Monday, December 12, 2022

सीताजी की अग्निपरीक्षा,

 # प्रस्तुति -  रेणु दत्ता / आशा  सिन्हा 


रावण की मृत्यु के साथ ही ,युद्ध समाप्त हो गया। श्री रामचंद्र के आदेश से विभीषण को राजा घोषित कर राज्याभिषेक कर दिया गया। अभिषेक-विधि के बाद विभीषण ने नगर से बाहर निवास कर रहे ,श्रीराम से आशीर्वाद प्राप्त किया।...


राम ने हनुमान से कहा,"लंकापति विभीषण की आज्ञा लेकर,सीता को अशोक-वाटिका मे खबर सुना आओ।"...

हनुमान तुरंत चल पड़े और विभीषण की आज्ञा लेकर अशोक-वाटिका पहुंचे। माता सीता को उन्होंने सारा वृत्तांत सुनाया। परम आनंद के कारण देवी के मुंह से शब्द नहीं निकल रहे थे।.

जानकी बोलीं, "हे तात ! मेरा गला भरा हुआ है। शब्द नहीं निकल रहे हैं। किस प्रकार में तुम्हें धन्यवाद दूं। तुम्हारे जैसा, विवेकी,वीर, धैर्यवान, विनयशील और मनोबलवाला व्यक्ति, मैंने आज तक नहीं देखा।".वैदेही की आंखों से अविरल अश्रुधारा बहती जा रही थी।.लौटते समय हनुमान ने पूछा, "मां ! श्रीराम के पास क्या संदेशा लेकर जाऊं?"सीता बोलीं, "बस इतना ही कहना कि उनके दर्शन के लिए तरस रही हूं।"...


हनुमान, रामचंद्र के पास लौट आये। श्रीराम विचारमग्न थे। उनकी मुखाकृति कुछ बदली हुई थी।आंखें सजल थीं।उन्होंने हनुमान को आज्ञा दी ,"अच्छी बात है,सीता स्नानादि करके, स्वस्थ हो जाएं और वस्त्राभूषण पहनें, उसके बाद उसे मेरे पास ले आओ।"...

हनुमान,सीताजी को लेने चले। पालकी में सीता को आते देख ,वानर-भालू ,उन्हें देखने का आग्रह करते हुए उछल कूद मचाने लगे।...श्रीराम ने कहा, "सीता ,पैदल ही यहां आयें। वानरों को उन्हें देखकर आनंद होगा। ये सभी मेरे मित्र हैं । इन्हीं की सहायता से मैंने यह युद्ध जीता है।"वानरों और लक्ष्मण को रामचंद्र के व्यवहार में कुछ विचित्रता लगी। उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था।


सीता ने पहुंचकर केवल इतना ही कहा, "आर्यपुत्र!"...

आगे उनसे कुछ बोला न गया और फूट-फूट कर रोने लगीं।

श्रीराम का मुखमंडल अत्यंत गंभीर था। चेहरे का रंग कुछ गहरा हो गया था। उन्होंने कहा,"शत्रु मारा गया। मैंने तुम्हें कारागृह से मुक्त कर दिया। मेरा क्षत्रिय-धर्म पूरा हुआ । मैंने जो प्रण किया था वह भी पूर्ण हुआ।"...उन्होंने फिर कहा,

"मैंने तुम्हारे कारण यह भयंकर युद्ध नहीं किया। मैंने तो अपना कर्तव्य पूरा किया। तुम्हें पाकर मुझे अब खुशी नहीं हो रही है। लोकापवाद के धुयें से तुम घिरी हुई हो। पराये घर में तुम बहुत समय तक रह चुकी हो। ऐसी स्थिति में तुम्हें स्वीकार करना मेरे लिए उचित नहीं । तुम क्या कहती हो?....


