Thursday, June 3, 2021

लक्ष्य

 आज का प्रेरक प्रसंग /  लक्ष्य 


         

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एक लड़के ने एक बार एक बहुत ही धनवान व्यक्ति को देखकर धनवान बनने का निश्चय किया। वह धन कमाने के लिए कई दिनों तक मेहनत कर धन कमाने के पीछे पड़ा रहा और बहुत सारा पैसा कमा लिया। इसी बीच उसकी मुलाकात एक विद्वान से हो गई। विद्वान के ऐश्वर्य को देखकर वह आश्चर्यचकित हो गया और अब उसने विद्वान बंनने का निश्चय कर लिया और अगले ही दिन से धन कमाने को छोड़कर पढने-लिखने में लग गया। 


वह अभी अक्षर ज्ञान ही सिख पाया था, की इसी बीच उसकी मुलाकात एक संगीतज्ञ से हो गई। उसको संगीत में अधिक आकर्षण दिखाई दिया, इसीलिए उसी दिन से उसने पढाई बंद कर दी और संगीत सिखने में लग गया। इसी तरह काफी उम्र बित गई, न वह धनी हो सका ना विद्वान और ना ही एक अच्छा संगीतज्ञ बन पाया। तब उसे बड़ा दुख हुआ। एक दिन उसकी मुलाकात एक बहुत बड़े महात्मा से हुई। उसने महात्मन को अपने दुःख का कारण बताया।

 

महात्मा ने उसकी परेशानी सुनी और मुस्कुराकर बोले, “बेटा, दुनिया बड़ी ही चिकनी है, जहाँ भी जाओगे कोई ना कोई आकर्षण ज़रूर दिखाई देगा। एक निश्चय कर लो और फिर जीते जी उसी पर अमल करते रहो तो तुम्हें सफलता की प्राप्ति अवश्य हो जाएगी, नहीं तो दुनियां के झमेलों में यूँ ही चक्कर खाते रहोगे। बार-बार रूचि बदलते रहने से कोई भी उन्नत्ति नहीं कर पाओगे।” युवक महात्मां की बात को समझ गया और एक लक्ष्य निश्चित कर उसी का अभ्यास करने लगा।


*शिक्षा:-*

उपर्युक्त प्रसंग से हमें यह शिक्षा मिलती हैं कि हमें भी शुरुआत से ही एक लक्ष्य बनाकर उसी के अनुरूप मेहनत करना चाहिए। इधर-उधर भटकने की बजाय एक ही जगह, एक ही लक्ष्य पर डटे रहने से ही सफलता व उन्नति प्राप्त की जा सकती हैं।


*सदैव प्रसन्न रहिये।*

*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

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Wednesday, June 2, 2021

देवो के देव भगवान महादेव l

 देवो के देव महादेव भगवान शिव को गुरु बनाने की विधि:-


प्रस्तुति - -- रेणु दत्ता / आशा सिन्हा 


शिव गुरु को साक्षी मानकर किये गये,  कोई भी कार्य मे कभी रुकावटें नही आतीं, भगवान शिव गुरुओं के भी गुरु हैं और जब गुरू शिव हों, तो इष्ट कोई भी हो अभीष्ट की प्राप्ति हो ही जाती है, उनको गुरु बनाने की विधि नीचे है, उसे अपनायें और अनंत सुखों की राह पर चल पड़ें।


1. सबसे पहले मन को शांत करके ध्यान की मुद्रा मे आंखें बंद करके बैठ जायें,  इसके बाद भगवान शिव से कहें-

“हे शिव मै ‘अमुक नाम’ गोत्र ‘अमुक गोत्र’ आप को अपना गुरु बनाने का आग्रह कर रहा हूँ, आप मुझे शिष्य के रूप में स्वीकार करें”

2. फिर दोनों ऊपर हाथ उठाकर ब्रह्मांड की तरफ देखते हुए 3 बार घोषणा करें-

“मै ‘अमुक नाम’ गोत्र ‘अमुक गोत्र’ अखिल अन्तरिक्ष सम्राज्य में घोषणा करता हूं कि, शिव मेरे गुरु हैं,

 मै उनका शिष्य हूं, शिव मेरे गुरु हैं मै उनका शिष्य हूं, शिव मेरे गुरु हैं, मै उनका शिष्य हूं, मैं गुरु दक्षिणा के रूप में आपको राम नाम सुनाऊंगा, तथास्तु घोषणा दर्ज हो” !


