Friday, February 7, 2020

राधास्वामी संत मत दयालबाग / गुरू महाराज के बचन

 *जो मालिक को देना है, छप्पर फाड़ के देगा*

*परम गुरु हुज़ूर प्रोफ़ेसर प्रेम सरन सतसंगी साहब द्वारा फ़रमाया अमृत बचन*
25.10.2019 - सायं सतसंग में
(पिछले दिन का शेष)
             *वैसे ही जिसने उपदेश इस जीवन में नहीं लिया, उसको कई जीवन बिताने पड़ेंगे, उपदेश मिलेगा, सब कर्मों का भार चुकता हो जाएगा, तब उद्धार होता है।* पहले ब्रह्माण्ड में पहुँचे, फिर उसके बाद ब्रह्माण्ड में मानसरोवर में गए जो threshold पर है, महाप्रलय के बाद और उस स्थान में भी वर्णन है हँस और हँसनियों का। तो हँस पहले निर्मल चेतन देश में पहुँच जाते हैं, हँसनियाँ कुछ अन्तराल के बाद, वह भी हँस बन जाते हैं और वह भी पहुँच जाते हैं। तो स्त्री पुरुष दोनों ही पहुँचते हैं, पर जैसा कहा जाता है कि देवी-देवताओं के नाम तो आप ब्रह्माण्ड तक ही पाते हैं, उसके आगे सत्तपुरुष होते हैं। *तो यह नहीं कि इस चोले में जो स्त्रियाँ हैं, उनका उद्धार नहीं होता, उनका भी उद्धार होता है। उनके कर्म उन्होंने यहीं काट दिए, तो बहुत थोड़े समय के लिये उनका मानसरोवर में हँसनी के रूप में रहना होता है। फिर वह भी हँस बन कर के निर्मल चेतन देश में स्थान प्राप्त करते हैं। तो इसलिए उनको कोई कमी नहीं होती। स्त्रियों का मान-सम्मान करना आदर्श बताया जाता है।*
राधास्वामी

परम पुरूष पूरन धनी मेहता जी महाराज

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻 *【परम गुरु हुजूर मेहताजी महाराज ,गुरुचरन दास मेहता जी महाराज :-20 दिसंबर 1885- 17 फरवरी 1975-】:- राधास्वामी सत्संग के छठे संत सतगुरु मेहताजी महाराज,  गुरुचरन दास माता जी महाराज का जन्म बटाला में एक सम्मानित पंजाबी परिवार में 20 दिसंबर 1885 को हुआ था। उनके पिता श्री आत्माराम मेहता साहब थे। मेहताजी महाराज बचपन से ही असाधारण मेधावी थे । लड़कपन से ही उन्होंने पढ़ाई में कड़ी मेहनत की और कुछ उच्च श्रेणियां प्राप्त की। उन्होंने गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर से बी.ए. की परीक्षा में द्वितीय स्थान प्राप्त किया। थामसन कॉलेज ऑफ सिविल इंजीनियरिंग रुड़की से सिविल इंजीनियर की परीक्षा पास की जिसमें उनको सर्वोत्तम इंजीनियरिंग डिजाइन व सर्वेइंग और ड्राइंग में पदक मिले। उन्होने पंजाब पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट में कार्य प्रारंभ किया और सेवा निवृत्ति तक उत्तरोतर उन्नति प्राप्त करते हुए चीफ इंजीनियर और शासन के सचिव पद  को प्राप्त किया।।           13 वर्ष की उम्र में हुजूर महाराज अपने पिता जी के साथ हुजूर महाज के सत्संग में पीपलमंडी आये थे। हुजूर महाराज ने उनका नाम पूछा और नाम हरचरन दास बताये जाने पर  उन्होंने उसे बदल कर गुरु चरन दास रख दिया । सन 1905 में इलाहाबाद में एक नाटक के प्रदर्शन के बाद महाराज साहब जी ने मेहताजी महाराज के पिता से कहा मैं उनसे बहुत प्रसन्न हूँ। सन 1914 में जब साहबजी महाराज सोलन में रूके हुए थे तब उन्होने हुजूर मेहताजी को "मंजूर-ए- नजर " कहा था।  सन 1920 में जब साहबजी महाराज हरदा मध्य प्रदेश में बहुत बीमार हो गए थे तब उन्होंने फरमाया था कि गुरुचरन दास मेरे बाद सत्संग का मार्गदर्शन करेंगे।।                          24 जून 1937 को साहबजी महाराज के निज धाम पधारने पर उनके उत्तराधिकारी के विषय में कोई भी संदेह नहीं था। एक वर्ष पहले से ही ऐसे बहुत से संकेत मिलने के अतिरिक्त कई सतसंगियों को अनुभव प्राप्त हुए जिसको उन्होने दूसरों को भी बताया।  पंडित मनीराम शास्त्री ने स्वपन में हुजूर साहबजी महाराज को देखा और उनसे साहबजी जी महाराज ने कहा कि वह अब हुजूर मेहताजी साहब के रूप में मौजूद है। तिमरनी में एक दिन जब सत्संगी सुबह का सतसंग शुरू कर रहे थे तो प्रत्येक सतसंगी ने देखा कि हुजूर साहबजी जी महाराज की फोटोग्राफ के बजाय मेहताजी महाराज कुर्सी पर विराजमान है। 28 अगस्त सन 1937 को साहबजी महाराज के भंडारे के अवसर  पर साहबजी महाराज के स्थान पर मेहताजी महाराज को सभा का प्रेसिडेंट चुना।                 17 अप्रैल 1938 को मेहताजी महाराज ने दया करके सतसंग हाल में फरमाया " सतसंगी भाई व बहने यह जानकर अत्यंत प्रसन्न होगें कि राधास्वामी दयाल की दया और मेहर इस समय बडे जोर से बह.रही है और समस्त संगत पर उनकी दया का हाथ स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है क्योंकि इस समय जो काम हाथ में लिया जाता है उसमें सफलता प्राप्त होती है। इस वास्ते सत्संगी भाई और बहनों को अपनी कमर कस कर मैदान में आ जाना चाहिए और सेवा बलिदान के लिए तत्पर रहना चाहिए**

