Monday, January 21, 2013

हिंदी का अरण्यरोदन

शंभुनाथ
जनसत्ता 26 सितंबर, 2012: हिंदी का जन्म ही आजाद और लोकतांत्रिक मानसिकता की देन है। इसलिए इसे मानसिक आजादी की भाषा या लोकतंत्र की भाषा के रूप में देखा जाता है। अगर हमारी मानसिक आजादी और हमारा लोकतंत्र सुरक्षित है, तब हिंदी को आगे बढ़ने और विश्व में सम्मानजनक स्थान पाने से नहीं रोका जा सकता। पर अगर हम मानसिक आजादी खो रहे हों और लोकतंत्र बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मुट्ठी में चला जा रहा हो तो दुनिया की कई दूसरी भाषाओं की तरह हिंदी का तरह-तरह से संकट में पड़ना, इसका सिकुड़ना या विकृत होना निश्चित है। इन स्थितियों में हमें ‘इंडेंजर्ड लैंग्वेज’ की अवधारणा का विस्तार करना होगा। दुनिया की तमाम राष्ट्रीय भाषाओं को- जिनमें कई यूरोपीय भाषाएं भी हैं, दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका की भाषाएं भी हैं- और अपनी तमाम भारतीय भाषाओं को और निश्चित रूप से हिंदी को भी बढ़ते अंग्रेजी-वर्चस्व के बरक्स ‘इंडेंजर्ड लैंग्वेजेज’ के रूप में देखना चाहिए।
हिंदी लोकचेतना और लोकतंत्र की देन है। यह हम सिद्धों-नाथों से लेकर अमीर खुसरो, विद्यापति और भक्त कवियों से होते हुए भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रेमचंद, निराला, अज्ञेय आदि तक देख सकते हैं। इन्होंने हिंदी को गढ़ा, विकसित किया और लोकप्रिय बनाया। आज मुख्यत: हिंदी को कौन निर्मित कर रहा है? आज जो मस्त, चुलबुली और दमकती हुई हिंदी दिखाई देती है, वह पहले से काफी फैली हुई भले नजर आए, हम उससे संतुष्ट नहीं हो सकते। आज सूचना और मनोरंजन की भाषा के रूप में निश्चय ही हिंदी का प्रसार हुआ है। पर क्या यह दफ्तर, अंतरराष्ट्रीय बाजार, उच्च-स्तरीय वार्ता, उच्च शिक्षा, ज्ञान-विज्ञान और बहस की भाषा बन पाई है? इसलिए हमें कहना होगा कि भारत में अंग्रेजी-वर्चस्व की वजह से भाषा का लोकतंत्र नहीं है। हिंदी लोकतंत्र की भाषा सिर्फ तब बनेगी, जब सूचना और मनोरंजन की भाषा से आगे बढ़ कर ज्ञान और संवेदना की भाषा बने।
दक्षिण अफ्रीका की धरती पर ही महात्मा गांधी ने पहली बार साम्राज्यवादी भेदभाव के विरुद्ध ‘पैसिव रेजिस्टेंस’ शुरू किया था, अपने सत्याग्रह की शक्ति से दुनिया को परिचित कराया था। उनकी लड़ाई मानवीय आत्मसम्मान, आजादी और लोकतंत्र के लिए ही नहीं थी; राष्ट्रीय भाषाओं की मर्यादा की प्रतिष्ठा के लिए भी थी। गांधी ने भारत में कहा था, ‘‘मैकाले ने जिस शिक्षा की नींव रखी, उसने सबको गुलाम बना दिया है। यदि भारत अंग्रेजी बोलने वाले लोगों का स्वराज्य है, तो नि:संदेह अंग्रेजी ही राष्ट्रीय भाषा होगी। लेकिन अगर भारत करोड़ों भूखों मरने वालों, निरक्षरों और दलितों-अंत्यजों का स्वराज्य है और इन सबके लिए है तो हिंदी ही एकमात्र राष्ट्रभाषा हो सकती है।’’ अंग्रेजी भले फिलहाल एक अंतरराष्ट्रीय भाषा है, पर पिछले दरवाजे से विश्व भर में यथार्थत: यही ‘नेशनल लैंग्वेज’ बनती जा रही है और जीवन में चारों तरफ छाती जा रही है- हम ऐसा कभी होने नहीं देंगे। हम हिंदी ही नहीं, सभी भारतीय भाषाओं के आत्मसम्मान के लिए लड़ेंगे। जोहानिसबर्ग के विश्व हिंदी सम्मेलन की सार्थकता इसी में है कि यह अंग्रेजी-वर्चस्व के विरुद्ध लड़ाई का एक प्रेरणास्रोत बने।
विश्व हिंदी सम्मेलन निश्चय ही हिंदी की दशा और भावी दिशा पर सोचने के लिए था। यह भूलना नहीं होगा कि हिंदी का भविष्य पहले भी भारतीय भाषाओं के भविष्य से जुड़ा हुआ था और आज भी जुड़ा है। हमारी पहली और आखिरी मांग यह होनी चाहिए कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का सशक्तीकरण किया जाए। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के सशक्तीकरण का अर्थ है भारतीय जनता का सशक्तिकरण, लोकतंत्र को मजबूत बनाना। हम कहना चाहते हैं कि स्त्रियों के सशक्तीकरण, दलितों के सामाजिक न्याय, किसानों और आदिवासियों के सशक्तीकरण की तरह ही भारतीय भाषाओं का, हिंदी का सशक्तीकरण जरूरी है।
लोकतंत्र में हिंदी कहां है, किस दशा में है? हिंदी में लोकतंत्र कितना है, किस दशा में है? इन सवालों के सामने अगर हम-आप खड़े हों, हमारे भीतर रूह होगी तो वह कांप जाएगी। ‘लोकतंत्र में हिंदी’ इस समय भीष्म साहनी की ‘चीफ की दावत’ है और हिंदी में लोकतंत्र, प्रेमचंद से उदाहरण लेकर कहें तो, ‘ठाकुर का कुआं’ है। इसलिए बाहर अंग्रेजी-वर्चस्व से लड़ाई है तो हिंदीवालों को अपने भीतर छिपे सामंतवाद से भी कम नहीं लड़ना होगा।
गांधी ने कहा था, ‘सादा जीवन, उच्च विचार’। आज उसकी जगह छाता जा रहा है ‘कृत्रिम जीवन, निम्न विचार’। आज चारों तरफ वस्तुएं ही वस्तुएं हैं और विचार की कमी हो गई है।
हिंदी बाजार की भाषा बन चुकी हो, पर इसे लोकतंत्र की भाषा बनाना बाकी है। हिंदी लोकतंत्र की भाषा कैसे बने? हिंदी में अंग्रेजी के कुछ चमकीले शब्द आ जाने से या हिंदी के इंग्लिश बन जाने भर से यह लोकतांत्रिक नहीं हो सकती। हिंदी जिन स्थानों पर अपनाई जा रही है, बढ़ रही है, वहां की स्थानीय भाषाओं-संस्कृतियों के तत्त्व उसमें घुले-मिलें, यह हिंदी का लोकतंत्र है।
हिंदी में अंग्रेजी शब्दों का एकाधिकारवाद इसके लोकतांत्रिक स्वरूप के लिए खतरनाक है। इसलिए हिंदी के जातीय स्वरूप की रक्षा एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि इसके बिना यह विश्व में सम्मानजनक स्थान नहीं पा सकती।
दरअसल, इस समय अंग्रेजी खुद ही खोखली नहीं होती जा रही है, यह दुनिया की सारी भाषाओं और लोगों के जीवन को खोखला बना रही है। इसलिए हिंदी को लोकतंत्र की भाषा बनाने का अर्थ है, इसे कैसे राष्ट्रीय जन-जीवन का आईना बनाया जाए। हम इसे बाजार

