Tuesday, June 2, 2020

सतसंग के प्रसंग उपदेश प्रेमपत्र और रोजाना वाक्यात






परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज

-रोजाना वाकियात- कल का शेष:-

 दूसरी बात इससे भी  अजीब है।  प्रोफेसर साहब बयान करते हैं " मैं अभी मेज पर बैठा हुआ था कि 2 मिनट खामोश रहने का ऐलान किया गया।  यह इस गरज से था कि सब लोग अंतर में ध्यान करें। मगर मुझे यह 2 मिनट करोड़ों बरस के बराबर लंबे महसूस हुए ।" यह है मगरिब की चंचलता का नमूना। 2 मिनट निश्चल बैठना भी दूभर है। भला ऐसे लोग अंतर्मुख साधन कब करने लगे?  हिंदुस्तानी भाइयों ! तुम गरीब हो,कष्टग्रस्त हो लेकिन तुम अपने मन को पश्चिम वालों के मुकाबले निहायत आसानी से निश्चल कर सकते हो। तुम्हारे अंदर रूहानियत की तालीम के लिए अधिकार मौजूद है ।।                             

   तीसरी बात भी काफी दिलचस्प है । प्रोफेसर साहब बड़े देश विदेश में फिरने वाले पर्यटक हैं। एक मर्तबा आप ग्रेटब्रिटेन के उत्तर में " फउला' नामी द्वीप में पहुंचे । इस द्वीप  का साढे तीन  मील क्षेत्रफल है ।आबादी ढाई सौ व्यक्ति। आबादी का पेशा मछली पकड़ना । आपकी आगमन के पहले शीत के दिनों में समुद्री हवाएं बहुत तेज चली दूसरे दीपों से बिल्कुल कटी हुई(खंडित) हो गई । 5 माह तक उस द्वीप की आबादी ने सख्त मुसीबत उठाई। अकाल के मुतअल्लिक़ खबरें बोतलों में बंद करके समंदर से छोड़ी गई जो परली पार पहुंच गई और अडबगज से एक जहाज सामान खानपान लेकर रवाना हुआ लेकिन समुंदर में तूफान आ रहा था इसलिए वह वापस गया । कुछ दिनों बाद दूसरा जहाज रवाना हुआ और वह द्वीप फउला के किनारे तक सलामत पहुंच गया। जहाज के लोगों ने निहायत घबराकर द्वीप के बाशिंदों से अकाल की मुसीबत का हाल दरियाफ्त किया। बाशिंदों ने आठ आठ आँसू रोकर बयान किया " और तो सब कुछ काफी था लेकिन तंबाकू बिल्कुल खत्म हो गया था । हम लोगों ने तंबाकू के बजाय चाय ,रुई ,और लकड़ी के बुरादे के कश ले ले कर दिन काटे हैं " अपनी तरफ से कोई राय लिखने की जरूरत नहीं । मरगिब के लोग तंबाकू न मिलने से परेशान हो जाते हैं और मशरिक के लोग सूखे टुकड़ों के मोहताज हैं और खामोश है !प्रोफेसर साहब का शुभ नाम ऐडवर्ड वेस्टमार्क है। जो बात लिखते है साफ-साफ लिखते हैं।.   

            

  🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**


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परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज


 -सत्संग के उपदेश -भाग 2-( 51)-

【 अंशांशिभाव से क्या अभिप्राय है ?】:


- राधास्वामी मत में सुरत यानी आत्मा और राधास्वामी दयाल यानी सच्चे मालिक में अंशांशिभाव माना गया है जिससे जाहिर है कि दोनों का एक जौहर है और मन व माया के बंधनों से आजाद होने पर यानी अपनी असली निर्मल चेतन अवस्था में लौटने पर सुरत का वही हाल होता है जो समुंदर में दाखिल होने पर नदियों व नालों का हुआ करता है यानी जब तक पर जमीन पर बहते हैं, नदी नाले कहलाते हैं और उनके जुदा-जुदा नाम व रुप रहते हैं लेकिन जब वे समुंदर में दाखिल हो जाते हैं तो उनके नाम और रूप मिट जाते हैं और उनका समुद्ररुप हो जाता है । वाजह हो कि नदी, नालों व समुंद्र की मिसाल सूरत की निर्मल अवस्था के बयान पर हर पहलू से नहीं घटती क्योंकि पानी एक स्थूल चीज है औरत सुरत व सच्चा मालिक चेतन जौहर है इसलिए चेतन जौहर की हालत स्थूल पदार्थों की मिसाल से बयान करने में स्थूल पदार्थों के गुणों के दोषों खवामख्वाह दर्मियान में आ जाते हैं । इस मिसाल को विचारते वक्त नदी नालों के समुंद्र में गिरने पर अपने नाम व रुप   को खो देने और उनके जल का समुद्र के जल के साथ तदरुप यानी हमजात हो जाने का भी ध्यान में रखना चाहिए।                    बाज लोग लफ्ज अंश के मानी टुकड़ा या जुज लगा कर उसका ख्याल करते वक्त लकड़ी के टुकड़ों या पानी की बूंदो की हालत सामने रखकर एतराज करते हैं कि संतमत की तालीम कि रु से यह मानना होगा कि मालिक टुकड़ों या जुजों में तकसीम हो सकता है बल्कि यह कहना होगा रचना होने पर अनेक सुरतों यानी आत्माओं के जहूर से,जो इस संसार में देह धारण किए हुए नजर आती है, मालिक के बेशुमार टुकड़े हो गये है।

