Sunday, February 23, 2020

राधास्वामी दयालबाग / कर्म का भोग चुकाना पड़ता है





प्रस्तुति - उषा रानी/
राजेंद्र प्रसाद सिन्हा


जीव को कर्म भोगना पड़ेगा और जीव पर कर्ज है उसे चुकाना पड़ेगा फिर वो अनन्य प्रकार के है।माँ बाप की सेवा सबसे बढ़कर।
ज्ञान,बुद्धि,विवेक,विचार मिला है उसको सोच समझके अपने हित की भी बात को न सोचें तो उसे को कौन समझाए।
इतनी बाते समझाए,बताए जाने पर भी हम पुरानी आदतों को नही छोड़ते है तो कोनसी ताकत है जो हमको ठीक कर देगी।
समझना हमे पड़ेगा क्योंकि करना हमे है,करेंगे इसलिए क्योंकि फिर भोगना हमे है।भोग कोनसा भोगना है वो बता दिया कि अच्छे करने वाले को अच्छा और बुरा करने वाले को बुरा।।

हम गुरु के पुत्र,सेवक,शिष्य,प्रेमी,सत्संगी,रूहे है अतः गुरु की आज्ञा में और उनके वचन अनुसार जीवन को ढालकर उनके बताए मार्ग पर ही चलना जरूरी है।गुरु के प्रति ही हमारा प्रेम,विरह,वेदना,त्याग होना चाहिए जीवन मे।हम उस वक्त में गुजरे हालात के जानकार नही है जब गुरु ने अपना आपा सतगुरु को सौंपा था।

हमारे भटकने,भरम में पड़ने,धक्के खाने का एकमात्र कारण है कि हमने गुरु को गुरु नही जाना।गुरु से पक्का नाता यदि जोड़ लिया तब करनी करने की भी कोई जरूरत नही है हमे।क्योंकि जहाँ एक की पूजा है वही परमात्मा की पूजा है किसी रूप में भी मानकर पूजो बेशक उसे,जैसे किसी ने  पत्थर के सालिगराम को परमात्मा मानकर उन्हें प्रगट कर लिए।शब्द गुरु से नाता जोड़ो।शब्द गुरु सूरत का अटल सुहाग है जो न कभी जन्मता है न मरता है।उसी को पिया,पति,माँ, पिता कहो।

राधास्वामी नाम खुदा का नाम है,कुल के मालिक का नाम है,शब्द का नाम है,शब्द को ये नाम दे दिया गया,शब्द ही गुरु है उसे गुरु जानो।
1861 में राधास्वामी सत्संग जारी किया था स्वामी जी महाराज ने लेकिन 1866 में हजूर महाराज ने प्रगट किया इस नाम को।
उन्होंने खुद ये वाणी में लिखा,ग्रन्थों की रचना तो बाद में हुई।
राधास्वामी मात पिता पति मेरे
राधास्वामी चरनन सुख घनेरे
राधास्वामी बिना कोई नही बाचे
राधास्वामी है गुरु सतगुरु साचे
‌शब्द को कहा गया राधास्वामी, आदमी को नही।जिसको पति,पिता मानते हो,वो शब्द गुरु किसी के माध्यम से मिलता है।
‌प्रेम की अग्नि में ईर्ष्या,द्वेष,छल, कपट,बईमान,चतुराई सभी जल जाती है, दग्ध हो जाती है
‌जिसके दिल मे प्रेम है,प्रेम ही भक्ति है।अतः प्रेम को पैदा करो।
‌स्वामी जी ने कहा है,
‌        गुरु मैं गुनहगार अति भारी।
       काम,क्रोध,मद,लोभ,मोह,अहंकार इन संग है मेरी यारी।
‌क्योंकि गुरु की शरण लेने पर भी हमारे ये यार है तबतक गुनाह करते है हम।





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