की जेरॉक्स कॉपी बनते नहीं देख सकते। हम चाहते हैं कि इसे लोकतंत्र के तीन खंभों की भाषा बनाने के साथ-साथ उच्च शिक्षा का माध्यम बनाया जाए। यह शर्म की बात मानी जानी चाहिए कि आज भी आजादी के पैंसठ साल बाद भारत में उच्च शिक्षा की भाषा सिर्फ अंग्रेजी है।
हम सिर्फ इस पर गर्व करते हैं कि हिंदी बोलने-समझने वालों की संख्या चालीस करोड़ से अधिक है। हमें इस संख्या से संतोष न करके देखना है कि हम हिंदी को अब तक गुणात्मक रूप से कितनी समृद्ध बना पाए हैं। हम इसे संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने का स्वप्न देखते रहे हैं, इसे विश्व-भाषा बनाने की फिक्र है। इस सवाल पर विचार कीजिए, क्या हिंदी में कोई अद्यतन विश्वकोश है? हिंदी पट््टी की अपनी उनचास भाषाएं, उपभाषाएं और बोलियां हैं। इन बोलियों के अद्भुत अंतर्ध्वनि वाले शब्द कुछ दशकों से गुम होने लगे हैं और बीस-पचीस सालों में, लगता है, विलुप्त हो जाएंगे। क्या हिंदी की जड़ों को बचाने के लिए उनचास खंडों में हिंदी लोक शब्दकोश हम बना पाए हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि हिंदी के एक सरकारी संस्थान में लगभग छह साल पहले ‘लघु हिंदी विश्वकोश’ की योजना उस समय के मानव संसाधन विकास मंत्री की उपस्थिति में स्वीकृत कराके तेजी से शुरू कर दी गई थी। काफी काम हुआ था, पर पिछले तीन सालों से सब ठप है या यह प्राथमिकता में नहीं है। अगर हिंदी को गुणात्मक रूप से समृद्ध करना हम जरूरी समझते हों, अगर जरूरी मानते हों कि हिंदी में इन्साइक्लोपीडिया, हिंदी लोक शब्दकोश बनने चाहिए तो ये चीजें भी विश्व हिंदी सम्मेलन की मुख्य चिंताओं में होनी चाहिए।
यह समझने की जरूरत है कि लोकतंत्र में जो भी शक्ति आती है, वह राष्ट्रीय भाषाओं की उन्नति से आती है, जिनमें हिंदी प्रमुख है। इस समय लोकतंत्र अंग्रेजी की मुट्ठी में है और अंग्रेजी विदेशी वित्तीय पूंजी की मुट्ठी में है। अगर हम सोचते हैं कि लोकतंत्र में आम लोगों की हिस्सेदारी बढ़े तो इसके लिए जरूरी है कि हिंदी की भूमिका को विस्तार मिले। हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाएं पॉवर ग्रिड की तरह हैं, हमारी संस्कृति की ही नहीं, हमारी जातीय आत्म-पहचान और विकास की भी। अगर हिंदी का पॉवर ग्रिड फेल हुआ तो समझना चाहिए संपूर्ण भारतीय जीवन में अंधकार छा जाएगा। कृत्रिम रोशनी के कुछ छोटे-छोटे द्वीप भले झलमलाएं! मुश्किल यह है कि वैश्वीकरण के जमाने में एक इतना बड़ा सांस्कृतिक आक्रमण है, पर इससे लोग डरते नही हैं। वे अब डरते हैं सिर्फ भूत-प्रेत की फिल्मों से। और गर्व क्या अब तो शर्म भी नहीं है।
मीडिया के लोगों को इस पर सोचना चाहिए कि लोकतंत्र का आज चौथा खंभा कौन है- मीडिया या बाजार। संभवत: अब मीडिया की जगह बाजार लोकतंत्र का चौथा खंभा बनता जा रहा है, जो खुद पत्रकारों और संपूर्ण मीडिया जगत के लिए एक चुनौतीपूर्ण मामला है। हिंदी पत्रकारिता और मीडिया का एक गौरवशाली राष्ट्रीय इतिहास है। एक समय हिंदी पत्रकारिता जब हिंदी को बना-बढ़ा रही थी, वह अतीत के दकियानूसी विचारों और पश्चिम के अंधानुकरण से लड़ रही थी। आज मीडिया ‘पेड न्यूज’ से आक्रांत है। हिंदी का जो कुछ श्रेष्ठ और सुंदर है, अब वह बिग मीडिया से बहिष्कृत है। पत्रकार का मूल्य इससे आंका जाता है कि वह कितनी अधिक बिकाऊ खबर ले आता है। निश्चय ही हिंदी आज मीडिया और विज्ञापन की प्रधान भाषा है। हिंदी के बिना आम उपभोक्ता तक पहुंचना मुश्किल है। मगर इस सवाल पर सोचना होगा कि मीडिया हिंदी पाठक या दर्शक के दिमाग का कितना ‘रेजिमेंटेशन’ कर रहा है और उसे कितना स्वाधीन बना रहा है। मीडिया की बाजारू भाषा में जीवन का मजा है, पर जीवन का सौंदर्य नहीं है।
विश्व हिंदी सम्मेलन में इस पर गहरी चिंता व्यक्त की जानी चाहिए कि हिंदी को हिंदी क्षेत्र के शिक्षित लोगों की जितनी ताकत मिलनी चाहिए, उतनी नहीं मिल रही है। विश्व बांग्ला सम्मेलन हर साल होता है। बंगाल के बुद्धिजीवी, समाचारपत्र, व्यापारी सभी उसका अभिनंदन करते हैं। दूसरी भारतीय भाषाओं के विदेश में बसे लोगों ने भी अपनी भाषा-संस्कृति नहीं छोड़ी है। हिंदी के लोग ही इतने उदासीन क्यों हैं, वे देश में और विदेशों में हिंदी के लिए आगे क्यों नहीं आते? एक अरण्यरोदन-सा कहीं हो जाता है विश्व हिंदी सम्मेलन।
विश्व हिंदी सम्मेलन को एक ऐसा अवसर समझना चाहिए, जब हम मिले-जुलें, समस्याओं को पहचानें, आपस में बैठ कर समस्याओं के समाधान निकालें, दूरियां मिटाएं और यह सोचें कि हिंदी के लिए और क्या किया जा सकता है। चीरफाड़ जरूरी है, पर सिर्फ चीरफाड़ नहीं। हम यह देखें कि कैसे हिंदी की सरकारी संस्थाएं हिंदी की कब्रें न बनने पाएं। इस पर सोचें कि कैसे हर साल विश्व हिंदी सम्मेलन हो- एक साल भारत में और एक साल विदेश में। कैसे हम विश्व हिंदी सम्मेलन को एक ऐसी जगह बनाएं, जहां हिंदी से जुड़ी सांस्कृतिक विविधता की उच्च झलक हो। विश्व हिंदी सम्मेलन विदेशी शहरों में महज घूम-फिर आने का मामला नहीं है, यह एक संकल्प से भर जाने का मामला है- इस सम्मेलन का प्रतीक गांधी का चरण चिह्न यही कहता था। यह बौद्धिक साम्राज्यवाद लड़ने का आह्वान करता है। क्या दक्षिण अफ्रीका का सम्मेलन एक प्रस्थान-बिंदु बनेगा। क्या यह भारत के हिंदी क्षेत्र में कोई आलोड़न पैदा कर सका?
 

