Saturday, December 17, 2011

भाषा संवाद

जातिवाद पर पर व्यंग्य करती परसाईजी की लेखनी.

अगस्त 15, 2007
हरिशंकर परसाई ने व्यंग्य विधा में अनूठे रंग बिखेरे और व्यवस्था,परिवेश और मनुष्य के स्तर पर नज़र आती तमाम बुराइयों पर अपने क़लम से फ़टकार लगाई.साठ साल के आज़ाद भारत की तस्वीर आज कितनी भी उजली नज़र आती हो..औरत,संप्रदाय,जाति,अशिक्षा,धर्म और छुआछूत के नाम पर स्थितियों में कोई ख़ास फ़र्क नहीं आया है.एक लघु कथा के ज़रिये परसाईजी ने कितने बेहतरीन नोट पर अपनी बात को ख़त्म किया आइये पढ़ते हैं….
जाति
कारख़ाना खुला.कर्मचारियों के लिये बस्ती बन गई.
ठाकुरपुरा से ठाकुर साहब और ब्राह्मणपुरा से पंडितजी कारखा़ने में नौकरी करने लगे और पास-पास के ब्लाँक में रहने लगे.
ठाकुर साहब का लड़का और पंडितजी की लड़की दोनो जवान थे.उनमें पहचान हुई और पहचान इतनी बढ़ी कि दोनों ने शादी करने का निश्चय किया.
जब प्रस्ताव आया तो पंडितजी ने कहा…ऐसा कभी हो सकता है भला ? ब्राह्मण की लड़की ठाकुर से शादी करे ! जाति चली जाएगी.
ठाकुर साहब ने भी कहा कि ऐसा नहीं हो सकता.पर-जाति में शादी  करने से हमारी जाति चली जाएगी.
किसी ने उन्हें समझाया कि लड़का – लड़की बड़े हैं ..पढ़े-लिखे हैं..समझदार हैं..उन्हें शादी कर लेने दो.अगर शादी नहीं की तो भी वे चोरी छिपे मिलेंगे और तब जो उनका संबंध होगा वह व्यभिचार कहलाएगा…
इस पर ठाकुर साहब और पंडितजी एक स्वर में बोले…
होने दो.व्यभिचार से जाति नहीं जाती है ; शादी से जाती है.

