Wednesday, September 2, 2020

दाता की दया है

 हे मेरे मालिक मैं तेरे चरणों का आशिक़ ‌हो गया हूं ।*

 *इस  संसार के हालातों से तेरे सत्संग का दास हो गया हूं।।* 


सुन रहा हूं सत्संग आपकी दया व मेहर से ।

उठा रहा हूं रुहानी लाभ इन बंदिशों में भी।।


अविष्कारों  का उपयोग करना तो अब सीख रहा हूं ।

मगर तेरे दर्शन के वियोग में सब बेरंग महसूस  किये जा रहा हूं ।।


हे मेरे दाता अब और सहा नही  जाता ।

तेरे दर्शन के बिना मेरा मन बार बार बेचैनी से भर जाता ।।


मिल रही है भरपूर दया ई सत्संग शब्द सुनने की ।

मगर पूरी नहीं होती हसरत तुझसे मिलने की ।।


मुझे अपने चरणों में लगा लें दाता ।

मैं तेरा दास हूं मुझे बुला ले दाता ।।


दाता तेरे दर्शन को मैं तरस गया हूं ।

मैं सत्संग रोज सुनकर अपने आप को रोक रहा हूं ।।


दिल करता है कि तेरे दर पे दौड़ आऊं, सब बंधन तोड़कर ।

मगर तेरे आदेशों का पालन कर अपने आप को रोक रहा हूँ ।।


*हे मेरे मालिक मैं तेरे चरणों का आशिक़ ‌हो गया हूं।*

*इस संसार के हालात से तेरे सत्संग का दास हो गया हूं।।*


प्राथना कुल मालिक के चरणों में


SANT ADHAR BARODA BRANCH

[9/2, 17:22] +91 92346 58709: *दाता जी की दया है*


दाता जी की दया है

कि हम सब बेख़ौफ़ जुड़े हैं

 सत्संग  सुनने को मिल रहा है

और घर बैठे दर्शन भी मिल रहा है।


बस दाता जी की दया है

खेतों की सेवा का यह नया रूहानी  आलम है।


दया मेहर की पर्चे और सुपरमैन नस्ल की मिसाल है।

निर्मल अमृत दूध का प्रसाद दया की दया धार है।।

चाय , टोस्ट, फ्लेवर्ड मिल्क, और मक्खन, सूरत की अपनी ही खुराक है।

 

बस दाता जी की दया है


दयालबाग की जीवन शैली, दुनिया में है बेमिसाल

कर लो फौलो इसको, तुम भी हो जाओ मालामाल।

बन सुपरमैन सत्संग के, सब कुछ हमको करना है

ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र के, सब गुणों को अपने में धारण करना  है।


अगर हो दया दाता दयाल की तो उनके चरणों में पूरा जीवन अर्पण कर दूंगा। रहमत के आश्रय राधा स्वामी मिशन में अपनी सारी सांसे कुर्बान कर दूंगा । 

बस रहमत हो उस कुल मालिक की मालिक की, अपनी जान लगा दूंगा।


( W

riter - SANT ADHAR BARODA BRANCH MGRSA)

आज का दिन मंगलमय हो

       +प्रस्तुति - कृष्ण मेहता: 

🌞 ~ *आज का हिन्दू पंचांग* ~ 🌞

⛅ *दिनांक 03 सितम्बर 2020*

⛅ *दिन - गुरुवार*

⛅ *विक्रम संवत - 2077 (गुजरात - 2076)*

⛅ *शक संवत - 1942*

⛅ *अयन - दक्षिणायन*

⛅ *ऋतु - शरद*

⛅ *मास - अश्विन  (गुजरात एवं महाराष्ट्र अनुसार - भाद्रपद*

⛅ *पक्ष - कृष्ण* 

⛅ *तिथि - प्रतिपदा दोपहर 12:26 तक तत्पश्चात द्वितीया*

⛅ *नक्षत्र - पूर्व भाद्रपद रात्रि 08:51 तक तत्पश्चात उत्तर भाद्रपद*

⛅ *योग - धृति दोपहर 01:21 तक तत्पश्चात शूल*

⛅ *राहुकाल - दोपहर 01:59 से शाम 03:32 तक* 

⛅ *सूर्योदय - 06:23* 

⛅ *सूर्यास्त - 18:52* 

⛅ *दिशाशूल - दक्षिण दिशा में*

⛅ *व्रत पर्व विवरण - द्वितीया का श्राद्ध* 

 💥 *विशेष - प्रतिपदा को कूष्माण्ड(कुम्हड़ा, पेठा) न खाये, क्योंकि यह धन का नाश करने वाला है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)*