क्रमशः                                   

🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**



: **परम गुरु हुजूर महाराज -

प्रेम पत्र -भाग 1- कल से आगे:-(5)

आम दस्तूर है कि मन ऊंचे से ऊंचे और बढ से बढ की बात को जल्दी से और बे मेहनत और तकलीफ के हासिल करना चाहता है।  इस सबब से हर आदमी, जिसको थोड़ी बहुत विद्या और समझ  हासिल है,  इस मत में जल्द शामिल हो जाता है और अहंकार करके अपनी असली हालत की (कि निपट संसारियों के मुआफिक हैं)  बल्कि परख नहीं करता । यह बाचक ज्ञानी निर्भय होकर भेषों और ब्राह्मणों और गृहस्थों को बगैर परखे उनके अधिकार के बाचक ज्ञानी बनाते चले जाते हैं। इसमें भारी नुकसान उनका और उनके संगियों का होता है कि भक्ति वे मार्ग में शामिल होने के लायक नहीं रहते और दीनता मन में बिल्कुल नहीं रहती। इस सबब से उनके उद्धार का रास्ता बिल्कुल बंद हो जाता है।।                                                   

 (6) इस समय में छोड़े या बहुत सब मतों के लोग जिनको थोड़ी विद्या और बुद्धि हासिल है, बाचक ज्ञान को पसंद करके इस नए मत में शामिल होते चले जाते हैं, क्योंकि इसमें उनको बिल्कुल आजादी यानी स्वतंत्रतख हासिल हो जाती है और किसी का खौफ और शर्म नहीं रहती, निर्भय होकर मन और इंद्रियों के धारों में बहते हैं और अपने हाल से बेखबर रहते हैं । इन विचारों ने बड़ा धोखा खाया , पर इनका इलाज कुछ नहीं है क्योंकि यह साधन करने वालों की बात बिल्कुल नहीं सुनना चाहते हैं बल्कि उनको नादान समझते हैं और अपने आप को समझदार और होशियार मानते हैं । यह लोग अपनी करनी और व्यवहार के माफिक अंत में फल पाएंगे।

क्रमशः       

🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**




प्रेमपत्र सतसंग के उपदेश और रोजाना वाक़ियात








**परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज

- रोजाना वाकियात- 14 अक्टूबर 1932- शुक्रवार:-

 ख्वाजा हसन निजामी को मालिक ने अलावा और गुणों के हास्य और प्रकृति भी इनायत की हैः जिसका वह हमेशा उचित इस्तेमाल करते हैं और उसकी मार्फत अपना विषय निहायत खूबी से बयान कर देते हैं। आपके रोजनामचे में बुढ्ढों के लिए है खैरात का जिक्र हो रहा है ।आपकी राय है कि जो लोग खैरात के आदी हो जाते हैं वह कभी काम को हाथ नहीं लगाते । मेरा तजुर्बा भी यही है। मैंने कई मर्तबा ब्राह्मणों को कहते सुना, " हम तो मांगखानी जात है । हमसे कलों पर काम न हो सकेगा " इसी वजह से सत्संग में चंदा मांगने का तरीका दूषित करार दिया गया और इसी वजह से मैंने बाहरी लोगों की पेश की हुई माली आर्थिक सहायता मंजूर करने से इंकार कर दिया । भीख मांगने या खैरात लेने की ऐसी दुर्व्यसन है कि एक मर्तबा लग जाने पर मुश्किल ही से छूटती है । अगर सतसंगियों को मौका दिया जाये तो निहायत आसानी से लाख दो लाख रुपया बतौर चंदा वसूल करके भेंट कर सकते हैं। लेकिन मैं उनसे यही कहता हूं कि अपनी मेहनत के पैदा किये हुए चार आनों में से एक पैसा या धेला भेंट करो। तुम्हारा यह धेला भीख माँगे के करोड रूपये से बेहतर है। भीख माँगने कीआदत इंसान के पौरुष का खात्मा कर देती है। खैर!  ख्वाजा साहब तहरीर फरमाते है:-" एक मस्जिद के सामने मुल्ला की सूखी रोटियाँ सूख रही थी एक भिश्ती के बैल ने वह रोटियाँ खा ली। मुल्ला ने बैल को मारा। भिश्ती रोने लगा। मुल्ला ने कहा मैने बैल को मारा है तुझे नही मारा । तू क्यो रोता है।भिश्ती ने कहा इसलिये रोता हूँ कि मेरा बैल भी मेरी तरह निकम्मा हो जायेगा क्योंकि उसने मुफ्त की आई हुई रोटियाँ खा ली है।"                         


   तबीयत बदस्तूर  रोगी है। लेटे लेटे काम किया जाता है। रात के सतसंग में शिरकत से वंचित हूँ। सुबह की सैर और शाम की लॉन पर बैठक स्थगित है ।आज गीता का हिंदी अनुवाद भी छपना शुरू हो गया है ।

उर्दू अनुवाद निस्फ से ज्यादा छप चुका है।

           
 🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**



परम गुरु हुजूर महाराज-

 प्रेम पत्र -भाग -1 कल से आगे:-(7)