पं.रामनारायण उपाध्याय की सात्विक पंक्तियाँ

जुलाई 18, 2007
म.प्र. के साहित्य लेखन के गाँधी दादा रामनारायण उपाध्याय सरल,सहज और सात्विक क़लम के कारीगर थे.पं.माखनलाल चतुर्वेदी के खण्डवा के रामा दादा जीवनभर गाँधीवादी सोच में जीते रहे और वैसा ही लिखते रहे.बापू के कहने पर ग्रामीण अंचल में रह कर साहित्य सेवा करने वाले रामा दादा म.प्र.के वरिष्ठ लेखकों की जमात में पहली पायदान के हस्ताक्षर थे.निबंध,कहानी और अपनी छोटी छोटी कविताओं के ज़रिये मानो वे पूरे भारत में बसे ग्रामीण परिवेश का इकतारा बजाते थे.उनकी बहुचर्चित पुस्तक ’गँवई मन और गाँव की याद’ में रचे गए निबंध..मेरे गाँवों की सुख-शांति किसने छीन ली..से संकलित की हैं ये अमृत पंक्तियाँ…
आख़िर गाँवों का सुख और शांति किसने छीन ली ?
किसान के कंठ के गीत कहाँ लुप्त हो गए ? तीज-त्योहार की मस्ती किसने चुरा ली ; दही बिलोने वाली के थिरकन पर अब किसी किसन कन्हैया का मन क्यों नहीं नाचता ? सूरज की पहली किरण अब ग्वाले के हाथ लकुटी क्यों नहीं बनती ? उगता सूरज , अब किसी हल जोतने वाले के मन में अपनी प्रिया के भाल पर लगे कुमकुम की याद क्यों नहीं जगाता ? रात का चाँद अब किसी नववधू की देह मेम अपने प्रियतम की याद का ताबीज़ बनकर क्यों नहीं चुभता?
 किसी घर में लड़की का ब्याह रचाया जाता तो गीत की कड़ियों से हर सुहावने प्रभात और संध्या का स्वागत किया जाता,किसी गीत की अंगुली पकड़कर गणेशजी लड़की वाले का पता पूछते-पूछते विवाह घर आते और एक बुज़ुर्ग की तरह सारे कामों को निर्विघ्न सम्पन्न करवा कर ही लौटते…
 लड़की की बिदाई पर पिता के रोने से गंगा में बाढ़ आ जाती.माँ के रोने से आकाश में अंधेरा छा जाता और भाई के रोने से उसकी धोती पाँवों तक भीग जाती.ब्याह के मांगलिक गीतों में मानसरोवर की तरह पिता,भरे पूरे भण्डार की तरह ससुर,बहती गंगा की तरह माँ भरी पूरी बावडी़ ती तरह सास, गुलाब के फूल की तरह बच्चे और उगते सूर्य की तरह स्वामी के रूप में ऐसी उद्दात्त कल्पनाएँ सँजोई हैं , जिनको लेकर,हमारा पारिवारिक जीवन समॄध्द होता आया है.
 लेकिन अब…..वे गोकुल से सहज , सरल गाँव नष्ट ही होते जा रहे हैं जहाँ स्त्रियाँ बडे भोर में उठकर आटे के साथ घने अंधेरे को भी पीसकर सुहावने प्रभात में बदल देतीं थीं.जहाँ घट्टी के हर फ़ेरे के साथ गीत की नई पंक्तियाँ उठतीं थीं.लगता था जैसी श्रम में से संगीत का जन्म हो रहा है.
 अब फ़्लोअर मिल के साथ घर की घट्टी के गीत समाप्त होते जा रहे हैं .ट्रेक्टर के साथ हल के गीतों का लोप होता जा रहा है.खेत के घास तो तो हल की नोक से भी उखाड़कर फ़ेंका जा सकता है लिकिन ट्रेक्टर की गहरी जुताई के साथ जिस हल्की और ओछी सभ्यता के बीज बोये जा रहे हैं उन्हें उखाड़ फ़ैकने में कितना समय लगेगा, यह सोचकर ह्र्दय काँ उठता है.
मन सोचने पर मजबूर हो जाता है कि खरा परिवेश त्याग कर ये जो सिंथेटिक ज़िंदगी ओढ़ ली है हमने क्या वह वाक़ई हमारे काम की है…परिवेश से परे एक पावन परिवार की कल्पना बेमानी लगती है और दादा रामनारायण की का यह शब्द चित्र मन को बेधता है.

क्या कुछ भी तुम्हे अब आमंत्रित नहीं करते ?

जुलाई 12, 2007
यदि बन सको तो बनो
पर्वतों की भाँति औघड़
नदियों की भाँति पारदर्शी
और आदिम हवाओं की भाँति अनागरिक
धरती के काव्य-संकलन जैसे
ये वन,उपवन,पर्वत
साम्राग्यियों के चीनांशुकों से
ये धनखेत
कृष्ण-आकुल गोपिका नेत्रों जैसे
ये श्यामल मेघ
क्या कुछ भी तुम्हें अब आमंत्रित नहीं करते ?
-श्रीनरेश मेहता

भवानी भाई की प्रेरक – पंक्तियाँ

जुलाई 10, 2007
साधारणत: मौन अच्छा है…
किन्तु मनन के लिये !
जब शोर हो चारों ओर, सत्य के हनन के लिये !
 तब तुम्हे अपनी बात,
ज्वलंत शब्दों में कहना चाहिये !
 सिर कटाना पडे़ या न पडे़
तैयारी तो उसकी होनी चाहिये.