💥 *श्राद्ध और व्रत के दिन स्त्री-सहवास तथा तिल का तेल खाना और लगाना निषिद्ध है।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-38)*

               🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞


🌷 *जानिए पुराणों के अनुसार श्राद्ध का महत्व*🌷

 🙏 *कुर्मपुराण : कुर्मपुराण में कहा गया है कि 'जो प्राणी जिस किसी भी विधि से एकाग्रचित होकर श्राद्ध करता है, वह समस्त पापों से रहित होकर मुक्त हो जाता है और पुनः संसार चक्र में नहीं आता।'*

 🙏 *गरुड़ पुराण : इस पुराण के अनुसार 'पितृ पूजन (श्राद्धकर्म) से संतुष्ट होकर पितर मनुष्यों के लिए आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, वैभव, पशु, सुख, धन और धान्य देते हैं।*

 🙏 *मार्कण्डेय पुराण : इसके अनुसार 'श्राद्ध से तृप्त होकर पितृगण श्राद्धकर्ता को दीर्घायु, सन्तति, धन, विद्या सुख, राज्य, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करते हैं।*

 🙏 *ब्रह्मपुराण : इसके अनुसार 'जो व्यक्ति श्रद्धा-भक्ति से श्राद्ध करता है, उसके कुल में कोई भी दुःखी नहीं होता।' साथ ही ब्रह्मपुराण में वर्णन है कि 'श्रद्धा एवं विश्वास पूर्वक किए हुए श्राद्ध में पिण्डों पर गिरी हुई पानी की नन्हीं-नन्हीं बूंदों से पशु-पक्षियों की योनि में पड़े हुए पितरों का पोषण होता है। जिस कुल में जो बाल्यावस्था में ही मर गए हों, वे सम्मार्जन के जल से तृप्त हो जाते हैं।*

             🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞


🌷 *श्राद्ध में क्या करें क्या ना करें* 🌷


🌷 *श्राद्ध एकान्त में ,गुप्तरुप से करना चाहिये, 😁पिण्डदान पर दुष्ट मनुष्यों की दृष्टि पडने पर वह पितरों को नहीं पहुचँता, दूसरे की भूमि पर श्राद्ध नहीं करना चाहिये, जंगल, पर्वत, पुण्यतीर्थ और देवमंदिर ये दूसरे की भूमि में नही आते, इन पर किसी का स्वामित्व नहीं होता, श्राद्ध में पितरों  की तृप्ति ब्राह्मणों  के द्वारा ही होती है, श्राद्ध के अवसर पर ब्राह्मण को निमन्त्रित करना आवश्यक है, जो बिना ब्राह्मण के श्राद्ध करता है, उसके घर पितर भोजन नहीं करते तथा श्राप देकर लौट जाते हैं, ब्राह्मणहीन श्राद्ध करने से मनुष्य महापापी होता है | (पद्मपुराण, कूर्मपुराण, स्कन्दपुराण )*

🌷 *श्राद्ध के द्वारा प्रसन्न हुये पितृगण मनुष्यों को पुत्र, धन, आयु, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष आदि प्रदान करते हैं , श्राद्ध के योग्य समय हो या न हो, तीर्थ में पहुचते ही मनुष्य को सर्वदा स्नान, तर्पण और श्राद्ध करना चाहिये,*

*शुक्ल पक्ष की अपेक्षा कृष्ण पक्ष और पूर्वाह्न की अपेक्षा अपराह्ण श्राद्ध के लिये श्रेष्ठ माना जाता है | (पद्मपुराण, मनुस्मृति)*