Saturday, January 19, 2013

भारतीय डाक : सदियों का सफरनामा


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पुस्तक लेखक-अरविंद कुमार सिंह प्रकाशक-नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया मूल्य-125 रूपए पृष्ठï-416 दुनिया में सबसे उन्नत मानी जानेवाली भारतीय डाक व्यवस्था का संगठित स्वरूप भी 500 साल पुराना है। एकीकृत व्यवस्था के तहत ही भारतीय डाक डेढ़ सदी से ज्यादा लंबा सफर तय कर चुकी है। कड़ी प्रतिस्पर्धा के बावजूद आज भी डाकघर ही ग्रामीण भारत की धडक़न बने हैं। आजादी के समय भारत में महज 23334 डाकघर थे,पर उनकी संख्या 1.55 लाख पार कर चुकी है। डाकघरों की भूमिकाएं भी समय के साथ बदल रही हैं। इसी नाते भारतीय डाक प्रणाली दुनिया के तमाम विकसित देशों से कहींं अधिक विश्वसनीय और बेहतर बन चुकी है। आजादी मिलने के बाद स्व.रफी अहमद किदवई के संचार मंत्री काल में भारतीय डाक तंत्र के मजबूत विकास की रूपरेखा बनी और लगातार समर्थन ने इसे बहुत मजबूत बनाया। इसी नाते भारत के दूर देहात में डाकघरोंं की सुगम पहुंच बन सकी। हमारे 89 फीसदी डाकघर देहातों में ही स्थित हैं। इसी तरह सेना डाकघरों का भी अपना विशेष महत्व है क्योंकि इनकी गति दुनिया में सबसे तेज है। पुस्तक में डाक प्रणाली के साथ परिवहन प्रणाली का भी रोचक व्यौरा है।जानेमाने लेखक एवं पत्रकार अरविंद कुमार सिंह ने भारतीय डाक प्रणाली का आकलन मौर्य काल से आधुनिक इंटरनेट युग तक किया है। नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया द्वारा प्रकाशित उनकी पुस्तक भारतीय डाक: सदियों का सफरनामा तमाम रोचक और अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डालती है। करीब डेढ़ दशक तक अनुसंधान के बाद श्री सिंह ने यह पुस्तक लिखी और इसे उन हजारों डाकियो को समर्पित किया है जिनके नन्हे पांव सदियों से संचार का सबसे बड़ा साधन रहे हैं।
किसी भी देश के आर्थिक सामाजिक और संास्कृतिक विकास में डाक विभाग की भी अपनी अहम भूमिका होती है। यही कारण है कि इसे भी सडक़,रेल और फोन की तरह आधारभूत ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। भारत में 1995 के आसपास मोबाइल के चलते संचार क्रांति का जो नया दौर शुरू हुआ,उसका विस्तार बहुत तेजी से हुआ। उसके बाद खास तौर पर शहरी इलाकों मेें यह आम मान्यता हो गयी कि अब डाक सेवाओं और विशेष कर चि_िïयों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। पर वास्तविकता यह है कि संचार क्रांति मुख्य रूप से शहरी इलाकों तक ही सीमित है। देश के 70 फीसदी लोग आज भी ग्रामीण इलाकों में रहते हैं और यहां आज भी लोगों के लिए आपसी संपर्क का साधन चि_िïयां हैं। तमाम नयी प्रौद्योगिकी के आने के बावजूद डाक ही देहात का सबसे प्रभावी और विश्वसनीय संचार माध्यम बना हुआ है। जब भारत को आजादी मिली थी तो यहां कुल टेलीफोनों की संंख्या 80 हजार थी और 34 सालों में 20.5 लाख टेलीफोन लग पाए थे। पर अब दूरसंचार नेटवर्क के तहत हर माह लाखों नए फोन लग रहे है। फिर भी संचार के नए साधनो के तेजी से विस्तार के बावजूद चि_िïयां अपनी जगह महत्व की बनी हुई हैं। आज भी हर साल करीब 900 करोड़ चि_िïयां भारतीय डाक विभाग दरवाजे-दरवाजे तक पहुंचा रहा है। कूरियर और ईमेल से जानेमानी चि_िïयां अलग हैं। 1985 में जब डाक और तार विभाग अलग किया गया था तब सालाना 1198 करोड़ पत्रों की आवाजाही थी। आज भी वैकल्पिक साधनों के विकास के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में पत्रों का आना -जाना भारतीय डाक प्रणाली के महत्व और उसकी सामाजिक उपादेयता को दर्शाने के लिए काफी है। पर चुनौतियों से जुड़ा दूसरा पहलू भी गौर करनेवाला है। दुनिया भर में डाकघरों की भूमिका में बदलाव आ रहे हैं। इलेक्ट्रानिक मेल और नयी प्रौद्योगिकी परंपरागत डाक कार्यकलापों का पूरक बन रही है। मोबाइल और स्थिर फोन,यातायात के तेज साधन,इंटरनेट और तमाम माध्यमों से चि_ïी प्रभावित हुई है। पर दुनिया में चि_िïयों पर सर्वाधिक प्रभाव टेलीफोनो ने डाला। लेकिन भारत में यह प्रभाव खास तौर पर महानगरों में ही देखने को मिल रहा है। पर यह गौर करने की बात है कि शहरी इलाकों में व्यावसायिक डाक लगातार बढ़ रही है। इसका खास वजह यह है कि टेलीमार्केटिंग की तुलना में चि_िïयां व्यवसाय बढ़ाने में अधिक विश्वसनीय तथा मददगार साबित हो रही हैंं।
भारतीय डाक प्रणाली पर अगर बारीकी से गौर किया जाये तो पता चलता है कि आजादी के बाद ही डाक नेटवर्र्क का असली विस्तार हुआ। हमारी डाक प्रणाली का विस्तार सात गुना से ज्यादा हुआ है। डाक विभाग की ओर से  कुल 38 सेवाऐं प्रदान की जा रही हैं,जिनमें से ज्यादातर घाटे में हैं। फिर भी यह  विभाग एक विराट सामाजिक भूमिका निभा रहा है। यही नहीं भारतीय डाक प्रणाली आज दुनिया की सबसे विश्वसनीय और अमेरिका,चीन,बेल्जियम और ब्रिटेन से भी बेहतर प्रणाली साबित हो चुकी है। 
अरविंद कुमार सिंह ने अपनी पुस्तक में मौर्य काल की पुरानी डाक व्यवस्था से लेकर रजवाड़ों की डाक प्रणाली, पैदल, घोड़ा -गाड़ी, नाव और पालकी से लेकर ऊंटों तक का उपयोग करके डाक ढ़ोने की व्यवस्था जैसे तमाम रोचक और प्रामाणिक तथ्य हमें अतीत में ले जाते हैं। 1 अक्तूबर 1854 को डाक महानिदेशक के नियंत्रण में डाक विभाग के गठन की ऐतिहासिक पृष्ठïभूमि ,डाक अधिनियम ,ब्रिटिश डाक प्रणाली के विकास और विस्तार के पीछे के कारण और अन्य तथ्यों को शामिल करके इसे काफी रोचक पुस्तक बना दिया गया है। 1857 की क्रांति और उसके बाद के आजादी के आंदोलनो में डाक कर्मचारियों की ऐतिहासिक भूमिका को भी इस पुस्तक के एक खंड में विशेष तौर पर दर्शाया गया है। डाक कर्मचारी भी आजादी के आंदोलन में अग्रणी भूमिका में थे और स्वतंत्रता सेनानियों के संदेशोंं के आदान प्रदान में भी कई ने बहुत जोखिम लिया। मगर दुर्भाग्य से इस तथ्य का अनदेखी की सभी ने की। डाक विभाग ने केवल चि_िïयां ही नहीं पहुंचायी। मलेरिया नियंत्रण तथा प्लेग की महामारीे रोकने मेें भी डाक विभाग की ऐतिहासिक भूमिका रही है। ऐतिहासिक नमक सत्याग्रह के दौरान देहात तक नमक पहुंचाने में डाक विभाग की भूमिका काफी दिलचस्प तरीके से दर्शायी गयी है। शुरू से ही भारतीय डाक बहुआयामी भूमिका में रहा है तथा बहुत कम लोग जानते हैं कि डाक बंगलों, सरायों तथा सडक़ों पर के रख रखाव का काम लंबे समय तक डाक विभाग ही करता था। इन पर लंबे समय तक डाक विभाग का ही नियंत्रण था। डाकघरों से पहले कोई भी मुसाफिर डाक ले जानेवाली गाड़ी,पालकी या घोड़ा गाड़ी आदि में अग्रिम सूचना देकर अपनी जगह बुक करा सकता था । इसी तरह रास्ते में पडऩेवाली डाक चौकियों में (जो बाद में डाक बंगला कहलायीं) वह रात्रि विश्राम भी कर सकता था। यानि यह विभाग यात्राओं में भी सहायक बनता था। पुस्तक में भारतीय डाक प्रणाली के प्राण पोस्टमैन यानि डाकिये पर बहुत ही रोचक अध्याय है। डाकिया की भूमिका भले ही समय के साथ बदलती रही हो पर उसकी प्रतिष्ठïा तथा समाज में अलग हैसियत बरकरार है। इसी नाते वे भारतीय जनमानस में रच- बस गए हैं। डाकियों पर तमाम गीत-लोकगीत और फिल्में बनी हैं। भारतीय डाक प्रणाली की जो गुडविल है,उसमें डाकियों का ही सबसे बड़ा योगदान है। आज भी वे साइकिलों पर या पैदल सफर करते हैं। एक जमाने मेें तो वे खतरनाक जंगली रास्तों से गुजरते थे और अपने जीवन की आहूति भी देते थे। कई बार डाकियों या हरकारों को कर्तव्यपालन के दौरान शेर या अन्य जंगली जानवरों ने खा लिया, तमाम खतरनाक जहरीले सांपों की चपेट में आकर मर गए। तमाम डाकिए प्राकृतिक आपदाओं और दुर्गम भौगोलिक क्षेत्रों में शिकार बने