Thursday, August 30, 2012

पुरुषों को पसंद है अनजान महिलाओं के साथ संबंध


जिएं तो जिएं ऐसे

रफ्तार के साथ तालमेल बिठाती जिंदगी में चाहिए ऐसे जीना जो बनाए आपको सबकी आंखों का नूर

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पोस्टेड ओन: 11 Feb, 2012 मेट्रो लाइफ में

वैसे तो पुरुषों का महिलाओं के प्रति शारीरिक रूप से आकर्षित होना कोई हैरान करने वाली बात नहीं है. आमतौर पर हम सभी यह तथ्य स्वीकार करते हैं कि पुरुष कभी भी अपनी साथी के प्रति प्रतिबद्ध और समर्पित नहीं रह सकते. किसी नए साथी की तलाश उनकी प्राथमिकताओं का एक बड़ा हिस्सा होती है. यही वजह है कि वह बहुत ज्यादा समय तक किसी एक महिला के साथ संबंध नहीं रखना चाहते या यूं कहें कि रख ही नहीं पाते.

manलेकिन हाल ही में हुए एक अध्ययन के नतीजों पर नजर डालें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि शारीरिक संबंधों के प्रति पुरुषों का रुझान इतना ज्यादा होता है कि उन्हें इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता कि जिस महिला के साथ वे संबंध स्थापित करने जा रहे हैं वे उसे जानते भी हैं या नहीं?

लंदन में हुए इस अध्ययन के अंतर्गत राह चलते कुछ पुरुषों को सुंदर और आकर्षक महिलाओं ने स्वयं संबंध स्थापित करने का प्रस्ताव दिया. निश्चित था कि पुरुष उन महिलाओं से ना तो पहले कभी मिले हैं और ना ही उनके विषय में कुछ भी जानते हैं. लेकिन फिर भी हर 10 में से 8 पुरुषों ने उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया. हालांकि जब साधारण सी दिखने वाली महिलाओं ने उन्हें अपने साथ चलने के लिए आमंत्रित किया तो काफी ज्यादा पुरुषों ने उनके निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया.

वहीं दूसरी ओर जब किसी अनजान पुरुष ने महिलाओं को अपने साथ संबंध स्थापित करने के लिए कहा तो 120 महिलाओं में से मात्र 1 महिला ने ही उसके प्रस्ताव को स्वीकार किया.

डेली स्टार में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार वैज्ञानिकों का कहना है कि शोध द्वारा स्थापित यह तथ्य महिला और पुरुषों के बीच स्वभाव और व्यक्तित्व भिन्नता को साफ प्रदर्शित करते हैं. शोधकर्ताओं ने यह स्पष्ट किया है कि महिला और पुरुष में शारीरिक संबंधों के प्रति आकर्षण और रुझान बहुत अलग-अलग होता है. जहां पुरुष इस दृष्टिकोण से ज्यादा सक्रिय और उत्सुक होते हैं वहीं महिलाएं साथी को जानने और समझने के बाद ही इस ओर सोचती हैं. पुरुष किसी अनजान महिला के साथ उसके स्थान पर जाने में कोई संकोच नहीं करते लेकिन महिलाएं ऐसा सोचती भी नहीं हैं.

विदेशी पृष्ठभूमि को दर्शाता यह शोध साफ करता है कि विदेशों में आपसी संबंधों जैसे भाव समाप्त हो चुके हैं. निजी स्वार्थ और शारीरिक आकर्षण अब संबंधों के मर्म को पूरी तरह समाप्त कर चुका है. लेकिन अगर भारतीय परिदृश्य पर नजर डाले तो हम आज भी अपनी परंपरा और नैतिकता को संभाल कर रखे हुए हैं. जहां तक शारीरिक संबंधों की बात है तो यहां आज भी यह विवाह के उपरांत केवल पति-पत्नी के बीच का मसला ही माना जाता है. हालांकि हमारे युवाओं ने इस वन नाइट स्टैंड जैसी संस्कृति को स्वीकार्यता देकर भारत की परंपरा और मान्यता पर आघात किया है लेकिन फिर भी विदेशों की भांति खुलेआम अश्लीलता का प्रदर्शन करना कभी भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं बन सकता. यही कारण है कि इस शोध को भारतीय परिदृश्य के संदर्भ में देखना निरर्थक और निंदनीय ही कहा जाएगा.


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Sunday, August 26, 2012

भारत का इतिहास

Bharat ka Itihas



रोमिला थापर 
<< आपका कार्ट
पृष्ठ : 333 << अपने मित्रों को बताएँ
मूल्य : $ 5.95
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
आईएसबीएन : 9788126715558
प्रकाशित : जनवरी ०१, २००८
पुस्तक क्रं : 6864
मुखपृष्ठ : अजिल्द

सारांश:


पूर्वपीठिका
अनेक यूरोपवासियों के मन में भारत के नाम से महाराजाओं, सँपेरों और नटों की तसवीर उभरती रही है। इस प्रवृत्ति ने उन चीजों में आकर्षण तथा रोमानियत का संचार किया, जो भारतीय थीं। लेकिन पिछले कुछ दशकों में भारत की चर्चा आर्थिक दृष्टि से अल्पविकसित देश के रूप में इतनी अधिक हुई है कि महाराजओं, सपेरों और नटों के कुहासे में से उसका चित्र एक शक्तिशाली, स्पंदनशील देश के रूप में उभरने लगा है। महाराजा अब तेजी से विलुप्त हो रहे हैं और नटों के करतब दृष्टि से उभरने लगा है। महाराजा अब तेजी से विलुप्त हो रहे हैं और नटों के करतब दृष्टिभ्रम से ज्यादा कभी कुछ नहीं रहे। बाकी है तो एक सपेराः सामान्यतया एक अर्ध-पोषण का शिकार प्राणी, जो अपनी जान जोखिम में डालकर साँप को पकड़ता है, उसके जहरीले दाँतों को उखाड़ता है और अपनी बीन के इशारों पर उसे नचाता है। और यह सब वह अपना, अपने परिवार का और साँप का पेट भरने के लिए, कभी-कभी कुछ सिक्के मिल जाने की आशा में करता है।

