Thursday, October 6, 2022

मानव मस्तिष्क के रहस्य को जानने की जाने की पहल

 आगरा। मानव मस्तिष्क की रहस्य भरी दुनिया को जानने में जुटे वैज्ञानिकों का जमावड़ा लग चुका है। दयालबाग शिक्षण संस्थान डीईआई में रविवार से ‘चेतनता विज्ञान की ओर 2013’ में वैज्ञानिक दृष्टि से मस्तिष्क को पढ़ने की कोशिश शुरू की गई और संभावनाओं पर भी चर्चा हुई।

डीईआई के सेंटर फॉर कान्शसनेस स्टडीज और एरीजोना यूनिवर्सिटी, अमेरिका के सेंटर फॉर कान्शसनेस स्टडीज के सहयोग से इस ‘चेतनता विज्ञान की ओर’ अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में पहले दिन मानव मस्तिष्क की संरचना पर चर्चा की गई। बेसिक न्यूरो एंड काग्नीटिव साइंस के तहत मस्तिष्क के जटिल न्यूरल स्ट्रक्चर और उसकी पारस्परिक समन्वय प्रणाली पर विशेषज्ञों ने विचार रखे। साथ ही अध्यात्मिक चेतनता प्राप्ति की संभावनाओं पर चर्चा की।

इसके साथ ही म्यूजिक इनरिचमेंट प्रोग्राम, कान्शसनेस एंड विजुअल प्रोसेस, इन्ट्यूटिव कान्शसनेस, म्यूजिक हायर एजूकेशन, एथिकल एजूकेशन, टीचर्स स्प्रिुच्युअल इंटेलीजेंस, इफेक्ट ऑफ मेडिटेशन पर शोध पत्र प्रस्तुत किये गये। संगोष्ठी के संयोजक डॉ. विशाल साहनी ने बताया कि सम्मेलन में अमेरिका, यूरोप, जापान एवं भारत के करीब 25 अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विशेषज्ञ मानव चेतनता विज्ञान पर विचार रखेंगे। प्रोफेसर स्टुअर्ट हेमरॉफ, प्रोफेसर जेम्स बैरेल, प्रोफेसर पीटर रो, प्रोफेसर जैक सुजुन्सकी प्रोफेसर पीटर कालिंग आदि ने चेतनता पर चल रहे शोध कार्य की जानकारी दी।

बनेगा सुपर कंप्यूटर
मानव मस्तिष्क के रहस्यों को सुलझाने में वैज्ञानिक जुटे हुए हैं। इसमें सफलता मिलने पर सुपर कंप्यूटर बनाया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि मानव मस्तिष्क में संभावनाओं की कमी नहीं है। कुछ ऐसा हो रहा है है जिससे रिजल्ट कम आ रहे हैं।
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भगवान का घर🏡*

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❤️  प्रस्तुति -  नवल किशोर प्रसाद 


एक बुजुर्ग के यहां जाने पर उन्होंने बातचीत के दौरान बताया, "इस *'भगवान के घर'* में हम दोनों पति-पत्नी ही रहते हैं! हमारे बच्चे तो विदेश में रहते हैं।" 

मैंने जब उन्हें *भगवान के घर* के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि "हमारे परिवार में *भगवान का घर* कहने की पुरानी परंपरा है! इसके पीछे की भावना हैं कि यह घर भगवान का है और हम तो उस घर में रहते हैं! *जबकि लोग कहते हैं कि "घर हमारा है और भगवान हमारे घर में रहते है!*"

मैंने विचार किया कि दोनों कथनों में कितना अंतर है! तदुपरांत वह बोले...

*"भगवान का घर"* बोला तो अपने से कोई *"नकारात्मक कार्य नहीं होते और हमेशा सदविचारों से ओत प्रेत रहते हैं।"*

बाद में मजाकिया लहजे में बोले ...

