Saturday, December 17, 2011

भाषा संवाद

जातिवाद पर पर व्यंग्य करती परसाईजी की लेखनी.

अगस्त 15, 2007
हरिशंकर परसाई ने व्यंग्य विधा में अनूठे रंग बिखेरे और व्यवस्था,परिवेश और मनुष्य के स्तर पर नज़र आती तमाम बुराइयों पर अपने क़लम से फ़टकार लगाई.साठ साल के आज़ाद भारत की तस्वीर आज कितनी भी उजली नज़र आती हो..औरत,संप्रदाय,जाति,अशिक्षा,धर्म और छुआछूत के नाम पर स्थितियों में कोई ख़ास फ़र्क नहीं आया है.एक लघु कथा के ज़रिये परसाईजी ने कितने बेहतरीन नोट पर अपनी बात को ख़त्म किया आइये पढ़ते हैं….
जाति
कारख़ाना खुला.कर्मचारियों के लिये बस्ती बन गई.
ठाकुरपुरा से ठाकुर साहब और ब्राह्मणपुरा से पंडितजी कारखा़ने में नौकरी करने लगे और पास-पास के ब्लाँक में रहने लगे.
ठाकुर साहब का लड़का और पंडितजी की लड़की दोनो जवान थे.उनमें पहचान हुई और पहचान इतनी बढ़ी कि दोनों ने शादी करने का निश्चय किया.
जब प्रस्ताव आया तो पंडितजी ने कहा…ऐसा कभी हो सकता है भला ? ब्राह्मण की लड़की ठाकुर से शादी करे ! जाति चली जाएगी.
ठाकुर साहब ने भी कहा कि ऐसा नहीं हो सकता.पर-जाति में शादी  करने से हमारी जाति चली जाएगी.
किसी ने उन्हें समझाया कि लड़का – लड़की बड़े हैं ..पढ़े-लिखे हैं..समझदार हैं..उन्हें शादी कर लेने दो.अगर शादी नहीं की तो भी वे चोरी छिपे मिलेंगे और तब जो उनका संबंध होगा वह व्यभिचार कहलाएगा…
इस पर ठाकुर साहब और पंडितजी एक स्वर में बोले…
होने दो.व्यभिचार से जाति नहीं जाती है ; शादी से जाती है.

पं.रामनारायण उपाध्याय की सात्विक पंक्तियाँ

जुलाई 18, 2007
म.प्र. के साहित्य लेखन के गाँधी दादा रामनारायण उपाध्याय सरल,सहज और सात्विक क़लम के कारीगर थे.पं.माखनलाल चतुर्वेदी के खण्डवा के रामा दादा जीवनभर गाँधीवादी सोच में जीते रहे और वैसा ही लिखते रहे.बापू के कहने पर ग्रामीण अंचल में रह कर साहित्य सेवा करने वाले रामा दादा म.प्र.के वरिष्ठ लेखकों की जमात में पहली पायदान के हस्ताक्षर थे.निबंध,कहानी और अपनी छोटी छोटी कविताओं के ज़रिये मानो वे पूरे भारत में बसे ग्रामीण परिवेश का इकतारा बजाते थे.उनकी बहुचर्चित पुस्तक ’गँवई मन और गाँव की याद’ में रचे गए निबंध..मेरे गाँवों की सुख-शांति किसने छीन ली..से संकलित की हैं ये अमृत पंक्तियाँ…
आख़िर गाँवों का सुख और शांति किसने छीन ली ?
किसान के कंठ के गीत कहाँ लुप्त हो गए ? तीज-त्योहार की मस्ती किसने चुरा ली ; दही बिलोने वाली के थिरकन पर अब किसी किसन कन्हैया का मन क्यों नहीं नाचता ? सूरज की पहली किरण अब ग्वाले के हाथ लकुटी क्यों नहीं बनती ? उगता सूरज , अब किसी हल जोतने वाले के मन में अपनी प्रिया के भाल पर लगे कुमकुम की याद क्यों नहीं जगाता ? रात का चाँद अब किसी नववधू की देह मेम अपने प्रियतम की याद का ताबीज़ बनकर क्यों नहीं चुभता?
 किसी घर में लड़की का ब्याह रचाया जाता तो गीत की कड़ियों से हर सुहावने प्रभात और संध्या का स्वागत किया जाता,किसी गीत की अंगुली पकड़कर गणेशजी लड़की वाले का पता पूछते-पूछते विवाह घर आते और एक बुज़ुर्ग की तरह सारे कामों को निर्विघ्न सम्पन्न करवा कर ही लौटते…
 लड़की की बिदाई पर पिता के रोने से गंगा में बाढ़ आ जाती.माँ के रोने से आकाश में अंधेरा छा जाता और भाई के रोने से उसकी धोती पाँवों तक भीग जाती.ब्याह के मांगलिक गीतों में मानसरोवर की तरह पिता,भरे पूरे भण्डार की तरह ससुर,बहती गंगा की तरह माँ भरी पूरी बावडी़ ती तरह सास, गुलाब के फूल की तरह बच्चे और उगते सूर्य की तरह स्वामी के रूप में ऐसी उद्दात्त कल्पनाएँ सँजोई हैं , जिनको लेकर,हमारा पारिवारिक जीवन समॄध्द होता आया है.
 लेकिन अब…..वे गोकुल से सहज , सरल गाँव नष्ट ही होते जा रहे हैं जहाँ स्त्रियाँ बडे भोर में उठकर आटे के साथ घने अंधेरे को भी पीसकर सुहावने प्रभात में बदल देतीं थीं.जहाँ घट्टी के हर फ़ेरे के साथ गीत की नई पंक्तियाँ उठतीं थीं.लगता था जैसी श्रम में से संगीत का जन्म हो रहा है.
 अब फ़्लोअर मिल के साथ घर की घट्टी के गीत समाप्त होते जा रहे हैं .ट्रेक्टर के साथ हल के गीतों का लोप होता जा रहा है.खेत के घास तो तो हल की नोक से भी उखाड़कर फ़ेंका जा सकता है लिकिन ट्रेक्टर की गहरी जुताई के साथ जिस हल्की और ओछी सभ्यता के बीज बोये जा रहे हैं उन्हें उखाड़ फ़ैकने में कितना समय लगेगा, यह सोचकर ह्र्दय काँ उठता है.
मन सोचने पर मजबूर हो जाता है कि खरा परिवेश त्याग कर ये जो सिंथेटिक ज़िंदगी ओढ़ ली है हमने क्या वह वाक़ई हमारे काम की है…परिवेश से परे एक पावन परिवार की कल्पना बेमानी लगती है और दादा रामनारायण की का यह शब्द चित्र मन को बेधता है.