यूरोप की कल्पना में भारत सदा से बेहिसाब संपत्ति और अलौकिक घटनाओं का एक अविश्वसनीय देश रहा है, जहाँ बुद्धिमान व्यक्तियों की संख्या सामान्य से कुछ अधिक थी। जमीन खोदकर सोना निकालनेवाली चीटियों से लेकर वनों में नग्न रहनेवाले दार्शनिकों तक सब उस चित्र के अंग थे जो भारतीयों को लेकर प्राचीन यूनानियों के मन में बसा हुआ था और यह चित्र कई शताब्दियों तक ऐसा ही बना रहा। इसे नष्ट न करना सदाशयतापूर्ण प्रतीत हो सकता था, किन्तु इसे बनाए रखने का मतलब एक मिथ्या धारणा को बनाए रखना होता।

दूसरी सभी प्राचीन संस्कृतियों की तरह भारत में संपत्ति कुछ लोगों तक सीमित रही। आध्यात्मिक क्रियाकलापों में भी थोड़े-से लोग ही संलग्न थे। पर यह सत्य है कि इन क्रियाकलापों में आस्था रखना अधिकांश लोगों का स्वभाव बन गया था। दूसरी कुछ संस्कृतियों में जहाँ रस्सी के करतब को शैतान की प्रेरणाओं का परिणाम कहा जाता कुछ संस्कृतियों में जहाँ रस्सी के करतब को शैतान की प्रेरणाओं का परिणाम कहा जाता और इसलिए इसकी हर चर्चा को दबाया जाता, भारत में इसे मनोरंजन के साधन के रूप में उदार दृष्टि से देखा जाता था। भारतीय सभ्यता की बुनियादी विवेकशीलता का कारण यही रहा है कि इसमें कोई शैतान नहीं रहा।

संपत्ति जादू और ज्ञान के साथ भारत का नाम अनेक शताब्दियों तक जुड़ा रहा। लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी में, जब यूरोप ने आधुनिक युग में प्रवेश किया तो यह रवैया बदलना शुरू हो गया, और कई क्षेत्रों में भारतीय संस्कृति के प्रति उत्साह प्रायः उसी अनुपात में कम हो गया जितना पहले उत्साह का अतिरेक था। अब वह पाया गया कि भारत में कोई विशेषता नहीं थी जिसकी नवीन यूरोप सराहना करता। विवेकयुक्त विचार और व्यक्तिवाद के मूल्यों पर स्पष्टः यहाँ कोई बल नहीं था। भारत की संस्कृति गत्यत्ररुद्घ संस्कृति थी और इसे अतीव तिरस्कार की दृष्टि से देखा जाने लगा। यह प्रवृत्ति भारतीय वस्तुओं के प्रति मैकाले के तिरस्कार में शायद, सर्वोत्तम ढंग से मूर्तिमान हुई है। भारत की राजनीतिक संस्थाओं को, जिनकी कल्पना अधिकांशतया महाराजाओं और सुलतानों के शासन के रूप में की गई थी, निरंकुश और जनमत के प्रतिनिधित्व से सर्वथा विच्छिन्न कहकर तिरस्कृत किया गया। और, एक लोकतांत्रिक क्रांतियों के युग में, यह शायद सबसे बड़ा पाप था।

किन्तु यूरोपीय विद्वानों के एक छोटे वर्ग के बीच से, एक विरोधी प्रवृत्ति का जन्म हुआ। इन विद्वानों ने भारत की खोज अधिकांशतया उसके प्राचीन दर्शन और संस्कृत भाषा में सुरक्षित साहित्य के माध्यम से की थी। इस प्रवृत्ति ने जान-बूझकर भारतीय संस्कृति के अनाधुनिक और अनुपयोगितावादी पक्षों पर बल दिया, जिनमें तीन हजार से भी अधिक वर्षों से अक्षुण्ण रहनेवाले घर्म के अस्तित्व का जयगान था और यह समझा गया था कि भारतीय जीवन-पद्धति आध्यात्मिकता और धार्मिक विश्वास की सूक्ष्मताओं से इतनी अधिक संपृक्त हैं कि जीवन की पार्थिव चीजों के लिए वहाँ कोई अवकाश ही नहीं है। जर्मन रोमैटिकवाद भारत के इस स्वरूप के समर्थन में अत्यधिक आग्रहशील था और यह आग्रहशीलता भारत के लिए उतनी ही क्षतिकारक थी जितनी मैकाले द्वारा भारतीय संस्कृति की अवहेलना। भारत अब अनेक यूरोपवासियों के लिए एक रहस्यात्मक प्रदेश हो गया, जहाँ अत्यंत साधारण क्रियाकलापों में भी प्रतीकात्मकता का समावेश किया जाता था। वह पूर्व की आध्यात्मकिता का जनक था, और संयोगवश, उन यूरोपीय बुद्घिजीवियों का शरण-स्थल भी जो अपनी स्वयं की जीवन-पद्धति से पलायन करना चाह रहे थे। मूल्यों का एक द्वैध स्थापित किया गया, जिसमें भारतीय मूल्यों को ‘आध्यात्मिक’ और यूरोपीय मूल्यों को ‘भौतिकवादी’ कहा गया, किन्तु इन कथित आध्यात्मिक मूल्यों को भारतीय समाज के संदर्भ में देखने का प्रयास बहुत कम हुआ (जिसके कुछ विक्षुब्ध करनेवाले परिणाम हो सकते थे)। पिछले सौ वर्षों में कुछ भारतीय बुद्धिजीवियों के लिए यह ब्रिटेन की तकनीक श्रेष्ठता के साथ प्रतियोगिता कर पाने में अपनी असमर्थता को छुपाने का एक बहाना बन गया।