सीता ने राम की ओर देखा। उनकी आंखों में अब दीनता नहीं थी। चिंगारियां निकल रही थी। बोलीं,"हे राम! क्या तुम नहीं जानते कि राक्षस मुझे जबरदस्ती उठा लाया था। क्या यह भूल गए कि मैं किस कुल की हूँ। मेरे पिता जनक हैं। उनसे मैंने धर्म सीखा है।... तुम्हारे मुंह से ऐसी बातें सुनने की, मुझे आशा न थी।....


लक्ष्मण सहित ,सारी वानर सेना, विषण्णमुख हो ,श्रीराम को ताक रही थी। उन्हें श्रीराम का व्यवहार समझ में नहीं आ रहा था।.सीता ने लक्ष्मण की ओर देखकर कहा, "अग्नि प्रज्वलित करो।".उनके आग्रह पर लक्ष्मण ने अग्नि प्रज्वलित की। भूमि पर दृष्टि जमाए सीता ने 'पति' की प्रदक्षिणा की। अग्नि में प्रवेश से पूर्व उन्होंने कहा," हे अग्निदेव! तुम्हें तो मेरी पवित्रता पर संदेह नहीं है न? तुम मुझे आश्रय दो।"... इतना कहकर वैदेही, अग्नि में प्रवेश कर गईं।... 


तभी एक चमत्कार हुआ। अग्निदेव सशरीर वहां आये और सब प्रकार के वस्त्र और आभूषणों से विभूषित देवी सीता को राम के हाथों में समर्पित कर दिया।... अब श्रीराम ने सीता को बड़े प्यार से दोनों हाथों में स्वीकार किया और बोले-- 

,"प्रिये! मैं तुम्हें भली-भांति पहचानता हूं। तुम्हारी पवित्रता पर मैंने एक क्षण के लिए भी संदेह नहीं किया। साधारण जनता के मन में कोई शंका नहीं न रह जाये, इसी हेतु, मैंने यह परीक्षा ली।...

तभी देवेंद्र के साथ स्वर्ग से राजा दशरथ उतर आए। उन्होंने राम को अपने अंक में भर कर प्यार किया और सीता से बोले, "बेटी ! मेरे पुत्र को क्षमा करो। धर्म की रक्षा के उद्देश्य से उसने तुम्हारी परीक्षा ली। तुम्हारा सौभाग्य अटल रहे।"...आकाश से देवगण पुष्प-वर्षा करने लगे। देवेंद्र ने भी वरदान दिया कि जितने वानर युद्ध में काम आए थे ,सब के सब पुनर्जीवित हो जायें।...


जय श्रीराम,

रोजाना वाकिआत-परम गुरु हुज़ूर साहबजी महाराज!*

 *रा धा स्व आ मी!            

  12-12-22-आज शाम सतसंग में पढ़ा गया बचन

-कल से आगे:-(21-2-31-सनीचर)-

आज चीफ़ इन्जीनियर साहब मय अपनी अहलेखाना(पत्नी) तशरीफ़ लाये कारखाना का मुलाहजा किया गया नीज़ आपने बहुत सी अशिया खरीद की। आपके हमराह राय बहादुर पंडित सूरज प्रसाद वाजपेयी भी थे।ट्यूबवेल चलाया गया। पानी खूब निकला लेकिन रेत मिला हुआ है। अभी बहुत सफ़ाई की जरूरत मालूम होती है।दिन भर बूँदा बाँदी होती रही। मौसम निहायत खुशगवार हो गया है। सड़के साफ़ है । दरख़्त हरे भरे नज़ृ आते हैं। रात के सतसंग में मिस सुशीला ने सवाल किया कि यह बड़ा अंधेर है कि हालाँकि इन्सान बेचारा सृष्टि नियमों से नावाक़िफ़ है लेकिन फिर उसे उनके ख़िलाफ़ वरजी करने पर सजा दी जाती है दुनिया में कोई माँ अपने नादान बच्चे को ऐसी हरकत के लिये जिसकी माहीयत' वह समझता न हो कभी सजा नहीं देती। फिर मालिक अपने नादान बच्चों को क्यों सज़ा देता है?              