🌷 *सायंकाल में  श्राद्ध नहीं करना चाहिये, सायंकाल का समय राक्षसी बेला नाम से प्रसिद्ध है, चतुर्दशी को श्राद्ध करने से कुप्रजा (निन्दित सन्तान) पैदा होती है, परन्तु जिसके पितर युद्ध में शस्त्र से मारे गये हो, वे चतुर्दशी को श्राद्ध करने से प्रसन्न होते हैं, जो चतुर्दशी को श्राद्ध करने वाला स्वयं भी युद्ध का भागी होता है | (स्कन्दपुराण, कूर्मपुराण, महाभारत)*

🌷 *रात्रि में  श्राद्ध नहीं  करना चाहिये, उसे राक्षसी कहा गया है, दोनो संध्याओं में भी श्राद्ध नहीं करना चाहिये, दिन के आठवें भाग (महूर्त) में जब सूर्य का ताप घटने लगता है उस समय का नाम 'कुतप' है, उसमें  पितरों  के लिये दिया हुआ दान अक्षय होता है, कुतप, खड्गपात्र, कम्बल, चाँदी , कुश, तिल, गौ और दौहित्र ये आठो कुतप नाम से प्रसिद्ध है, श्राद्ध में तीन वस्तुएँ अत्यन्त पवित्र हैं, दौहित्र, कुतपकाल, तथा तिल, श्राद्ध में तीन वस्तुएँ अत्यन्त प्रशंसनीय हैं, बाहर और भीतर की शुद्धि, क्रोध न करना तथा जल्दबाजी न करना (मनुस्मृति, मत्स्यपुराण, पद्मपुराण, विष्णुपुराण)*


             🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞

🙏🍀🌷🌻🌺🌸🌹🍁🙏



 🔱 *हर हर महादेव*🔱

*गोस्वामी तुलसीदास जी* ने  रामचरित मानस के बालकांड में भगवान शंकर के द्वारा माता पार्वती को  इस धरा पर श्री हरि के अवतार लेने के कारणों और श्री हरि की महिमा बताते हुए कहा है कि -


 *सुनु गिरिजा हरिचरित सुहाए।*

 *बिपुल बिसद निगमागम गाए॥* 

 *हरि अवतार हेतु जेहि होई।* *इदमित्थं कहि जाइ न सोई॥* 


 *भावार्थ:-* हे पार्वती! सुनो, वेद-शास्त्रों ने श्री हरि के सुंदर, विस्तृत और निर्मल चरित्रों का गान किया है। हरि का अवतार जिस कारण से होता है, वह कारण 'बस यही है' ऐसा नहीं कहा जा सकता (अनेकों कारण हो सकते हैं और ऐसे भी हो सकते हैं, जिन्हें कोई जान ही नहीं सकता)॥


 *राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी।*

 *मत हमार अस सुनहि सयानी॥* 

 *तदपि संत मुनि बेद पुराना।*

 *जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना॥* 


 *भावार्थ:-* हे सयानी! सुनो, हमारा मत तो यह है कि बुद्धि, मन और वाणी से श्री रामचन्द्रजी की तर्कना नहीं की जा सकती। तथापि संत, मुनि, वेद और पुराण अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार जैसा कुछ कहते हैं॥


 *तस मैं सुमुखि सुनावउँ तोही।*

 *समुझि परइ जस कारन मोही॥*

 *जब जब होई धरम कै हानी।* *बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी॥* 


 *भावार्थ:-* और जैसा कुछ मेरी समझ में आता है, हे सुमुखि! वही कारण मैं तुमको सुनाता हूँ। जब-जब धर्म का ह्रास होता है और नीच अभिमानी राक्षस बढ़ जाते हैं॥


 *करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी* 

 *सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥* 

 *तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा।* 

 *हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥* 


 *भावार्थ:-* और वे ऐसा अन्याय करते हैं कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता तथा ब्राह्मण, गो, देवता और पृथ्वी कष्ट पाते हैं, तब-तब वे कृपानिधान प्रभु भाँति-भाँति के (दिव्य) शरीर धारण कर सज्जनों की पीड़ा हरते हैं॥