इससे भगवान शिव अपनी ही तय शास्त्रीय व्यवस्था के मुताबिक आग्रह करने वाले को शिष्य के रूप में स्वीकार कर लेते हैं।

3. शिव गुरु को साक्षी मानकर शुरु किये गए कार्यों में रुकावटें नही आती हैं, इसलिये जो भी काम करें, उसके लिये भगवान शिव को पहले साक्षी बना लें और कहें------

“हे शिव आप मेरे गुरु हैं, मै आपका शिष्य हूं , आपको साक्षी बनाकर ये कार्य करने जा रहा हूं, इसकी सफलता के लिये मुझे दैवीय सहायता और सुरक्षा प्रदान करें”


4. फिर शिव गुरु से कम से कम तीन बार रोज कहें-

” हे शिव आप मेरे गुरु हैं मै आपका शिष्य हूं मुझ शिष्य पर दया करें, हे शिव आप मेरे गुरु हैं, मै आपका शिष्य हूं, मुझ शिष्य पर दया करें, हे शिव आप मेरे गुरु हैं, मै आपका शिष्य हूं, मुझ शिष्य पर दया करें.”!


5. फिर हर रोज शिव गुरु को नमन करें, इसके लिये शांत मन से कुछ मिनटों तक ” ॐ नमः शिवाय गुरवे, सच्चिदानन्द मूर्तये, निष्प्रपञ्चाय शान्ताय, निरालम्बाय तेजसे “ का जाप करें !


6. इसके बाद गुरु दक्षिणा के रूप मे “ॐ नमः शिवाय” मंत्र की कम से कम एक माला का जाप प्रतिदिन करने का संकल्प लेकर शिव गुरु को अर्पित करें।


इस प्रकार आप भगवान शिव को गुरु बना सकते हैं, किन्तु हमेशा ये स्मरण रहे कि, आप भगवान शिव के शिष्य बन जाएंगे, इसलिए हमेशा सच्चाई, ईमानदारी, चल,कपट से दूर और सत्य कि, राह पर चलते हुये सदकर्म करना और हमेशा जनसेवा एवं समाजसेवा के कार्य करना होंगे, यदि आप, ऐसा नहीं करते हैं तो, भगवान शिव आपको अपने शिष्य के रूप में अस्वीकार कर देंगे।


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Tuesday, June 1, 2021

चाय एक शाकाहारी नशा है...

 चाय एक शाकाहारी नशा है...


तो क्यों न शराब की बजाय चाय को जज्बातों से जोड़ते हैं...


तो अर्ज किया है...

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*एक तेरा ख़्याल ही तो है मेरे पास...*

*वरना कौन अकेले में बैठे कर चाय पीता है...!!!*

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*आज लफ्जों को मैने शाम की चाय पे बुलाया है...*

*बन गयी बात तो ग़ज़ल भी हो सकती है...!!!*

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*ठान लिया था कि अब और नहीं पियेगें चाय उनके हाथ की...*

*पर उन्हें देखा और लब बग़ावत कर बैठे...!!!*

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*मिलो कभी चाय पर फिर क़िस्से बुनेंगे...*

*तुम ख़ामोशी से कहना हम चुपके से सुनेंगे...!!!*

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*चाय के कप से उड़ते धुंए में मुझे तेरी शक़्ल नज़र आती है...*

*तेरे इन्ही ख़यालों में खोकर, मेरी चाय अक्सर ठंडी हो जाती है...!!!*

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*हलके में मत लेना तुम सांवले रंग को...*

*दूध से कहीं ज्यादा देखे है मैंने शौक़ीन चाय के.....@*

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*फिजा में घुल रही है महक अदरक की,*