 जवाब में बतलाया गया जबकि यह तस्लीम किया जाता है कि मालिक प्रेम व दया का सिंध है तो यह ख़याल कैसे जायज हो सकता है कि ऐसे सिंध से प्रेम व दया के ख़िलाफ़' या बर अक्स कोई बात निकल सकती है? जबकि दूध के घड़े से दूध ही निकलता है तो दया व प्रेम के सिंध से दया व प्रेम ही निकलेगा इसलिये मालिक की हर एक कार्रवाई से और उसके हर एक नियम से दया व प्रेम ही की उम्मीद रखनी चाहिये। इसके अलावा गौर करो कि अगर यह मान लिया जावे कि सजा सिर्फ सृष्टि नियमों से वाक़िफ़ ही को मिलनी चाहिये तो इसके यह मानी होंगे कि आइन्दा आग किसी ऐसे बच्चे को जो आग के मुतअल्लिक़ सृष्टि नियमों से नावाक़िफ़ है न जलावे और चूँकि जब तक किसी बच्चे को जलने का तजरबा नहीं हो लेता उसे यह समझ ही में नहीं आ सकता कि जलना क्या होता है। इसलिये नतीजा यह होगा कि रफ्ता रफ्ता आग से जलने का अमल' ही छूट जावेगा यानी सभी बच्चे शुरु में आग की इस सिफ़त से नावाक़िफ़ होते हैं और बगैर जलने का तजरबा हासिल किये उन्हें कभी समझ ही में न आवेगा कि जलना 6क्या होता है इसलिये आग के लिये लाजिमी होगा कि उन्हें कभी न जलावे और होते होते ये बच्चे दुनिया की इन्सानी आबादी जलने से महफ़ूज रखनी होगी और ऐसे ही दुनिया का तमाम जड़ मसाला भी सृष्टि नियमों से नावाकिफ होने के बाइस(कारण) जलने से महफ़ूज रखना होगा तो गोया दुनिया से जलने का अमल ही उठ जायेगा। इसी तरह और सब क़ुदरत के काम भी बंद करने होंगे जो कि महज लगो है। इसके ख़िलाफ़ मौजूदा सूरत यह है कि सृष्टि नियम अपना काम करते हैं। जो उनसे वाक़िफ़ होकर उनसे काम लेता है वह उसकी पूरी तौर से ख़िदमत बजा लाते हैं। और जो दानिस्ता' या ना दानिस्ता उनकी ख़िलाफ़ वर्जी करता है वह उसे बिला किसी रुओरिआयत के नुकसान पहुँचाते हैं उनको न किसी से मोहब्बत है और न नफ़रत सबके साथ यकसाँ बर्ताव करते हैं। और हमेशा अटल रहते हैं। उनके इस सुभाव ही की वजह से वह नियम कहलाने के मुस्तहक़ हैं और इस सुभाव ही की वजह से दुनिया के तमाम उलूम क़ायम हैं। और नीज़ दुनिया का वजूद' क़ायम है। अगर जमीन की कशिशे-सिफ़्ल' सिर्फ उन लोगों पर असर करे जो कशिशे-सिफ़्ल से आशना हों तो खयाल किया जा सकता है कि दुनिया का क्या हाल होगा। मालिक ने इन्सान को अक़्ल इनायत की है। इन्सान को चाहिये उस अक़्ल को जगावे और उसकी मदद से सृष्टि नियमों से वाक़िफ़ियत हासिल करे और दानिस्ता किसी नियम की खिलाफ़ वर्जी न करे और उनसे मुताबिक़त" करके सुख व कामयाबी हासिल करे। इसके अलावा माँ की मिसाल से सृष्टि नियमों के मुतअल्लिक़ नतीजा निकालना भी नादुरुस्त है। माँ की यह कार्रवाई महज खुद गर्जी की वजह से होती है। हरेक माँ को अपने बच्चे से गहरी मोहब्बत होती है इसलिये उसके कुसूरों को वह नजरअंदाज करती है। अगर ऐसा न होता तो गैर बच्चों के नादानी से सख्त नुक़सान पहुँचाने पर भी माँएँ खुश या मुतमईन नज़र आया करतीं । मतलब यह है कि सृष्टि नियम सृष्टि का कारखाना चलाने और इन्सान की अक़्ल जगाने और इस्तेमाल किये जाने पर इन्सान की मदद करने के लिये बनाए गये हैं। अगर ख़िलाफ़ वर्ज़ी करने पर वह सज़ा न दें तो यह सब मतलब फ़ौत(समाप्त) हो जाते हैं।                                                                   🙏🏻रा धा स्व आ मी🙏🏻 