 *संदेश:-* श्री हरि की महिमा अपरंपार है। जब-जब धर्म का ह्रास होता है और नीच अभिमानी राक्षस बढ़ जाते है तब-तब वे कृपानिधान प्रभु भाँति-भाँति के (दिव्य) शरीर धारण कर सज्जनों की पीड़ा हरते हैं॥

 *जय श्रीराम

राधारानी की चुनरिया

 बरसाने के एक संत की कथा


एक संत बरसाना में रहते थे और हर रोज सुबह उठकर यमुना जी में स्नान करके राधा जी के दर्शन करने जाया करते थे यह नियम हर रोज का था। जब तक राधा रानी के दर्शन नहीं कर लेते थे,तब तक जल भी ग्रहण नहीं करते थे। दर्शन करते करते तकरीबन उनकी ऊम्र अस्सी वर्ष की हो गई।


आज सुबह उठकर रोज की तरह उठे और यमुना में स्नान किया और राधा रानी के दर्शन को गए। मन्दिर के पट खुले और राधा रानी के दर्शन करने लगे।

दर्शन करते करते संन्त के मन मे भाव आया की :- "मुझे राधा रानी के दर्शन करते करते आज अस्सी वर्ष हो गये लेकिन मैंने आज तक राधा रानी को कोई भी वस्त्र नहीं चढ़ाये लोग राधा रानी के लिये, कोई नारियल लाता है, कोई चुनरिया लाता है, कोई चूड़ी लाता है, कोई बिन्दी लाता है, कोई साड़ी लाता है, कोई लहंगा चुनरिया लाता है। लेकिन मैंने तो आज तक कुछ भी नहीं चढ़ाया है।"


यह विचार संत जी के मन मे आया की "जब सभी मेरी राधा रानी लिए कुछ ना कुछ लाते है, तो मैं भी अपनी राधा रानी के लिए कुछ ना कुछ लेकर जरूर आऊँगा। लेकिन क्या लाऊं? जिससे मेरी राधा रानी खुश हो जाये ? 


तो संन्त जी यह सोच कर अपनी कुटिया मे आ गए। सारी रात सोचते सोचते सुबह हो गई उठे उठ कर स्नान किया और आज अपनी कुटिया मे ही राधा रानी के दर्शन पूजन किया।


दर्शन के बाद मार्केट मे जाकर सबसे सुंदर वाला लहंगा चुनरिया का कपड़ा लाये और अपनी कुटिया मे आकर के अपने ही हाथों से लहंगा-चुनरिया को सिला और सुंदर से सुंदर उस लहंगा-चुनरिया मे गोटा लगाये। जब पूरी तरह से लहंगा चुनरिया को तैयार कर लिया तो मन में सोचा कि "इस लहंगा चुनरिया को अपनी राधा रानी को पहनाऊगां तो बहुत ही सुंदर मेरी राधा रानी लगेंगी।"


यह सोच करके आज संन्त जी उस लहंगा-चुनरिया को लेकर राधा रानी के मंदिर को चले। मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने लगे और अपने मन में सोच रहे हैं , "आज मेरे हाथों के बनाए हुए लहंगा चुनरिया राधा रानी को पहनाऊगां तो मेरी लाड़ली खूब सुंदर लगेंगी" यह सोच कर जा रहे हैं।


इतने मे एक बरसाना की लड़की(लाली)आई और बाबा से कहती है :- "बाबा आज बहुत ही खुश हो, क्या बात है ? बाबा बताओ ना !"