आइना झूठ बोलता ही नहीं

जुलाई 1, 2007
कृष्णबिहारी नूर फ़रमाते हैं…
ज़िन्दगी से बडी़ सज़ा ही नहीं
और क्या जुर्म है पता ही नहीं
सच घटे या बढे़ तो सच न रहे
झूठ की कोई इंतहा ही नहीं
चाहे सोने के फ़्रेम मे जड़ दो
आइना झूठ बोलता ही नहीं

आपके ह्र्दय-द्वार पर….दिनकर सोनवलकर

जुलाई 1, 2007
न जाने क्या बात है कि हमारा मालवा अपनी गुदड़ी के लालों को वह मान देता ही नहीं जिसके वो अधिकारी होते हैं.ऐसे ही एक सु-कवि दिनकर सोनवलकर आज भाषा-संवाद की जाजम पधारे हैं दिनकर जी ने हिन्दी ग़ज़ल पर भी लाजवाब काम किया है (जिसे नीरज जी गीतिका कहते हैं )मराठी के यशस्वी कवियों के अनुवाद भी दिनकर जी ने किये है.कुछ बेहतरीन गीन आकाशवाणी इन्दौर से प्रसारित हुए हैं.दो रचनाएं पढ़िये और महसूस कीजिये इस विलक्षण क़लमकार कारीगरी को.ये रचनाएं १९७० यानी अब से ३७ बरस पहले हिन्दी की आदरणीय पत्रिका वीणा में प्रकाशित हुईं थीं…दिनकर सोनवलकर…
एक सूचना…
कला के इस मंदिर में
झुककर प्रवेश कर.
इसलिये नहीं कि
प्रवेशद्वार छोटा है ?
और तेरी ऊँचाई से
टकरा कर टूट जाएगा .
नहीं !
आकाश ही उसका द्वार है…विराट
यहाँ बौने ही लगेंगे तेरे ठाठ-बाट.
इंसानियत के आगे झुकना
सबसे बडी़ कला है
उन्ही को कर प्रणाम
इसी में छुपे हैं….
रहीम और राम.
परंपरा बोध…..
मुझे क्या ज़रूरत है
विदेशी स्टंटों से चमकृत होने की ?
जिसकी हों अपनी जड़ें,वही औरों के भरोसे जिये.
क्या बताएगा गिन्सबर्ग मुझ कबीर पंथी को ?
पहले कह गया है गुरू हमारा
जो घर फ़ूँके आपनो सो चले हमारे साथ
तुम पहनो अपने तन पर
उधार ली हुई फ़ाँरेनमेड पोषाकें
हम तो जन्म से ही नंगे हैं..नंगे अवधूत
मर्लिन मूनरो या मारिज़ुआना
दोनों हदों से बेहद हो चुके हैं हम .
‘हम न मरिहै संसारा’
बीटनिक,बीटल्स या हिप्पी,सभी हैं माया का पसारा.
इस ठगिनी को खू़ब जानते हैं हम .
तुम नये जीवन-दर्शन के नाम पर
बडी़ पुरानी विकृतियों को उछालत हो
रचते रहो आँप या पाँप
हम तो बस चुपचाप
ज्यों की त्यों धर देते हैं चदरिया
विद्रोह को पतिक्षणं जीते हुए !

मेरे दोहे

जुलाई 1, 2007
कविता मेरा इलाक़ा नहीं लेकिन विरासत में मिला संस्कार है.अनुभूति या अनुभव के स्तर पर कभी कभी कुछ भाव उमड़ते हैं वैसे ही जैसे बिन मौसम बादल बरसते हैं.मेरा मानना है कि हर व्यक्ति के मन में संगीत और कविता का अंडर-करंट होता है और वक़्त-बेवक़्त वह अभिव्यक्त हो ही जाता है.कविता-गीत-संगीत मुझे विरसे में वैसे ही मिले हैं जैसे मुझे मेरा जिस्म और ख़ून.और इसलिये यदि किसी पंक्ति पर यदि आपकी दाद मिलेगी तो पूरी ईमानदारी से मै उसे  मेरे बाप-दादाओं की यश की बही में लिख देना चाहूंगा.मुलाहिज़ा फ़रमाएं
अहंकार से मन भरमाया
वाणी दूषित रोगी काया.