रोजाना वाकिआत-परम गुरु हुज़ूर साहबजी महाराज!*



Friday, December 9, 2022

शांति कैसे मिले?/ कृष्ण मेहता

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*प्रस्तुति *रेणु दत्ता / आशा सिन्हा 

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मेरे पास न मालूम कितने लोग आते हैं। वे कहते हैं, शांत कैसे हों? 

मैं उनसे पूछता हूं कि पहले तुम मुझे बताओ कि तुम अशांत कैसे हुए? क्योंकि जब तक यह पता न चल जाए कि तुम कैसे अशांत हुए, तो शांत कैसे हो सकोगे! 

एक आदमी मेरे पास लाया गया। उसने कहा, मैं अरविंद आश्रम से आता हूं। शिवानंद के आश्रम गया हूं। महेश योगी के पास गया हूं। ऋषिकेश हो आया। यहां गया, वहां गया। रमण के आश्रम गया हूं। कहीं शांति नहीं मिलती। तो किसी ने आपका मुझे नाम दिया तो मैं आपके पास आया हूं।

तो मैंने कहा, इसके पहले कि तुम निराश होकर लौट जाओ, तुम लौट जाओ पहले ही। नहीं तो तुम और लोगों से भी जाकर कहोगे कि वहां भी गया और शांति नहीं मिली। तो तुम अभी ही लौट जाओ, इसके आगे बात करनी उचित नहीं है।

उसने कहा, क्या मतलब आपका? मैं तो बड़ी आशा से आया हूं।

तो मैंने उस आदमी को कहा कि अशांति सीखने तुम किस आश्रम में गए थे? किस गुरु से अशांति सीखी? अशांति तुम सीखोगे और शांति मैं न दे पाऊंगा तो अपराधी मैं हो जाऊंगा। मैंने उस आदमी से पूछा, तुम फिकर छोड़ो शांति की, तुम मुझे यह बताओ कि तुम अशांत कैसे हुए? क्योंकि जो अशांत होने का ढंग है उसी में कुंजी छिपी है शांत होने की, और कहीं कोई शांति नहीं खोज सकता।

अशांत होते हैं हम, जिंदगी के साथ जोर से चिपक जाते हैं इसलिए अशांत होते हैं। जिंदगी को बहने नहीं देते, तिनके की तरह आड़े लड़ते हैं जिंदगी से, तो अशांत होते हैं। उस तिनके की तरह सीधे नहीं नदी में बह जाते। नहीं तो फिर अशांति का कोई कारण नहीं है।

 अशांत हम होते हैं, हमारा जीवन के प्रति जो ढंग है, उससे। वह जो हमारा वे ऑफ लिविंग है, उससे हम अशांत होते हैं। और शांति हम खोजते हैं कि किसी मंत्र से मिल जाए, किसी माला से मिल जाए। शांति हम खोजते हैं कि किसी के आशीर्वाद से मिल जाए। शांति हम खोजते हैं कि परमात्मा की कृपा से मिल जाए। हम अशांत होने का पूरा इंतजाम करते चले जाते हैं और शांति खोजते रहते हैं। तब यह शांति की खोज सिर्फ एक और नई अशांति बन जाती है, और कुछ भी नहीं होता।

