प्रकृति और पुरुष के मिलन में प्रकृति पुरुष के अधीनस्थ रहती है। उस से शालीनता का व्यवहार करती है। और उस परिधि में रहना चाहती है जो पुरुष के इर्द-गिर्द रची हो। प्रकृति और पुरुष के समामेलन से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा प्रकृति और पुरुष के प्रेम को बांधती है। ये उस संबंध का परिणाम है प्रकृति और पुरुष के मेल से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा प्रकृति और पुरुष को वंधत्व में बनती है। तथा समाज कल्याण तथा परिवार कल्याण के उन सभी कार्यों में अपनी भागीदारी व रूचि स्पष्ट करती है। उस ऊर्जा के प्रति प्रकृति का प्रेम कर्तव्य अपने दायित्वों से बड़ा होता है। कोई घटना अगर उस ऊर्जा को परेशान या हानि पहुंचाती है। तो प्रकृति पुरुष से विद्रोह कर लेती है। उस विद्रोह में पैदा होने वाले नुकसान पुरुष समाज परिवार सभी को भुगतना पड़ता है। पुरुष द्वारा या अन्य किसी घटना के द्वारा हुए नुकसान की भरपाई करना पड़ती है। प्रकृति की उस ऊर्जा को जब तक ठीक नहीं किया जाता या सुधारा नहीं जाता। तब तक वह समाज कल्याण पारिवारिक कल्याण तथा अन्य ऐसे तथ्यों को नुकसान पहुंचाती रहती है। प्रकृति बंधन में बंध जाती है। उन ऊर्जाओं के कारण जो प्रकृति और पुरुष के समामेलन से पैदा होती है। प्रकृति अपनी इच्छाओं अपनी आशाओं तथा अपनी अभिलाषाओं को पूर्ण करने के लिए पुरुष के अधीनस्थ होती है। वह पुरुष से शालीनता वाला व्यवहार करती है। तथा पुरुष के समामेलन से पैदा हुई ऊर्जा को संभालने के लिए तत्पर रहती है। तथा विवाह जैसे बंधन को स्वीकार करती है। इस बीच पैदा होने वाले तमाम बंधनों को वहां स्वीकार करती है। इसको धन्यवाद और कृतज्ञता के साथ में अपनाती है। वैसे तो प्रकृति अपने आप में स्वतंत्र हैं फिर भी वहां वंधत्व को स्वीकार करती है। उस घटना के लिए जिससे उसे मातृत्व की पूर्ति हो सके प्रेम के कारण ही प्रकृति पुरुष का बंधन स्वीकार करती है। अन्यथा प्रकृति अपने आप में ही पूर्ण है। पुरुष प्रकृति से बंधा हुआ है। इसीलिए पुरुष प्रकृति से बाहर कभी हो ही नहीं सकता। और अगर होने का प्रयास भी करता है। तो प्रकृति पुणः उसे अपने मौह में तथा प्रेम में उसे बांध कर रख लेती है। जो पुरुष प्रकृति के बंधन से छूट जाता है वही मोक्ष के मार्ग पर आगे निकल जाता है।.........जय
Saturday, June 13, 2020
रह्स्य्वाद के मायने
प्रकृति और पुरुष के मिलन में प्रकृति पुरुष के अधीनस्थ रहती है। उस से शालीनता का व्यवहार करती है। और उस परिधि में रहना चाहती है जो पुरुष के इर्द-गिर्द रची हो। प्रकृति और पुरुष के समामेलन से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा प्रकृति और पुरुष के प्रेम को बांधती है। ये उस संबंध का परिणाम है प्रकृति और पुरुष के मेल से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा प्रकृति और पुरुष को वंधत्व में बनती है। तथा समाज कल्याण तथा परिवार कल्याण के उन सभी कार्यों में अपनी भागीदारी व रूचि स्पष्ट करती है। उस ऊर्जा के प्रति प्रकृति का प्रेम कर्तव्य अपने दायित्वों से बड़ा होता है। कोई घटना अगर उस ऊर्जा को परेशान या हानि पहुंचाती है। तो प्रकृति पुरुष से विद्रोह कर लेती है। उस विद्रोह में पैदा होने वाले नुकसान पुरुष समाज परिवार सभी को भुगतना पड़ता है। पुरुष द्वारा या अन्य किसी घटना के द्वारा हुए नुकसान की भरपाई करना पड़ती है। प्रकृति की उस ऊर्जा को जब तक ठीक नहीं किया जाता या सुधारा नहीं जाता। तब तक वह समाज कल्याण पारिवारिक कल्याण तथा अन्य ऐसे तथ्यों को नुकसान पहुंचाती रहती है। प्रकृति बंधन में बंध जाती है। उन ऊर्जाओं के कारण जो प्रकृति और पुरुष के समामेलन से पैदा होती है। प्रकृति अपनी इच्छाओं अपनी आशाओं तथा अपनी अभिलाषाओं को पूर्ण करने के लिए पुरुष के अधीनस्थ होती है। वह पुरुष से शालीनता वाला व्यवहार करती है। तथा पुरुष के समामेलन से पैदा हुई ऊर्जा को संभालने के लिए तत्पर रहती है। तथा विवाह जैसे बंधन को स्वीकार करती है। इस बीच पैदा होने वाले तमाम बंधनों को वहां स्वीकार करती है। इसको धन्यवाद और कृतज्ञता के साथ में अपनाती है। वैसे तो प्रकृति अपने आप में स्वतंत्र हैं फिर भी वहां वंधत्व को स्वीकार करती है। उस घटना के लिए जिससे उसे मातृत्व की पूर्ति हो सके प्रेम के कारण ही प्रकृति पुरुष का बंधन स्वीकार करती है। अन्यथा प्रकृति अपने आप में ही पूर्ण है। पुरुष प्रकृति से बंधा हुआ है। इसीलिए पुरुष प्रकृति से बाहर कभी हो ही नहीं सकता। और अगर होने का प्रयास भी करता है। तो प्रकृति पुणः उसे अपने मौह में तथा प्रेम में उसे बांध कर रख लेती है। जो पुरुष प्रकृति के बंधन से छूट जाता है वही मोक्ष के मार्ग पर आगे निकल जाता है।.........जय
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