 इन गुरुओं से जिनका जिक्र ऊपर लिखा गया (जो वह अपने मत के पूरे निष्ठावान भी होवें) जीव का सच्चा उद्धार नहीं हो सकता है , क्योंकि उनका सिद्धांत पद पाया की हद में है । इस वास्ते अब उन महापुरुषों का जिक्र, कि जिनके वसीले से जीव सच्ची मुक्ति हासिल कर सके, किया जाता है और उनका नाम संत सतगुरु और साधगुरु है।।                     


संत सतगुरु उनको कहते हैं कि जो पिंडी और ब्रह्मांडी माया की हद के पार, जहां दयाल देंश अथवा निर्मल चेतन देश है,पहुंचकर सच्चे मालिक सत्तपुरुष राधास्वामी से मिले । और उनका रास्ता चलने का घटना है और सुरत शब्द योग के अभ्यास से वह रास्ता तय करके अभ्यासी उस देश में पहुंच सकता है और वहां पहुंचकर जन्म मरण से रहित होकर परम आनंद को प्राप्त होता है। वह देश भी अमर है और वहां का आनंद भी अपार और अमर है ।।       


 साधगुरु उनको कहते हैं कि जो संतों की दृष्टि के मुआफिक अभ्यास करते हैं मुकाम सुन्न में , जो त्रिकुटी और  ओंकारपद के परे है, पहुंचे हैं और आगे संत गति को प्राप्त होने वाले हैं। इनसे मिलकर भी जीव को भी वही फायदा हो सकता है जैसा कि संत सतगुरछ से, क्योंकि साधुगुरु संत सतगुरु के बनाए हुए हैं।।                                                 


(8) जब तक कि जीव को इन दोनों महापुरुषों में से कोई ना मिलेगा और वह उनको अपना गुरु या सतगुरु धारण करके प्रेम सहित सुरत शब्द योग की कमाई ना करेगा , तब तक सच्चा उद्धार या सच्ची में किसी तरह हासिल नहीं हो सकती है । इस वास्ते सब जीवों को , जो अपना सच्चा कल्याण चाहते हैं , मुनासिब और जरूरी है कि संत सद्गुरु या साधगुरु की खोज उनकी शरण लेवें और उन्ही का पाठ और उनके भेद और किसी मत में नहीं है।

क्रमशः                                           

 🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**







*परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज-


सत्संग के उपदेश -भाग 2-

कल से  आगे:-

मगर जैसा कि ऊपर इशारा किया गया यह एतराज चेतन जौहर व स्थूल मसाले के बाहमी फर्क को नजरअंदाज करने से पैदा होता है ।अगर अंश का अनुमान करते वक्त बजाय लकड़ी के टुकड़ों व पानी के कतरों  के सूर्य की किरणों की जानिब तवज्जुह मुखातिब की जाए और सूर्य (जो कि अंशी भंडार रूप है) और सूर्य की किरणों की( जो कि अंश रूप है ) का बाहमी रिश्ता निगाह में रक्खा जावे तो सुरतों की हस्ती से मालिक के लातादाद  टुकड़ों में तक्सीम हो जाने का भ्रम आसानी से दूर हो सकता है । लेकिन मालूम हो कि चेतन जोहर सूर्य की किरणों से भी बदर्जहा लतीफ यानी सूक्ष्म है और जब तक किसी शख्स को रूहानी मंडल का वाकई तजुर्बा ना हो जाए उसका इस जोहर की निस्बत अनुमान लाजमी तौर पर गलत होगा ।इसलिए यह समझ में आना मुश्किल नहीं होना चाहिए कि सूरत मालिक का अंश कहलाते हुए मालिक से किसी हालत में जुदा नहीं होती और रचना होने से सिर्फ यह सूरत पैदा हुई है कि सुरत का रुख बाहर की तरफ से यानी प्रकृति की जानिब हो गया है लेकिन अंतर में सुरत का मालिक के साथ झीना रिश्ता बराबर कायम है और अखंडित है और उद्धार व मोक्ष के मानी यही है कि किरणरुपी सुरत का रुख बाहर की जानिब से हटकर  अपने सूर्यरुपी निज भंडार की जानिब कियम  हो। संतमत की इस तालीम को सुनकर दुखी से दुखी और कंगाल से कंगाल को बड़ी जबरदस्त तकवियत हासिल होती है और शरीर व मन संबंधी सभी क्लैश निहायत बदहैसियत व कमजोर दिखलाई देने लगते हैं और.शौक व हिम्मत पैदा होती है कि मुनासिब साधन करके मौजूदा जीवावस्था के पार होकर और दरमियानी मंजिलें तय करके जहां तक मुमकिन जल्द निर्मल चेतन यानी खालिस रुहानी अवस्था या गति 'जो सूरत की असलु हालत है"  हासिल की जावे। नीज  समझ में आ जाता है कि संतमत यानी राधास्वामी मत में साध व संत व सतगुरु की जो इस कदर महिमा की गई है वह निहायत जायज व दुरुस्त हैं क्योंकि जिस पुरुष ने शरीर व मन के बंधनों पर फतह हासिल करके मन के बंधनो पर फतह हासिल करके मन के घाट की जागृति के बजाय सूरत के घाट की जागृति हासिल कर ली है या दूसरे लफ्जों में जो नाला समुद्र में दाखिल हो गया है या जो किरण बजाय बाहर मुखी चमकने के अपने सूर्य में लोट गई है, उसमें और सच्चे मालिक में कोई भेद नहीं है