दुर्लभ जन्म मिला मानव का
इसको क्यों फ़िर क्षुद्र बनाया.

निहित स्वार्थ में जिया है जीवन
दृष्टी -वृत्ति मन कैसा पाया.

क्षण क्षण कितने हुए निरर्थक
अर्थ न जाना व्यर्थ कमाया.

स्वीकारो श्रद्धा-अनुनय यह
प्रेम-दान दो शीतल छाया.

क्षमा-पात्र यह द्वार तुम्हारे
एक अकिंचन लेकर आया.
संजय पटेल

ज़िन्दगी की सचाइयां बयान करते मुक्तक

जून 23, 2007
आज ये मुक्तक लाया हूं बुज़ुर्ग शायर जनाब एस.एन.रूपायन के मजमुए ‘ टुकडे़ टुकडे़ हयात ‘से.
रूपायन साहब लाहौर के नामचीन एस.वी.काँलेज में पढे़ हैं और उर्दू के ऐसे शायरों में उनका ना बाइज़्ज़्त शुमार किया जा सकता है जिन्होने बहुत एकांत में रह कर ज़ुबान और अदब की ख़िदमत की है.पचास साला पुरानी किताबों की दुकान रूपायना ने इन्दौर शहर के लिट्रेचर और पुस्तक प्रेमियों को बहुत कुछ दिया है.रूपायन साहब अब अस्सी पार हैं और थक चले हैं.उनकी पत्नी श्रीमती लीला रूपायन जानी मानी कहानीकार हैं.रूपायन दंपत्ति की असली कमाई है इन्दौर के बडी़-छोटी उम्र के साहित्यप्रेमियों का स्नेह.रूपायन साहब की ज़िन्दगी का एक और पहलू है और वह यह कि वे हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के गहरे जानकार हैं और आकाशवाणी के प्रतिष्ठापूर्ण दौर में आँडिशन कमेटी के गणमान्य सदस्य रहे हैं.सादा तबियत रूपायन साहब हमेशा प्रचार और प्रशस्ति से कोसों दूर रहे हैं.उर्दू साहित्य की लोकप्रिय विधा मुक्तक पर रूपायन साहब का कारनामा रेखांकित करने योग्य है.वे चार पंक्तियों में पूरी एक ग़ज़ल का मर्म अपनी बात में कहने का हुनर रखते हैं रूपायन साहब. आज भाषा-संवाद मे उनके चंद मुक्तक ज़िन्दगी की सचाइयों को बयान कर रहे हैं .आपसे रूबरू हैं…जनाब एस.एन.रूपायन :
गै़र की बातों को छोडो़ गैर पर
दोस्तो ! खु़द से वफ़ादारी करो
जीना मुश्किल है मगर हर हाल में
हँस के जीने की अदाकारी करो.

ज़िन्दगानी की ओढ़नी पर जो
टांक रक्खे हैं हमने गुल-बूटे
फूल पत्ते ही इन को मत समझो
ये तो हैं छोटे-छोटे समझौते.
जिसकी है जैसी तमन्ना लिक्खो
और क्या उसको मिलेगा लिक्खो
जिनको आता नहीं जीने का हुनर
उनके हिस्से में निराशा लिक्खो.
टूटता हूँ न मै बिखरता हूँ
फ़ैलता हूँ फ़कत सदा बनकर
जब ज़माना मुझे सताता है
मै सिमट जाता हूँ दुआ बन कर.
रास्तों में उलझ न जाह कहीं
छोड़ कर घर को इतनी दूर न जा
नये रिश्ते तो बनते रहते हैं
जो पुराने हैं टूटने से बचा.
धूप शिद्द्त की है तो इसको मैं
सह न पाउंगा ये सवाल नहीं
लेकिन इस बात की है फ़िक्र मुझे
मेरा साया झुलस न जाए कहीं
पाप और पुण्य की लडा़ई में
कौन हारा है कौन जीत गया
सोचते सोचते यही आखि़र
ज़िन्दगी तेरा वक़्त बीत गया.