अठारहवीं शताब्दी में भारत के अतीत की खोज और यूरोप के सामने उसे प्रस्तुत करने का काम अधिकांशतया भारत में जेसुइट संप्रदाय के लोगो और सर विलियम जोन्स तथा चार्ल्स विल्किन्स जैसे ईस्ट इंडिया कंपनी के यूरोपीय कर्मचारियों ने किया। जल्दी ही भारत की प्राचीन भाषाओं और उनके साहित्य के अध्ययन में दिलचस्पी लेनेवालों की संख्या बढ़ गई और उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में भाषा-विज्ञान, नृशास्त्र तथा भारत-विद्या के अन्य क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति दिखाई दी। यूरोप में विद्धानों ने अध्ययन के इस नए क्षेत्र में गहरी दिलचस्पी दिखाई, जिसका प्रमाण उन लोगों की संख्या है जिन्होंने भारत-विद्या को अपने अध्ययन का क्षेत्र बनाया, और जिनमें से कम-से-कम एक व्यक्ति का उल्लेख यहाँ आवश्यक है-वह है एफ. मैक्समूलर।

उन्नीसवीं सदी में भारत के साथ सबसे ज्यादा सीधा सरोकार जिन लोगों का था वे ब्रिटिश प्रशासक थे और शुरू में भारत के गैर-भारतीय इतिहासकार अधिकांशतया इसी वर्ग के लोग थे। फलस्वरूप, शुरू के इतिहास ‘प्रशासकों के इतिहास’ थे, जिनमें मुख्यतया राजवंशों और साम्राज्यों के उत्थान और पतन का विवरण होता था। भारतीय इतिहास के नायक राजा थे और घटनाओं का विवरण उन्हीं से जुड़ा हुआ होता था। अशोक, चंद्रगुप्त द्वितीय, या अकबर जैसे अपवादों को छोड़कर, भारतीय शासक का आदर्श रूप निरंकुश राजा था जो अत्याचारी था और अपनी प्रजा की भलाई में जिसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। जहाँ तक वास्तविक शासन का सवाल है, अंतनिर्हित विचार यह था कि इस उपमहाद्वीप के इतिहास में जितने शासक आज तक हुए हैं, ब्रिटिश प्रशासन उन सबकी तुलना में श्रेष्ठ था।

भारतीय इतिहास की इस व्याख्या ने उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों और बीसवीं सदी के प्रारंभ में लिखनेवाले भारतीय इतिहासकारों पर अपना प्रभाव डाला। आदर्श इतिहास-ग्रंथों का मुख्य विषय राजवंशों का इतिवृत्त था जिसमें शासकों की जीवनी को अधिक महत्त्व दिया जाता था। लेकिन व्याख्या के दूसरे पक्ष की प्रतिक्रिया भिन्न प्रकार की हुई। अधिकांश भारतीय इतिहासकारों ने या तो स्वाधीनता के राष्ट्रीय आंदोलन में स्वयं भाग लिया था, या वे उससे प्रभावित थे। उनकी मान्यता थी कि भारतीय इतिहास का स्वर्ण-युग इस देश में अंग्रेजों के आगमन में पूर्व अस्तित्व में था और भारत का सुदूर अतीत विशेष रूप से उसके इतिहास का वैभवशाली युग था। यह दृष्टिकोण बीसवीं सदी के प्रारंभ में भारतीय जनता की राष्ट्रीय आकांक्षाओं का स्वाभाविक और अनिवार्य अंग था।

इस संदर्भ में एक और तिरस्कारपूर्ण धारणा थी जिसनें प्राचीन भारत संबंधी अधिकांश प्रारंभिक लेखक को प्रभावित किया। इस काल का अध्ययन करनेवाले यूरोपीय इतिहासकारों की शिक्षा-दीक्षा यूरोप की क्लासिकी परंपरा में हुई थी, जहाँ लोगों का यह दृढ़ विश्वास था कि यूनान की प्राचीन सभ्यता-यूनान का चमत्कार-मानव-जाति की महानतम् उपलब्धि थी। फलस्वरूप, जब भी किसी नई संस्कृति का पता चलता, तो उसकी तुलना प्राचीन यूनान से की जाती, और इस तुलना में उसे निरपवाद रूप से हीन पाया जाता। या अगर उसमें कोई प्रशंसनीय बात होती भी तो सहज भाव से उसे यूनानी संस्कृति के साथ जोड़ने की चेष्टा की जाती। विंसेंट स्मिथ, जो कई दशाब्दियों तक प्राचीन भारत का अग्रगण्य इतिहासकार समझा जाता रहा, इस प्रवृत्ति का शिकार था। अजंता स्थित सुप्रसिद्ध बौद्ध-स्थल के भित्ति-चित्रों पर, और विशेष रूप से एक ऐसे चित्र पर लिखते समय, जिसके विषय में माना जाता है कि यह ईसा की सातवीं शताब्दी में फारस के एक सासानी राजा के किसी दूत के आगमन का चित्र है और जिसका कला और इतिहास, किसी भी दृष्टि से यूनान के साथ कतई कोई संबंध नहीं है, वह कहता हैः