*"लोग मृत्यु उपरान्त भगवान के घर जाते हैं परन्तु हम तो जीते जी ही भगवान के घर का आनंद ले रहे हैं!"*

यह वाक्य भी जैसे भगवान ने दिया कोई *प्रसाद* ही है!

भगवान ने ही मुझे उनको घर छोड़ने की प्रेरणा दी!

     "घर *भगवान का* और हम उनके घर में रहते हैं।"

*यह वाक्य बहुत दिनों तक मेरे दिमाग में घूमता रहा, सही में कितने अलग विचार थे!*

सतसंग में पढ़ा गया बचन

 *रा धा स्व आ मी!*                                                                   

06-10-22-आज शाम सतसंग में पढ़ा गया बचन

-कल से आगे:


प्रस्तुति - नवल किशोर प्रसाद 


-(26-12-30-शुक्र-का तीसरा व अंतिJम भाग)-*  


*रात के सतसंग में बयान हुआ कि बाज सतसंगी उपदेश लेने के बाद उम्मीद करने लगते हैं कि अब उन्हें कोई दुख व क्लेश व्यापना नहीं चाहिये और दुनिया का हर काम उनकी मर्जी के मुवाफिक होना चाहिये और अपनी इस समझ की हिमायत में- " कल कलेश सब नाश सुख पावे सब दुख हरे" वगैरह कड़ियाँ पेश करते हैं लेकिन वे गलती पर हैं । 

रा धा स्व आ मी मत का उपदेश यह है कि सद्गुरू की शरण लेने पर जीव को अब्बल तो यह समझ आ जाती है कि हर बात के कर्ता धर्त्ता हुजूर रा धा स्व आ मी दयाल हैं और जो कुछ हालत दुख या सुख की उसके सिर पर आती है वह उन दयाल ही की मौज से आती है और जो कुछ वे परम दयाल पिता उसके लिये रवा फ़रमाते हैं वह जरूर उसकी बेहतरी के लिये होगा । पिता अपने पुत्र का बिगाड़ कभी नहीं कर सकता । दूसरे सद्गुरु की शरण वही लेता है जिसने दुनिया व दुनिया के सामान से किसीक़दर मुँह मोड़ लिया है यानी जिसे दुनिया व दुनिया के सामान तुच्छ दिखलाई पड़ते हैं । ऐसी सूरत में ज़िन्दगी की नीच ऊँच हालतें आने पर उसका मन डाँवाडोल नहीं होता और सहज में उसकी अनेक कलह व क्लेश से रक्षा हो जाती है । इसके अलावा यह भी है कि जिसे शरण प्राप्त हो जाती है रा धा स्व आ मी दयाल जरूर उसकी मुनासिब रक्षा व मदद फरमाते हैं लेकिध इसके ये मानी नहीं हैं कि दुनिया का कुल कारखाना आयन्दा उसके हस्बमर्जी चलने लगे।*                                                                *जो लोग मज़कूराबाला गलत समझोती लेते हैं वे अपनी मर्जी के खिलाफ सूरतें नमूदार (प्रकट) होने पर ज़ईफ़ुल्ऐतक़ाद(ढिलमिल-यकीन) हो जाते हैं और स्वार्थ व प्रमार्थ दोनों के लुत्फ़ से महरूम (खाली) रहते हुए दिन काटते हैं। इसके बाद मैंने कहा कि अक्सर सतसंगी  अब तक तो रा धा स्व आ मी मत पर ऐतक़ाद पुस्तकों में लिखे हुए उपदेश पढ़कर या जबानी फ़रमाये हुए उपदेश सुनकर लाये हैं लेकिन अब उन्हें चाहिये कि पढ़ी सुनी हुई बातों की बुनियाद के बजाय जाती तजरुबे की बुनियाद व नीज़ उपदेश करने वाले के ऐतबार पर कायम करें और कम अज कम एक साल तक सच्चा व गहरा विश्वास इस बात का दिल में रखकर कि रा धा स्व आ मी दयाल जरूर हैं और वे हमारे सच्चे रक्षक व मेहरबान हैं , अपनी जिन्दगी बसर करें और सख्त मुश्किल या मुसीबत सिर पर आने पर मदद माँगें और देखें कि जिन्दगी के लुत्फ़ में कुछ इज़ाफ़ा होता है या नहीं । हर किसी को इख़्तियार है कि साल भर के तजरुबे के बाद अगर कोई बेहतरी न हो तो अपनी साबिक़ा ( पिछली ) ढिलमिल - यक़ीनी की हालत में लौट जाय । इस उपदेश का जाहिरा हाज़िरीन बड़ा असर पड़ा । मेरा यक़ीन है । कि अगर लोगों ने ऐसा किया तो ज़रूर ज़रूर वे ख़ास दया के भागी होंगे । हुज़ूर रा धा स्व आ मी दयाल की दया के बादल घुमड़ रहे हैं । हमारे पात्र मैले हैं इसलिये वर्षा में देरी है ।  जहाँ हम लोगों ने अपने दिलों को उनके पवित्र चरणों से Harmonise किया , वर्षा शुरू हो जायगी।                                                                🙏🏻 रा धा स्व आ मी🙏🏻  क्रमशःरोजाना वाकिआत-परम गुरु हुज़ूर साहबजी महाराज!*