तो बाबा ने कहा कि :- "लाली आज मे बहुत खुश हूँ। आज मैं अपने हाथों से राधा रानी के लिए लहंगा-चुनरिया बनाया है। इस लहँगा चुनरिया को राधा रानी जी को पहनाऊंगा और मेरी राधा रानी बहुत सुंदर दिखेंगी।"


उस लाली ने कहा :- "बाबा मुझे भी दिखाओ ना आपने लहँगा चुनरिया कैसी बनाई है।"

लहँगा चुनरिया को देखकर वो लड़की बोली :- "अरे बाबा राधा रानी के पास तो बहुत सारी पोशाक है। तो ये मुझे दे दो ना।"


तो महात्मा बोले की :- "बेटी तुमको मैं दूसरी बाजार से दिलवा दूंगा। ये तो मै अपने हाथ से बनाकर राधा रानी के लिये लेकर जा रहा हूँ। तुमको और कोई दुसरा दिलवा दूंगा।"


लेकिन उस छोटी सी बालिका ने उस महात्मा का दुपट्टा पकड़ लिया "बाबा ये मुझे दे दो", पर संत भी जिद करने लगे की "दूसरी दिलवाऊंगा ये नहीं दूंगा।"

लेकिन वो बच्ची भी इतनी तेज थी की संत के हाथ से छुड़ा लहँगा-चुनरिया को छीन कर भाग गई।


अब तो बाबा को बहुत ही दुख लगा की "मैंने आज तक राधा रानी को कुछ नहीं चढ़ाया। लेकिन जब लेकर आया तो लाली लेकर भाग गई। मेरा तो जीवन ही खराब हैं। अब क्या करूँगा?"

यह सोच कर संन्त उसी सीढ़ियों में बैठे करके रोने लगे।


इतने मे कुछ संत वहाँ आये और पूछा :- "क्या बात है, बाबा ? आप क्यों रो रहे हैं।" तो बाबा ने उन संतों को पूरी बात बताया, संतों ने बाबा को समझाया और कहा कि :- "आप दुखी मत हो कल दूसरी लहँगा चुनरिया बना के राधा रानी को पहना देना। चलो राधा रानी के दर्शन कर लेते है।"


इस प्रकार संतो ने बाबा को समझाया और राधा रानी के दर्शन को लेकर चले गये। रोना तो बन्द हुआ लेकिन मन ख़राब था क्योंकि कामना पूरी नहीं हुई ना, तो अनमने मन से राधा रानी का दर्शन करने संत जा रहे थे और मन में ये ही सोच रहे है " की मुझे लगता है की किशोरी जी की इच्छा नहीं थी , शायद राधा रानी मेरे हाथो से बनी पोशाक पहनना ही नहीं चाहती थी ! ", ऐसा सोचकर बड़े दुःखी होकर जा रहे है।


मंदिर आकर राधा रानी के पट खुलने का इन्तजार करने लगे।

थोड़े ही देर बाद मन्दिर के पट खुले तो संन्तो ने कहा :- "बाबा देखो तो आज हमारी राधा रानी बहुत ही सुंदर लग रही है।"

संतों की बात सुनकर के जैसे ही बाबा ने अपना सिर उठा कर के देखा तो जो लहँगा चुनरिया बाबा ने अपने हाथों से बनाकर लाये थे, वही आज राधा रानी ने पहना था।


बाबा बहुत ही खुश हो गये और राधा रानी से कहा हे "राधा रानी,आपको इतना भी सब्र नहीं रहा आप मेरे हाथों से मंदिर की सीढ़ियों से ही लेकर भाग गईं ! ऐसा क्यों?"


सर्वेश्वरी श्री राधा रानी ने कहा की  "बाबा आपके भाव को देखकर मुझ से रहा नहीं गया और ये केवल पोशाक नही है, इस मैं आपका प्रेम  है तो मैं खुद ही आकर के आपसे लहँगा चुनरिया छीन कर भाग गई थी।"

इतना सुनकर के बाबा भाव विभोर हो गये और बाबा ने उसी समय किशोरी जी का धन्यवाद किया।


💖🙏🏻बोलिए श्री राधा रानी सरकार की जय🙏🏻💖 

💖🙏🏻जय श्री राधे कृष्णा जी🙏🏻💖 

💖🙏🏻जय सच्चिदानन्द जी🙏🏻💖

प्रेमपत्र

 **परम गुरु हुजूर महाराज- प्रेम पत्र- भाग 1-


 कल से आगे-( 22) 