क्या कुछ भी तुम्हे अब आमंत्रित नहीं करते ?

जुलाई 12, 2007
यदि बन सको तो बनो
पर्वतों की भाँति औघड़
नदियों की भाँति पारदर्शी
और आदिम हवाओं की भाँति अनागरिक
धरती के काव्य-संकलन जैसे
ये वन,उपवन,पर्वत
साम्राग्यियों के चीनांशुकों से
ये धनखेत
कृष्ण-आकुल गोपिका नेत्रों जैसे
ये श्यामल मेघ
क्या कुछ भी तुम्हें अब आमंत्रित नहीं करते ?
-श्रीनरेश मेहता

भवानी भाई की प्रेरक – पंक्तियाँ

जुलाई 10, 2007
साधारणत: मौन अच्छा है…
किन्तु मनन के लिये !
जब शोर हो चारों ओर, सत्य के हनन के लिये !
 तब तुम्हे अपनी बात,
ज्वलंत शब्दों में कहना चाहिये !
 सिर कटाना पडे़ या न पडे़
तैयारी तो उसकी होनी चाहिये.

आइना झूठ बोलता ही नहीं

जुलाई 1, 2007
कृष्णबिहारी नूर फ़रमाते हैं…
ज़िन्दगी से बडी़ सज़ा ही नहीं
और क्या जुर्म है पता ही नहीं
सच घटे या बढे़ तो सच न रहे
झूठ की कोई इंतहा ही नहीं
चाहे सोने के फ़्रेम मे जड़ दो
आइना झूठ बोलता ही नहीं

आपके ह्र्दय-द्वार पर….दिनकर सोनवलकर

जुलाई 1, 2007
न जाने क्या बात है कि हमारा मालवा अपनी गुदड़ी के लालों को वह मान देता ही नहीं जिसके वो अधिकारी होते हैं.ऐसे ही एक सु-कवि दिनकर सोनवलकर आज भाषा-संवाद की जाजम पधारे हैं दिनकर जी ने हिन्दी ग़ज़ल पर भी लाजवाब काम किया है (जिसे नीरज जी गीतिका कहते हैं )मराठी के यशस्वी कवियों के अनुवाद भी दिनकर जी ने किये है.कुछ बेहतरीन गीन आकाशवाणी इन्दौर से प्रसारित हुए हैं.दो रचनाएं पढ़िये और महसूस कीजिये इस विलक्षण क़लमकार कारीगरी को.ये रचनाएं १९७० यानी अब से ३७ बरस पहले हिन्दी की आदरणीय पत्रिका वीणा में प्रकाशित हुईं थीं…दिनकर सोनवलकर…
एक सूचना…
कला के इस मंदिर में
झुककर प्रवेश कर.
इसलिये नहीं कि
प्रवेशद्वार छोटा है ?
और तेरी ऊँचाई से
टकरा कर टूट जाएगा .
नहीं !
आकाश ही उसका द्वार है…विराट
यहाँ बौने ही लगेंगे तेरे ठाठ-बाट.
इंसानियत के आगे झुकना
सबसे बडी़ कला है
उन्ही को कर प्रणाम
इसी में छुपे हैं….
रहीम और राम.
परंपरा बोध…..
मुझे क्या ज़रूरत है
विदेशी स्टंटों से चमकृत होने की ?
जिसकी हों अपनी जड़ें,वही औरों के भरोसे जिये.
क्या बताएगा गिन्सबर्ग मुझ कबीर पंथी को ?
पहले कह गया है गुरू हमारा
जो घर फ़ूँके आपनो सो चले हमारे साथ
तुम पहनो अपने तन पर
उधार ली हुई फ़ाँरेनमेड पोषाकें
हम तो जन्म से ही नंगे हैं..नंगे अवधूत
मर्लिन मूनरो या मारिज़ुआना
दोनों हदों से बेहद हो चुके हैं हम .
‘हम न मरिहै संसारा’
बीटनिक,बीटल्स या हिप्पी,सभी हैं माया का पसारा.
इस ठगिनी को खू़ब जानते हैं हम .
तुम नये जीवन-दर्शन के नाम पर
बडी़ पुरानी विकृतियों को उछालत हो
रचते रहो आँप या पाँप
हम तो बस चुपचाप
ज्यों की त्यों धर देते हैं चदरिया
विद्रोह को पतिक्षणं जीते हुए !

मेरे दोहे

जुलाई 1, 2007
कविता मेरा इलाक़ा नहीं लेकिन विरासत में मिला संस्कार है.अनुभूति या अनुभव के स्तर पर कभी कभी कुछ भाव उमड़ते हैं वैसे ही जैसे बिन मौसम बादल बरसते हैं.मेरा मानना है कि हर व्यक्ति के मन में संगीत और कविता का अंडर-करंट होता है और वक़्त-बेवक़्त वह अभिव्यक्त हो ही जाता है.कविता-गीत-संगीत मुझे विरसे में वैसे ही मिले हैं जैसे मुझे मेरा जिस्म और ख़ून.और इसलिये यदि किसी पंक्ति पर यदि आपकी दाद मिलेगी तो पूरी ईमानदारी से मै उसे  मेरे बाप-दादाओं की यश की बही में लिख देना चाहूंगा.मुलाहिज़ा फ़रमाएं
अहंकार से मन भरमाया
वाणी दूषित रोगी काया.