तो तमाम चोरों और डकैतों का मुकाबला करते हुए लोककथाओं का हिस्सा बन गए। पुस्तक में पोस्टकार्र्ड,मनीआर्र्डर, स्पीड पोस्ट सेवा ,डाक जीवन बीमा जैसी लोकप्रिय सेवाओं पर विशेष अध्याय हैं। इसके साथ ही डाकघर बचत बैक की बेहद अहम भूमिका पर भी एक खास खंड है। डाकघर बचत बैंक भारत का सबसे पुराना,भरोसेमंद और सबसे बड़ा बैंक है। इसी तरह पुस्तक में डाक टिकटो की प्रेरक,शिक्षाप्रद और मनोहारी दुनिया पर भी विस्तार से रोशनी डाली गयी है। विदेशी डाक तथा दुनिया के साथ भारतीय डाक तंत्र के रिश्तो पर भी अलग से रोशनी डाली गयी है। इसी तरह भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए डाक विभाग द्वारा शुरू की गयी नयी सेवाओं,आधुनिकीकरण के प्रयास,डाक विभाग को नयी दिशा देने की कोशिश समेत सभी प्रमुख पहलुओं को इस पुस्तक में शामिल कर काफी उपयोगी बना दिया गया है। भारतीय डाक विभाग ने खास तौर पर देहाती और दुर्गम इलाकों में साक्षरता अभियान तथा समाचारपत्रों को ऐतिहासिक मदद की पहुंचायी है। रेडियो लाइसेंस प्रणाली डाक विभाग की मदद से ही लागू हुई थी और लंबे समय तक रेडियो को राजस्व दिलाने का यही प्रमुख स्त्रोत रहा । इसी तरह रेडियो के विकास में भी डाक विभाग का अहम योगदान रहा है। एक अरसे से मुद्रित पुस्तकों,पंजीकृत समाचार पत्रों को दुर्गम देहाती इलाकों तक पहुंचा कर भारतीय डाक ने ग्रामीण विकास में बहुत योगदान दिया । वीपीपी (वैल्यू पेयेबल सिस्टम) से लोगों में किताबे मंगाने और पढऩे की आदत विकसित हुई गांव के लाखों अनपढ़ लोगों को चिट्टिïयों और पोस्टमैन ने साक्षर बनने की प्रेरणी दी.तमाम आपदाओं के मौके पर प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष और मुख्यमंत्री राहत कोषों को भेजे जानेवाले मनीआर्डर और पत्रों को बिना भुगतान के भेजने से लेकर तमाम ऐतिहासिक सेवाऐ डाकघरों ने प्रदान की हैं। इस पुस्तक में डाक प्रणाली के विस्तृत इतिहास के साथ जिला डाक और राजाओं महाराजाओं की डाक व्यवस्था, आधुनिक डाकघरों, देहाती डाकखानो, पोस्टमैन, पोस्टकार्ड ,लेटरबाक्स आदि पर अलग से खंड हैं। डाक प्रणाली के विकास में परिवहन के साधनों के विकास का भी अपना महत्व रहा है। इस नाते भारतीय हरकारों, कबूतरों, हाथी -घोड़ा तथा पालकी, डाकबंगलों,रेलवे डाक सेवा, हवाई डाक सेवा पर भी अलग से खंड हैं। इसी के साथ भारतीय डाक टिकटों की मनोहारी दुनिया, पाकिस्तान पोस्ट, विदेशी डाक प्रबंधन, डाक जीवन बीमा, करोड़ो चि_िïयो का प्रबंधन,चि_ïी पत्री की अनूठी दुनिया, रेडियो लाइसेंंस, मीडिया के विकास में डाक का योगदान,डेड लेटर आफिस के कार्यकरण पर भी पुस्तक में काफी रोशनी डाली गयी है। पुस्तक में एक रोचक अध्याय उन डाक कर्मचारियों पर है जिन्होने समाज में लेखन ,कला या अन्य कार्यों से अपनी खास जगह बनायी। कम ही लोग जानते हैं कि नोबुल पुरस्कार विजेता सीवी रमण,मुंशी प्रेमचंद, अक्कीलन,राजिंदर सिंह बेदी, देवानंद, नीरद सी चौधरी, महाश्वेता देवी ,दीनबंधु मित्र, मशहूर डोगरी लेखक शिवनाथ से लेकर कृष्णविहारी नूर जैसी सैकड़ो हस्तियां डाक विभाग के आंगन में ही पुष्पित पल्लवित हुईं। ये सभी डाक विभाग में कर्मचारी या अधिकारी रहे हैं। संचार क्रांति की चुनौतियों से मुकाबले के लिए डाक विभाग की तैयारी भी अलग से चल रही है। इसी के तहत व्यवसाय विकास निदेशालय के कार्यकरण , स्पीड पोस्ट तथा अन्य अत्याधुनिक उत्पादों का विवरण, निजी कुरियर सेवाओं आदि पर भी पुस्तक विशेष गौर करती है। पुस्तक में भारतीय सेना डाक सेवा पर भी काफी रोचक और महत्वपूर्ण जानकारियां हैं। टेलीफोन, मोबाइल या ईमेल सैनिकों को अपने प्रियजनो के हाथ से लिखी पाती जैसा सुख- संतोष दे ही नहीं सकते । घर-परिवार से आया पत्र जवान को जो संबल देता है, वह काम कोई और नहीं कर सकता। माहौल कैसा भी हो,सैनिक को तो मोरचे पर ही तैनात रहना पड़ता है,ऐसे में पत्र उसका मनोबल बनाए रखने में सबसे ज्यादा मददगार होते हैं। इसी नाते सेना के डाकघरों का बहुत महत्व है। करीब सारे महत्वपूर्ण पक्षों और तथ्यों को समेट कर भारतीय डाक प्रणाली पर यह पुस्तक वास्तव में एक संदर्भ ग्रंथ बन गयी है।
डाकिया बीमार है…कबूतर जा… अजित वडनेरकर लेखक- अरविंदकुमार सिंह/
प्रकाशक-नेशनल बुक ट्रस्ट/ पृष्ठ-406/ मूल्य-125 रु./ 
सेलफोन, सेटेलाईट फोन और इंटरनेट जैसे संवाद के सुपरफास्ट साधनों के     इस युग में भी चिट्ठी का महत्व बरक़रार है। आज डाकिये की राह चाहे कोई नहीं देखता, पर दरवाज़े पर डाकिये की आमद एक रोमांच पैदा करती है। कुछ अनजाना सा सुसंवाद जानने की उत्कंठा ने इस सरकारी कारिंदे के प्रति जनमानस में हमेशा से लगाव का भाव बनाए रखा है, जो आज भी उतना की पक्का है। सूचना और संवाद क्रांति के इस दौर में वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह ने भारतीय डाक सेवा पर एक समग्र और शोधपूर्ण पुस्तक लिखी हैः भारतीय डाक-सदियों का सफ़रनामा, जिसमें सैकड़ों साल से देश के अलग-अलग भागों में प्रचलित संवाद प्रेषण प्रणाली के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन किया गया है। 
करीब साढ़े तीन सौ साल पहले अंग्रेजों 1688 में अंग्रेजों ने मुंबई में पहला डाकघर खोला। ज़रूरत इसलिए पड़ी क्योंकि ईस्ट इंडिया कंपनी को अपने राजनीतिक एजेंडा को पूरा करना था। डाक विभाग के जरिये सैन्य और खुफिया सेवाओं की मदद का मक़सद भी खास था। आज जब इस किताब की चर्चा हो रही है, तब आदिमकाल से चली आ रही और अब एक संगठन, संस्कृति का रूप ले चुकी संवाद प्रेषण की इस परिपाटी के सामने सूचना क्रांति की चुनौती है। इसके बावजूद दुनियाभर में डाक सेवाएं अपना रूप बदल चुकी हैं और कभी न कभी पश्चिमी देशों के उपनिवेश रहे, दक्षिण एशियाई देशों में भी यह चुनौती देर-सबेर आनी ही थी। किसी ज़माने सर्वाधिक सरकारी कर्मचारियों वाला महक़मा डाकतार विभाग होता था। उसके बाद यह रुतबा भारतीय रेलवे को मिला। डाकतार विभाग का शुमार आज भी संभवतः शुरुआती पांच स्थानों में किसी क्रम पर होगा, ऐसा अनुमान है। पूरी किताब दिलचस्प, रोमांचक तथ्यों से भरी है। गौरतलब है कि पुराने ज़माने में ऊंटों, घोड़ों और धावकों के जरिये चिट्ठियां पहुंचाई जाती थीं। राह में आराम और बदली के लिए सराय या पड़ाव बनाए जाते थे। बाद में उस राह से गुज़रनेवाले अन्य मुसाफिरों के लिए भी वे विश्राम-स्थल बनते रहे और फिर धीरे-धीरे वे आबाद होते चले गए। चीन में घोड़ों के जरिये चौबीस घंटों में पांच सौ किलोमीटर फासला तय करने के संदर्भ मिलते हैं, इसका उल्लेख शब्दों का सफर में डाकिया डाक लाया श्रंखला में किया जा चुका है। अरविंदकुमार सिंह की किताब बताती है कि मुहम्मद बिन तुगलक ने भी संवाद प्रेषण के लिए चीन जैसी ही व्यवस्था बनाई थी। गंगाजल के भारी भरकम कलशों से भरा कारवां हरिद्वार से दौलताबाद तक आज से करीब सात सदी पहले अगर चालीस दिनों में पहुंच जाता था, तो यह अचरज से भरा कुशल प्रबंधन था। ये कारवां लगातार चलते थे जिससे पानी की कमी नहीं रहती थी। महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि तुगलक पीने के लिए गंगाजल का प्रयोग करता था। मेघों को हरकारा बनाने की सूझ ने तो कालिदास से मेघदूत जैसी कालजयी काव्यकृति लिखवा ली। मगर कबूतरों को हरकारा बनाने की परम्परा तो कालिदास से भी बहुत प्राचीन है। चंद्रगुप्त मौर्य के वक्त यानी ईसा पूर्व तीसरी – चौथी सदी में कबूतर खास हरकारे थे। कबूतर एकबार देखा हुआ रास्ता कभी नहीं भूलता। इसी गुण के चलते उन्हें संदेशवाहक बनाया गया। लोकगीतों में जितना गुणगान हरकारों, डाकियों का हुआ है उनमें कबूतरों का जिक्र भी काबिले-गौर है। इंटरनेट पर खुलनेवाली नई नई ईमेल सेवाओं और आईटी कंपनियों के ज़माने में यह जानकर ताज्जुब हो सकता है कि करीब ढाई सदी पहले जब वाटरलू की लड़ाई लड़ी जा रही थी, तब ब्रिटिश सरकार लगातार मित्र राष्टों को परवाने लिखती थी और गाती थी-कबूतर, जा...