सुमनजी के मालवा का एक गुमनाम शायर…रमेश मेहबूब.

जून 17, 2007
वक़्त भी बडा़ बेरहम है.किसी को बिन मांगे देता है ..कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें अपना सर्वस्व देने के बाद भी कुछ नहीं मिलता.कला के क्षेत्र में तो ये बात ज़रा ज़्यादा ही लागू होती है.आज आपकी मुलाक़ात करवा रहा हूं मेरे शहर इन्दौर के वरिष्ठ कवि-शायर श्री रमेश मेहबूब से.नगर पालिक निगम इन्दौरे में टायपिस्ट रह चुके मेहबूबजी इन-दिनों बीमार रहते हैं ..पत्नी का देहांत हो चुका है और एकमात्र बेटी अपने ससुराल में व्यस्त रहती है… अपने परिवार और संसार की सुध लेने मे. रमेश मेहबूब ने छंद-बद्ध और अतुकांत कविताएं खू़ब लिखीं हैं.व्यंग्य  भी उनके काव्य में मुखर होता रहा है.राजनीति पर उनकी कविताओं में  व्यवस्था के खि़लाफ़ व्यंग्य बहुत  तीखा़ और चुभने वाला होता है.मालवा  के जिन कवियों  ने अपने क़लम से सक्रिय काव्य सेवा की है उनमें बालकवि बैरागी , सरोजकुमार,नरहरि पटेल,चंद्रसेन विराट,सत्यनारायण सत्तन,राहत इन्दौरी,क़ाशिफ़ इन्दौरी,नूर इन्दौरी,चन्द्रकांत देवताले के साथ रमेश मेहबूब का नाम भी इस  फ़ेहरिस्त में इज़्ज़त के साथ शुमार किया जा सकता है . मेहबूब जी की अनेक लाजवाब कविताएं हैं लेकिन आज मै आपके लिये उनकी  एक ग़ज़ल  ढूंढ निकाल लाया हूं.प्रयास करूंगा कि रमेश मेहबूब से संपर्क कर आपके लिये और रचनाएं जारी कर सकूं.अपनी बात ख़त्म करते हुए मै यह ज़रूर कहना चाहूंगा कि वक़्त रहते हमें अपने – अपने अंचल के काव्य और साहित्यकारों का दस्तावेज़ीकरण ज़रूर कर लेना चाहिये . डाँ.शिवमंगल सिंह सुमन के मालवा का यह यशस्वी कवि आज  अभाव और एकांत  से घिरा हुआ है लेकिन मेहबूब जी ने जो भी लिखा है वह अदभुत है.बस पुराने और मेहबूब जी जैसे लोगों के साथ एक ही बात है कि इन लोगों को कभी अच्छा प्रमोटर नहीं मिला अन्यथा वरिष्ठ कवि नीरज,माया गोविंद,सोम ठाकुर,काका हाथरसी,निर्भय हाथरसी,देवराज दिनेश और वीरेन्द्र मिश्र जैसे नामचीन कवियों के साथ काव्य-पाठ कर चुके रमेश मेहबूब का नाम आज देश के शीर्षस्थ कवियों में सम्मिलित किया जा सकता.
खै़र ये सब तो हमारे सोचने का नज़रिया है..मेहबूब अपने काव्य-कर्म से संतुष्ट हैं और उन्हे जितना भी नाम,यश और प्रेम मिला उसके लिये वे श्रोताओं सलाम करते हैं..
तो आइये मुलाहिज़ा फ़रमाइये..
रमेश मेहबूब की  ग़ज़ल..
 साज़िशें लड़वाने वालीं,दीनों-ईमां हो गईं
गीत हिन्दू हो गए,ग़ज़लें मुसलमां हो गईं
जब सियासत मज़हबों  की पालकी लेकर चली
मंदिर-ओ-मस्ज़िद की दीवारें पशेमां हो गईं
शहर में दंगे हुए,बाज़ार से उट्ठा धुआँ
शहर की गलियाँ सभी,आतिश-बदामाँ हो गईं
गुमशुदा लोगों में शामिल हो गईं अपनी भी नींद
ख्वा़ब हैराँ हो गए,रातें परेशाँ हो गईं
गीत भी मेहबूब के होठों पे अब आते नहीं
बेज़ुबाँ ग़ज़लें सभी अश्कों में पिनहाँ हो गईं