प्रेम की चिंगारी / पंकज निगम

**प्रेम की चिनगी**
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प्रेम नगर से निकला मैं,
प्रेम की दात लेकर!
दया मेहर की ओढ़ चुनरिया,
करमों का भार देकर!
सेवा भी बहु करी न पाई,
आलस भी दिन रात सताई!
खेतन सेवा मन से कीन्हा,
दरशन कर बहु भाग्य बढ़ाई!
सतसंग नित्य होय होत भोरा,
आधी रात गुरू मन झझकोरा!
तन भागा गुरू दरशन ओरा,
लागा मन गुरू चरनन मोरा!
पहुंच खेत फिर करम कटाई,
उठा दंतारी पौध कीन्ह छटाई!
गन्नों का हम गठ्ठर बांधा,
सतसंगीयन का देकर कांधा!
चने, मूंग की करी निराई,
आलस निदरा सभई हराई!
सुपरमैन सब दौड़ लगांवें,
बहिनन पीटी काल भगांवे!
छिन छिन हम परशादी पाई,
अमरित धारा रस पान कराई!
बचन सुने हम देकर काना,
प्रेम की चिनगी हम तबहीं जाना!
राधास्वामी नाम की सुरत चढ़ा कर,
प्रेम नगर में कदम बढ़ा कर!
मधुर चाल फिर देखन लागी,
प्रेम की चिनगी जागन लागी!
तब मन पाया पूरन सुख चैना,
छोड़त दयाल देश नीर भीगे नैना!
अब दाता भर देव झोली,
बीता बसंत अब खेंलू होली!
माफी कलम फेर देओ हमरी बिनती,
औगुन हमरे लाओ न गिनती!
यही है हमरा सतसंग पूरा,
हम हैं तीली तुम हमरे धूरा!
प्रेम की चिनगी से भर कर झोली,
निकलत प्रेम नगर से सुरत राधास्वामी बोली।।
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राधास्वामी।
पकंज निगम
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दयालबाग में व्यायाम के 80 साल