 क्रमशः               

 🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**



शाम का सतसंग और बचन






**राधास्वामी!! 02-06-2020-

आज शाम के सतसंग में पढे गये पाठ- (1) हे मेरे प्यारे सतगुरू। तुम दाता अपर अपारा।। (प्रेमबानी-3-शब्द-2-पृ.सं. 271)                                      (2) सतगुरु पूरे खोज कर हुआ चरन लौलीन। राधास्वामी कहें पुकार कर शिष पूरा लो चीन।। बलिहारी वा शिष्य के हौं वारी सौ बार। जड चेतन का भेद जिन चीन्ह लिया मन सार।। (प्रेमबिलास-शब्द-124,पृ.सं.181)                                                           (3) यथार्थ प्रकाश- भाग-1(परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज)          🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**

**राधास्वामी!!                                         02-06- 2020 -आज शाम के सत्संग में पढ़ा गया बचन- यथार्थ प्रकाश- भाग पहला-{ राधास्वामी मत  की शिक्षा}:-                                          (1) राधास्वामी मत की शिक्षा अत्यंत सरल और सहज है पर उस हृदय के लिए, जो सच्चे मालिक के प्रेम से शून्य है, इसका समझना न केवल कठिन, बल्कि असंभव है।।                                                         ( 2) राधास्वामी- मत सिखलाता है कि मनुष्य के शरीर में तीन तत्व यानी जौहर मौजूद है- पहला स्थूल तत्व- जिससे मनुष्य का स्थूल शरीर बनता है, दूसरा सूक्ष्म तत्व- जो मनुष्य के मन का मसाला है और तीसरा आत्मतत्व अर्थात सुरत-जो मनुष्य के शरीर की जान है और जिससे उसके मन और शरीर का विकास होता है। मनुष्य के शरीर और मन दोनों नाशमान है परंतु आत्मा अविनाशी है।                                           (3) और जैसे मानुषी देह को रचने और जान देने वाली उसकी आत्मा अर्थात सुरत है ऐसे ही सारी सृष्टि को रचने और जान देने वाली एक "परम आत्मा " है जिसको कुल्लमालिक या राधास्वामी दयाल कहते हैं ।और जोकि आत्मा और परमात्मा अर्थात सुरत और कुलमालिक का सार तत्व यानी जौहर एक ही है इसलिए मानुषि शरीर समस्त रचना का नमूना माना जाता है और रचना को                                   " ब्रह्मांड" " और मानुषि शरीर को "पिंड" कहते हैं ।             🙏🏻राधास्वामी🙏🏻               यथार्थ प्रकाश -भाग 1 -परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज!**

Monday, June 1, 2020

रवि अरोड़ा की नजर में...........





अख़बारों का मर्सिया

रवि अरोड़ा

घर में कई अख़बार आते हैं मगर मेरे बच्चे अख़बार नहीं पढ़ते । हालाँकि दुनिया जहान की ख़बर उन्हें मुझसे ज़्यादा रहती है । जब पूछो कि तुम्हें यह सब कैसे पता तो जवाब मिलेगा- नेट से । मेरे बच्चे ही नहीं मेरे रिश्तेदारों और मित्रों के बच्चों का भी यही हाल है । न जाने क्यों नई पीढ़ी अख़बार से दूरी बना कर चलती है । रही सही कसर अब कोरोना संकट ने पूरी कर दी है । संक्रमण के भय से लोग बाग़ अख़बार नहीं ख़रीद रहे । बड़ी बड़ी सोसायटीज ने भीतर अख़बार आने पर प्रतिबंध लगा रहा है । चौराहों और बाज़ारों में तो ख़ैर अख़बारों की फ़ुटकर बिक्री का सवाल ही नहीं । नतीजा समाचार पत्रों का सर्कुलेशन औंधे मुँह ज़मीन पर आ गया है । आर्थिक संकट के चलते निजी क्षेत्र के ही नहीं सरकारी विज्ञापन भी ख़त्म सिमट रहे हैं और आर्थिक तंगी के नाम पर पत्रकारों की धड़ाधड़ नौकरियाँ जा रही हैं । बेशक कभी न कभी महामारी का यह संकट भी ख़त्म होगा मगर इसके साथ बदली हमारी जीवन शैली में भी क्या अख़बारों की जगह होगी , यह सवाल मौजू हो चला है ।

कोरोना काल से पूर्व की बात करें तो पूरी दुनिया में अख़बारों का अवसान प्रारम्भ हो चुका था । डिजिटल मीडिया धीरे धीरे अख़बारों की जगह लेने लग गया था मगर भारत में फिर भी प्रिंट मीडिया सालाना पाँच फ़ीसदी की दर से आगे बढ़ रहा था । इंडियन रीडरशिप सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार संकट से पूर्व भारत में अख़बारों की प्रतिदिन बिक्री साढ़े बयालिस करोड़ थी । हालाँकि यह आँकड़ा वह है जो आरएनआई को सवा लाख से अधिक अख़बारों ने अपने सर्कुलेशन में दर्शाया है । चूँकि विज्ञापन की दरें सर्कुलेशन से जुड़ी होती हैं अतः तमाम अख़बार अपनी प्रसार संख्या बढ़ा चढ़ा कर ही दर्शाते हैं । इस आँकड़े के अनुरूप तो चार सदस्यों वाले देश के प्रत्येक परिवार में एक से अधिक अख़बार की ख़रीद होनी चाहिये । ज़ाहिर है देश की एक तिहाई आबादी के पास जब दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ नहीं है और देश की सम्पूर्ण साक्षरता दर भी 74 फ़ीसदी ही है तो अख़बारों की प्रसार संख्या इतनी कैसे हो सकती है ?