*आज बारिश भी चाय की तलबगार हो गई..*

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*अदाएं तो देखिए चायपत्ती की,*

*ज़रा दूध से क्या मिली शर्म से लाल हो गई...*


चाय के शौकीनों के लिए* ☕

"हम दोनों ने 18 की उम्र में घर छोड़ा,*

 *"हम दोनों ने 18 की उम्र में घर छोड़ा,*


प्रस्तुति -- -- दयाल निमोडिया



हम दोनों ने 18 की उम्र में घर छोड़ा,*

तुमने JEE पास की

मेने Army के लिए Test पास की

तुम्हे IIT मिली,

मुझे Army

तुमने डिग्री हांसिल की,

मेने कठोर प्रशिक्षण,

तुम्हारा दिन सुबह 7 से शुरू होकर शाम 5 खत्म होता

मेरा सवेरे 4 बजे से रात 9 बजे तक और कभी कभार 24 घंटे...

तुम्हारी कनवोकेशन सेरेमनी हुई,

मेरी नियुक्ति हुई,

सबसे बेहतर कंपनी तुम्हे लेकर गयी और सबसे शानदार पैकेज मिला,

मुझे कंधो पर regiment ke naam के साथ पलटन ज्वाइन करने का आदेश मिला,

तुम्हे नोकरी मिली,

मुझे जीने का तरीका,

हर सांझ तुम परिवार से मिलते,

मुझे उम्मीद रहती की जल्द मिलूँगा,

तुम हर त्यौहार उजाले और संगीत में मनाते,

मैं अपने commander संग बंकर में,

हम दोनों की शादी हुई.....

तुम्हारी पत्नी रोज तुम्हे देख लिया करती,

मेरी पत्नी बस मेरे जिन्दा रहने की आस करती,

तुम्हे बिजनेस ट्रिप पर भेजा गया,

मुझे लाइन ऑफ़ कण्ट्रोल पर भेजा गया,

हम दोनो लौटे ......

हम दोनों की पत्नियां आंसू नहीं रोक पाई....

लेकिन....

तुमने उसके आंसू पोंछ दिए,

मैं नहीं पोंछ पाया,

तुमने उसे गले लगा लिया,

मैं नहीं लगा पाया,

क्यूंकि मैं एक तिरंगे में लिपटे हुए कफ़न के अन्दर छाती पर मैडल लेकर लेटा हुआ था,

मेरे जीने का तरीका ख़त्म हो गया.....

तुम्हारी नोकरी जारी है....

हम दोनों ने 18 की उम्र में घर छोड़ा ❤️

*Indian Army ❤️....*

काइआ_अंदरी_रतन_पदारथ_भगति_भरे_भंडार

 काइआ_अंदरी_रतन_पदारथ_भगति_भरे_भंडार

इसु काइआ अंदरी नऊ खंड पृथमी हाट पटण बाजारा


गुरु साहिब समझाते है की हमारी देह के अन्दर अपार रूहानी दोलत है भक्ति के भंडार भरे हुवे हैजो कुछ भी हमें मिलेगा अपने शारीर के अन्दर ही मिलेगा हमारे शारीर के अन्दर सारे दुनिया की रचना है आप भी सोचेगे की जब डाक्टर पोस्ट मार्टम करता है तो उसे हमारी देह में ये सब रचनाये कभी नहीं मिलतीअगर आप रेडियो को तोडकर देखे तो उसके अन्दर से कभी कोई बोलने वाला तो नहीं निकलता लेकिन आवाज अन्दर से ही आती है इसी प्रकार सब कुछ हमारी देह या शारीर के अन्दर है जब तक हम अन्दर जाकर अपने ख्याल को उस केंद्र पर इकट्टा नहीं करते हमें न अन्दर कुछ दिखाई देता है और न ही किसी चीज को सुन सकते है #गुरु _साहिब सब कुछ बयान करके फिर #शब्द या नाम की और आते है यह #शब्द या नाम हमें अपनी देह के अन्दर ही मिलेगा यह नाम रूपी दोलत बाहर न कभी किसी को मिली है और न कभी किसी को मिलेगी ll