Wednesday, October 5, 2022

विजयादशमी - विजय का पर्व

 


विजयादशमी - विजय का पर्व


भगवान श्री कृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता में कहते हैं -


" द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च।"अर्थात् इस लोक में भूतों की सृष्टि यानी मनुष्य समुदाय दो ही प्रकार का है - एक तो दैवी प्रकृति वाला और दूसरा आसुरी प्रकृति वाला। 

हम दैवी - शक्ति के उपासक हैं। दैवी - शक्ति की आसुरी शक्ति पर विजय को हम हिंदू हर्ष - उल्लास के साथ आज भी मनाते आ रहे हैं। दैवी - शक्ति के आसुरी - शक्ति पर विजय का प्रतीक है - विजयादशमी।


आश्विन शुक्ल दशमी को सायं काल में तारा उदय होने के समय  "विजय " नामक काल होता है। वह सभी कार्यों को सिद्ध करने वाला होता है। 

प्रभु श्री राम ने इसी  "विजय " काल में रावण पर विजय पाई थी , अतः यह दिन विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है।

हिंदू परंपरा में आश्विन शुक्ल दशमी अक्षय स्फूर्ति , शक्ति - उपासना एवं विजय - प्राप्ति का दिवस है। किसी भी शुभ एवं सांस्कृतिक कार्य को प्रारंभ करने के लिए यह तिथि सर्वोत्तम माना जाता है।


विजयादशमी को निम्नलिखित कार्य हुए थे : ---

१. सत्ययुग में भगवती दुर्गा के रूप में दैवी शक्ति ने महिषासुर का वध किया था । दुर्गम नामक असुर का वध करने के कारण मां भगवती " दुर्गा " कहलाई।


२. त्रेता युग में प्रभु श्री राम ने वानरों (वनवासियों) का सहयोग लेकर अत्याचारी रावण की आसुरी शक्ति का विनाश विजयादशमी के दिन किया था।


३. द्वापर युग में १२ वर्ष के वनवास तथा १ वर्ष के अज्ञातवास के पश्चात् पांडवों ने अपने अस्त्र - शस्त्रों का पूजन इसी दिन किया था । अतः इस तिथि को आज भी शस्त्र - पूजन अपने समाज में मनाया जाता है।


४. कलियुग के अंतर्गत प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हिंदुत्व का स्वाभिमान लेकर हिंदू - पद - पादशाही (हिंदवी स्वराज) की स्थापना करने वाली छत्रपति शिवाजी ने " सीमोल्लंघन " की परंपरा का प्रारंभ इसी दिन किया था।