इस वास्ते जो कोई उस रूप से मिलना चाहे उसको चाहिए कि पहले उस आदि स्वरूप की भक्ति करके वहाँ.तक उस रास्ते से, जो कि उस स्वरूप ने संत सतगुरु रूप धर कर इस संसार में प्रगट किया है, पहुंचे। तब अरुप से मेल होगा। और जो ऐसा नहीं करेगा तो जिस जगह की जीव की पिंड में बैठक है वहीं बैठा बैठा चाहे जिस तरह अरूप की महिमा गया करें और जिक्र किया करें और निर्णय और तहकीकात करता रहे, पर जब तक कि उस जुगत की जो कि उस स्वरूप ने आप संत रूप धर कर प्रगट की है, कमाई और अभ्यास नहीं करेगा, तब तक अपनी जगह से नहीं हिलेगा। और इस वास्ते देह का बंधन उसका कभी नहीं काटा जाएगा और न जन्म मरण से रिहाई होवेगी और न अपने निज घर में यानी सत्तलोक और राधास्वामी पद में दखल पाएगा।।                                                         ( 23)  इस सबब से कुल विद्यावान और बुद्धिमान लोग खाली रह गये, और सिर्फ बातें विद्या बुद्धि की बनाते रहे । और जो कुछ उन्होंने उस मालिक के रूप या अरुप का निर्णय किया, वह भी सही नहीं हो सकता और न उनको रचना के भेद की सही खबर मिली।  इस वास्ते उनके मन और बुद्धि का अंधेरा और भरम और संदेह बिल्कुल दूर नहीं हुए और इसी सबब से इन लोगों के बचन में आपस में इत्तेफाक नहीं है । कोई कुछ कहता है और कोई कुछ बकता है और दूसरा उसी को रद्द करता है और दूसरी बात बताता है। पर यह सब के सब भूल और भरम में पड़े हुए हैं और अकल से अनुमान करके बातें बनाते हैं सुरत यानी रुह की आंख से कुछ देखा नहीं । और संत सतगुरु जो हाल फरमाते हैं, वह देखे हुए कहते हैं और उनका बचन एक ही है और हमेशा कायम है, कोई उसको काट नहीं सकता और न उसमें कमी बेशी कर सकता है। क्रमशः                          🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**

Tuesday, September 1, 2020

 सभी प्रेज़ेन्टशन्स की समाप्ति पर परम पूज्य हुज़ूर द्वारा फ़रमाई गई टिप्पणी -



            हमें 'Towards the Evolutionary Science of Consciousness' विषय पर जो एक approach (दृष्टिकोण/पद्धति) है, विभिन्न convergent (एक केन्द्रोन्मुख) व divergent (विभिन्न दिशोन्मुख) विचार सुनने का अवसर प्राप्त हुआ। Wikipedia (विकीपीडिया) में 'Science of Consciousness' जो पूर्व में 'Towards Science of consciousness' थी के संदर्भ में की गई recent entry में निरन्तर सीखने की प्रक्रिया (Continuing Learning Process) में इस पर विशेष ध्यान देने को आवश्यक बताया गया है। हमने Bartlatt की 19 जून, 2020 की media coverage जो 'The Guardian' में प्रकाशित हुई है को पहले ही सुना है। इसलिए हमें सदैव सतर्क रहना चाहिए व divergent thinking का स्वागत करना चाहिए जिसके द्वारा अपने विचारों को निरन्तर सीखने की प्रक्रिया में अपने समक्ष आई चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रयोग में लाएँ। हमारे विचार में 'Golden Mean Path to Devotion'सबसे श्रेष्ठ तरीक़ा है जो Egoistic Setbacks जैसी बुराइयों से दूर रखता है, जो आज के संदर्भ में संस्थाओं पर सत्ता की साज़िश कर रहा है जबकि भारत विश्व की घनी आबादी वाले देशों में तीसरे नम्बर की अविश्वसनीय विशिष्टता रखता है, यूनाइटेड स्टेट्स सबसे ऊपर पहले नम्बर पर है व ब्राजील दूसरे नम्बर पर है। इसलिए निरन्तर सीखते रहना सर्वश्रेष्ठ तरीक़ा है जिससे अन्त में fossilized अर्थात् दीर्घ काल तक स्थिर पड़े रहने की स्थिति न हो। धन्यवाद  