नऊ दरवाज नवे दर फीके रसू अमृत दसवे च इजे


भाई आखों के निचे -निचे इन्द्रियों के भोग है विषय विकारो शराबो कबाबो की लज्जते है अगर तू रस से भरे हुवे अमृत को पीना चाहता है दसवे चुईजे ; वह तेरी आखों के पीछे बरस रहा है आप देखे कितनी जोर की बारिश क्यों न हो रही हो अगर हम बर्तन को ही उल्टा कर रख देगे उसको सीधा नहीं करेगे तो बारिश का इक कतरा भी बर्तन में नहीं जा सकता इसलिये जिस चीज को यहाँ आँखों के पीछे आकर उस अमृत को पीना है वह मन तो सारी दुनिया में फेला हुवा है उसी मन को सिमरन और ध्यान के जरिये फिर वापस इस नुक्ते पर इकट्टा करना है l

दयालबाग़ समाचार

अभी चेयरमैन साहब SNC के द्वारा निम्नलिखित आदेश आया है:

 *गुरु महाराज का निर्देश:*


" सब लोग अपने-अपने ड्यूटी पर टाइम से पहुंचे"l 11:00 बजे ब्लॉक पंच अपने-अपने ब्लॉक के सभी घरों में जाकर यह सुनिश्चित करें कि किसी निवासी को कोई समस्या तो नहीं है यदि है तो उसका समाधान करें और इसकी रिपोर्ट *GRACIOUS HUZUR* को 12:00 बजे पेश की जाएगीl 

राधा स्वामीl

[6/1, 12:43] Deepa Mumma New: राधास्वामी

 कृपया ध्यान दें


 अब से कनेक्टिंग टाइम 2.30 बजे  दोनों टाइम सुबह व शाम ई सत्संग का होगा ।


 यदि आप निर्धारित समय सीमा के बाद लॉगिन करते हैं तो

 आपका प्रसारण  ब्लॉक कर दिया जाएगा


 पूरी कार्यवाही के दौरान पांच उपदेशी सत्संगियों को कैमरे की सीमा के भीतर होना होगा।


 अगर पांच सत्संगी दिखाई नहीं दे रहे हैं तो प्रसारण अवरुद्ध हो जाएगा


 सभी लोगों को नाक से ठुड्डी तक मास्क व पूरी तरह से ढका हुआ हेलमेट पहनना आवश्यक है

 सामाजिक दूरी बनाए रखें


 नही तो किसी पर भी हब पर कार्रवाई की जा सकती है


 ऑडियो ट्रांसमिशन के लिए भी यदि आप डिस्कनेक्ट करते हैं और फिर से कनेक्ट करना चाहते हैं तो आपको फिर से ऑडियो नहीं मिलेगा



 ये हैं नई गाइडलाइंस🙏🏻

ख्वाज़ा अब्बास अब्बास की दुनियां / रेहान फज़ल

 आज ख्वाज़ा अब्बास अब्बास साहब को दुनिया से गए 34 साल हो गए..../ रेहान फ़ज़ल 


अगर ना होते अमिताभ के मामू जान ख़्वाजा अहमद अब्बास

उन दिनों अब्बास फ़िल्म 'सात हिंदुस्तानी' के लिए अभिनेताओं की तलाश में थे. एक दिन ख़्वाजा अहमद अब्बास के सामने कोई एक लंबे युवा व्यक्ति की तस्वीर ले कर आया.


अब्बास ने कहा, "मुझे इससे मिलवाइए". तीसरे दिन शाम के ठीक छह बजे एक शख़्स उनके कमरे में दाख़िल हुआ. वो कुछ ज़्यादा ही लंबा लग रहा था, क्योंकि उसने चूड़ीदार पायजामा और नेहरू जैकेट पहनी हुई थी.


ख़्वाजा अहमद अब्बास ने इस बातचीत का पूरा विवरण अपनी आत्मकथा, 'आई एम नॉट एन आईलैंड' में लिखा है-


"बैठिए. आपका नाम?"


"अमिताभ"(बच्चन नहीं)


"पढ़ाई?"


"दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए."


"आपने पहले कभी फ़िल्मों में काम किया है?"


"अभी तक किसी ने मुझे अपनी फ़िल्म में नहीं लिया."


"क्या वजह हो सकती है ?"


"उन सबने कहा कि मैं उनकी हीरोइनों के लिए कुछ ज़्यादा ही लंबा हूँ."


"हमारे साथ ये दिक्कत नहीं है, क्योंकि हमारी फ़िल्म में कोई हीरोइन है ही नहीं. और अगर होती भी, तब भी मैं तुम्हें अपनी फ़िल्म में ले लेता."


"क्या मुझे आप अपनी फ़िल्म में ले रहे हैं? और वो भी बिना किसी टेस्ट के?"


"वो कई चीज़ों पर निर्भर करता है. पहले मैं तुम्हें कहानी सुनाऊंगा. फिर तुम्हारा रोल बताऊंगा. अगर तुम्हें ये पसंद आएगा, तब मैं तुम्हें बताउंगा कि मैं तुम्हें कितने पैसे दे सकूंगा."


इसके बाद अब्बास ने कहा कि पूरी फ़िल्म के लिए उसे सिर्फ़ पांच हज़ार रुपए मिलेंगे. वो थोड़ा झिझका, इसलिए अब्बास ने उससे पूछा, "क्या तुम इससे ज़्यादा कमा रहे हो?"


उसने जवाब दिया, "जी हाँ. मुझे कलकत्ता की एक फ़र्म में सोलह सौ रुपए मिल रहे थे. मैं वहाँ से इस्तीफ़ा दे कर यहाँ आया हूँ."


अब्बास आश्चर्यचकित रह गए और बोले, "तुम कहना चाह रहे हो कि इस फ़िल्म को पाने की उम्मीद में तुम अपनी सोलह सौ रुपए महीने की नौकरी छोड़ कर यहाँ आए हो? अगर मैं तुम्हें ये रोल ना दूँ तो?"


उस लंबे व्यक्ति ने कहा, "जीवन में इस तरह के चांस तो लेने ही पड़ते हैं."


अब्बास ने वो रोल उसको दे दिया और अपने सचिव अब्दुल रहमान को बुला कर कॉन्ट्रैक्ट डिक्टेट करने लगे. उन्होंने उस शख़्स से इस बार उसका पूरा नाम और पता पूछा.


"अमिताभ."


उसने कुछ रुक कर कहा, "अमिताभ बच्चन, पुत्र डॉक्टर हरिवंशराय बच्चन."


"रुको." अब्बास चिल्लाए. "इस कॉन्ट्रैक्ट पर तब तक दस्तख़्त नहीं हो सकते, जब तक मुझे तुम्हारे पिता की इजाज़त नहीं मिल जाती. वो मेरे जानने वाले है और सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड कमेटी में मेरे साथी हैं. तुम्हें दो दिनों तक और इंतज़ार करना होगा."


इस तरह ख़्वाजा अहमद अब्बास ने कॉन्ट्रैक्ट की जगह डॉक्टर बच्चन के लिए एक टेलिग्राम डिक्टेट किया और पूछा, "क्या आप अपने बेटे को अभिनेता बनाने के लिए राज़ी हैं?"


दो दिन बाद डॉक्टर रिवंशराय बच्चन का जवाब आया, "मुझे कोई आपत्ति नहीं. आप आगे बढ़ सकते हैं."


आगे की घटनाएं इतिहास हैं.


अमिताभ बच्चन बताते हैं, "हम उन्हें मामू जान कहा करते थे. जब हम सात हिंदुस्तानी की शूटिंग करने गोवा गए, तो हम सब ने ट्रेन के तीसरे दर्जे में सफ़र किया. ये उनका भारत के आम आदमी को सम्मान देने का अपना तरीका था."