दुर्लभ जन्म मिला मानव का
इसको क्यों फ़िर क्षुद्र बनाया.

निहित स्वार्थ में जिया है जीवन
दृष्टी -वृत्ति मन कैसा पाया.

क्षण क्षण कितने हुए निरर्थक
अर्थ न जाना व्यर्थ कमाया.

स्वीकारो श्रद्धा-अनुनय यह
प्रेम-दान दो शीतल छाया.

क्षमा-पात्र यह द्वार तुम्हारे
एक अकिंचन लेकर आया.
संजय पटेल

ज़िन्दगी की सचाइयां बयान करते मुक्तक

जून 23, 2007
आज ये मुक्तक लाया हूं बुज़ुर्ग शायर जनाब एस.एन.रूपायन के मजमुए ‘ टुकडे़ टुकडे़ हयात ‘से.
रूपायन साहब लाहौर के नामचीन एस.वी.काँलेज में पढे़ हैं और उर्दू के ऐसे शायरों में उनका ना बाइज़्ज़्त शुमार किया जा सकता है जिन्होने बहुत एकांत में रह कर ज़ुबान और अदब की ख़िदमत की है.पचास साला पुरानी किताबों की दुकान रूपायना ने इन्दौर शहर के लिट्रेचर और पुस्तक प्रेमियों को बहुत कुछ दिया है.रूपायन साहब अब अस्सी पार हैं और थक चले हैं.उनकी पत्नी श्रीमती लीला रूपायन जानी मानी कहानीकार हैं.रूपायन दंपत्ति की असली कमाई है इन्दौर के बडी़-छोटी उम्र के साहित्यप्रेमियों का स्नेह.रूपायन साहब की ज़िन्दगी का एक और पहलू है और वह यह कि वे हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के गहरे जानकार हैं और आकाशवाणी के प्रतिष्ठापूर्ण दौर में आँडिशन कमेटी के गणमान्य सदस्य रहे हैं.सादा तबियत रूपायन साहब हमेशा प्रचार और प्रशस्ति से कोसों दूर रहे हैं.उर्दू साहित्य की लोकप्रिय विधा मुक्तक पर रूपायन साहब का कारनामा रेखांकित करने योग्य है.वे चार पंक्तियों में पूरी एक ग़ज़ल का मर्म अपनी बात में कहने का हुनर रखते हैं रूपायन साहब. आज भाषा-संवाद मे उनके चंद मुक्तक ज़िन्दगी की सचाइयों को बयान कर रहे हैं .आपसे रूबरू हैं…जनाब एस.एन.रूपायन :
गै़र की बातों को छोडो़ गैर पर
दोस्तो ! खु़द से वफ़ादारी करो
जीना मुश्किल है मगर हर हाल में
हँस के जीने की अदाकारी करो.

ज़िन्दगानी की ओढ़नी पर जो
टांक रक्खे हैं हमने गुल-बूटे
फूल पत्ते ही इन को मत समझो
ये तो हैं छोटे-छोटे समझौते.
जिसकी है जैसी तमन्ना लिक्खो
और क्या उसको मिलेगा लिक्खो
जिनको आता नहीं जीने का हुनर
उनके हिस्से में निराशा लिक्खो.
टूटता हूँ न मै बिखरता हूँ
फ़ैलता हूँ फ़कत सदा बनकर
जब ज़माना मुझे सताता है
मै सिमट जाता हूँ दुआ बन कर.
रास्तों में उलझ न जाह कहीं
छोड़ कर घर को इतनी दूर न जा
नये रिश्ते तो बनते रहते हैं
जो पुराने हैं टूटने से बचा.
धूप शिद्द्त की है तो इसको मैं
सह न पाउंगा ये सवाल नहीं
लेकिन इस बात की है फ़िक्र मुझे
मेरा साया झुलस न जाए कहीं
पाप और पुण्य की लडा़ई में
कौन हारा है कौन जीत गया
सोचते सोचते यही आखि़र
ज़िन्दगी तेरा वक़्त बीत गया.

सुमनजी के मालवा का एक गुमनाम शायर…रमेश मेहबूब.