 राधास्वामी!! 01-09-2020-

 आज शाम के सतसंग में पढे गये पाठ-    

                         


  (1) दास हुआ चरनन में लौलीन। ध्यान गुरु लाय ताडी।।-( करुँ क्या अस्तुत उनकी गाय। चरन पर बलिहारी।।) (प्रेमबानी-3-शब्द-15,पृ.सं. 357-58)                                                  

  (2) चरन गुरु में लाग सुरत क्यों सोवई। जनम अमोलक पाय वृथा क्यों खोवई।।-( ऐसा महल अनूप वही स्रुत पावही। राधास्वामी चरन अधार हिये जो लावही।।) (प्रेमबिलास-शब्द-45,पृ.सं.56,57)                                                           

 (3) यथार्थ प्रकाश-भाग पहला- कल से आगे।                

  🙏🏻राधास्वामी🙏🏻


राधास्वामी!! -                                            

01- 09-2020-आज शाम के सत्संग में पढा गया बचन

- कल से आगे-(96)


- अब जरा आपकी योग्यता और अभिज्ञता का हाल देखिये। पहले तो यह कडी या तुक महल्ला 5 की है न कि महल्ला 4 की।  स्वयं स्वामी दयानंद जी ने सत्यार्थप्रकाश में यह कडी उद्धृत करके सुखमनी पौडी 7 का उल्लेख किया है, और प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि सुखमनी साहब के रचने वाले पाँचवी बादशाही अर्थात गुरु अर्जुन देव हैं। 

दूसरे , राधास्वामी मत के अनुयायियों को क्या पड़ी है कि अपने किसी सिद्धांत के पक्ष में आर्य समाजियो के समक्ष श्री ग्रंथसाहब का प्रमाण उपस्थित करें। तीसरे, स्वामी दयानंद जी ने इस कड़ी को वेदों की निंदक समझा है । (देखिये हिंदी सत्यार्थप्रकाश , तेरहवाँ एडीशन पृष्ट 378)।  चौथे , पंडितजी ने जो कडी लिखी है वह मूलपाठ से नही मिलती है। 

शुद्ध कडी यह है:- साध की महिमा वेद न जानहि। जेता सुने तेता बिख्यानहि।।  पाँचवें , संत शब्द का अर्थ 'नाममात्र के सन्त'  और 'वेद न' का अर्थ 'वेदन'  अर्थात वेदों की , किस  नियम से निकाला गया?  छठे, यदि इस कडी का अर्थ वही है जो पंडित जी ने ईजाद किया है तो इससे अगली कड़ियों के क्या अर्थ होगें?