जा ..जा. ब्रिटेन में एक ग्रेट बैरियर पिजनग्राम कंपनी थी जिसने पैसठ मील की कबूतर संदेश सेवा स्थापित की थी। बाद में इसे आयरलैंड तक विस्तारित कर दिया गया था। बिना किसी वैज्ञानिक खोज हुए, यह निकट भूतकाल का एक आश्चर्य है। भारत में कई राज्यों में कबूतर डाक सेवा थी। उड़ीसा पुलिस ने सन् 1946 में कटक मुख्यालय में कबूतर-सेवा शुरू की थी। इसमें चालीस कबूतर थे। भारतीय डाकसेवा में कब कब विस्तार हुआ, कैसे प्रगति हुई, कब इसकी जिम्मेदारियां बढ़ाई गई और कब यह बीमा और बचत जैसे अभियानों से जुड़ा, यह सब लेखक ने बेहद दिलचस्प ब्यौरों के साथ विस्तार से पुस्तक में बताया है। डाक वितरण की प्रणालियां और उनमें नयापन लाने की तरकीबें, नवाचार के दौर से गुजरती डाक-प्रेषण और संवाद-प्रेषण से जुडी मशीनों का उल्लेख भी दिलचस्प है। डेडलेटर आफिस यानी बैरंग चिट्ठियों की दुनिया पर भी किताब में एक समूचा अध्याय है। एक आदर्श संदर्भ ग्रंथ में जो कुछ होना चाहिए, यह पुस्तक उस पैमाने पर खरी उतरती है। इस पुस्तक से यह जानकारी भी मिलती है कि भारत की कितनी नामी हस्तियां जो अन्यान्य क्षेत्रों में कामयाब रही, डाक विभाग से जुड़ी रहीं। ऐसे कुछ नाम हैं नोबल सम्मान प्राप्त प्रो. सीवी रमन, प्रख्यात उर्दू लेखक-फिल्मकार राजेन्द्रसिंह बेदी, शायर कृष्णबिहारी नूर, महाश्वेता देवी, अब्राहम लिंकन आदि। पत्रकारिता से जुडे़ लोगों के लिए यह पुस्तक बहुत महत्वपूर्ण है। वैसे यह पुस्तक संदर्भ में होनी चाहिए। मेरी सलाह है कि अवसर मिलने पर आप इसे ज़रूर खरीदें, आपके संग्रह के लिए यह किताब उपयोगी होगी। रचनाकार अरविंद कुमार सिंह
प्रकाशक नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया नेहरू भवन, ५ इंस्टीटयूशनल एरिया नई दिल्ली. ११००१६
पृष्ठ - ४१२
मूल्य: १०.९५ डॉलर*
'भारतीय डाक: सदियों का सफरनामा' (डाक व्यवस्था पर शोध) पत्रकारिता के क्षेत्र में हिन्दी अकादमी दिल्ली द्वारा सम्मानित प्रसिध्द पत्रकार, अन्वेषक एवं लेखक अरविन्द कुमार सिंह द्वारा रचित एवं नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया द्वारा प्रकाशित 'भारतीय डाक: सदियों का सफरनामा' विश्व डाक साहित्य को एक कीमती तोहफा है। यह भारतीय डाक व्यवस्था पर एक अत्यन्त महत्वपूर्ण शोध ग्रन्थ है। यह अंग्रेजी, उर्दू सहित अन्य भारतीय भाषाओं में भी प्रकाशित की जा रही है। इस पुस्तक में जहां हमें संसार की सब से विशाल, विकसित एवं अनूठी भारतीय डाक व्यवस्था के उद्भव, उतार-चढ़ाव एवं विकास के दिग्दर्शन होते हैं वहीं इसे दरपेश परेशानियों, चुनौतियों एवं सरोकारों से भी रू-ब-रू होने का सुअवसर मिलता है। आज भी आम आदमी का डाक विभाग से गहरा नाता है और उस पर अगाध विश्वास है।
इसी अनूठे विश्वास और जनसेवा के प्रति समर्पित भावना को रेखांकित करते अरविन्द कदम-कदम पर हरकारों के अदम्य साहस, वीरता और बलिदान की गाथा बयान करते हैं। उनके उत्पीड़न, दु:ख-दर्द, शोषण एवं मजबूरियों का मार्मिक चित्रण करते हुए, उन्हीं की आवाज की प्रतिगूंज बन जाते हैं। अरविन्द का सरोकार न केवल भारतीय हरकारों (मेहनतकशों) की नियति से है बल्कि संसार के समस्त हरकारों की नियति से है। इसी अहसास से ओत-प्रोत उनकी कलम बड़े ही सरल, सुन्दर, सहज एवं सबल ढंग से जहां-तहां व्याप्त कुत्सित व्यवस्थाओं, विकृतियों एवं विसंगतियों की ओर ध्यान आकर्षित करती है और उन्हें दूर करने के लिए हमें लगातार संघर्षशील होने का आह्वान भी देती है।
इंटरनेट के दौर में आज विश्व डाक व्यवस्था एक बहुत ही संकटमय स्थिति से गुजर रही है और भारतीय डाक व्यवस्था भी उससे अछूती नहीं रह पाई। डॉक्टर मुल्कराज आनन्द की लिखी पुस्तक भारतीय डाकघर की गाथा के बाद 'भारतीय डाक: सदियों का सफरनामा' एक ऐसी पुस्तक है जो समग्र भारतीय डाक व्यवस्था पर बिना किसी पूर्वाग्रह व दुराग्रह के तटस्थ भाव से सच्चाई का विवेकपूर्ण वर्णन करती है। इसीलिए इसकी सार्थकता एवं उपयोगिता वर्तमान संदर्भ में और भी बढ़ जाती है। डाक जीवन के कटु और स्थूल यथार्थों से दृढ़ता से जूझना और ईमानदारी से उनका मुकाबला करना सभी डाक कर्मियों का परम कर्तव्य है और यह सफर वेदना, त्रासदी व अवसाद से भरा है। अरविन्द की पुस्तक उन्हें इसी त्रासदी से जूझने और अवसाद से उबरने का संदेश देती है ताकि डाक जीवन हरा-भरा रह सके। यह रचना प्रेरणा और सृजन का अनूठा संगम है जो पाठक को प्रबल चुम्बकीय शक्ति से अपनी ओर खींचती है और अपने आप में समाहित कर लेती है। लेखन ने विभिन्न स्रोतों से प्राप्त सामग्री व सहयोग का संतुलित प्रयोग कर के इस पुस्तक को यथा-संभव कमियों से मुक्त रखने का प्रयास किया गया है।
यह पुस्तक डाक नीति निर्धारकों, अधिकारियों एवं डाक कर्मियों के लिए एक प्रकाश स्तंभ का कार्य करेगी। सूचना क्रान्ति के युग में इस किताब का सभी दफ्तरों, स्कूलों, कालेजों, पुस्तकालयों एवं विश्वविद्यालयों में होना बहुत जरूरी है। कहते हैं कि जो लोग अपना इतिहास नहीं जानते वे कभी अपनी आजादी और स्वाभिमान को कायम नहीं रख सकते।
इस पुस्तक में डाक प्रणाली के विस्तृत इतिहास के साथ जिला डाक और राजाओं महाराजाओं की डाक व्यवस्था, आधुनिक डाकघरों, देहाती डाकखानों, पोस्टमैन, पोस्टकार्ड, लेटरबॉक्स आदि पर अलग से खंड है। डाक प्रण्ााली के विकास में परिवहन के साधनों के विकास का भी अपना महत्व रहा है। इस नाते भारतीय हरकारों, कबूतरों, हाथी-घोड़ा तथा पालकी, डाकबंगलों, रेलवे डाक सेवा, हवाई डाक सेवा पर भी अलग से खंड हैं।
इसी के साथ भारतीय डाक टिकटों की मनोहारी दुनिया, पाकिस्तान पोस्ट, विदेशी डाक प्रबंधन, डाक जीवन बीमा, करोड़ों चिट्ठियों का प्रबंधन, चिट्ठी पत्री की अनूठी दुनिया, रेडियो लाइसेंस, मीडिया के विकास में डाक का योगदान, डेड लेटर आफिस के कार्यकरण पर भी पुस्तक में काफी रोशनी डाली गई है। इस पुस्तक में एक रोचक अध्याय उन भारतीय डाक कर्मचारियों पर है जिन्होंने समाज में लेखन, कला या अन्य कार्यों से अपनी खासी जगह बनाई। कम ही लोग जानते हैं कि नोबल पुरस्कार विजेता सीवी रमण, मुंशी प्रेमचंद, अक्कलीन, राजिंदर सिंह बेदी, देवानंद, नीरद सी चौधरी, महाश्वेता देवी, दीनबंधु मित्र, मशहूर डोगरी लेखक शिवनाथ से लेकर कृष्णबिहारी नूर जैसी सैकड़ों हस्तियां डाक विभाग में कर्मचारी या अधिकारी रही हैं।
संचार क्रान्ति की चुनौतियों से मुकाबले के लिए व्यवसाय विकास निदेशालय के कार्यकरण, स्पीड पोस्ट तथा अन्य अत्याधुनिक उत्पादों का विवरण, निजी कूरियर सेवाओं आदि पर भी पुस्तक विशेष गौर करती है। पुस्तक में भारतीय सेना डाक सेवा पर भी काफी रोचक और महत्वपूर्ण जानकारियां हैं। यह बात कम ही लोग जानते हैं कि टेलीफोन, मोबाइल या ईमेल सैनिकों को अपने प्रियजनों के हाथ से लिखी पाती जैसा सुख-संतोष दे ही नहीं सकते।
घर-परिवार से आया पत्र जवान को जो संबल देता है वह काम कोई और नहीं कर सकता। इसी नाते सेना के डाकघरों का बहुत महत्व है। करीब सारे महत्वपूर्ण पक्षों और तथ्यों को समेट कर भारतीय डाक प्रणाली पर यह पुस्तक वास्तव में एक संदर्भ ग्रन्थ बन गई है। पुस्तक के लेखक अरविंद कुमार सिंह संचार तथा परिवहन मामलों के जानकार हैं। अमर उजाला, जनसत्ता जैसे अखबारों में काम कर चुके श्री सिंह इस भारतीय रेल के परामर्शदाता हैं।
कर्नल तिलकराज पूर्व चीफ पोस्टमास्टर जनरल, पंजाब १८ जनवरी २००९