जून 17, 2007
वक़्त भी बडा़ बेरहम है.किसी को बिन मांगे देता है ..कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें अपना सर्वस्व देने के बाद भी कुछ नहीं मिलता.कला के क्षेत्र में तो ये बात ज़रा ज़्यादा ही लागू होती है.आज आपकी मुलाक़ात करवा रहा हूं मेरे शहर इन्दौर के वरिष्ठ कवि-शायर श्री रमेश मेहबूब से.नगर पालिक निगम इन्दौरे में टायपिस्ट रह चुके मेहबूबजी इन-दिनों बीमार रहते हैं ..पत्नी का देहांत हो चुका है और एकमात्र बेटी अपने ससुराल में व्यस्त रहती है… अपने परिवार और संसार की सुध लेने मे. रमेश मेहबूब ने छंद-बद्ध और अतुकांत कविताएं खू़ब लिखीं हैं.व्यंग्य  भी उनके काव्य में मुखर होता रहा है.राजनीति पर उनकी कविताओं में  व्यवस्था के खि़लाफ़ व्यंग्य बहुत  तीखा़ और चुभने वाला होता है.मालवा  के जिन कवियों  ने अपने क़लम से सक्रिय काव्य सेवा की है उनमें बालकवि बैरागी , सरोजकुमार,नरहरि पटेल,चंद्रसेन विराट,सत्यनारायण सत्तन,राहत इन्दौरी,क़ाशिफ़ इन्दौरी,नूर इन्दौरी,चन्द्रकांत देवताले के साथ रमेश मेहबूब का नाम भी इस  फ़ेहरिस्त में इज़्ज़त के साथ शुमार किया जा सकता है . मेहबूब जी की अनेक लाजवाब कविताएं हैं लेकिन आज मै आपके लिये उनकी  एक ग़ज़ल  ढूंढ निकाल लाया हूं.प्रयास करूंगा कि रमेश मेहबूब से संपर्क कर आपके लिये और रचनाएं जारी कर सकूं.अपनी बात ख़त्म करते हुए मै यह ज़रूर कहना चाहूंगा कि वक़्त रहते हमें अपने – अपने अंचल के काव्य और साहित्यकारों का दस्तावेज़ीकरण ज़रूर कर लेना चाहिये . डाँ.शिवमंगल सिंह सुमन के मालवा का यह यशस्वी कवि आज  अभाव और एकांत  से घिरा हुआ है लेकिन मेहबूब जी ने जो भी लिखा है वह अदभुत है.बस पुराने और मेहबूब जी जैसे लोगों के साथ एक ही बात है कि इन लोगों को कभी अच्छा प्रमोटर नहीं मिला अन्यथा वरिष्ठ कवि नीरज,माया गोविंद,सोम ठाकुर,काका हाथरसी,निर्भय हाथरसी,देवराज दिनेश और वीरेन्द्र मिश्र जैसे नामचीन कवियों के साथ काव्य-पाठ कर चुके रमेश मेहबूब का नाम आज देश के शीर्षस्थ कवियों में सम्मिलित किया जा सकता.
खै़र ये सब तो हमारे सोचने का नज़रिया है..मेहबूब अपने काव्य-कर्म से संतुष्ट हैं और उन्हे जितना भी नाम,यश और प्रेम मिला उसके लिये वे श्रोताओं सलाम करते हैं..
तो आइये मुलाहिज़ा फ़रमाइये..
रमेश मेहबूब की  ग़ज़ल..
 साज़िशें लड़वाने वालीं,दीनों-ईमां हो गईं
गीत हिन्दू हो गए,ग़ज़लें मुसलमां हो गईं
जब सियासत मज़हबों  की पालकी लेकर चली
मंदिर-ओ-मस्ज़िद की दीवारें पशेमां हो गईं
शहर में दंगे हुए,बाज़ार से उट्ठा धुआँ
शहर की गलियाँ सभी,आतिश-बदामाँ हो गईं
गुमशुदा लोगों में शामिल हो गईं अपनी भी नींद
ख्वा़ब हैराँ हो गए,रातें परेशाँ हो गईं
गीत भी मेहबूब के होठों पे अब आते नहीं
बेज़ुबाँ ग़ज़लें सभी अश्कों में पिनहाँ हो गईं

प्रेम करने के लिये समय निकालें

जून 15, 2007
जीवन और चिंतन को उर्जा से भर देने वाली एक आयरिश कविता आपके साथ बांट रहा हूं.
वक़्त अपनी रफ़्तार से आगे जा रहा है.हमें इस बात का अहसास होना चाहिये कि सिर्फ़ वक़्त ही नहीं बीत रहा उसके साथ हम भी बीत रहे हैं. ये कविता हमारे सीमित समय में से बहुत कुछ असीमित और अपने लिये करने को प्रेरित करती है.ये भी सनद रहे कि लिखा तो सब अच्छा ही जा रहा है ..या गया है….पढा़ भी अच्छा जा रहा है …लेकिन क्षमा करें मनन और आचरण के स्तर पर हमसे बड़ा हिप्पोक्रेट न मिलेगा (जी… मैं भी शामिल हूं इसमें)
शब्द संपदा तो एक सुरभि बन कर हमारे पास आते हैं , किताबों,ब्लाग्स,पत्रिकाओं या बुज़ुर्गों की सीख से रूप में ..लेकिन हम ही शायद चूक जाते हैं उस गंध का आनन्द लेने से. मै निराशवादी नहीं हूं..क्योंकि उम्मीद पर ही तो टिकी है सारी दुनिया..चलिये इसी कविता के साथ जीवन में एक नए,सुरीले,चैतन्य सोच को विकसित करने का प्रयास तो किया ही जा सकता है .आइये पढिये ये आइरिश कविता…..
काम के लिये समय निकालें
यह सफलता का मूल्य है.

चिंतन के लिये समय निकालें
यह शक्ति का स्त्रोत है

खेल के लिये समय निकालें
यह अक्षय यौवन का रहस्य है

अध्ययन के लिये समय निकालें
यह आनंद का मार्ग है

स्वप्नों के लिये समय निकालें
यह उत्कर्ष का पहला क़दम है

प्रेम करने के लिये समय निकालें
यह दिव्यता की अनुभूति है

अपने चहुँओर देखने के लिये समय निकालें
स्वार्थों के लिये दिन बहुत छोटा है

उल्लास के लिये समय निकालें
यह आत्मा का संगीत है.

यह आइरिश कविता पढ़ने के बाद आपके आगामी दिन सुदिन बीतें.
हां एक गुज़ारिश …आपको वाक़ई लगे कि इन शब्दों में सकारात्मक संदेश हैं 
 तो और मित्रों और परिजनों के बीच इन शब्दों को संक्रामक बनाएं.खा़सकर नौजवानों में.वे ही हमारी उम्मीद हैं ..उन्हीं से हमें आस है..वे हमारा विश्वास हैं
टीप : कवि का नाम मैं ढूंढ रहा हूं कई दिनों से…इसमें आपकी मदद का स्वागत है.

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रावण


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यह लेख निर्वाचित लेख बनने के लिए परखने हेतु रखा गया है। अधिक जानकारी के लिए और इस लेख को निर्वाचित लेख बनने के लिए क्या आवश्यकताएँ हैं यह जानने के लिए कृपया यहाँ देखें

राक्षस राज रावण का चित्र
रावण रामायण का एक विशेष पात्र है। रावण लंका का राजा था। वह अपने दस सिरों के कारण भी जाना जाता था (साधारण से दस गुणा अधिक मस्तिष्क शक्ति), जिसके कारण उसका नाम दशानन (दश = दस + आनन = मुख) भी था। किसी भी कृति के लिये अच्छे पात्रों के साथ ही साथ बुरे पात्रों का होना अति आवश्यक है। किन्तु रावण में अवगुण की अपेक्षा गुण अधिक थे। जीतने वाला हमेशा अपने को उत्तम लिखता है, अतः रावण को बुरा कहा गया है।
रामकथा में रावण ऐसा पात्र है, जो राम के उज्ज्वल चरित्र को उभारने काम करता है।