"लोकेशन पर हम सभी सरकारी गेस्ट हाउसों में रुकते, जहाँ बहुत ही मामूली सुविधाएं होतीं. रात में हम लोग एक हॉल में ज़मीन पर अपना होल्डाल बिछा कर सोते. वहाँ कोई बिजली नहीं होती थी. मामूजान भी हमारे साथ ही ज़मीन पर सोते और रात में जब कभी मेरी आँख खुलती तो मैं देखता कि वो देर रात लालटेन की रोशनी में अगले दिन होने वाली शूटिंग के डायलॉग लिख रहे होते."


बहुआयामी शख़्सियत थी ख़्वाजा अहमद अब्बास की. लेखक कहते कि वो पत्रकार हैं. पत्रकार कहते कि वो फ़िल्मकार हैं. फ़िल्मकार कहते कि वो कहानियाँ लिखते हैं.


ऐसे में उनके मुंह से अक्सर ग़ालिब का ये मिसरा निकलता- 'पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है, कोई बताए के हम बताएं क्या!'


तीस सालों तक उनके दोस्त रहे मशहूर उपन्यासकार कृष्ण चंद्र ने उनके कहानी संग्रह 'पाओं में फूल' के प्राक्कथन में लिखा था, "जब मैं अपनी, इस्मत और मंटो की कहानियों को पढ़ता हूँ तो मुझे लगता है कि हम लोग एक ख़ूबसूरत रथ पर सवार हैं. जबकि अब्बास की कहानियों से लगता है जैसे वो हवाई जहाज़ पर उड़ रहा हो. हमारे रथों में चमक है. उनके पहियों तक में नक्काशी है. उनकी सीटों में बेल बूटे लगे हुए हैं. उनके घोड़ो की गर्दनों से चाँदी की घंटियाँ लटक रही हैं."


"लेकिन उनकी चाल बहुत सुस्त है. उनकी सड़के गंदी हैं और उनमें बहुत गड्ढ़े हैं. जबकि अब्बास के लेखन में कोई गड्ढ़े नहीं हैं. उनकी सड़क पक्की और समतल है. ऐसा लगता है कि उनका कलम रबर टायरों पर चल रहा है. पश्चिम में साहित्य और पत्रकारिता की सीमाएं धुंधली पड़ रही हैं. वाक्य छोटे होते जा रहे हैं. हम लेखकों में ये ख़ूबी सिर्फ़ अब्बास में है."


सय्यदा सैयदेन हमीद जानी-मानी लेखिका हैं और ख़्वाजा अहमद अब्बास की भतीजी हैं. वो योजना आयोग की सदस्य भी रह चुकी हैं.


सय्यदा याद करती हैं, "अब्बास साहब एक 'ह्यूमन डायनेमो' थे. बहुत चुलबुली तबियत थी उनकी. बच्चों के साथ हमेशा बच्चे बन जाते थे. हम लोग बंबई की फ़िल्मी ज़िंदगी से बहुत मुतास्सिर थे और उतनी ही सख़्ती से हमें उस तरफ़ बढ़ने से रोका जाता था. जब हम उनकी फ़िल्म देखते थे तो हमें बहुत तनाव होता था और हम दुआएं करते थे कि काश ये फ़िल्म हिट हो जाए."


"मुझे याद है कि हम सब लोगों ने उनके साथ दिल्ली के दरियागंज के गोलचा सिनेमा में उनकी फ़िल्म 'परदेसी' देखी थी. अंत में 'दि एंड' की जगह जब स्क्रीन पर 'द बिगनिंग' आया था तो सभी दर्शकों ने ज़ोर से तालियाँ बजाई थी और हमारी जान में जान आई थी कि ये फ़िल्म तो हिट होगी ही. मुझे याद है शो ख़त्म होने के बाद हम बीस के बीस लोग पास के मोतीमहल रेस्तराँ में गए थे जहाँ अब्बास साहब ने हमारे लिए चार मेज़ें बुक करा रखी थीं..."


राज कपूर के लिए ख़्वाजा अहमद अब्बास ने कई फ़िल्में लिखीं. अब्बास अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, "मैं, वीपी साठे और इंदरराज आनंद मरोसा रेस्तराँ में मिला करते थे. एक बार राज कपूर ने किसी से सुना कि मैंने एक कहानी लिखी है. वो मेरे पास आए और कहानी सुन कर बोले कि अब्बास अब ये कहानी मेरी हो गई. इसे किसी और को मत दे देना."


