Friday, July 3, 2020

03/07 को शाम के सतसंग में पाठ और वचन




**राधास्वामी!!

 03-07-2020-

आज.शाम के सतसंग में पढे गये पाठ-

(1) प्रेम रंग बरसावत चहुँ दिस। होलु खेलन आई सूरत प्यारी।।-( प्रेम दान दीन्हा निज घर से। राधास्वामी चरनन हुई दुलारी।। )-(प्रेमबानी-3-शब्द-10,पृ.सं.300)

(2) गुरु की सरन सम्हालो। औसर न बार बारी।।टेक।।-(संगत बुरी का है फल। करमों का भी कुछ है बल। मन भी रहा है चंचल। हँगता रही है तारी।।)- (प्रेमबिलास- शब्द-5,पृ.सं.5,6)

(3) यथार्थ प्रकाश-भाग पहला-कल से आगे।

🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**


**राधास्वामी!!                                           
 03 --07-- 2020-                                  आज शाम के

सत्संग पढ़ा गया बचन -कल से आगे -

(38 ) ऋग्वेद के वांगाभृंगी सूक्त में शब्दों में वर्णन की गई है । लिखा है-"मुझ में ही सब देवताओं का वास है , मैं सबका पालन पोषण करती हूँ, मैं ही सब जगत् को हिलाती हूँ, मेरे ही आश्रय से सब कुछ चल रहा है; सब ज्ञान ,सब कर्म को मैं ही प्रेरित करती हूँ"।  और तो और " ब्राह्मण की गौ' नामक पुस्तक में ,जो गुरुकुल कांगड़ी के मुख्यअधिष्ठाता महाशय की ओर से प्रकाशित हुए है, पंडित देव शर्मा विद्यालंकार ,जो उस पुस्तक के रचयिता है, इसी सूक्त का उल्लेख करके लिखते हैं-" सभी धर्म वाले जो शब्द से जगत् की उत्पत्ति की तरफ इशारा करते हैं वह यही बात है ।



भगवान के शब्द (वाणी ) में जो आता जाता है वह होता जाता है। इसी तरह जगत् बना है और चलता है।  असल में हम उसकी वाणी को समझ ही नहीं सकते"।(  पृष्ठ 66-67)।  क्या एक सत्संगी अर्थात राधास्वामी मत के अनुयायी को यहां इतना निवेदन करने की आज्ञा होगी कि इस शब्द (वाणी) को समझने की योग्यता उत्पन्न करने के साधन ही को सुरत शब्द अभ्यास कहते हैं?                   

 उक्त सूक्त के आठवें मंत्र का पंडित जयदेव शर्मा ने जो अनुवाद किया है वह भी विचार करने योग्य है। वाणी (शब्द शक्ति )कहती है:-" मैं ही समस्त लोकों और देहों को निर्माण करती हूँ। देहो में प्राण के समान और संसार में वायु के समान सर्वत्र विशेष रूप से,उत्कृष्ट रूप से, व्यापक होकर रहती हूँ और मैं ही सूर्य आदि लोको से परे, और इस पृथ्वी से भी परे अर्थात इन विकार पदार्थों से पूर्वकाल में विद्यमान रहकर अपनी महिमा अर्थात महत् शक्ति से इतने विशाल स्वरूप में जगत् का रूप बनाकर पूर्ण रीति से प्रकट हो रही हूँ"।
 ( ऋग्वेद मंडल 10, सूक्त 125 तथा अर्थवेद कांड, 4  सूक्त 30)                     

 क्यों साहब ! जब की ऋक् तथा अर्थववेद के इस बचन के अनुसार आदि शब्द प्रत्येक मनुष्य के शरीर में प्राण के समान और समस्त संसार में वायु के समान व्यापक अर्थात भरपूर फैल रहा है और यही रचना सबसे अधिक प्रबल शक्ति है तो इससे सम्बंध स्थापित करने के साधन ( सुरत शब्द अभ्यास) को बच्चो का खेल क्यों ठहराया गया? और वह कौन सी विद्वत्ता अथवा योग्यता योगगति थी जिसके भरोसे स्वामी दयानंद जी ने कबीर साहब के लिए ऐसे अनुचित शब्द प्रयुक्त किये?  शांत ! शान्तम!!

🙏🏻राधास्वामी🙏🏻       

          

यथार्थ प्रकाश- भाग पहला -

 परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज!**

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