अनुक्रम

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[संपादित करें] रावण का उदय

पद्मपुराण, श्रीमद्भागवत पुराण, कूर्मपुराण, रामायण, महाभारत, आनन्द रामायण, दशावतारचरित आदि ग्रंथों में रावण का उल्लेख हुआ है। रावण के उदय के विषय में भिन्न-भिन्न ग्रंथों में भिन्न-भिन्न प्रकार के उल्लेख मिलते हैं।
  • वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण पुलस्त्य मुनि का पोता था अर्थात् उनके पुत्र विश्वश्रवा का पुत्र था। विश्वश्रवा की वरवर्णिनी और कैकसी नामक दो पत्नियां थी। वरवर्णिनी के कुबेर को जन्म देने पर सौतिया डाह वश कैकसी ने कुबेला (अशुभ समय - कु-बेला) में गर्भ धारण किया। इसी कारण से उसके गर्भ से रावण तथा कुम्भकर्ण जैसे क्रूर स्वभाव वाले भयंकर राक्षस उत्पन्न हुये।
  • तुलसीदास जी के रामचरितमानस में रावण का जन्म शाप के कारण हुआ था। वे नारद एवं प्रतापभानु की कथाओं को रावण के जन्म कारण बताते हैं।
मोटा पाठ==रावण के जन्म की कथा==
पूर्वकाल में ब्रह्मा जी ने अनेक जल जन्तु बनाये और उनसे समुद्र के जल की रक्षा करने के लिये कहा। तब उन जन्तुओं में से कुछ बोले कि हम इसका रक्षण (रक्षा) करेंगे और कुछ ने कहा कि हम इसका यक्षण (पूजा) करेंगे। इस पर ब्रह्माजी ने कहा कि जो रक्षण करेगा वह राक्षस कहलायेगा और जो यक्षण करेगा वह यक्ष कहलायेगा। इस प्रकार वे दो जातियों में बँट गये। राक्षसों में हेति और प्रहेति दो भाई थे। प्रहेति तपस्या करने चला गया, परन्तु हेति ने भया से विवाह किया जिससे उसके विद्युत्केश नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। विद्युत्केश के सुकेश नामक पराक्रमी पुत्र हुआ। सुकेश के माल्यवान, सुमाली और माली नामक तीन पुत्र हुये। तीनों ने ब्रह्मा जी की तपस्या करके यह वरदान प्राप्त कर लिये कि हम लोगों का प्रेम अटूट हो और हमें कोई पराजित न कर सके। वर पाकर वे निर्भय हो गये और सुरों, असुरों को सताने लगे। उन्होंने विश्‍वकर्मा से एक अत्यन्त सुन्दर नगर बनाने के लिये कहा। इस पर विश्‍वकर्मा ने उन्हें लंका पुरी का पता बताकर भेज दिया। वहाँ वे बड़े आनन्द के साथ रहने लगे। माल्यवान के वज्रमुष्टि, विरूपाक्ष, दुर्मुख, सुप्तघ्न, यज्ञकोप, मत्त और उन्मत्त नामक सात पुत्र हुये। सुमाली के प्रहस्त्र, अकम्पन, विकट, कालिकामुख, धूम्राक्ष, दण्ड, सुपार्श्‍व, संह्नादि, प्रधस एवं भारकर्ण नाम के दस पुत्र हुये। माली के अनल, अनिल, हर और सम्पाती नामक चार पुत्र हुये। ये सब बलवान और दुष्ट प्रकृति होने के कारण ऋषि-मुनियों को कष्ट दिया करते थे। उनके कष्टों से दुःखी होकर ऋषि-मुनिगण जब भगवान विष्णु की शरण में गये तो उन्होंने आश्‍वासन दिया कि हे ऋषियों! मैं इन दुष्टों का अवश्य ही नाश करूँगा।
जब राक्षसों को विष्णु के इस आश्‍वासन की सूचना मिली तो वे सब मन्त्रणा करके संगठित हो माली के सेनापतित्व में इन्द्रलोक पर आक्रमण करने के लिये चल पड़े। समाचार पाकर भगवान विष्णु ने अपने अस्त्र-शस्त्र संभाले और राक्षसों का संहार करने लगे। सेनापति माली सहित बहुत से राक्षस मारे गये और शेष लंका की ओर भाग गये। जब भागते हुये राक्षसों का भी नारायण संहार करने लगे तो माल्यवान क्रुद्ध होकर युद्धभूमि में लौट पड़ा। भगवान विष्णु के हाथों अन्त में वह भी काल का ग्रास बना। शेष बचे हुये राक्षस सुमाली के नेतृत्व में लंका को त्यागकर पाताल में जा बसे और लंका पर कुबेर का राज्य स्थापित हुआ। राक्षसों के विनाश से दुःखी होकर सुमाली ने अपनी पुत्री कैकसी से कहा कि पुत्री! राक्षस वंश के कल्याण के लिये मैं चाहता हूँ कि तुम परम पराक्रमी महर्षि विश्वश्रवा के पास जाकर उनसे पुत्र प्राप्त करो। वही पुत्र हम राक्षसों की देवताओं से रक्षा कर सकता है।
पिता की आज्ञा पाकर कैकसी विश्रवा के पास गई। उस समय भयंकर आँधी चल रही थी। आकाश में मेघ गरज रहे थे। कैकसी का अभिप्राय जानकर विश्रवा ने कहा कि भद्रे! तुम इस कुबेला में आई हो। मैं तुम्हारी इच्छा तो पूरी कर दूँगा परन्तु इससे तुम्हारी सन्तान दुष्ट स्वभाव वाली और क्रूरकर्मा होगी। मुनि की बात सुनकर कैकसी उनके चरणों में गिर पड़ी और बोली कि भगवन्! आप ब्रह्मवादी महात्मा हैं। आपसे मैं ऐसी दुराचारी सन्तान पाने की आशा नहीं करती। अतः आप मुझ पर कृपा करें। कैकसी के वचन सुनकर मुनि विश्रवा ने कहा कि अच्छा तो तुम्हारा सबसे छोटा पुत्र सदाचारी और धर्मात्मा होगा।
इस प्रकार कैकसी के दस मुख वाले पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम दशग्रीव (रावण) रखा गया। उसके पश्‍चात् कुम्भकर्ण, शूर्पणखा और विभीषण के जन्म हुये। दशग्रीव और कुम्भकर्ण अत्यन्त दुष्ट थे, किन्तु विभीषण धर्मात्मा प्रकृति का था। अपने भाई वैश्रवण से भी अधिक पराक्रमी और शक्‍तिशाली बनने के लिये दशग्रीव ने अपने भाइयों सहित ब्रह्माजी की तपस्या की। ब्रह्मा के प्रसन्न होने पर दशग्रीव ने माँगा कि मैं गरुड़, नाग, यक्ष, दैत्य, दानव, राक्षस तथा देवताओं के लिये अवध्य हो जाऊँ। रावण ने 'मनुष्य' से इसलिये नही कहा क्यों के वो मनुष्य को कमजोर तथा बलरहित समझता था| ब्रह्मा जी ने 'तथास्तु' कहकर उसकी इच्छा पूरी कर दी। विभीषण ने धर्म में अविचल मति का और कुम्भकर्ण ने वर्षों तक सोते रहने का वरदान पाया।वो एस वजह्से कि इन्द्रने मा सरस्वती को कहा कि जब कुम्भकर्ण वरदान मांग रहा हो तब आप उसका ध्यान विचलित करे।