 क्या उनमें भी साध का अर्थ 'नाममात्र'  के या भगवें पोश बेपढे लिया जायगा ? अगली कड़ियाँ ये है :- साध की उपमा तिह गुन ते दूर । साध की उपमा रही भरपूर। साध की सोभा का नाहिं अंत। साध की सोभा सदा बेअन्त। साध की सोभा ऊच से ऊची। साध की सोभा मूच ते मूची। साथ की सोभा साध बन आई। नानक साध प्रभभेद न भाई।८,७।  यदि पंडित विश्वामित्र जी के मतानुसार साध शब्द का अर्थ पाखंडी और नाममात्र का फकीर है तो क्या गुरु अर्जुन देव साहब इन कडियों के द्वारा यह निश्चय कराया चाहते हैं कि पाखंडी साध की महिमा तीन गुणों की हद से परे तक पहुंची हुई है और उसकी शोभा का कोई अन्त नहीं है, और उसकी शोभा ऊँची से ऊँची और उसकी सोभा साध ही वर्णन कर सकते हैं और उसमें अर्थात नाममात्र के साध और प्रभु अर्थात ब्रह्म में कोई भेद नहीं है?  नहीं, नहीं ऐसा अधर्म न करो।  विवादास्पद कड़ी में तथाच समस्त अष्टपदि में ' साध' शब्द का अर्थ सच्चा साध है। संतमत की परिभाषा में साध उस महापुरुष को कहते हैं जो ब्रह्मांड की चोटी के स्थान अर्थात् सुन्नपद की गति प्राप्त करें। यह स्थान तीन गुणों की सीमा के परे है और जोकि वेदों में तीन गुणों की सीमा के अंतर्गत ही का भेद वर्णित हुआ है इसलिए कहा गया कि वेद सच्चे साध की महिमा से अनभिज्ञ है।  गुरु महाराज का यह बचन वेदों का निंदक नहीं है। अपितु सच्चे साध की महिमा का द्योतक है। अर्थात इस बचन के द्वारा गुरु महाराज वेद कि निंदा नहीं किंतु सच्चे साध की अपार महिमा का वर्णन किया चाहते हैं। उदाहरणार्थ देखिए-  जब हम कहते हैं कि अमुक बच्चे का चेहरा चंद्रमा से अधिक सुंदर है तो हमारा अभिप्राय चंद्रमा की निंदा करने का नहीं होता वरंच बच्चे की सुंदरता की प्रशंसा का होता है । इसी प्रकार गुरु महाराज ने इस कडी और समस्त अष्टपदी में सच्चे साध की महिमा का वर्णन किया है और अंत में सच्चे साध की महिमा वर्णन करने के लिए सच्चे साध को प्रभु अर्थात परब्रह्म के बराबर का पद दिया है। और सच पूछो तो 'नानक साध प्रभ भेद न पाई'  में उपनिषद के वाक्य 'ब्रह्मविद ब्रह्मैव भवति'  का और पहली दो कड़ियों में भागवदगीता अध्याय 2 के श्लोक 45 और 46 का उल्था किया गया है।                           🙏🏻राधास्वामी🙏🏻 यथार्थ प्रकाश- भाग पहला- परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज!

परम् पूज्य हुज़ूर सत्संगी साहब के विचार

 चाय के दौरान प्रेसीडेन्ट आर.एस. सभा द्वारा विचार अभिव्यक्त करने के पश्चात् परम पूज्य हुज़ूर ने दयाकर निम्न टिप्पणी की -


            '

Evolutionary Ultimate Reality' मेरे विचार में स्थिर Phenomenon नहीं है बल्कि dynamic या kinetic (गतिशील या गत्यात्मक) संतुलन है जो सदा से evolutionary तरीक़े से अपने में नवीनीकरण करता रहा है जिससे समस्त सृष्टि को लाभ पहुँचता है। इसलिए इसे 'The ultimate Reality' के रूप में न देख कर इसके गतिशील व गत्यात्मक संतुलन व सदा नवीनीकरण की विशिष्टता पर विचार करना चाहिए। 'The' शब्द का प्रयोग करने पर हमें उसी तरह कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है जैसा कि वैज्ञानिकों को आज भौतिक जगत या मानसिक जगत (cognitive world) में करना पड़ रहा है। यद्यपि इसे 'Ultimate Relaity'का शीर्षक दिया गया है किन्तु इसका विकास स्थिर फ़्रेमवर्क -विद्युत स्थिर  (Electrostatic) या द्रव्य स्थिर फ़्रेमवर्क से हुआ है। यह बेहतर होगा कि इसे निरन्तर सीखने की प्रक्रिया तथा नव उर्जा प्रक्रिया (refreshing process) के रूप में देखा जाए। हमें परम पिता तक केवल पहुँचना या उससे मेल ही नहीं करना है बल्कि हमें इसे (यह स्थिति) सदा के लिए बनाए रखने की भी आवश्यकता है। इसलिए गतिशील या गत्यात्मक निरन्तर संतुलन को बनाए रखने के लिए हमें अपनी निरन्तर सीखने की प्रक्रिया पर विशेष बल देना होगा। धन्यवाद

राधास्वामी अभी, हमेशा व सदा के लिए।

पूज्य हुज़ूर का निर्देश

  कल 8-1-22 की शाम को खेतों के बाद जब Gracious Huzur, गाड़ी में बैठ कर performance statistics देख रहे थे, तो फरमाया कि maximum attendance सा...