दरअसल लघु और मझोले अख़बार ही नहीं देश के जाने माने तमाम बड़े अख़बार भी प्रसार संख्या में खेल करते हैं और प्रिंटिंग प्रेस से अख़बार सीधा रद्दी बाज़ार पहुँच जाता है । ख़ैर आँकड़ों से इतर ज़मीनी हक़ीक़त देखें तो भी इस समय अख़बारों का प्रसार ज़मीन पर है । देश के एक बड़े अख़बार के प्रसार विभाग से जुड़े अधिकारी की मानें तो कोरोना संकट के बाद अख़बारों का प्रसार मात्र बीस फ़ीसदी रह गया है । अपनी मौजूदगी बनाये रखने के लिए सभी प्रकाशक अपने ऑन लाइन एडिशन निकाल रहे हैं और पे वॉल बंद कर अपना अख़बार पाठकों को मुफ़्त उपलब्ध करवा रहे हैं । छोटे अख़बार भी अपनी पीडीएफ फ़ाइल को प्रसारित कर बता रहे हैं कि अभी हम मरे नहीं हैं । अनेक अख़बारों ने अपने वट्सएप संस्करण भी निकाले हुए हैं । उधर, बिक्री बंद होते ही छोटे ही नहीं बड़े अख़बारों ने भी पत्रकारों की छँटनी शुरू कर दी है । प्रसार और छपाई से जुड़ा आधे से अधिक स्टाफ़ तो पहले झटके में ही घर बैठा दिया गया था । बड़े बड़े अख़बारों ने भी अपने पेज कम कर दिए हैं और हिंदुस्तान टाइम्स और टाइम्स आफ इंडिया जैसे दिग्गज समूह भी इस मामले में किसी क़स्बे के अख़बार जैसा व्यवहार कर रहे हैं । हालात यह हो चले हैं कि लघु और मझोले अख़बारों में कई महीने से वेतन नहीं बँट पा रहा तो बड़े समूह तीस से चालीस फ़ीसदी कटौती की बात कर रहे हैं ।

कुल मिला कर सवाल यह है कि क्या अख़बार अब हमारी ज़िंदगी से विदा लेने वाले हैं ? स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख हथियार, आज़ादी के बाद जागरूकता के सबसे बड़े औज़ार एवं देश में बौद्धिकता की अलख जगाए वाले सबसे बड़े सिपाही की विदाई का क्या समय आ गया है ? क्या वाक़ई अब हमें अपने प्रिय अख़बारों का मर्सिया पढ़ना पड़ेगा और कहना पड़ेगा कि हे अख़बारों अब आराम करो सन 1780 से लेकर 2020 तक आपने हमारी बहुत सेवा कर ली ?


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यथार्थ प्रकाश भूमिका





**राधास्वामी!! 01-06-2020-

आज शाम के सतसंग में पढा गया बचन-परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज आनन्दस्वरुप साहब द्वारा रचित -(यथार्थ-प्रकाश भाग-1)                     