[संपादित करें] रावण का विवाह

फिर दशग्रीव ने लंका के राजा कुबेर को विवश किया कि वह लंका छोड़कर अपना राज्य उसे सौंप दे। अपने पिता विश्रवा के समझाने पर कुबेर ने लंका का परित्याग कर दिया और रावण अपनी सेना, भाइयों तथा सेवकों के साथ लंका में रहने लगा। लंका में जम जाने के बाद अपने बहन शूर्पणखा का विवाह कालका के पुत्र दानवराज विद्युविह्वा के साथ कर दिया। उसने स्वयं दिति के पुत्र मय की कन्या मन्दोदरी से विवाह किया जो हेमा नामक अप्सरा के गर्भ से , प्रचलित जनश्रुतियो के अनुसार राजस्थान के जोधपुर के निकट मन्डोर मे उत्पन्न हुई थी। विरोचनकुमार बलि की पुत्री वज्रज्वला से कुम्भकर्ण का और गन्धर्वराज महात्मा शैलूष की कन्या सरमा से विभीषण का विवाह हुआ। कुछ समय पश्‍चात् मन्दोदरी ने मेघनाद को जन्म दिया जो इन्द्र को परास्त कर संसार में इन्द्रजित के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

[संपादित करें] रावण द्वारा भगवान शंकर की प्रार्थना

सत्ता के मद में रावण उच्छृंखल हो देवताओं, ऋषियों, यक्षों और गन्धर्वों को नाना प्रकार से कष्ट देने लगा। एक बार उसने कुबेर पर चढ़ाई करके उसे युद्ध में पराजित कर दिया और अपनी विजय की स्मृति के रूप में कुबेर के पुष्पक विमान पर अधिकार कर लिया। उस विमान का वेग मन के समान तीव्र था। वह अपने ऊपर बैठे हुये लोगों की इच्छानुसार छोटा या बड़ा रूप धारण कर सकता था। विमान में मणि और सोने की सीढ़ियाँ बनी हुई थीं और तपाये हुये सोने के आसन बने हुये थे। उस विमान पर बैठकर जब वह 'शरवण' नाम से प्रसिद्ध सरकण्डों के विशाल वन से होकर जा रहा था तो भगवान शंकर के पार्षद नन्दीश्‍वर ने उसे रोकते हुये कहा कि दशग्रीव! इस वन में स्थित पर्वत पर भगवान शंकर क्रीड़ा करते हैं, इसलिये यहाँ सभी सुर, असुर, यक्ष आदि का आना निषिद्ध कर दिया गया है। नन्दीश्‍वर के वचनों से क्रुद्ध होकर रावण विमान से उतरकर भगवान शंकर की ओर चला। उसे रोकने के लिये उससे थोड़ी दूर पर हाथ में शूल लिये नन्दी दूसरे शिव की भाँति खड़े हो गये। उनका मुख वानर जैसा था। उसे देखकर रावण ठहाका मारकर हँस पड़ा। इससे कुपित हो नन्दी बोले कि दशानन! तुमने मेरे वानर रूप की अवहेलना की है, इसलिये तुम्हारे कुल का नाश करने के लिये मेरे ही समान पराक्रमी रूप और तेज से सम्पन्न वानर उत्पन्न होंगे। रावण ने इस ओर तनिक भी ध्यान नहीं दिया और बोला कि जिस पर्वत ने मेरे विमान की यात्रा में बाधा डाली है, आज मैं उसी को उखाड़ फेंकूँगा। यह कहकर उसने पर्वत के निचले भाग में हाथ डालकर उसे उठाने का प्रयत्न किया। जब पर्वत हिलने लगा तो भगवान शंकर ने उस पर्वत को अपने पैर के अँगूठे से दबा दिया। इससे रावण का हाथ बुरी तरह से दब गया और वह पीड़ा से चिल्लाने लगा। जब वह किसी प्रकार से हाथ न निकाल सका तो रोत-रोते भगवान शंकर की स्तुति और क्षमा प्रार्थना करने लगा।ओर उस दिन से दशग्रिव दशानन कानाम रावण पडगया ।इस पर भगवान शंकर ने उसे क्षमा कर दिया और उसके प्रार्थान करने पर उसे एक चन्द्रहास नामक खड्ग भी दिया।