मैं, मेरी दादी और स्वामी विवेकानंद



 शनिवार, 19 जनवरी, 2013 को 12:42 IST तक के समाचार
स्वामी विवेकानंद
विवेकानंद ने पश्चिम का परिचय योग और ध्यान से कराया था.
पश्चिम को योग और ध्यान से परिचित कराने वाले स्वामी विवेकानंद के बारे में वहां कम ही लोग जानते हैं लेकिन भारत में इस बंगाली बुद्धिजीवी का अब भी बहुत सम्मान किया जाता है. इस महीने उनके जन्म के 150 साल पूरे होने जा रहे हैं.
सीधे चलते हैं न्यूयॉर्क एक ऐतिहासिक इमारत में.
बजरी पर कार के टायरों की चरमराहट, आने वाले तूफान की आशंका और हवाओं के साथ झूमते पेड़....
न्यूयॉर्क में दादी मां के घर की ऐसी कई भूली-बिसरी यादें मेरे जेहन में रह गई हैं.
और भी कई चीजें याद आती हैं. किसी स्वामी के बारे में हल्के में कही गई वो बात कि ये सोफा स्वामी का था, इसी कमरे में स्वामी सोया करते थे.
अपने कुत्ते के लिए मैं जिस बड़े से देवदार के पेड़ की टहनियां चुना करती थी, उस पेड़ को स्वामी का देवदार' कहा जाता था.
बातें और भी थीं. विक्टोरियन युग की महिलाओं की हैट और लंबे लिबास वाली धुंधली पड़ती तस्वीरें और उनके साथ खड़ा असाधारण व्यक्तित्व वाला एक हिंदुस्तानी युवक.
उस युवक ने सर पर साफा बांध रखा था और उसकी आंखें बेहद प्रभावशाली थीं.

अतीत के झरोखे से

swami vivekananda
कश्मीर में ली गई स्वामी विवेकानंद की तस्वीर.
1970 के दशक में मेरे लिए इन बातों के कोई मायने नहीं थे. मेरा नजरिया हाल में उस वक्त बदला जब मुझे मालूम चला कि वह स्वामी भारत के सबसे प्रभावशाली आध्यात्मिक शिक्षकों में से एक थे.
स्वामी विवेकानंद ने पश्चिम को पूरब के दर्शन से परिचित कराया था. मेरे परिवार ने उस ज़माने में उन्हें अपने घर में रहने के लिए आमंत्रित किया था और स्वामी जी के काम के प्रकाशन में उनकी सहायता की थी.
वे एक बंगाली बुद्धिजीवी थे और हिंदू आध्यात्मिक गुरु रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे. प्राचीन ग्रंथों की जटिल बातों को एक सहज और सरल से संदेश के जरिये पारिभाषित करने का श्रेय स्वामी विवेकानंद को ही जाता है.
उन्होंने कहा था कि सभी धर्म बराबर हैं और ईश्वर प्रत्येक व्यक्ति के भीतर रहता है. शिकागो में हुए धर्मों के विश्व संसद से उन्हें दुनिया भर में ख्याति मिली.
इस धर्म संसद में विवेकानंद ने सहिष्णुता के पक्ष में और धार्मिक हठधर्मिता को खत्म करने का आह्वान किया. अजीब इत्तेफाक था कि वह तारीख 11 सितंबर की थी.