**29 अप्रैल 1940 से शारीरिक व्यायाम का अभ्यास शुरू किया गया ताकि भविष्य में कृषि प्रोग्राम शुरू करने के लिए स्त्री व पुरुष शरीर से सक्षम बनाया जा सकें। 1943 में मेहताजी महाराज ने अधिक अन्न उपजाओ अभियान के अंतर्गत ऊसर व बंजर भूमि को कृषि योग्य बनाने का अभियान शुरू किया। यह जमीन ऊँचे टीलों, कांटेदार झाड़ियों से भरी हुई थी । इसलिए कांटेदार झाड़ियों आदि को हटाने,भूमि को समतल करने और खेती के योग्य बनाने के लिए एक बड़ा अभियान शुरू किया गया। सतसंगियों ने जाडे, गर्मी व बरसात में घंटो कार्य किया।                  मेहताजी महाराज उनके पथ - प्रदर्शन व  उत्साहवर्धन के लिए स्वयं उपस्थित रहते थे। बाहर से दयालबाग आने वाले सतसंगियों ने भी इस कार्य में भाग लिया।प्रतिदिन सूर्योदय के साथ सतसंगियों को सेवा का अवसर मिला, जो इस कलयुग में अपने कर्मों की धूल झाड़ने का सबसे सरल उपाय है। हन 1955-1956 से सतसंगी बहनों ने भी खेतों में कार्य कलना प्रारंभ कर दिया। सन 1943 तथा 1944 में मेहताजी महाराज ने बडे विस्तृत दौरे किये। दक्षिण भारत के एक लंबे दौरे में, जो पूरे 1 महीने चला, सतसंगियों को सत्संग करने का मौका मिला। वह 8 फरवरी 1943 को काकीनाडा पहुंचे। सन 1937 में साहबजी महाराज ने अपने अत्यधिक कमजोर स्वास्थ्य के कारण काकीनाडा के दौरे का प्रोग्राम निरस्त कर दिया था। अब मेहताजी महाराज ने काकीनाडा में एकत्रित सतसंगियों पर विशेष दया व मेहर की। उस साल बसंत 8 फरवरी का था इसलिए करीब 3000 सत्संगी जो यहां उस दिन उपस्थित थे उनके माथे पर हुजूर ने टीका लगाया। दयालबाग लौटने पर सतसंगियों ने टीका लगानज व दमा व मेहर की प्रार्थना की। 21 फरवरी 1943 को इस प्रार्थना को स्वीकृति देकर पूरा किया।  कोयम्बटूर में एक आम सभा में उन्होंने सामाजिक आदर्श व लक्ष्यों को स्पष्ट करते हुए "ए बेटर वर्लड आर्डर" विषय पर अपने विचार व्यक्त किये। यह लम्बे, दुष्कर और बार बार के दौरे, साहबजी महाराज के उस कथन की याद दिलाते है, जब उन्होंने कहा था कि वह एक बलिष्ठ शरीर में दक्षिण भारत आयेंगे।**

हुज़ूर सत्संगी साहब का बचन

*परम गुरु हुज़ूर डॉ. लाल साहब के पवित्र भंडारे के सुअवसर पर ग्रेशस हुज़ूर डा. प्रेम सरन सतसंगी साहब का महत्वपूर्ण और सारगर्भित बचन*
10 जुलाई, 2005

*अगर गुरु स्वरूप उपस्थित है तो आपको क्या करना चाहिए ?*

  *आप प्रथम आँखें खोल करके ध्यान गुरु स्वरूप पर केन्द्रित करके सुमिरन कीजिए। अगर अनायास ही आप की आँखें बन्द हो जाती हैं और सुमिरन ध्यान बनने लगता है तो आँखें बन्द करके करिये। अंतर में गुरु स्वरूप प्रकट हो गया आप उसके दर्शन कीजिए। सुमिरन करिये फिर जो कुछ भी शब्द सुन सकते हैं सुनिये। उसके बाद सतसंग होता है। मंगलाचरण पढ़ा जाता है। मंगलाचरण सबके साथ मिलकर पढ़िये और अंतर में भाव, जैसी व्याख्या परम गुरु हुज़ूर डॉ. लाल साहब ने दी, उसके अनुसार रखिये। पहले भाग में सुमिरन करिये। दूसरे भाग में ध्यान करिये कि अंतर में गुरु स्वरूप प्रकट हो। देदीप्यमान लौ के समान गुरु स्वरूप विभिन्न नाड़ी केन्द्रों पर आप का मार्ग दर्शन करे। तो यह आवश्यक है कि जब आप सतसंग में बैठे हैं तो मंगलाचरण हो या अन्य शब्द का पाठ हो या बचन हो या बिनती हो,सबको पूरी तरह से आत्मसात् करके, समझ करके सुनें, यह नहीं कि आप का मन तो कहीं और चला गया, आप शारीरिक रूप से यहाँ ज़रूर विद्यमान हैं। तो पूरा लाभ आपको तभी प्राप्त होता है जब आप इन शब्दों के अर्थ के अनुसार आचरण करते हैं,सतसंग में बैठे हुए। जैसा परम गुरु हुज़ूर डॉ लाल साहब ने कहा अगर ऐसा किया तो सुमिरन, ध्यान और भजन तीनों को आपने मंगलाचरण के दौरान ही कर लिया और फिर जहाँ तक भी, जिस स्थान तक भी आपकी रसाई है, वहाँ केन्द्रित हो करके, किसी धाम तक नहीं हैं तो सुरत के स्थान पर केन्द्रित हो करके, अगर उपदेश प्राप्त नहीं है तो बाहरी रूप से गुरु स्वरूप पर ध्यान केन्द्रित करके सतसंग कीजिए, शब्दों के अर्थ के अनुसार आचरण कीजिए, जिससे आपको पूरा लाभ प्राप्त होगा।*
             *यह बताया गया है कि सतसंगियों के लिए जो आचरण वांछ्य है- सतसंग, सेवा और अभ्यास का है, तो सतसंग और अभ्यास की बात हो गई। सेवा का भी जैसा मैंने पहले निवेदन किया, अवसर प्राप्त है। ब्रांच में भी सेवा की जाती है। जब आप हेडक्वार्टर में आते हैं तो यहाँ भी सेवा करते हैं। यह अक्सर पूछा जाता है कि आज कल ई-सतसंग शुरू हो गया तो क्या उससे प्रत्यक्ष सतसंग का ही पूरा लाभ प्राप्त हो जाता है?ऐसा है कि ई-सतसंग में ध्यान केन्द्रित करने के लिए तो आपको गुरु स्वरूप की छबि दीख जाती है, तो जैसा मैंने आरंभ में शिशुओं के विषय में निवेदन किया, सतसंग में, प्रत्यक्ष सतसंग में, जो गुरु स्वरूप के प्रभामण्डल से किरणें फैलती हैं वे किरणें ई-सतसंग में नहीं प्राप्त होतीं। तो इसलिए प्रत्यक्ष सतसंग की महिमा तो कुछ और ही है। यह तो एक आध्यात्मिक क्षेत्र है जैसे चुम्बकीय क्षेत्र होता है। एक बहुत शक्तिशाली चुम्बक के पास आने पर लोहे के कण भी चुम्बक के गुण ग्रहण कर लेते हैं। वैसे ही सतसंग में आने पर विशेषकर राधास्वामी सतसंग, दयालबाग़ हेडक्वार्टर में सतसंग करने से आपको जिस आध्यात्मिक क्षेत्र शक्ति का प्रभाव प्राप्त होता है वह ई-सतसंग में नहीं प्राप्त हो सकता।*
 राधास्वामी।     
 (प्रेम प्रचारक 15 अगस्त, 2005)
राधास्वामी