५. अपने राष्ट्र में प्रत्येक भारतवासी के अंतःकरण में देशभक्ति का भाव जगा कर , उन्हें स्नेह एवं अनुशासन के सूत्र में पिरो कर एक प्रबल संगठित - शक्ति का निर्माण करने के लिए डॉ० केशव हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना १९२५ में विजयादशमी के दिन की थी। यह विश्व का वृहत्तम स्वायत्त संस्था है।


६. मातृशक्ति (नारी शक्ति) को संगठित करने के लिए राष्ट्र सेविका समिति का प्रादुर्भाव भी १९३६ में विजयादशमी के दिन ही हुआ था।


हिंदू समाज की अवनति के कई कारणों में से एक प्रमुख कारण रहा है - हिंदुओं में विजिगीषु वृत्ति का अभाव। अर्थात जिस दिन से हम आगे बढ़ना भूल गए एवं संकुचित विचारों में कैद हो गए , तभी से हम पर बाह्य - आक्रमण प्रारंभ हुए।


अपने हृदय में महान भारत को पुनः विश्व - गुरु के पद पर आसीन करने का संकल्प लेकर , भुजाओं में सभी हिंदुओं को समेट कर तथा पैरों में युग परिवर्तन की गति लेकर मां भगवती दुर्गा से प्रार्थना करें -

दैवी - शक्ति की विजय हो तथा आसुरी - शक्ति का संपूर्ण विनाश हो।

आप सभी को विजयादशमी - पर्व पर बधाई।

Tuesday, October 4, 2022

आंवला मुरब्बा

 *GH has Desired that amla murabba should be made in large quantities. He has also mentioned that amla is very good for health.*


*Accordingly, all three branches of Agra and SRC have been requested to take immediate action to present murabba as soon as possible.*


*Branches of regions near Dayalbagh, who wish to participate in this Sewa may please let us know the quantity of amla required by them and when they would be picking from Dayalbagh. Please consider at least 100 kg quantity for pick up per branch.*


*Department of* *Agroecology and* *Precision Farming*

*Dayalbagh*


*ग्रेशस हुज़ूर की इच्छा है कि आंवला मुरब्बा अधिक मात्रा में बनाया जाए। उन्होंने यह भी उल्लेख किया है कि "आंवला स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा है"।*


*तदनुसार आगरा एवं एसआरसी की तीनों शाखाओं से अनुरोध किया गया है कि जल्द से जल्द मुरब्बा पेश करने के लिए तत्काल कार्रवाई करें.*


*दयालबाग के पास के रीजन्स की शाखाएं, जो इस सेवा में भाग लेना चाहते हैं, कृपया हमें बताएं कि उन्हें आंवला की कितनी मात्रा की आवश्यकता है, और वे दयालबाग से कब उठाएंगे। कृपया प्रति शाखा पिकअप के लिए कम से कम 100 किलो मात्रा पर विचार करें।*


*कृषि पारिस्थितिकी विभाग और सटीक खेती*

*दयालबाग*


Sunday, October 2, 2022

भगवान कृष्ण का महा प्रस्थान


भगवान कृष्ण का महा प्रस्थान 



 भगवान् कृष्ण ने जब देह छोड़ा तो उनका अंतिम संस्कार किया गया , उनका सारा शरीर तो पांच तत्त्व में मिल गया लेकिन उनका हृदय बिलकुल सामान्य एक जिन्दा आदमी की तरह धड़क रहा था और वो बिलकुल सुरक्षित था , उनका हृदय आज तक सुरक्षित है जो भगवान् जगन्नाथ की काठ की मूर्ति के अंदर रहता है और उसी तरह धड़कता है , ये बात बहुत कम लोगो को पता है


महाप्रभु का महा रहस्य

सोने की झाड़ू से होती है सफाई......