भूमिका:-                                                                                   

सच्चे मालिक ने मनुष्य को जो श्रेष्ठ वस्तुएँ प्रदान की है उनमें सबसे उत्तम परमार्थ है। किन्तु खेद है कि जैसे कोई छोटे बच्चे अज्ञानतावश अपने अच्छे से अच्छे वस्त्रों को थोड़े ही समय में मैला-कुचैला कर डालते हैं ऐसे ही भारतवर्ष के बहुत से लोगों ने अपना प्रमार्थ कलुषित कर लिया है और मालिक का यह अनुग्रह आजकल देश के लिए गलग्रह बन रहा है तथा परमार्थ के प्रेमियों और धर्म के नेमियों के लिए सुख शांति से जीवन व्यतीत करना और धार्मिक पथ-परदर्शकों के लिए अपने विचारों का प्रचार करना अत्यंत कठिन हो रहा है । उचित तो यह था कि यह पवित्र भारत भूमि ,जहाँ सहस्त्रों ऋषि ,संत, महात्मा और औलिया निरंतर प्रकट होते आये हैं, आध्यात्मिकता से परिपूर्ण होकर आध्यात्मिक शिक्षा के लिए अत्यंत अनुकूल वातावरण उपस्थित करती। परंतु खेद के साथ कहना पड़ता है कि इस प्रकार की परिस्थिति उपस्थित करने के बदले यह देश गृह -विग्रहों, अज्ञान-जन्य क्रियाओं तथा पक्षपात -पूर्ण कार्यवाहियों का केंद्र बन रहा है। इस स्वतंत्रता के युग में , जबकि प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म में श्रद्धा भाव रखने तथा अपने मत के आचार्यों के आदर सत्कार और अपने विचार के प्रचार के लिए पूरा अधिकार प्राप्त है, यह कैसे सहन किया जा सकता है कि कोई व्यक्ति अन्य मतों के आचार्यों के विषय में जनता के समक्ष हृदय- पीड़क और अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करें और अपने मत की शिक्षा की श्रेष्ठता प्रकट करने के बदले  दूसरें मतो की शिक्षा को तोड़ मरोड़ कर उसके उपहास करने की अनुचित चेष्टा में उद्यत हो । इसी नीति का अनुसरण करते हुए सत्संगी- जनता ने अपने सत्तर वर्ष से अधिक जीवन में दूसरे मतों के आचार्यों के विरुद्ध कटु शब्द मुख से निकालने अथवा उनकी शिक्षा-दीक्षा में छिद्रान्वेषण करने के दोष से अपने आप को बचाए रक्खा- यहाँ  तक कि यदि किसी अन्य संप्रदाय के लोगों ने इस नीति की उपेक्षा करके राधास्वामी मत की शिक्षा और उसके आचार्यों के विरुद्ध अनुचित शब्द प्रयुक्त किए तो उनका उत्तर मौनावलम्बन से ही दिया। परंतु शौक है कि इन दिनों कतिपय  आर्य -समाजी और  सनातनी तथा अकाली भाइयों ने इस मौनता को हमारी आचारिक निर्बलता समझकर अनर्गल वाचालता से काम लेना आरंभ किया। अतः विवश होकर इस संबंध में लेखनी उठाने की आवश्यकता प्रतीत हुई और राधास्वामी -मत की स्थिति स्पष्ट करने के लिए यह पंक्तियां लिखनी पड़ी।।                                                     परंतु पाठकगण यह  न समझे कि इस पुस्तक में आक्षेपको के समान कटूक्ति अथवा दुर्वचन से काम लिया जाएगा ।नहीं , चेष्टा यह होगी की प्रथम राधास्वामी-मत की वास्तविक शिक्षा का संक्षेप में वर्णन करके आक्षेपकों के आक्षेपो के उत्तर दियें जायँ, जिससे वे समझ सके कि राधास्वामी मत के विरुद्ध उनके लेख तथा भाषण कहां तक न्याय संगत है;  फिर आक्षेपको की मान्य धर्म पुस्तकों से अनेक प्रमाण उद्घृत करके उन कठिनाइयों का उल्लेख किया जाय जिनके कारण राधास्वामी-मत के अनुयायी उनसे सहमत होने और वेदादि शास्त्रों को उस आदर की दृष्टि से देखने में असमर्थ हैं जिससे वे आक्षेपक उन्हे देखते हैं।।                                    आशा है कि इन पंक्तियों के अवलोकन के अनन्तर हम पर कृपा- कटाक्ष  करने वाले सज्जन अपना वर्तमान हृदय -पीडक व्यवहार छोड़कर हमारी कठिनाईयों को हटाने और राधास्वामी-मत की शिक्षा का यथार्थ भाव समझने की सुचारू चेष्टा में संलग्न होंगे तथा हमारे लिए अपने धर्म पुस्तकों की शिक्षा से लाभान्वित और अपने लिये राधास्वामी-मत की शिक्षा से लब्ध लाभ होने की परिस्थिति उत्पन्न करेंगें।।

        आनंदस्वरूप                             

 दयालबाग:-                                           
   12 जनवरी 1934 -       
                              
🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**
Radhasw

राधास्वामी

बचन रोजाना वाक्यात और उपदेश







परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज

-रोजाना वाकियात-

 कल का शेष:-

दूसरी बात इससे भी  अजीब है।  प्रोफेसर साहब बयान करते हैं " मैं अभी मेज पर बैठा हुआ था कि 2 मिनट खामोश रहने का ऐलान किया गया।  यह इस गरज से था कि सब लोग अंतर में ध्यान करें। मगर मुझे यह 2 मिनट करोड़ों बरस के बराबर लंबे महसूस हुए ।" यह है मगरिब की चंचलता का नमूना। 2 मिनट निश्चल बैठना भी दूभर है। भला ऐसे लोग अंतर्मुख साधन कब करने लगे?  हिंदुस्तानी भाइयों ! तुम गरीब हो,कष्टग्रस्त हो लेकिन तुम अपने मन को पश्चिम वालों के मुकाबले निहायत आसानी से निश्चल कर सकते हो। तुम्हारे अंदर रूहानियत की तालीम के लिए अधिकार मौजूद है ।।                                   तीसरी बात भी काफी दिलचस्प है । प्रोफेसर साहब बड़े देश विदेश में फिरने वाले पर्यटक हैं। एक मर्तबा आप ग्रेटब्रिटेन के उत्तर में " फउला' नामी द्वीप में पहुंचे । इस द्वीप  का साढे तीन  मील क्षेत्रफल है ।आबादी ढाई सौ व्यक्ति। आबादी का पेशा मछली पकड़ना । आपकी आगमन के पहले शीत के दिनों में समुद्री हवाएं बहुत तेज चली दूसरे दीपों से बिल्कुल कटी हुई(खंडित) हो गई । 5 माह तक उस द्वीप की आबादी ने सख्त मुसीबत उठाई। अकाल के मुतअल्लिक़ खबरें बोतलों में बंद करके समंदर से छोड़ी गई जो परली पार पहुंच गई और अडबगज से एक जहाज सामान खानपान लेकर रवाना हुआ लेकिन समुंदर में तूफान आ रहा था इसलिए वह वापस गया । कुछ दिनों बाद दूसरा जहाज रवाना हुआ और वह द्वीप फउला के किनारे तक सलामत पहुंच गया। जहाज के लोगों ने निहायत घबराकर द्वीप के बाशिंदों से अकाल की मुसीबत का हाल दरियाफ्त किया। बाशिंदों ने आठ आठ आँसू रोकर बयान किया " और तो सब कुछ काफी था लेकिन तंबाकू बिल्कुल खत्म हो गया था । हम लोगों ने तंबाकू के बजाय चाय ,रुई ,और लकड़ी के बुरादे के कश ले ले कर दिन काटे हैं " अपनी तरफ से कोई राय लिखने की जरूरत नहीं । मरगिब के लोग तंबाकू न मिलने से परेशान हो जाते हैं और मशरिक के लोग सूखे टुकड़ों के मोहताज हैं और खामोश है !प्रोफेसर साहब का शुभ नाम ऐडवर्ड वेस्टमार्क है। जो बात लिखते है साफ-साफ लिखते हैं।.                   