"राज ने ये ज़िम्मेदारी मुझे दी कि मैं उनके पिता पृथ्वीराज कपूर के पास जाऊँ और उन्हें हीरो के पिता का रोल करने के लिए राज़ी करूँ.


उन्होंने कहानी सुनते ही कहा, "तो तुम मुझे हीरो के बाप का रोल देना चाहते हो?" मैंने कहा, "नहीं हज़ूर, आप हीरो के बाप नहीं हैं. आप हीरो हैं और राज आपके बेटे का रोल कर रहा है."


राज कपूर को 'आवारा' बनाने में दो साल लग गए. अब्बास अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, "आवारा के प्रीमियर के दिन राज कपूर ने पूरी फ़िल्म इंडस्ट्री को बुला रखा था. मुझे याद है शो के बाद हर कोई चुपचाप राज कपूर के पास जाता. उनसे हाथ मिलाता और बाहर निकल जाता. राज कपूर दरवाज़े पर खड़े थे. लोगों की भावभंगिमा ऐसी थी जैसे वो उन्हें मुबारकबाद देने की बजाए सांत्वना दे रहे हों."


"जब सब चले गए तो राज ने मुझसे और साठे से पूछा, 'बताओ क्या हमारी फ़िल्म इतनी ख़राब है?' मैंने कहा ये बहुत अच्छी फ़िल्म है. अगले दिन का इंतज़ार करिए और देखिए लोग इसे किस तरह हाथों-हाथ लेते हैं. बिल्कुल यही हुआ. फ़िल्म ज़बरदस्त हिट रही. उस ज़माने में फ़िल्मों के लिए पुरस्कार नहीं होते थे. लेकिन अगर होते तो इसमें कोई शक नहीं कि 'आवारा' को हर श्रेणी में पुरस्कार मिलता और वो साल की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म घोषित की जाती."


ख़्वाजा अहमद अब्बास ने अपने छात्र जीवन में ही जवाहरलाल नेहरू को अपना आदर्श मान लिया था. एक बार जब वो अलीगढ़ में पढ़ रहे थे तो उन्हें पता चला कि नेहरू कलकत्ता मेल से अलीगढ़ होते हुए इलाहाबाद जा रहे हैं.


अब्बास लिखते हैं, "जब हमें पता चला कि नेहरू की ट्रेन अलीगढ़ से हो कर गुज़रेगी, तो हमने तय किया कि हम एक स्टेशन पहले खुर्जा चले जाएंगे और उनके साथ उनके डिब्बे में बैठ कर अलीगढ़ आएंगे.


रास्ते में नेहरू ने हमसे पूछा, "आप कौन सा विषय पढ़ रहे हैं?" हमने कहा, "इतिहास." नेहरू का जवाब था, "इतिहास को सिर्फ़ पढ़े ही नहीं, उसको बनते हुए देखिए भी."


जब ट्रेन अलीगढ़ के बाहरी इलाके में पहुंची तो मैंने उनके सामने अपनी ऑटोग्राफ़ बुक बढ़ा दी. उस पर उन्होंने कुछ लिखा. तब तक स्टेशन आ गया. वो नेहरू के प्रशंसकों से खचाखच भरा हुआ था. नेहरू ने कहा, "तुम प्लेटफ़ार्म पर नहीं उतर पाओगे, इसलिए दूसरी तरफ़ से उतरो."


उतर कर रेलवे लाइन क्रॉस करने के बाद जब मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो नेहरू तमाम जयजयकार के बीच दरवाज़े पर खड़े हो कर मुझे हाथ हिला रहे थे. जब मैंने अपनी ऑटोग्राफ़ बुक खोली तो उस पर लिखा था, 'लिव डेंजरसली, जवाहरलाल नेहरू.'


जवाहरलाल नेहरू की मौत से कुछ दिनों पहले उनसे अब्बास की आख़िरी मुलाकात हुई थी. अब्बास की फ़िल्म 'शहर और सपना' को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था.