महाप्रभु जगन्नाथ(श्री कृष्ण) को कलियुग का भगवान भी कहते है.... पुरी(उड़ीसा) में जग्गनाथ स्वामी अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलराम के साथ निवास करते है... मगर रहस्य ऐसे है कि आजतक कोई न जान पाया


हर 12 साल में महाप्रभु की मूर्ती को बदला जाता है,उस समय पूरे पुरी शहर में ब्लैकआउट किया जाता है यानी पूरे शहर की लाइट बंद की जाती है। लाइट बंद होने के बाद मंदिर परिसर को crpf की सेना चारो तरफ से घेर लेती है...उस समय कोई भी मंदिर में नही जा सकता...


मंदिर के अंदर घना अंधेरा रहता है...पुजारी की आँखों मे पट्टी बंधी होती है...पुजारी के हाथ मे दस्ताने होते है..वो पुरानी मूर्ती से "ब्रह्म पदार्थ" निकालता है और नई मूर्ती में डाल देता है...ये ब्रह्म पदार्थ क्या है आजतक किसी को नही पता...इसे आजतक किसी ने नही देखा. ..हज़ारो सालो से ये एक मूर्ती से दूसरी मूर्ती में ट्रांसफर किया जा रहा है...


ये एक अलौकिक पदार्थ है जिसको छूने मात्र से किसी इंसान के जिस्म के चिथड़े उड़ जाए... इस ब्रह्म पदार्थ का संबंध भगवान श्री कृष्ण से है...मगर ये क्या है ,कोई नही जानता... ये पूरी प्रक्रिया हर 12 साल में एक बार होती है...उस समय सुरक्षा बहुत ज्यादा होती है... 


मगर आजतक कोई भी पुजारी ये नही बता पाया की महाप्रभु जगन्नाथ की मूर्ती में आखिर ऐसा क्या है ??? 


कुछ पुजारियों का कहना है कि जब हमने उसे हाथ मे  लिया तो खरगोश जैसा उछल रहा था...आंखों में पट्टी थी...हाथ मे दस्ताने थे तो हम सिर्फ महसूस कर पाए...


आज भी हर साल जगन्नाथ यात्रा के उपलक्ष्य में सोने की झाड़ू से पुरी के राजा खुद झाड़ू लगाने आते है...


भगवान जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार से पहला कदम अंदर रखते ही समुद्र की लहरों की आवाज अंदर सुनाई नहीं देती, जबकि आश्चर्य में डाल देने वाली बात यह है कि जैसे ही आप मंदिर से एक कदम बाहर रखेंगे, वैसे ही समुद्र की आवाज सुनाई देंगी


आपने ज्यादातर मंदिरों के शिखर पर पक्षी बैठे-उड़ते देखे होंगे, लेकिन जगन्नाथ मंदिर के ऊपर से कोई पक्षी नहीं गुजरता। 


झंडा हमेशा हवा की उल्टी दिशामे लहराता है


दिन में किसी भी समय भगवान जगन्नाथ मंदिर के मुख्य शिखर की परछाई नहीं बनती।


भगवान जगन्नाथ मंदिर के 45 मंजिला शिखर पर स्थित झंडे को रोज बदला जाता है, ऐसी मान्यता है कि अगर एक दिन भी झंडा नहीं बदला गया तो मंदिर 18 सालों के लिए बंद हो जाएगा


इसी तरह भगवान जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर एक सुदर्शन चक्र भी है, जो हर दिशा से देखने पर आपके मुंह आपकी तरफ दीखता है।


भगवान जगन्नाथ मंदिर की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए मिट्टी के 7 बर्तन एक-दूसरे के ऊपर रखे जाते हैं, जिसे लकड़ी की आग से ही पकाया जाता है, इस दौरान सबसे ऊपर रखे बर्तन का पकवान पहले पकता है।


भगवान जगन्नाथ मंदिर में हर दिन बनने वाला प्रसाद भक्तों के लिए कभी कम नहीं पड़ता, लेकिन हैरान करने वाली बात ये है कि जैसे ही मंदिर के पट बंद होते हैं वैसे ही प्रसाद भी खत्म हो जाता है।


ये सब बड़े आश्चर्य की बात हैं..