भारत और फारस के असामान्य राजनीतिक संबंधों के एक समकालीन अभिलेख के रूप में दिलचस्प होने के अतिरिक्त यह चित्रकला के इतिहास में अपने विशिष्ट स्थान के कारण बहुत अधिक मूल्यवान है। इससे न केवल अजंता के कुछ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण चित्रों का काल-निर्धारण होता है बल्कि एक ऐसा प्रतिमान भी स्थापित होता है जिससे दूसरे चित्रों का काल-निर्धारण होता है बल्कि एक ऐसा प्रतिमान भी स्थापित होता है जिससे दूसरे चित्रों का काल-निर्धारण किया जा सके, बल्कि इस संभावना की स्थापित होता है जिससे दूसरे चित्रों का काल-निर्धारण किया जा सके, बल्कि संभावना की ओर भी संकेत मिलता है कि अंजता शैली की चित्रकला फारस से, और अंतोगत्वा यूनान से ग्रहण की गई होगी।
भारतीय इतिहासकारों पर ऐसे वक्तव्यों की तीव्र प्रतिक्रिया हुई, तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। यह सिद्ध करने के प्रयत्न किए गए कि भारत ने अपनी संस्कृति का कोई भी अंश यूनान से ग्रहण नहीं किया था, अथवा यह कि भारत की संस्कृति यूनानी संस्कृति के बिलकुल समानांतर थी, जिसमें उन सब गुणों के दर्शन होते थे जो यूनानी संस्कृति में वर्तमान थे। हर सभ्यता अपने-आपमें एक अलग चमत्कार होती है, इसे तब तक न यूरोपीय इतिहासकारों ने समझा था न भारतीय इतिहासकारों ने। किसी सभ्यता को स्वयं उसके गुणों के आधार पर परखने का विचार बाद में उत्पन्न हुआ।

अठारहवीं सदी में जब यूरोपीय विद्वानों का पहले-पहल भारत से संबंध स्थापित हुआ और उसके अतीत के बारे में जिज्ञासा उत्पन्न हुई, तो उनकी सूचनाओं के स्रोत ब्राह्मण पुरोहित थे, जिन्हें प्राचीन परंपरा का संरक्षक माना जाता था। उनका कहना था कि यह परंपरा संस्कृत-ग्रंथों में सुरक्षित है और उन ग्रंथों से केवल वे ही भली भाँति परिचित है। इस प्रकार भारत के अधिकांश प्राचीन इतिहास की पुनर्रचना लगभग संपूर्णतया संस्कृत-स्रोत्रों, अर्थात प्राचीन-शास्त्रीय भाषा में सुरक्षित सामग्री के आधार पर की गई। इनमें बहुतेरे ग्रंथ धार्मिक प्रकृति के थे और अतीत की व्याख्या स्वभावतः इनके रंग से बच नहीं सकी। धर्मशास्त्र (सामाजिक विधान की पुस्तकों) जैसे अपेक्षया इहलौकिक साहित्य के लेखक और टीकाकार भी ब्राह्मण ही थे। फलस्वरूप उनका झुकाव सत्ता के समर्थन की ओर था तथा आमतौर पर वे अतीत की ब्राह्मणों द्वारा की गई व्याख्या को मानते थे, भले ही उस व्याख्या का जैसा वर्णन इन ग्रंथों में किया गया है उससे प्रतीत होता है कि अत्यंत प्राचीनकाल में ही समाज का विभिन्न स्तरों में कठोरता से बँटवारा कर दिया गया था और उसके बाद शताब्दियों तक यह व्यवस्था प्रायः ज्यों-की-त्यों बनी उसमें परिवर्तन की काफी गुंजाइश थी, जिसे धर्मशास्त्रों के प्रणेता स्वभावतः स्वीकार नहीं करना चाहते थे।

बाद में दूसरे कई प्रकार के स्रोतों से उपलब्ध साक्ष्यों के प्रयोग ने ब्राह्मणों द्वारा प्रस्तुत कुछ साक्ष्यों को चुनौती दी और कुछ का समर्थन किया, और इस प्रकार अतीत का ज्यादा सही चित्र सामने आया। समकालीन अभिलेखों और सिक्कों से उपलब्ध साक्ष्यों का महत्त्व तेजी से बढ़ता गया। विदेशी यात्रियों द्वारा गैर-भारतीय भाषाओं-यूनानी, लातिन, चीनी और अरबी-में लिखे गए विवरणों का उपयोग करने पर अतीत को नए दृष्टिकोण से देखना संभव हुआ। विभिन्न स्थानों पर की गई खुदाई से अतीत के जो अधिक निभ्राँत अवशेष प्राप्त हुए हैं उनमें भी ऐसा ही लाभ हुआ। उदाहरण के लिए, चीनी स्रोतो से और श्रीलंका में काफी बड़ा हो गया। तेरहवीं सदी के बाद के भारतीय इतिहास से संबंधित अरबी और फारसी की सामग्री का अध्ययन अब स्वतंत्र रूप से किया जाने लगा और उसे पश्चिम एशिया में इस्लामी संस्कृति का पूरक मानने की प्रवृत्ति समाप्त हो गई।

प्रारंभ के अध्ययनों में राजवंशों के इतिहास पर अधिक ध्यान केद्रित करने के पीछे यह धारणा भी थी कि ‘प्राच्य’ समाजों में राजा की सत्ता शासन के दैनदिन कार्यों में भी सर्वोपरि थी। लेकिन भारतीय राजनीति प्रणालियों में दैनन्दिन कार्यों का प्राधिकार शायद ही कभी केंद्र के हाथों में होता था। भारतीय समाज की अद्वितीय विशेषता-वर्ण व्यवस्था-क्योंकि राजनीति और व्यावसायिक कार्य-कलाप दोनों से जुड़ी हुई थी, इसलिए उसके अंतर्गत बहुत-से ऐसे कार्य भी होते थे, जिन्हें सामान्यतया, ‘पूर्व की निरंकुश व्यवस्था’ जैसी कोई चीज यदि सचमुच होती, है यह वर्णों तथा जातियों के संबंधों और व्यापारिक श्रेणियों तथा ग्राम परिषदों करने संस्थाओं का विश्लेषण करके समझा जा सकता है, राजवंशों का सर्वेक्षण करने मात्र से नहीं। दुर्भाग्यवश, ऐसे अध्ययनों का महत्त्व अभी हाल में ही समझ गया है और संभवतः ऐतिहासिक दृष्टि से प्रामाणिक स्थापनाएँ प्रस्तुत करने के लिए एक-दो दशाब्दियों तक अभी और गंभीर अध्ययन करना पड़ेगा। फिलाहाल का प्रादुर्भाव हुआ होगा।