धर्म संसद में भाषण

‘अमरीका के भाईयों और बहनों’ कहकर उन्होंने अपनी बात शुरू की थी. प्रवाहपूर्ण अंग्रेजी में असरदार आवाज के साथ भाषण दे रहे उस संन्यासी ने गेरूए रंग का चोगा पहन रखा था.
पगड़ी पहने हुए स्वामी की एक झलक देखने के लिए वहां मौजूद लोग बहुत उत्साह से खड़े हो गए थे. इस भाषण से स्वामी विवेकानंद की लोकप्रियता बढ़ गई और उनके व्याख्यानों में भीड़ उमड़ने लगी.
ईश्वर के बारे में यहूदीवाद और इसाईयत के विचारों के आदी हो चुके लोगों के लिए योग और ध्यान का विचार नया और रोमांचक था.
अमरीका प्रवास के दौरान अपनी लंबी यात्राओं के बीच स्वामी विवेकानंद रिज़ली में हमारे घर ठहरा करते थे. सौ साल के बाद वह घर हमारे पूर्वजों के बाद अब स्वामी विवेकानंद के अनुयायियों के पास है.
जब मैं उस घर में लौटी तो कुछ छोटे-छोटे मगर अहम बदलावों को देखकर मुझे हैरत हुई. जिस घर में मैं उछल कूद मचाया करती थी अब वह जगह पूजास्थल के तौर पर इस्तेमाल की जा रही थी.

आध्यात्म की अनुभूति

swami vivekananda
रिज़ली हाउस, जहां विवेकानंद अपने अमरीका प्रवास के दौरान रहे थे.
झोपड़ीनुमा छत वाले उस घर की खूबसूरती को बरकरार रखने के लिए कई श्रद्धालु स्वेच्छा से लगे हुए थे.
उनके लिए यह महज किसी संपत्ति की देखभाल करना नहीं था, बल्कि वो इसे एक पवित्र स्थान समझते हैं.
विचारवान लोग यहां आते हैं और प्राचीन हिंदू ग्रंथों व वेदों के बारे में परिचर्चा करते हैं. यह सब कुछ शांति के साथ चलता रहता है. न्यू इंग्लैंड के इस हृदय स्थल में कहीं भारत पनप रहा है.
न्यू-जर्सी से आए एक भारतीय जोड़े ने बताया कि वह विवेकानंद की मौजूदगी को महसूस करना चाहते हैं. रामकृष्ण परमहंस की अनुयायी कैलिफोर्नियाई नन को वहां प्रव्राजिका गीताप्रणा के नाम से जाना जाता है. वहां रिट्रीट सेंटर चला रहीं प्रवराजिका गीताप्रणा ने मुझे पूरी जगह दिखाई.
"उन्हें बुरा नहीं लगेगा क्यूंकि वे न तो पूजे नहीं जाना चाहते थे और न अंनतकाल तक याद किए जाना चाहते थे. वह बस इतना चाहते थे कि लोग अपने भीतर के ईश्वर को खोज लें"
प्रव्राजिका गीताप्रणा, रिट्रीट सेंटर की प्रभारी
घर में साथ टहलते हुए प्रवराजिका ने बताया, “उनका बिस्तर भारत भेज दिया गया है लेकिन यह वही कमरा है जहां वो सोया करते थे, इस भोजन कक्ष में वह खाना खाया करते थे”.
गीताप्रणा ने मुझे स्वामी का देवदार वृक्ष दिखाया और कहा कि इसे तुम्हारी परदादी ने लगाया था.
स्वामी विवेकानंद मेरी परदादी को 'जोई-जोई' कहा करते थे. वह उम्र भर उनकी दोस्त और अनुयायी रहीं.
उन दिनों कम ही देखा जाता था कि श्वेत महिलाएं और भारतीय एक साथ यात्राएं करते हों.
भारत में विवेकानंद को संत की तरह की पूजा जाता है लेकिन पश्चिम में अब भी वे लगभग अनजान हैं.
लेकिन प्रवराजिका कहती हैं, “मुझे नहीं लगता कि उन्हें बुरा लगेगा क्योंकि वो ना तो पूजे नहीं जाना चाहते थे और न ही अंनतकाल तक याद किए जाना चाहते थे. वह बस इतना चाहते थे कि लोग अपने भीतर के ईश्वर को खोज लें.”

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Saturday, January 12, 2013

झुकी हुई है एक बहुत बड़ी मीनार


आठ सौ साल से झुकी हुई है एक मीनार
Friday, Nov 9 2012 2:31PM IST
नई दिल्ली। इस संसार में कई आश्चर्यजनक वस्तुएं हैं, जिनमें पीसा की मीनार सबसे अधिक आश्चर्यजनक है। यूरोप महाद्वीप के दक्षिण में इटली बड़ा ही मनोहर देश है। इसी देश में पीसा नगर है। इस नगर में जमीन की ओर झुकी हुई एक बहुत बड़ी मीनार है।

इसका झुकाव 13 फुट है। इसे देखकर अचरज होता है कि सैकड़ों वर्ष पहले बनी हुई यह इतनी बड़ी मीनार झुकी हालत में कैसे खड़ी है।
यह मीनार आज से 800 वर्ष पूर्व बनी थी। इसे पीसा के निवासियों ने बड़े ही चाव से बनाया था। वे अपने नगर में इटली के संसार-प्रसिद्ध सुंदर नगर वेनिस के घंटाघर से भी बढ़िया मीनार बनाने के इच्छुक थे, किंतु दैवयोग से यह मीनार झुक गई। आज तक यह उसी हालत में ज्यों की त्यों खड़ी है। वेनिस का घंटाघर तो एक बार गिर भी चुका है।

यह मीनार लड़की के लट्ठों को जमीन में गाड़कर उनके ऊपर बनाई गई है। मीनार थोड़ी ही बनने पाई थी कि एक ओर धरती में धंसनी शुरू हो गई, फिर भी इसका बनाना बंद नहीं किया गया। यह मीनार बहुत ऊंची ही नहीं है, वरन बहुत सुंदर भी है। इसका बाहरी भाग संगमरमर का बना हुआ है।
इस मीनार का महत्व और भी अधिक हो गया है, क्योंकि इस विश्वविख्यात इटालियन ज्योतिषी गैलीलियो ने आज से कोई 300 वर्ष पूर्व अपनी विद्या का प्रयोग किया था। गैलीलियो पीसा में प्रोफेसर थे। उनसे 2000 वर्ष पूर्व इटली में एक और संसार-प्रसिद्ध विद्वान हो चुके थे, जिनका कहना था, ''यदि हम एक ही सामग्री के बने हुए भिन्न-भिन्न बोझ के दो गोले लें और उन गोलों को एक पृथ्वी पर गिराएं तो भारी गोला पहले जमीन पर पहुंचेगा।''

2000 वर्ष तक सभी लोग इस सिद्धांत को सत्य मानते रहे, किंतु गैलीलियो ने कहा कि नहीं, भारी और हल्के दोनों ही गोलेएक साथ जमीन पर पहुंचेंगे। लोग गैलीलियों का मजाक उड़ाने लगे लेकिन वह हताश नहीं हुए।

उन्होंने एक दिन पीसा विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों और छात्रों को एकत्र किया और अपना प्रयोग दिखलाने के लिए हाथ में दो गोले लेकर पीसा की मीनार के ऊपर चढ़ गए। एक गोले का बोझ दस पौंड था, दूसरे का एक पौंड। गैलीलियो ने मीनार पर दोनों गोले एक साथ गिराए और दोनों एक ही साथ जमीन पर आकर गिरे। फिर तो लोगों ने गैलीलियो की बड़ी प्रशंसा की किंतु इसी के साथ उन पर एक मुसीबत भी आई।

कुछ लोग गैलीलियो से बुरी तरह चिढ़ गए, इसलिए कि उन्होंने पूर्व प्रचलित सिद्धांत को असत्य सिद्ध कर दिखाया था। विरोधियों ने गैलीलियो के व्याख्यानों में गड़बड़ी पैदा करनी शुरू कर दी। विवश होकर गैलीलियो को पीसा नगर छोड़कर अन्यत्र जाना पड़ा।

रामपुर में है एक रात की मस्जिद / मुजस्सिम नूर





Published by: Vineet Verma
Published on: Fri, 30 Nov 2012 at 01:41 IST

डेढ़ सौ साल पहले बनाई थी जिन्नों ने एक रात की मस्जिद
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रामपुर| उत्तर प्रदेश के रामपुर शहर से कुछ दूर विरान जगह पर स्थित एक विशाल मस्जिद का इतिहास इंसानों को चौकाने वाला रहा है। इस मस्जिद को बनाने में न साल लगा न महिना, इसे बनाने में लगी तो बस एक रात, शायद यह बात किसी के भी गले न उतरे मगर क्रीक्रत यही है। एक रात की मस्जिद के नाम से जानी जाने वाली यह इबादत गाह इंसानों के द्वारा नहीं बनाई गयी बल्कि इसको महज एक रात में जिन्नों ने बना डाला।