     🚩 जय श्री जगन्नाथ 🚩                                      🙏🙏

हमारे धर्म का रहस्य...

 


क्या हमारे ऋषि मुनि पागल थे?


जो कौवों के लिए खीर बनाने को कहते थे?

और कहते थे कि कौवों को खिलाएंगे तो हमारे पूर्वजों को मिल जाएगा?

नहीं, हमारे ऋषि मुनि क्रांतिकारी विचारों के थे।

*यह है सही कारण।*


तुमने किसी भी दिन पीपल और बरगद के पौधे लगाए हैं?

या किसी को लगाते हुए देखा है?

क्या पीपल या बड़ के बीज मिलते हैं?

इसका जवाब है ना.. नहीं....

बरगद या पीपल की कलम जितनी चाहे उतनी रोपने की कोशिश करो परंतु नहीं लगेगी।

कारण प्रकृति/कुदरत ने यह दोनों उपयोगी वृक्षों को लगाने के लिए अलग ही व्यवस्था कर रखी है।

यह दोनों वृक्षों के टेटे कौवे खाते हैं और उनके पेट में ही बीज की प्रोसेसीग होती है और तब जाकर बीज उगने लायक होते हैं। उसके पश्चात

कौवे जहां-जहां बीट करते हैं, वहां वहां पर यह दोनों वृक्ष उगते हैं।

पीपल जगत का एकमात्र ऐसा वृक्ष है जो round-the-clock ऑक्सीजन O2  छोड़ता है और बरगद के औषधि गुण अपरम्पार है।

देखो अगर यह दोनों वृक्षों को उगाना है तो बिना कौवे की मदद से संभव नहीं है इसलिए कौवे को बचाना पड़ेगा।

और यह होगा कैसे?

मादा कौआ भादो महीने में अंडा देती है और नवजात बच्चा पैदा होता है। 

तो इस नयी पीढ़ी के उपयोगी पक्षी को पौष्टिक और भरपूर आहार मिलना जरूरी है इसलिए ऋषि मुनियों ने

कौवों के नवजात बच्चों के लिए हर छत पर श्राघ्द के रूप मे पौष्टिक आहार की व्यवस्था कर दी।

जिससे कि कौवों की नई जनरेशन का पालन पोषण हो जाये......


इसलिए दिमाग को दौड़ाए बिना श्राघ्द करना प्रकृति के रक्षण के लिए नितांत आवश्यक है।

घ्यान रखना जब भी बरगद और पीपल के पेड़ को देखो तो अपने पूर्वज तो याद आएंगे ही क्योंकि उन्होंने श्राद्ध दिया था इसीलिए यह दोनों उपयोगी पेड़ हम देख रहे हैं।

🙏सनातन धर्म पे उंगली उठाने वालों, पहले सनातन धर्म को जानो फिर उस पर ऊँगली उठाओ।जब आपके विज्ञान का वि भी नही था हमारे सनातन धर्म को पता था कि किस बीमारी का इलाज क्या है, कौन सी चीज खाने लायक है कौBन सी नहीं...? अथाह ज्ञान का भंडार है हमारा सनातन धर्म और उनके नियम, मैकाले के शिक्षा पद्धति में पढ़ के केवल अपने पूर्वजों, ऋषि मुनियों के नियमों पर ऊँगली उठाने के बजाय , उसकी गहराई को जानिये🙏

पूज्य हुज़ूर का निर्देश

  कल 8-1-22 की शाम को खेतों के बाद जब Gracious Huzur, गाड़ी में बैठ कर performance statistics देख रहे थे, तो फरमाया कि maximum attendance सा...