🙏🏻 राधास्वा



*परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज -सत्संग के उपदेश

 -भाग 2-( 51)

-【अंशांशिभाव से क्या अभिप्राय है ?】:

- राधास्वामी मत में सुरत यानी आत्मा और राधास्वामी दयाल यानी सच्चे मालिक में अंशांशिभाव माना गया है जिससे जाहिर है कि दोनों का एक जौहर है और मन व माया के बंधनों से आजाद होने पर यानी अपनी असली निर्मल चेतन अवस्था में लौटने पर सुरत का वही हाल होता है जो समुंदर में दाखिल होने पर नदियों व नालों का हुआ करता है यानी जब तक पर जमीन पर बहते हैं, नदी नाले कहलाते हैं और उनके जुदा-जुदा नाम व रुप रहते हैं लेकिन जब वे समुंदर में दाखिल हो जाते हैं तो उनके नाम और रूप मिट जाते हैं और उनका समुद्ररुप हो जाता है । वाजह हो कि नदी, नालों व समुंद्र की मिसाल सूरत की निर्मल अवस्था के बयान पर हर पहलू से नहीं घटती क्योंकि पानी एक स्थूल चीज है औरत सुरत व सच्चा मालिक चेतन जौहर है इसलिए चेतन जौहर की हालत स्थूल पदार्थों की मिसाल से बयान करने में स्थूल पदार्थों के गुणों के दोषों खवामख्वाह दर्मियान में आ जाते हैं । इस मिसाल को विचारते वक्त नदी नालों के समुंद्र में गिरने पर अपने नाम व रुप   को खो देने और उनके जल का समुद्र के जल के साथ तदरुप यानी हमजात हो जाने का भी ध्यान में रखना चाहिए।                    बाज लोग लफ्ज अंश के मानी टुकड़ा या जुज लगा कर उसका ख्याल करते वक्त लकड़ी के टुकड़ों या पानी की बूंदो की हालत सामने रखकर एतराज करते हैं कि संतमत की तालीम कि रु से यह मानना होगा कि मालिक टुकड़ों या जुजों में तकसीम हो सकता है बल्कि यह कहना होगा रचना होने पर अनेक सुरतों यानी आत्माओं के जहूर से,जो इस संसार में देह धारण किए हुए नजर आती है, मालिक के बेशुमार टुकड़े हो गये है। क्रमशः                               

    🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**


*परम गुरु हुजूर महाराज -प्रेम पत्र -भाग 1-
कल से आगे:-(5)

 आम दस्तूर है कि मन ऊंचे से ऊंचे और बढ से बढ की बात को जल्दी से और बे मेहनत और तकलीफ के हासिल करना चाहता है।  इस सबब से हर आदमी, जिसको थोड़ी बहुत विद्या और समझ  हासिल है,  इस मत में जल्द शामिल हो जाता है और अहंकार करके अपनी असली हालत की (कि निपट संसारियों के मुआफिक हैं)  बल्कि परख नहीं करता । यह बाचक ज्ञानी निर्भय होकर भेषों और ब्राह्मणों और गृहस्थों को बगैर परखे उनके अधिकार के बाचक ज्ञानी बनाते चले जाते हैं। इसमें भारी नुकसान उनका और उनके संगियों का होता है कि भक्ति वे मार्ग में शामिल होने के लायक नहीं रहते और दीनता मन में बिल्कुल नहीं रहती। इस सबब से उनके उद्धार का रास्ता बिल्कुल बंद हो जाता है।।                                                   

 (6) इस समय में छोड़े या बहुत सब मतों के लोग जिनको थोड़ी विद्या और बुद्धि हासिल है, बाचक ज्ञान को पसंद करके इस नए मत में शामिल होते चले जाते हैं, क्योंकि इसमें उनको बिल्कुल आजादी यानी स्वतंत्रतख हासिल हो जाती है और किसी का खौफ और शर्म नहीं रहती, निर्भय होकर मन और इंद्रियों के धारों में बहते हैं और अपने हाल से बेखबर रहते हैं । इन विचारों ने बड़ा धोखा खाया , पर इनका इलाज कुछ नहीं है क्योंकि यह साधन करने वालों की बात बिल्कुल नहीं सुनना चाहते हैं बल्कि उनको नादान समझते हैं और अपने आप को समझदार और होशियार मानते हैं । यह लोग अपनी करनी और व्यवहार के माफिक अंत में फल पाएंगे। क्रमशः   

    🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**

Radhaswami   

बचन पाठ






                                                                  (3)                 🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**

**राधास्वामी!!

- आज शाम के सत्संग में पढ़ा गया बचन-

 कल से आगे-( 148)