इसलिए साधारण आदमी साधारण रूप से अशांत होता है, धार्मिक आदमी असाधारण रूप से अशांत हो जाता है। क्योंकि वह कहता है, शांति भी चाहिए। और वह जो चाहिए था सब, वह तो चाहिए ही—वह धन भी चाहिए, वह यश भी चाहिए, वह पद भी चाहिए—वह सब तो चाहिए ही, शांति भी चाहिए। उसकी फेहरिस्त में एक आयटम चाह का और बढ़ गया—शांति भी चाहिए। आगे लिखेगा: परमात्मा भी चाहिए। और उसकी अशांति और बढ़ जाएगी। इसलिए किसी घर में एक आदमी तथाकथित धार्मिक हो जाए, तो खुद तो अशांत होता है, बाकी लोगों को भी शांत रहने देने में दिक्कत डालने लगता है। सबको गड़बड़ कर देता है। शांति चाहिए, यह भी उसके लिए अशांति ही बन जाती है।

शांति चाही नहीं जा सकती, सिर्फ अशांति समझी जा सकती है। शांति को चाहा ही नहीं जा सकता, क्योंकि चाह अशांति है। इसलिए शांति को कैसे चाहिएगा? वह तो कंट्राडिक्ट्री हो जाएगी। शांति को कोई नहीं चाह सकता। शांति को डिजायर ऑब्जेक्ट नहीं बनाया जा सकता। क्योंकि सब इच्छाएं अशांति पैदा करती हैं, इसलिए शांति इच्छा नहीं बन सकती। सिर्फ अशांति को कोई समझ ले और अशांत न हो, तो जो शेष रह जाता है उसका नाम शांति है। शांति एब्सेंस है। शांति सिर्फ अभाव है।

स्वास्थ्य क्या है? अगर किसी डाक्टर से पूछें जाकर—स्वास्थ्य क्या है? तो वह कहेगा—बीमारियों का अभाव। इसलिए अगर किसी डाक्टर से कहें कि मुझे स्वास्थ्य का इंजेक्शन लगा दें! तो वह कहेगा, क्षमा करें मुझे। हम बीमारी काटने का इंजेक्शन लगा सकते हैं, स्वास्थ्य का कोई इंजेक्शन नहीं है। डाक्टर से आप कहें कि हमें स्वास्थ्य दे दीजिए! तो वह कहेगा, हम बीमारी छीन सकते हैं, स्वास्थ्य कैसे दे देंगे? हां, बीमारी नहीं बचेगी तो जो बच रहेगा वह स्वास्थ्य है।

इसलिए किसी मेडिकल साइंस की किसी किताब में—चाहे आयुर्वेद हो, और चाहे एलोपैथी हो, और चाहे होमियोपैथी हो—स्वास्थ्य की कोई परिभाषा नहीं है, कोई डेफिनीशन नहीं है कि स्वास्थ्य क्या है। सिर्फ बीमारियों की परिभाषाएं हैं कि बीमारी क्या है। और जहां बीमारी नहीं होती, वहां जो शेष रह जाता है, वह स्वास्थ्य है। इसलिए स्वास्थ्य की सब परिभाषाएं निगेटिव हैं, सब नकारात्मक हैं। बीमारी जहां नहीं है, वहां स्वास्थ्य है। अशांति के कारण जहां नहीं हैं, वहां शांति है।