संस्थाओं के अध्ययन की ओर विशेष ध्यान नहीं किया गया, अंशतः जिसका कारण यह विश्वास था कि उनमें कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ। यह ऐसा विचार था जिसने इस सिद्धांत का भी पोषण किया कि भारतीय संस्कृति, मुख्य रूप से भारतवासियों के आलस्य और जीवन के प्रति उनके निराशापूर्ण तथा भाग्यवादी दृष्टिकोण के कारण, अनेक शताब्दियों तक अवरुद्ध एवं अपरिवर्तनशील रही है। निस्संदेह यह अतिशयोक्ति है। शताब्दियों तक वर्ण-व्यवस्था के अंतर्गत बदलते हुए सामाजिक संबंधों या कृषि-व्यवस्थाओं या भारतीय के उत्साहपूर्ण व्यापारिक कार्यकलापों का सतही विश्लेषण भी किया जाए तो उससे और चाहे किसी बात का भी संकेत मिलता हो, रुद्ध सामाजिक-आर्थिक स्थिति का संकेत कदापि नहीं मिलता।

Thursday, August 23, 2012

गॉधी जयंती से शुरू होगी क्रांतिकारी ग्राम न्यायालय योजना



केन्द्र सरकार ने देश भर में पॉच हजार ग्राम न्यायालय शुरू करने की योजना बनाई है । गॉधी जयंती के मौके पर दो अक्टूबर को इस संबंध में अधिसूचना जारी की जाएगी । लंबित मुकदमों के जल्द निपटारे के लिए विधि-मंत्रालय ने यह फैसला लिया है । देश के ग्रामीण अंचलों में रहनेवाले ग्रामीणों के छोटे-मोटे विवादों का गॉव के स्तर पर ही समाधान की केन्द्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना के तहत ग्रामीण न्यायालयों की स्थापना दो अक्टूबर से अस्तित्व में आ जाएँगे । ग्रामीण न्यायालयों की स्थापना पर केन्द्र सरकार करीब ३२५ करोड़ रूपए सालाना खर्च करेगी । ग्रामीण न्यायालयों में विवादों का निपटारा करने के लिए प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट नियुक्‍त किए जा रहे हैं । इन न्यायिक मजिस्ट्रेट को न्याय अधिकारी के नाम से संबोधित किया जाएगा । केंद्र सरकार द्वारा विभिन्‍न राज्यों में स्थापना संबंधी कानून लागू करने के लिए अधिसूचना जारी की जा रही है । दरवाजे पर ही न्याय सुलभ कराने की इस अतिमहत्वपूर्ण योजना को मूर्त्त रूप देने में २३ साल लग गए हैं । ग्रामीण स्तर पर ही विवादों के निपटारे के लिए ग्राम न्यायालय स्थापित करने की सिफारिश सबसे पहले १९८६ में विधि आयोग ने अपनी ११४ वीं रिपोर्ट में की थी ।
विधि मंत्रालय के सचिव के अनुसार ये अदालतें पंचायत स्तर पर शुरू की जाएगी । अधिसूचना जारी होते ही राज्य सरकारें इस दिशा में पहल करेंगी । केंद्रीय विधि मंत्रालय के सचिव ने बताया कि इस प्रक्रिया में थोड़ा समय लगेगा । इस परियोजना पर होने वाले खर्च की वजह से राज्य सरकारों ने पहले रूचि नहीं दिखाई थी । प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पिछले महीने संपन्‍न एक राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान राज्य सरकारों से इस दिशा में तुरंत जरूरी कदम उठाने को कहा था । पूरे देश में ३.११ करोड़ मामले लंबित हैं । इनमें २.७१ करोड़ मामलों को निचली अदालतों में निपटाया जा सकता है । ग्राम न्यायालयों की मदद से मुकदमों के निपटारे में तेजी आने और इससे आम लोगों को राहत मिलने की उम्मीद है । केन्द्र सरकार ने अगले वित्तीय वर्ष के दौरान २०० ग्राम अदालतें शुरू करने की योजना बनाई है । तीन साल के दौरान इनकी संख्या पाँच हजार करने की है । ग्राम न्यायालय अधिनियम २००८ के तहत प्रथम श्रेणी के न्यायाधीश को ऐसे मामलों की सुनवाई करनी है । इन न्यायाधीशों की न्याय अधिकारी कहा जाएगा तथा इनक पद एवं वेतन में किसी भी तरह का परिवर्त्तन नहीं किया जाएगा । जिला मुख्यालयों और तालुक में स्थापित की जानेवाली अदालतों की पूँजी खाते की पूरी लागत केंद्र वहन करेगा । अदालतें बस या जीप में गाँव जाएँगे और वहाँ मुकदमों का निस्तारण करेंगी । ऐसी अदालतों में मुकदमे का खर्च मुकदमा करनेवाले पक्षों को नहीं बल्कि राज्यों को वहन करना पड़ेगा ।
( गोपाल प्रसाद )