[संपादित करें] रावण का अत्याचार

एक दिन हिमालय प्रदेश में भ्रमण करते हुये रावण ने अमित तेजस्वी ब्रह्मर्षि कुशध्वज की कन्या वेदवती को तपस्या करते देखा। उस देखकर वह मुग्ध हो गया और उसके पास आकर उसका परिचय तथा अविवाहित रहने का कारण पूछा। वेदवती ने अपने परिचय देने के पश्‍चात् बताया कि मेरे पिता विष्णु से मेरे विवाह करना चाहते थे। इससे क्रुद्ध होकर मेरी कामना करने वाले दैत्यराज शम्भु ने सोते में उनका वध कर दिया। उनके मरने पर मेरी माता भी दुःखी होकर चिता में प्रविष्ट हो गई। तब से मैं अपने पिता के इच्छा पूरी करने के लिये भगवान विष्णु की तपस्या कर रही हूँ। उन्हीं को मैंने अपना पति मान लिया है।
पहले रावण ने वेदवती को बातों में फुसलाना चाहा, फिर उसने जबरदस्ती करने के लिये उसके केश पकड़ लिये। वेदवती ने एक ही झटके में पकड़े हुये केश काट डाले। फिर यह कहती हुई अग्नि में प्रविष्ट हो गई कि दुष्ट! तूने मेरा अपमान किया है। इस समय तो मैं यह शरीर त्याग रही हूँ, परन्तु तेरा विनाश करने के लिये फिर जन्म लूँगी। अगले जन्म में मैं अयोनिजा कन्या के रूप में जन्म लेकर किसी धर्मात्मा की पुत्री बनूँगी। अगले जन्म में वह कन्या कमल के रूप में उत्पन्न हुई। उस सुन्दर कान्ति वाली कमल कन्या को एक दिन रावण अपने महलों में ले गया। उसे देखकर ज्योतिषियों ने कहा कि राजन्! यदि यह कमल कन्या आपके घर में रही तो आपके और आपके कुल के विनाश का कारण बनेगी। यह सुनकर रावण ने उसे समुद्र में फेंक दिया। वहाँ से वह भूमि को प्राप्त होकर राजा जनक के यज्ञमण्डप के मध्यवर्ती भूभाग में जा पहुँची। वहाँ राजा द्वारा हल से जोती जाने वाली भूमि से वह कन्या फिर प्राप्त हुई। वही वेदवती सीता के रूप में राम की पत्‍नी बनी।ऋआव्आण ड्आॠण्ङ् ब्आआ़ ट्ःआ।

[संपादित करें] राजा अनरण्य का रावण को शाप

अनेक राजा महाराजाओं को पराजित करता हुआ दशग्रीव इक्ष्वाकु वंश के राजा अनरण्य के पास पहुँचा जो अयोध्या पर राज्य करते थे। उसने उन्हें भी द्वन्द युद्ध करने अथवा पराजय स्वीकार करने के लिये ललकारा। दोनों में भीषण युद्ध हुआ किन्तु ब्रह्माजी के वरदान के कारण रावण उनसे पराजित न हो सका। जब अनरण्य का शरीर बुरी तरह से क्षत-विक्षत हो गया तो रावण इक्ष्वाकु वंश का अपमान और उपहास करने लगा। इससे कुपित होकर अनरण्य ने उसे शाप दिया कि तूने अपने व्यंगपूर्ण शब्दों से इक्ष्वाकु वंश का अपमान किया है, इसलिये मैं तुझे शाप देता हूँ कि महात्मा इक्ष्वाकु के इसी वंश में दशरथनन्दन राम का जन्म होगा जो तेरा वध करेंगे। यह कहकर राजा स्वर्ग सिधार गये।

[संपादित करें] बालि से विवशतापूर्ण मैत्री

रावण की उद्दण्डता में कमी नहीं आई। राक्षस या मनुष्य जिसको भी वह शक्‍तिशाली पाता, उसी के साथ जाकर युद्ध करने लगता। एक बार उसने सुना कि किष्किन्धा पुरी का राजा बालि बड़ा बलवान और पराक्रमी है तो वह उसके पास युद्ध करने के लिये जा पहुँचा। बालि की पत्‍नी तारा, तारा के पिता सुषेण, युवराज अंगद और उसके भाई सुग्रीव ने उसे समझाया कि इस समय बालि नगर से बाहर सन्ध्योपासना के लिये गये हुये हैं। वे ही आपसे युद्ध कर सकते हैं। और कोई वानर इतना पराक्रमी नहीं है जो आपके साथ युद्ध कर सके। इसलिये आप थोड़ी देर उनकी प्रतीक्षा करें। फिर सुग्रीव ने कहा कि राक्षसराज! सामने जो शंख जैसे हड्डियों के ढेर लगे हैं वे बालि के साथ युद्ध की इच्छा से आये आप जैसे वीरों के ही हैं। बालि ने इन सबका अन्त किया है। यदि आप अमृत पीकर आये होंगे तो भी जिस क्षण बालि से टक्कर लेंगे, वह क्षण आपके जीवन का अन्तिम क्षण होगा। यदि आपको मरने की बहुत जल्दी हो तो आप दक्षिण सागर के तट पर चले जाइये। वहीं आपको बालि के दर्शन हो जायेंगे।
सुग्रीव के वचन सुनकर रावण विमान पर सवार हो तत्काल दक्षिण सागर में उस स्थान पर जा पहुँचा जहां बालि सन्ध्या कर रहा था। उसने सोचा कि मैं चुपचाप बालि पर आक्रमण कर दूँगा। बालि ने रावण को आते देख लिया परन्तु वह तनिक भी विचलित नहीं हुआ और वैदिक मन्त्रों का उच्चारण करता रहा। ज्योंही उसे पकड़ने के लिये रावण ने पीछे से हाथ बढ़ाया, सतर्क बालि ने उसे पकड़कर अपनी काँख में दबा लिया और आकाश में उड़ चला। रावण बार-बार बालि को अपने नखों से कचोटता रहा किन्तु बालि ने उसकी कोई चिन्ता नहीं की। तब उसे छुड़ाने के लिये रावण के मन्त्री और अनुचर उसके पीछे शोर मचाते हुये दौड़े परन्तु वे बालि के पास तक न पहुँच सके। इस प्रकार बालि रावण को लेकर पश्‍चिमी सागर के तट पर पहुँचा। वहाँ उसने सन्ध्योपासना पूरी की। फिर वह दशानन को लिये हुये किष्किन्धापुरी लौटा। अपने उपवन में एक आसन पर बैठकर उसने रावण को अपनी काँख से निकालकर पूछा कि अब कहिये आप कौन हैं और किसलिये आये हैं?
रावण ने उत्तर दिया कि मैं लंका का राजा रावण हूँ। आपके साथ युद्ध करने के लिये आया था। मैंने आपका अद्‍भुत बल देख लिया। अब मैं अग्नि की साक्षी देकर आपसे मित्रता करना चाहता हूँ। फिर दोनों ने अग्नि की साक्षी देकर एक दूसरे से मित्रता स्थापित की।