अब्बास उस पुरस्कार की राशि को अपनी यूनिट में बराबर बराबर बांटना चाहते थे.


अब्बास के ख़ास इसरार पर नेहरू ये इनाम बांटने के लिए तैयार हो गए. डाक्टर सय्यदा सैयदेन बताती हैं, "नेहरू के डाक्टरों ने अब्बास और उनकी टीम को उनसे मिलने के लिए सिर्फ़ पंद्रह मिनट दिए. अब्बास ने तय किया कि इनाम में मिले पच्चीस हज़ार रुपयों को पूरी यूनिट में बराबर बांटा जाएगा, चाहे वो स्पॉट बॉय हो या फ़िल्म का हीरो. इसे नेहरू के हाथों से दिलवाया जाएगा."


"वो छोटे छोटे बटुए लाए थे नेहरू के हाथ से दिलवाने के लिए. नेहरू ने अचानक अब्बास से पूछा, 'तुम्हारी फ़िल्म में कोई गाना नहीं है?' अब्बास ने बताया कि गाना तो नहीं, हमारी फ़िल्म में अली सरदार जाफ़री की एक ग़ज़ल है. फिर मनमोहन कृष्ण ने बहुत सुरीली आवाज़ में वो ग़ज़ल नेहरू को गा कर सुनाई थी."


'वो जो खो जांए तो खो जाएगी किस्मत सारी, वो जो मिल जाएं तो साथ अपने ज़माना होगा' - जब मनमोहन कृष्ण वो ग़ज़ल गा रहे थे, तो उनकी आखों में आँसू थे. क्योंकि उन्हें पता था कि ये नेहरू से उनकी आख़िरी मुलाकात है.


इस ग़ज़ल के बाद सब लोग जाने के लिए उठ खड़े हुए. बाहर से नेहरू के डाक्टर घड़ी दिखा कर इशारा कर रहे थे कि आपका समय ख़त्म हो चुका है.


अब्बास ने नेहरू से कहा, "पंडितजी अब इजाज़त दीजिए". नेहरू बोले, "क्यों? मेरा तो किसी के साथ कोई अपॉएंटमेंट नहीं है. इस पर ख़्वाजा अहमद अब्बास का जवाब था, "तो समझ लीजिए कि हम लोग बहुत मसरूफ़ हैं."


ख़्वाजा अहमद अब्बास ने ब्लिट्ज़ के आख़िरी पन्ने पर लिखे जाने वाले साप्ताहिक कॉलम 'लास्ट पेज' से भी बहुत नाम कमाया. दुनिया और भारत के हर ज्वलंत मुद्दे पर उन्होंने अपनी लेखनी चलाई, जिसे पूरे भारत ने बहुत ध्यान से पढ़ा.


सय्यदा सयदैन बताती हैं, "दिलचस्प बात ये थी कि लोग आख़िरी पेज से ब्लिट्ज़ पढ़ना शुरू करते थे. आख़िरी पेज पर ही एक पिन-अप मॉडल की तस्वीर भी रहती थी. लोग पहले वो तस्वीर देखते थे और फिर अब्बास साहब का लेख पढ़ते थे. उनका वही कॉलम 'आज़ाद कलम' के नाम से हिंदी और उर्दू ब्लिट्ज़ में भी प्रकाशित होता था. जो भी घटनाएं होती थीं, उनको वो बातचीत के अंदाज़ में लिखा करते थे."


आख़िरी 'लास्ट पेज' कॉलम में उन्होंने अपनी वसीयत लिखी थी. उन्होंने लिखा था, "मेरी इच्छा है कि जब मैं मरूँ तो कफ़न के बदले मेरे सीने पर ब्लिट्ज़ के लास्ट पेज के पन्ने रखे जाएं."

पूज्य हुज़ूर का निर्देश

  कल 8-1-22 की शाम को खेतों के बाद जब Gracious Huzur, गाड़ी में बैठ कर performance statistics देख रहे थे, तो फरमाया कि maximum attendance सा...