जिला मुख्यालय और गांधी समाधि से महज एक किलोमीटर दूर लखनऊ दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग और कोसी नदी के बीच कई हजार बीघे में फैली कोठी खास बाग़ की एक वीरान जगह में स्थित है। इस विशाल मस्जिद के विषय में कहा जाता है कि इससे अब से डेढ़ सौ साल पहले इंसानों ने नहीं जिन्नों ने बनाया था वह भी महज एक रात में, इस मस्जिद की बनावट हकीकत में अपने आप में अदभुद है। एक रात की मस्जिद के नाम से मशहूर इस इबादतगाह में नमाज से पहले किये जाने वाले बुजू के लिए हौज, आजान देने की जगह और नमाज पढ़ने की ऊँची छत की बनावट अपने आप में अदभुद है। वही मस्जिद की मीनार और की गयी नक्क्सी इसकी सुन्दरता में चार चाँद लगाते हैं। इसके आलावा शहर में स्थित नवाबी दौर में बनी जमा मस्जिद एवं मोती मस्जिद अगर सुन्दरता का बेजोड़ नमूना है तो एक रात की मस्जिद की बनावट अपने आप में बेमिसाल है।

कहा जाता है कि एक रात की मस्जिद बनने से पहले यहाँ पर जिन्नों का वास था और वह इंसानों से दूर ही पसंद करते थे ऐसे में उन्होंने इस वीरान जगह को अपनी इबादत के लिए ही चुना और यहाँ पर उन्होंने इस इबादत गाह को एक ही रात में बना डाला। देखने में यह मस्जिद आज भी वीरानी जगह पर है अगर नवाबी जगह से इसकी तुलना की जाये तो उस समय यहाँ पर आना सचमुच रोंगटे खड़े कर देने वाला था। लोगों का कहना है कि आज भी यह पर विरान है और किसी अदृश्य बुजुर्ग की उपस्थिति की आहट महसूस की जा सकती है।

मस्जिद की कोठारी में उक्त अदृश्य व्यक्ति की उपस्थिति को महसूस कर अक़ीदत मदों द्वारा दरख्वास्त लिखाकर मन्नते मांगी जाती हैं और मन्नते पूरी होने पर अक़ीदतमंदों के द्वारा गोटे के हार चढ़ाये जाते हैं।

मस्जिद की देखरेख में कई वर्षों से लगे मुन्नू मियां बताते हैं कि इस मस्जिद में जिन्न अपने परिवार के साथ रहते हैं और वह कभी भी किसी इंसान को परेशान नहीं करते हैं बल्कि अक़ीदत मंदों की दुआ पूरी होने के लिए खुदा से गुहार लगाते हैं और इसका यह परिणाम होता है की यहाँ आकर लोगों की मन्नते जल्दी पूरी होती हैं।

मुन्ना मिया का यह भी कहना है कि पवित्र कुरान में इस बात का जिक्र है कि दुनिया में इंसान और जिन्नों का वास है। इंसान दिखाई देते है और जिन्न विशेष अवसरों को छोड़कर बाकी समय अदृश्य रहते हैं। यही नहीं जैसे इंसानों में सज्जन और दुर्जन इंसान होते है वैसे ही जिन्नों में भी सज्जन और दुर्जन जिन्न होते है| मगर एक रात की मस्जिद में वास करने वाले जिन्न सज्जन और बुजुर्ग अदृश्य है जो कभी किसी इंसान को भयभीत तथा परेशान नहीं करते।

गौरतलब है कि एक रात की मस्जिद के आसपास भी एक अजीब सी खामोशी का अहसास होने लगता है और जैसे-जैसे इंसान के कदम उक्त मस्जिद में प्रवेश करते है वैसे-वैसे ही एक अजीब सी शांति का सुखद अनुभव होने लगता है। शायद यही कारण है कि अक़ीदत मंद भले ही यहाँ पर तादाद में कम आते हैं मगर उनकी मन्नते पूरी होने की गवाही मस्जिद की कोठारी में टंगी अनगिनत गोटे के हार अवश्य देते हैं।

सुई के बगैर शुगर




इंसुलिन के काम करने के तरीके पर हुई नई खोज डायबिटीज का नया इलाज विकसित करने में मदद देगी. वैज्ञानिकों का कहना है कि तब हर दिन इंसुलिन का इंजेक्शन लेने की जरूरत नहीं होगी. इसका फायदा लाखों मरीजों को होगा.
अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों की टीम का कहना है कि उन्हें पहली बार यह पता करने में सफलता मिली है कि इंसुलिन के हारमोन कोशिकाओं की सतह पर किस तरह चिपकते हैं कि खून का ग्लूकोज उसे पार कर ऊर्जा के रूप में जमा होता जाता है. मुख्य रिसर्चर माइक लॉरेंस का कहना है कि शक्तिशाली एक्सरे किरणों का इस्तेमाल कर 20 साल की कठिन मेहनत के बाद हुई खोज डायबिटीज के नए और बेहतर इलाज का रास्ता साफ करेंगे.
मेलबर्न के मेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट के लॉरेंस कहते हैं, "अब तक हमें यह पता नहीं था कि ये मॉलेक्यूल कोशिकाओं के साथ किस तरह पेश आते हैं. अब हम इस जानकारी का इस्तेमाल बेहतर गुणों वाले नए इंसुलिन इलाज के विकास में कर सकते हैं, यह बहुत उत्साहजनक है." लॉरेंस का कहना है कि उनकी टीम की स्टडी ने इंसुलिन और कोशिकाओं के सतह पर उसके रिसेप्टर के बीच एक "मॉलेक्युलर हैंडशेक" का पता दिया है.
इस असामान्य जुड़ाव के बारे में वह कहते हैं, "इंसुलिन और रिसेप्टर दोनों ही मिलने पर फिर से व्यवस्थित होते हैं. इंसुलिन का टुकड़ा खुल जाता है और रिसेप्टर के अंदर के मुख्य टुकड़े बढ़कर इंसुलिन हारमोन से जा मिलते हैं." डायबिटीज का नया इलाज विकसित करने के लिए यह समझना जरूरी था कि इंसुलिन कोशिका से कैसे जुड़ता है. डायबिटीज ऐसी लाइलाज बीमारी है जब पैंक्रियास या तो पर्याप्त इंसुलिन नहीं बनाता या शरीर उसका सही उपयोग नहीं कर पाता.
लॉरेंस कहते हैं, "नए प्रकार के इंसुलिन की संभावना इसलिए सीमित थी क्योंकि हम यह देख पाने में सक्षम नहीं थे कि इंसुलिन शरीर में रिसेप्टर से कैसे मिलता है." उनके अनुसार नई खोज से नए प्रकार के इंसुलिन बन सकते हैं जो इंजेक्शन से अलग तरीके से भी दिए जा सकते हैं. इसके अलावा उनमें बेहतर गुण होंगे ताकि उन्हें जल्दी जल्दी न लेना पड़े. इसका असर विकसित देशों में डायबिटीज के इलाज पर भी पड़ेगा, क्योंकि ऐसे इंसुलिन बनाए जा सकेंगे जिन्हें फ्रिज में नहीं रखना होगा.
उनकी राय में नई खोज का इस्तेमाल कैंसर और अल्जाइमर के इलाज में भी किया जा सकेगा, क्योंकि इंसुलिन की इन बीमारियों में भी भूमिका होती है. "हमारी खोज विज्ञान का मौलिक हिस्सा है जो आखिराकर इन तीनों गंभीर बीमारियों में भूमिका कर सकती है."
डायबिटीज के रोगियों की संस्था ऑस्ट्रेलिया के डॉयबिडीज काउंसिल ने नई खोज को स्वागत योग्य विकास बताया है. काउंसिल की निकोला स्टोक्स ने कहा, "इस समय हमारे पास डायबिटीज का इलाज नहीं है, ऐसे में इस तरह की खोज हमें उम्मीद देती है कि वह नजदीक आ रही है."
स्टोक्स का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया में हर पांचवें मिनट डायबिटीज के एक नए रोगी का पता चल रहा है और हर साल रोगियों की संख्या 8 फीसदी की दर से बढ़ रही है. दुनिया भर में करीब 35 करोड़ लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 2030 तक यह मौत का सातवां सबसे बड़ा कारण होगा. डायबिटीज की वजह से दिल की बीमारी, अंधापन और किडनी की बीमारी भी हो जाती है.
एमजे/एजेए (एएफपी)

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