का शेष भाग- नही, सतसँग की तालीम का यह असर न होगा बल्कि सूरते हाल यह होगी कि हर शख्स को, मर्द हो या औरत, अमीर हो या गरीब, गोरा हो या काला, हिंदू हो या मुसलमान, ईसाई हो या जैन , अपनी जिस्मानी, दिमागी व रूहानी ताकतों के बढ़ाने यानी उन्नत करने के लिए यकसाँ मौका मिले बशर्ते कि वह इन ताकतों का सोसाइटी यानी मुल्क के मुफाद के खिलाफ इस्तेमाल न करें - यानी हर शख्स को मदद मिलेगी  कि जिस सीगे में चाहे कदम रक्खें और किसी को एक दूसरे के मुआमलात  म़े दखल देने का हक ना होगा। लेकिन अगर कोई शख्स अपनी जिस्मानी या दिमागी ताकतों को ऐसी तरफ इस्तेमाल करने लगे या ख्यालात का प्रचार करें जिससे आवाम को नुकसान पहुँचे या पहुंचने का एहतमाल  हो तो जरूर दस्तन्दाजी की जायगी ।


यही असली मुसावात (साम्य) का बर्ताव है। मुसाबात के यह मानी नहीं है कि तमाम आदमियों को यकसाँ लम्बाई के कपड़े पहनाए जायँ या लम्बे आदमियों की टाँगे और मोटे आदमियों के जिस्म तराश दिये जायँ या अमीरों का रुपया छीन कर गरीबों व कंगालों को तकसीम कर दिया जाए ।


 न सब इंसानों के जिस्म यकसाँ बनाए जा सकते हैं , न  दिल व दिमाग। कुदरत को तफरीक(असाम्य) ही पसंद है और तफरीक ही से  कुदरत की नैरंगी व खूबसूरती है।  जैसे बैंड में मुख्तलिफ बाजे होते हैं -नफीरियाँ, ढोल, वायोलिन वगैरह- लेकिन एक राग का ख्याल रखने से सब बाजों की आवाजें एक स्वर पैदा कर देती है और आवाजों की तफरीक बाअसे मुसर्त हो जाती है।


ऐसे ही सत्संग की तालीम का यह असर होगा कि मुख्तलिफ दिल व दिमाग अपनी अपनी आवाजें निकालते हुए सुरीला राग पैदा करेंगे।

सतसंग के उपदेश- भाग तीसरा।       
             
🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**

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हर सू (तरफ)है आशकारा(प्रकट) जाहिर जहूर तेरा। हर दिल में बस रहा है जलवा व नूर(तेज) तेरा।।

 ऐ नूर जाने आलम(संसार की जान का प्रकाश) ! ऐ मालिके हकीकी(सच्चे मालिक)! हर शै तेरी है शाहिद(साक्षी,गवाह) हर शै में नूर तेरा।।

बादल में तेरी कुदरत बिजली में तेरा जलवा। दरिया में तेरी रहमत(दया) कतरे में नूर तेरा।।

 बादे सबा(सवेरै की सुहानी हवा) के झोंके तेरी सना के नगमे(स्तुति के गीत)।।

गुलशन तेरा जहूरा हर गुल में नूर तेरा।।वहदत(एकताई) तेरी है कसरत(अनेकता)  कसरत है नूरे जुलमत(अंधकार)।।

 हर रूह तेरा जर्रा जर्रा व नूर तेरा ।। जब से पिलाया तूने रहमत से जामें उल्फत(प्रेम का प्याला)।।

 है नाम तेरा लब पर बातिन में(अंतर) नूर तेरा।।

 ऐ साहबे करामत(परम दयालु)! वै मायए अतूफत(हे करूणाकर)! सद जान तेरे सदके(तुझ पर सो जाने निछावर) सुबहान(आश्चरयवाचक शब्द) नूर तेरा।।*


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जिसने सुमिरन नही किया उसने कुछ भी नही किया* !


         

*चाहे उसने लाखो दान पुण्य किये हो ग्रंथ पढे हो  चाहे रोज सत्संग सुनता हो पर सुमिरन के बिना व्यर्थ है*


         

*सुमिरन के बिना सतगुरु के रूहानी दर्शन कभी नहीँ हो सकते*सच्ची तडप से 15 मिनट भी की गयी भक्ति कुछ दिनो तक की जाने वाली भक्ति से भी ज्यादा बेहतर है*


                     
       *रब  रब करदे  उमर  बीत  गई ,*
 *रब  की  है , कदे  सोच्या   ही  नहीं ,*



**राधास्वामी!! 01-06-2020-

आज सुबह के सतसंग में पढे गये पाठ:-   
                            
(1) सुख समूह अंतर घट छाया। आरत सामाँ आन सजाया।। चढी सुरत सतपुरूष गजाया। सच्चखंड जा तख्त बिछाया।। (सारबचन-शब्द-5-पृ.सं.-104) (2) सुरतिया जाग उठी। सुध बचन गुरु के सार।।                                                                               

 सुन बचन गुरू के सार।। नित नई प्रीति जगत गुरु चरनन। बरनन करी न जाय।। (प्रेमबानी-2-शब्द-115,पृ.सं.249)                               

  🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**


पूज्य हुज़ूर का निर्देश

  कल 8-1-22 की शाम को खेतों के बाद जब Gracious Huzur, गाड़ी में बैठ कर performance statistics देख रहे थे, तो फरमाया कि maximum attendance सा...