Wednesday, August 22, 2012

द्रौपदी




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संक्षिप्त परिचय
द्रौपदी
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अन्य नाम कृष्णा, पांचाली
अवतार शची (इन्द्राणी) का अंशावतार
पिता द्रुपद
जन्म विवरण द्रुपद ने द्रोणाचार्य से प्रतिशोध लेने के लिए यज्ञ किया था और उस यज्ञ से उन्हें पुत्र धृष्टद्युम्न और पुत्री कृष्णा की प्राप्ति हुई।
समय-काल महाभारत काल
परिजन भाई धृष्टद्युम्न, पिता द्रुपद
विवाह द्रौपदी का विवाह पाँचों पाण्डव से हुआ था। जिनके नाम इस प्रकार है- युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव
संतान द्रौपदी को युवराज युधिष्ठिर से प्रतिविन्ध्य, भीमसेन से सुतसोम, अर्जुन से श्रुतकीर्ति, नकुल से शतानीक और सहदेव से श्रुतवर्मा नामक पुत्र थे।
महाजनपद पांचाल की राजकुमारी और हस्तिनापुर की रानी।
शासन-राज्य कुरु
संदर्भ ग्रंथ महाभारत
प्रसिद्ध घटनाएँ 1.दुशासन ने द्रौपदी को केश पकड़कर खींचा था। उसके बाद द्रौपदी ने अपने केश सदैव खुले रखे, और उसके केश ही महाभारत का कारण बने।
2.द्रौपदी बाल्यावस्था से ही कृष्ण से विवाह करना चाहती थी किन्तु इनका विवाह अर्जुन से हुआ था।
मृत्यु स्वर्ग जाते समय द्रौपदी की मृत्यु मार्ग में सबसे पहले हुई।
यशकीर्ति द्रौपदी ने अपने पाँचों पुत्रों के हत्यारे अश्वत्थामा को क्षमा किया था।
अपकीर्ति द्रौपदी अपने पाँचों पतियों में से सबसे अधिक प्रेम अर्जुन से करती थीं इसलिए वह सशरीर स्वर्ग ना जा सकी। उनकी मृत्यु स्वर्ग जाते समय हो गई थी।
संबंधित लेख महाभारत
  • द्रौपदी का जन्म महाराज द्रुपद के यहाँ यज्ञकुण्ड से हुआ था। अतः यह ‘यज्ञसेनी’ भी कहलाई। द्रौपदी का विवाह पाँचों पाण्डव से हुआ था।
  • द्रौपदी पूर्वजन्म में किसी ऋषि की कन्या थी। उसने पति पाने की कामना से तपस्या की। शंकर ने प्रसन्न होकर उसे वर देने की इच्छा की। उसने शंकर से पांच बार कहा कि वह सर्वगुणसंपन्न पति चाहती है। शंकर ने कहा कि अगले जन्म में उसके पांच भारतवंशी पति होंगे, क्योंकि उसने पति पाने की कामना पांच बार दोहरायी थी। [1]
  • गुरु द्रोण से पराजित होने के उपरान्त महाराज द्रुपद अत्यन्त लज्जित हुये और उन्हें किसी प्रकार से नीचा दिखाने का उपाय सोचने लगे। इसी चिन्ता में एक बार वे घूमते हुये कल्याणी नगरी के ब्राह्मणों की बस्ती में जा पहुँचे । वहाँ उनकी भेंट याज तथा उपयाज नामक महान कर्मकाण्डी ब्राह्मण भाइयों से हुई । राजा द्रुपद ने उनकी सेवा करके उन्हें प्रसन्न कर लिया एवं उनसे द्रोणाचार्य को मारने का उपाय पूछा । उनके पूछने पर बड़े भाई याज ने कहा, " इसके लिये आप एक विशाल यज्ञ का आयोजन करके अग्निदेव को प्रसन्न कीजिये जिससे कि वे आपको वे महान बलशाली पुत्र का वरदान दे देंगे।" महाराज ने याज और उपयाज से उनके कहे अनुसार यज्ञ करवाया। उनके यज्ञ से प्रसन्न हो कर अग्निदेव ने उन्हें एक ऐसा पुत्र दिया जो सम्पूर्ण आयुध एवं कवच कुण्डल से युक्त था तथा प्रकट होते ही रथ पर चढ़ गया, जैसे युद्ध के लिए उद्यत हो। उसका नाम धृष्टद्युम्न रखा गया। उसी समय आकाश में अदृश्य महाभूत ने कहा- 'यह बालक द्रोणाचार्य का वध करेगा।' तदुपरांत वेदी से द्रौपदी नामक सुंदर कन्या का प्रादुर्भाव हुआ, जिसके नेत्र खिले हुये कमल के समान देदीप्यमान थे, भौहें चन्द्रमा के समान वक्र थीं तथा उसका वर्ण श्यामल था । उसके उत्पन्न होते ही एक आकाशवाणी हुई कि इस बालिका का जन्म क्षत्रियों के संहार और कौरवों के विनाश के हेतु हुआ है। बालिका का नाम कृष्णा रखा गया ।का नाम कृष्णा रखा गया। आगे चलकर द्रोणाचार्य ने ही धृष्टद्युम्न को अस्त्रविद्या की शिक्षा दी।

