Sunday, December 12, 2010

थकान दूर करने के लिए पृष्ठासन


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थकान दूर करने के लिए पृष्ठासन

Courtesy: BBCHindi.com
थकान दूर करने के लिए पृष्ठासन
तिर्यक कटिचक्रासन और पृष्ठासन ऐसे ही आसन हैं जिन्हें साथ-साथ किया जा सकता है. इससे संतुलन बना रहता है और शरीर के हर अंग की मालिश भी हो जाती है.

सीधे खड़े हो जाएँ. दोनों पैरों में डेढ़ फुट का अंतर रखें. दोनों हाथों की अँगुलियों को आपस में गूँथ लें. अब साँस भरें और दोनों बाज़ुओं को सिर के ऊपर लाएँ.

बाज़ू सीधा रखें. कलाई को पलटें ताकि हथेली का रूख़ आकाश की ओर रहे. अब साँस छोड़ते हुए कमर से आगे 90 डिग्री के कोण पर झुकें. सामने हथेली की ओर देखें. साँस बाहर रोककर रखें.

अपने शरीर और बाज़ुओं को ज़्यादा से ज़्यादा दाईं ओर घुमाएँ. इसी तरह बाईं ओर घुमाएँ. साँस भरें और सीधे खड़े हो जाएँ. अब साँस निकालते हुए हाथों को नीचे कर लें. यह एक पूरा चरण है.

पाँच बार इस इस आसन का अभ्यास करें. श्याटिका या स्लिप डिस्क की समस्या होने पर आगे की ओर झुकने वाले आसन नहीं करें.

तिर्यक कटिचक्रासन कंधे, पीठ और कमर की माँसपेशियों को व्यायाम देता है और उनकी शक्ति बढाता है. इस आसन के नियमित अभ्यास से कमर की जकड़न दूर होती है.शारीरिक और मानसिक तनाव कम करने में भी यह आसन सहायक है.

पृष्ठासन

नियमित अभ्यास से पैरों की माँसपेशियाँ मज़बूत बनती हैं

सीधे खड़े हो जाएँ. दोनों पैरों में डेढ फुट का अंतर रखें. पैरों को समानांतर नहीं रखें. दोनों पैरों की अँगुलियों को थोड़ा बाहर की ओर मोड़ लीजिए.

दोनों हाथों को नितम्ब के नीचे यानी जंघाओं के पिछले भाग पर सटाकर रखें. साँस भरें और साँस छोड़ते हुए घुटनों को थोड़ा मोड़ें. कमर से पीछ झुकते जाएँ और हाथों को नीचे सरकाते जाएँ.

पीछे झुकते हुए अगर आप हाथों को घुटनों के पिछले भाग तक पहुँचा सकें तो बहुत अच्छा है. अभ्यास हो जाने पर आप अपने हाथ टखनों तक पहुँचा सकते हैं.

लेकिन पीछे झुकने में जल्दबाज़ी नहीं करें और संतुलन बनाकर रखें. पृष्ठासन करने समय सिर को पीछे की ओर ढीला छोड़ दें. इस अवस्था में कुछ सेकेंड रुकने का प्रयास करें.

साँस भरें और फिर सीधे खड़े हो जाएँ. यह पूरा एक चरण है. तीन बार इसका अभ्यास करना चाहिए. पेट में अल्सर, उच्च रक्तचाप, श्याटिका या स्लिप डिस्क की समस्या होने पर पृष्ठासन का अभ्यास नहीं करें.

लाभ

पृष्ठासन करने से पेट की माँसपेशियों में खिचाव आता है. इससे पेट के सभी अंगों की कार्यक्षमता बढती है और स्फूर्ति आती है. नियमित अभ्यास से पीठ और कमर के हिस्से में रक्त का संचार बढ जाता है.

पीठ और कमर की जकड़न दूर होती है. तंत्रिकाओं को ताकत मिलती है और ताज़गी की अनुभूति होती है. साथ ही मानसिक संतुलन बढता है.
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