कोरोना से बचाव की सलाह

_*Important message :--*_

Dr. Sidharth (Saran Ashram Hospital : Dayalbagh) has suggested to take following  *Homeopathy medicines* as a preventive measure for _*Corona Virus*_ :--

> *Arsenic Album-30 :* _daily one doze for three days_
And
*Arsenic Album: 200 :* _one doze per week.._

Radhasoami

राधास्वामी सत्संग दयालबाग में शाम का पाठ /बचन

[07/02, 16:30] +91 79090 13535: 💥💥💥💥💥

*07-02- 2020 -आज शाम के सत्संग में पढ़ा गया बचन- कल से आगे-*

( 50) मुक्ति प्राप्त करने के दो तरीके हैं।  अपने हाथ पांव मार कर अधिकार पैदा करना या सच्चे सतगुरु की शरण लेना । पहला तरीका कठिन है लेकिन असंभव नहीं है। दूसरा तरीका सुगम है लेकिन भय से पूर्ण है क्योंकि अगर किसी साधारण पुरुष की शरण धारण कर ली गई जो मन व शरीर का दास है और जिसके अंदर सुरत सोई हुई है तो सारी उम्र बर्बाद जाएगी और गलत आशा की वजह से अपने हाथ पाव चलाने का अवसर भी न मिलेगा, अलबत्ता अगर किसी को सच्चे सतगुरु मिल जावे तो उनकी शरण धारण करने से बढ़कर रसीला और आसान कोई दूसरा रास्ता हो ही नहीं सकता। इसलिये हर शख्स पर फर्ज है कि अपने लिए मुनासिब रास्ता चुने और जो रास्ता पसंद आवे उसपर सावधानी से चले। सबसे उत्तम यह होगा कि मनुष्य अपने हाथ पाँव भी चलावे और खोज करके सच्चे सतगुरु की शरण भी धारन करें ।

राधास्वामी
(सत्संग के उपदेश -भाग तीसरा)
[07/02, 16:30] +91 79090 13535: 💥💥💥💥 *07-02-2020-आज शाम के सतसंग में पढे गये पाठ-*

*(1) अरी हे सहेली प्यारी, गुरु का ध्यान सम्हारों, मनमुखता सहज नसावे।।टेक।।*

*(2)आज आरती करूँ सजाई। उमँग प्रेम मेरे अधिक समाई।।          बीना धुन सुन अधिक हरषती। झूम झूम पग आगे धरती।।*
*(प्रेमबिलास-शब्द66,पे.न.88)*
                             
*(3)सतसंग के उपदेश-भाग तीसरा।*

राधास्वामी

पूज्य हुज़ूर का निर्देश

  कल 8-1-22 की शाम को खेतों के बाद जब Gracious Huzur, गाड़ी में बैठ कर performance statistics देख रहे थे, तो फरमाया कि maximum attendance सा...