द्रौपदी का स्वयंवर

कुंती तथा पांडवों ने द्रौपदी के स्वयंवर के विषय में सुना तो वे लोग भी सम्मिलित होने के लिए धौम्य को अपना पुरोहित बनाकर पांचाल देश पहुंचे। कौरवों से छुपने के लिए उन्होंने ब्राह्मण वेश धारण कर रखा था तथा एक कुम्हार की कुटिया में रहने लगे। राजा द्रुपद द्रौपदी का विवाह अर्जुन के साथ करना चाहते थे। लाक्षागृह की घटना सुनने के बाद भी उन्हें यह विश्वास नहीं होता था कि पांडवों का निधन हो गया है, अत: द्रौपदी के स्वयंवर के लिए उन्होंने यह शर्त रखी कि निरंतर घूमते हुए यंत्र के छिद्र में से जो भी वीर निश्चित धनुष की प्रत्यंचा पर चढ़ाकर दिये गये पांच बाणों से, छिद्र के ऊपर लगे, लक्ष्य को भेद देगा, उसी के साथ द्रौपदी का विवाह कर दिया जायेगा। ब्राह्मणवेश में पांडव भी स्वयंवर-स्थल पर पहुंचे। कौरव आदि अनेक राजा तथा राजकुमार तो धनुष की प्रत्यंचा के धक्के से भूमिसात हो गये। कर्ण ने धनुष पर बाण चढ़ा तो लिया किंतु द्रौपदी ने सूत-पुत्र से विवाह करना नहीं चाहा, अत: लक्ष्य भेदने का प्रश्न ही नहीं उठा। अर्जुन ने छद्मवेश में पहुंचकर लक्ष्य भेद दिया तथा द्रौपदी को प्राप्त कर लिया। कृष्ण उसे देखते ही पहचान गये। शेष उपस्थित व्यक्तियों में यह विवाद का विषय बन गया कि ब्राह्मण को कन्या क्यों दी गयी है। अर्जुन तथा भीम के रण-कौशल तथा कृष्ण की नीति से शांति स्थापित हुई तथा अर्जुन और भीम द्रौपदी को लेकर डेरे पर पहुंचे। उनके यह कहने पर कि वे लोग भिक्षा लाये हैं, उन्हें बिना देखे ही कुंती ने कुटिया के अंदर से कहा कि सभी मिलकर उसे ग्रहण करो। पुत्रवधू को देखकर अपने वचनों को सत्य रखने के लिए कुंती ने पांचों पांडवों को द्रौपदी से विवाह करने के लिए कहा। द्रौपदी का भाई धृष्टद्युम्न उन लोगों के पीछे-पीछे छुपकर आया था। वह यह तो नहीं जान पाया कि वे सब कौन हैं, पर स्थान का पता चलाकर पिता की प्रेरणा से उसने उन सबको अपने घर पर भोजन के लिए आमन्त्रित किया। द्रुपद को यह जानकर कि वे पांडव हैं, बहुत प्रसन्नता हुई, किंतु यह सुनकर विचित्र लगा कि वे पांचों द्रौपदी से विवाह करने के लिए उद्यत हैं। तभी व्यास मुनि ने अचानक प्रकट होकर एकांत में द्रुपद को उन छहों के पूर्वजन्म की कथा सुनायी कि-
  • एक वार रुद्र ने पांच इन्द्रों को उनके दुरभिमान स्वरूप यह शाप दिया था कि वे मानव-रूप धारण करेंगे। उनके पिता क्रमश: धर्म, वायु, इन्द्र तथा अश्विनीकुमार (द्वय) होंगे। भूलोक पर उनका विवाह स्वर्गलोक की लक्ष्मी के मानवी रूप से होगा। वह मानवी द्रौपदी है तथा वे पांचों इन्द्र पांडव हैं। व्यास मुनि के व्यवस्था देने पर द्रौपदी का विवाह क्रमश: पांचों पांडवों से कर दिया गया। व्यास ने उनके पूर्व रूप देखने के लिए द्रुपद को दिव्य दृष्टि भी प्रदान की थीं द्रुपद के दिये तथा कृष्ण के भेजे विभिन्न उपहारों को ग्रहण कर वे लोग द्रुपद की नगरी में ही विहार करने लगे।
  • द्रौपदी ने पांच पांडवों से पांच पुत्रों की प्राप्ति की। उनके पुत्रों का नाम क्रमश:
  1. प्रतिविंध्य (युधि0),
  2. श्रुतसोम (भीम0),
  3. श्रुतकर्मा (अर्जुन),
  4. शतानीक (नकुल),
  5. श्रुतसेन (सहदेव) रखे गये [2]
  • युद्ध की समाप्ति पर जब पांडव, द्रौपदी, श्रीकृष्ण, सात्यकि आदि शिविर में न ठहरकर ओधवती नदी के तट पर रात बिताकर उठे तो उन्हें अश्वत्थामा के किये पांचाल-संहार का समाचार मिला। द्रौपदी अपने मायके के समस्त नाते-रिश्तों के नष्ट होने के विषय में सुनकर बहुत दुखी हुई तथा उसने आमरण अनशन आरंभ कर दिया। उसने कहा कि अश्वत्थामा के मस्तक में उसके जन्म के साथ उत्पन्न हुई एक मणि है। यदि मुझे मणि नहीं दी जायेगी तो मैं भोजन नहीं करूंगी और प्राण त्याग दूंगी। मणि मिलने पर मैं उसे देख लूंगी। भीमसेन अत्यंत आवेग में अश्वत्थामा को मारने के लिए चल पड़े। श्रीकृष्ण यह जानते थे कि अश्वत्थामा को द्रोण ने ब्रह्मास्त्र का उपदेश रखा है। यद्यपि उन्होंने अर्जुन को पूर्ण रूपेण ब्रह्मास्त्र प्रदान किया था। पूर्वकाल में अश्वत्थामा ने स्वयं कृष्ण को यह बताया था और यह भी कहा था कि वे अपना सुदर्शन चक्र उसे दे दें तो वह ब्रह्मास्त्र उन्हें प्रदान कर देगा। श्रीकृष्ण ने मुस्कराकर उसे कहा कि वह कृष्ण का कोई भी अस्त्र ग्रहण कर ले। अश्वत्थामा अनेक प्रयत्नों