[संपादित करें] रावण के गुण

रावण मे कितना ही राक्षसत्व क्यों न हो, उसके गुणों विस्मृत नहीं किया जा सकता। रावण एक अति बुद्धिमान ब्राह्मण तथा शंकर भगवान का बहुत बड़ा भक्त था। वह महा तेजस्वी, प्रतापी, पराक्रमी, रूपवान तथा विद्वान था।
वाल्मीकि उसके गुणों को निष्पक्षता के साथ स्वीकार करते हुये उसे चारों वेदों का विश्वविख्यात ज्ञाता और महान विद्वान बताते हैं। वे अपने रामायण में हनुमान का रावण के दरबार में प्रवेश के समय लिखते हैं
अहो रूपमहो धैर्यमहोत्सवमहो द्युति:।
अहो राक्षसराजस्य सर्वलक्षणयुक्तता॥
आगे वे लिखते हैं "रावण को देखते ही राम मुग्ध हो जाते हैं और कहते हैं कि रूप, सौन्दर्य, धैर्य, कान्ति तथा सर्वलक्षणयुक्त होने पर भी यदि इस रावण में अधर्म बलवान न होता तो यह देवलोक का भी स्वामी बन जाता।"
रावण जहाँ दुष्ट था और पापी था वहीं उसमें शिष्टाचार और ऊँचे आदर्श वाली मर्यादायें भी थीं। राम के वियोग में दुःखी सीता से रावण ने कहा है, "हे सीते! यदि तुम मेरे प्रति कामभाव नहीं रखती तो मैं तुझे स्पर्श नहीं कर सकता।" शास्त्रों के अनुसार वन्ध्या, रजस्वला, अकामा आदि स्त्री को स्पर्श करने का निषेष है अतः अपने प्रति अकामा सीता को स्पर्श न करके रावण मर्यादा का ही आचरण करता है।
वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस दोनों ही ग्रंथों में रावण को बहुत महत्त्व दिया गया है। राक्षसी माता और ऋषि पिता की सन्तान होने के कारण सदैव दो परस्पर विरोधी तत्त्व रावण के अन्तःकरण को मथते रहते हैं।

[संपादित करें] रावण के अवगुण

वाल्मीकि रावण के अधर्मी होने को उसका मुख्य अवगुण मानते हैं। उनके रामायण में रावण के वध होने पर मन्दोदरी विलाप करते हुये कहती है, "अनेक यज्ञों का विलोप करने वाले, धर्म व्यवस्थाओं को तोड़ने वाले, देव-असुर और मनुष्यों की कन्याओं का जहाँ तहाँ से हरण करने वाले! आज तू अपने इन पाप कर्मों के कारण ही वध को प्राप्त हुआ है।" तुलसीदास जी केवल उसके अहंकार को ही उसका मुख्य अवगुण बताते हैं। उन्होंने रावण को बाहरी तौर से राम से शत्रु भाव रखते हुये हृदय से उनका भक्त बताया है। तुलसीदास के अनुसार रावण सोचता है कि यदि स्वयं भगवान ने अवतार लिया है तो मैं जाकर उनसे हठपूर्वक वैर करूंगा और प्रभु के बाण के आघात से प्राण छोड़कर भव-बन्धन से मुक्त हो जाऊंगा।

[संपादित करें] रावण के दस सिर

रावण के दस सिर होने की चर्चा रामायण में आती है। वह कृष्णपक्ष की अमावस्या को युद्ध के लिये चला था तथा एक-एक दिन क्रमशः एक-एक सिर कटते हैं। इस तरह दसवें दिन अर्थात् शुक्लपक्ष की दशमी को रावण का वध होता है। रामचरितमानस में यह भी वर्णन आता है कि जिस सिर को राम अपने बाण से काट देते हैं पुनः उसके स्थान पर दूसरा सिर उभर आता था। विचार करने की बात है कि क्या एक अंग के कट जाने पर वहाँ पुनः नया अंग उत्पन्न हो सकता है? वस्तुतः रावण के ये सिर कृत्रिम थे - आसुरी माया से बने हुये। मारीच का चाँदी के बिन्दुओं से युक्त स्वर्ण मृग बन जाना, रावण का सीता के समक्ष राम का कटा हुआ सिर रखना आदि से सिद्ध होता है कि राक्षस मायावी थे। वे अनेक प्रकार के इन्द्रजाल (जादू) जानते थे। तो रावण के दस सिर और बीस हाथों को भी कृत्रिम माना जा सकता है।

[संपादित करें] संदर्भ और टीका

  • श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण (प्रथम एवं द्वितीय खंड), सचित्र, हिंदी अनुवाद सहित, प्रकाशक एवं मुद्रक: गीताप्रेस, गोरखपुर
  • वाल्मीकीय रामायण, प्रकाशक: देहाती पुस्तक भंडार, दिल्ली
  • आचार्य चतुरसेन का उपन्यास : "Vayam Rakshamah" (वयं रक्षाम:)

[संपादित करें] बाहरी कड़ियाँ

पूज्य हुज़ूर का निर्देश

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