प्रेम करने के लिये समय निकालें

जून 15, 2007
जीवन और चिंतन को उर्जा से भर देने वाली एक आयरिश कविता आपके साथ बांट रहा हूं.
वक़्त अपनी रफ़्तार से आगे जा रहा है.हमें इस बात का अहसास होना चाहिये कि सिर्फ़ वक़्त ही नहीं बीत रहा उसके साथ हम भी बीत रहे हैं. ये कविता हमारे सीमित समय में से बहुत कुछ असीमित और अपने लिये करने को प्रेरित करती है.ये भी सनद रहे कि लिखा तो सब अच्छा ही जा रहा है ..या गया है….पढा़ भी अच्छा जा रहा है …लेकिन क्षमा करें मनन और आचरण के स्तर पर हमसे बड़ा हिप्पोक्रेट न मिलेगा (जी… मैं भी शामिल हूं इसमें)
शब्द संपदा तो एक सुरभि बन कर हमारे पास आते हैं , किताबों,ब्लाग्स,पत्रिकाओं या बुज़ुर्गों की सीख से रूप में ..लेकिन हम ही शायद चूक जाते हैं उस गंध का आनन्द लेने से. मै निराशवादी नहीं हूं..क्योंकि उम्मीद पर ही तो टिकी है सारी दुनिया..चलिये इसी कविता के साथ जीवन में एक नए,सुरीले,चैतन्य सोच को विकसित करने का प्रयास तो किया ही जा सकता है .आइये पढिये ये आइरिश कविता…..
काम के लिये समय निकालें
यह सफलता का मूल्य है.

चिंतन के लिये समय निकालें
यह शक्ति का स्त्रोत है

खेल के लिये समय निकालें
यह अक्षय यौवन का रहस्य है

अध्ययन के लिये समय निकालें
यह आनंद का मार्ग है

स्वप्नों के लिये समय निकालें
यह उत्कर्ष का पहला क़दम है

प्रेम करने के लिये समय निकालें
यह दिव्यता की अनुभूति है

अपने चहुँओर देखने के लिये समय निकालें
स्वार्थों के लिये दिन बहुत छोटा है

उल्लास के लिये समय निकालें
यह आत्मा का संगीत है.

यह आइरिश कविता पढ़ने के बाद आपके आगामी दिन सुदिन बीतें.
हां एक गुज़ारिश …आपको वाक़ई लगे कि इन शब्दों में सकारात्मक संदेश हैं 
 तो और मित्रों और परिजनों के बीच इन शब्दों को संक्रामक बनाएं.खा़सकर नौजवानों में.वे ही हमारी उम्मीद हैं ..उन्हीं से हमें आस है..वे हमारा विश्वास हैं
टीप : कवि का नाम मैं ढूंढ रहा हूं कई दिनों से…इसमें आपकी मदद का स्वागत है.

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