के उपरांत भी सुदर्शन चक्र को नहीं उठा पाया- लज्जित होकर लौट गया था। अत: अर्जुन और युधिष्ठिर को लेकर वे भी भीम के पीछे अश्वत्थामा के पास पहुंचे। अश्वत्थामा ने पांडवों को नष्ट करने के लिए एक तिनके में ब्रह्मास्त्र का आवाहन किया। वह तिनका भयानक रूप से प्रज्वलित हो उठा। अर्जुन ने अश्वत्थामा की मंगलकामना के साथ उसके ब्रह्मास्त्र को नष्ट करने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। इससे पूर्व कि दोनों अस्त्र एक-दूसरे को नष्ट कर भयानक विस्फोट करते, नारद तथा व्यास ने प्रकट होकर दोनों वीरों को शांत होने का आदेश दिया क्योंकि मनुष्य पर उसका प्रयोग वर्जित है। अर्जुन अपने अस्त्र को लौटाने में समर्थ थे, अत: उन्होंने लौटा लिया किंतु अश्वत्थामा ने हाथ जोड़कर कहा कि वे लौटाने की शक्ति से संपन्न नहीं हैं। व्यास तथा नारद ने दोनों के अस्त्र छोड़ने के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए अश्वत्थामा से कहा कि वे अस्त्र का परिहार करें। अश्वत्थामा अत्यंत लज्जित होकर बोले कि वे इसमें असमर्थ हैं, क्योंकि पांडवों पर न छूटकर यह अस्त्र पांडवों के गर्भस्थ शिशुओं का नाश करेगा। व्यास की आज्ञा का पालन करते हुए अश्वत्थामा ने अपने मस्तिष्क की मणि भी पांडवों को अर्पित कर दी। वह समस्त राज्य से अधिक मूल्यवान तथा शस्त्र, क्षुधा, देवता, दानव, नाग, व्याधि, आदि से रक्षा करनेवाली थी। श्रीकृष्ण ने पुन: कहा कि विराट की कन्या और अर्जुन की पुत्रवधू को (जब वह उपालव्य नगर में रहती थी) एक ब्राह्मण ने वरदान दिया था कि कौरव वंश के क्षीण होने के उपरांत वह परीक्षित नामक शिशु को जन्म देगी। वह वचन तो सत्य होगा ही। अश्वत्थामा इस पर क्रुद्ध होकर बोला-'मेरा ब्रह्मास्त्र सभी गर्भस्थ शिशुओं को मार डालेगा।' श्रीकृष्ण ने कहा-'ठीक है, वह मृत उत्पन्न होकर लंबी आयु उपलब्ध करेगा तथा तेरे देखते-देखते ही वह भूमंडल का सम्राट होगा। उस मृत बालक को मैं जीवनदान दूंगा। और तू? तू रोगों से पीड़ित होकर इधर-उधर भटकेगा।' व्यास, नारद, अश्वत्थामा को साथ लेकर वे सब द्रौपदी के पास पहुंचे। भीम ने उसे मणि देकर कहा- 'तुम्हारा दु:ख स्वाभाविक है, पर जब-जब शांति और संधि की बात उठी, तुमने अपने विगत अपमान की याद दिलाकर सबकों युद्ध के लिए उत्साहित किया। अब तुम्हें वे सब बातें याद करनी चाहिए।' द्रौपदी ने कहा-'मैं अपने पुत्रों के वध का प्रतिशोध लेना चाहती थी। गुरु-पुत्र तो मेरे लिए भी गुरु ही हैं।' द्रौपदी के कहने से युधिष्ठिर ने वह मणि अपने मस्तक पर धारण कर ली [3]
  • वास्तव में द्रौपदी साक्षात शची थी और पांडव इन्द्र के ही पांच रूप थे। पूर्वकाल में इन्द्र के हाथों त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप का हनन हो गया था। ब्रह्महत्या के कारण इन्द्र का तेज़ धर्मराज में प्रविष्ट हो गया। त्वष्टा ने क्रुद्ध होकर अपनी एक जटा उखाड़कर होम की। फलत: होमकुण्ड से वृत्र का आविर्भाव हुआ। उसे अपने वध के लिए उद्यत देख इन्द्र ने सप्तर्षियों से प्रार्थना की। उन्होंने कुछ शर्तों पर उन दोनों का समझौता करवा दिया। इन्द्र ने शर्त का उल्लंघन कर वृत्र को मार डाला, अत: इन्द्र के शरीर से निकलकर 'बल' ने वायु में प्रवेश किया। इन्द्र ने गौतम का रूप धारण कर अहिल्या के सतीत्व का नाश किया, अत: उसका रूप उसे छोड़ अश्विनीकुमारों में समा गया। पृथ्वी का भार हल्का करने के लिए जब सब देवता पृथ्वी पर अवतार लेने लगे, तब धर्म ने इन्द्र का तेज़ कुंती के गर्भ में प्रतिष्ठित किया, अत: युधिष्ठिर का जन्म हुआ। इसी प्रकार वायु ने इन्द्र का बल कुंती के गर्भ में प्रतिष्ठत किया तो भीम का जन्म हुआ। इन्द्र के आधे अंश से अर्जुन तथा अश्विनीकुमारों के द्वारा माद्री के गर्भ में इन्द्र के ही 'रूप' की प्रतिष्ठा के फलस्वरूप नकुल और सहदेव का जन्म हुआ। इस प्रकार पांडव इन्द्र के रूप थे तथा कृष्णा शची का ही दूसरा रूप थी [4]


टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. महाभारत, आदिपर्व, अध्याय 166, 168 ।
  2. महाभारत, आदिपर्व, अध्याय 182 से 198 तक
  3. महाभारत, आदिपर्व, सौप्तिकपर्व, 11 से 16 तक, अध्याय 220, श्लोक 78 स 89 तक
  4. मार्कण्डेय पुराण, 4-5

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