और ध्यान रहे, अगर आप सोचते हों कि परमात्मा हमें शांति दे दे, तो आप बड़ी गलती में पड़ेंगे। परमात्मा से आपका संबंध ही तब होगा जब आप शांत होंगे। इसलिए परमात्मा कोई शांति नहीं दे सकता। अगर आप सोचते हों कि परमात्मा हमें शांति दे दे, तो आप बड़ी गलत कंडीशन लगा रहे हैं। परमात्मा से संबंध ही तब होता है जब आप शांत हों। और जिससे संबंध ही नहीं है, उसकी तरफ की गई प्रार्थना अंधेरे में फिंक जाती है, कहीं नहीं पहुंचती। जिससे संबंध नहीं, कम्युनिकेशन नहीं, उसके साथ प्रार्थना का संबंध नहीं बन पाता। शांत आदमी ही प्रार्थना कर सकता है।

लेकिन अब तक अशांत आदमी प्रार्थना करता रहता है। और अशांत आदमी सोचता है—हमारी प्रार्थना सुनी नहीं जा रही। वह ऐसा ही है कि टेलीफोन बिना उठाए आदमी बोले चला जा रहा है और सोचता है—दूसरी तरफ कोई सुन नहीं रहा!

मैंने सुना है कि एक आदमी ने अपने घर की कॉलबेल सुधरवाने के लिए एक मेकेनिक को बुलाया हुआ था। बाहर जो घंटी लगी है घर के भीतर बुलाने की। दो दिन बीत गए, तीन दिन बीत गए, वह मेकेनिक नहीं आया। तो उसने फिर उसे फोन किया कि तुम आए नहीं, मैं तीन दिन से रास्ता देख रहा हूं।

उसने कहा, मैं आया था, मैंने कॉलबेल बजाई थी, लेकिन किसी ने दरवाजा नहीं खोला। अब उसको कॉलबेल सुधरवाने के लिए बुलाया हुआ था। वह सज्जन ने कॉलबेल बजाई, किसी ने नहीं सुनी इसलिए वापस लौट गए। 

अधिक लोगों की प्रार्थनाएं इसी तरह की कॉलबेल पर हाथ रखना है, जो बिगड़ी पड़ी है, जो कहीं नहीं बजेगी। वे जिंदगी भर प्रार्थना करते रहें, कहीं नहीं सुनी जाएगी। फिर नाराज परमात्मा पर होंगे आप। 

नाराज अपने पर हों, परमात्मा का इसमें कोई कसूर नहीं है। परमात्मा के साथ कम्युनिकेशन का, संवाद का जो पहला सूत्र है, वह शांति है। शांति के ही द्वार से हम उससे संबंधित होते हैं। या इससे उलटा कहें तो ज्यादा अच्छा होगा। अशांति के कारण हम उससे डिसकनेक्ट हो जाते हैं, अशांति के कारण हम असंबंधित हो जाते हैं। शांति के कारण हम संबंधित हो जाते हैं। शांति संबंध है, अशांति असंबंध है। बीच का तार कट गया, टूट गया।

इसलिए परमात्मा से शांति मत मांगना, शांति आप लेकर जाना उसके द्वार पर। आनंद उससे मिल सकता है, शांति आपको बनानी पड़ेगी। 

इसे थोड़ा समझ लेना उचित होगा। शांति हमारी पात्रता है, आनंद उसका प्रसाद है। शांत हमें होना होगा, आनंद से वह हमें भर देगा। शांति हमारी पात्रता है, आनंद उसकी वर्षा है। तो आनंद तो प्रसाद है। आप आनंदित नहीं हो सकते, आप सिर्फ शांत हो सकते हैं। आनंद बरसेगा। ऐसा समझें, शांति हमारा पात्र है और आनंद उसकी नदी है, जिससे हम अपने पात्र में पानी को भर लाते हैं।


लेकिन आप बिना ही पात्र के नदी के पास चले गए हैं और चिल्ला रहे हैं, और नदी से ही कह रहे हैं कि पात्र दे दे! 

नदी पानी दे सकती है, पात्र आपके पास होना चाहिए। परमात्मा से लोग पात्र मांग रहे हैं। पात्र तो आपको होना है।

Thursday, December 8, 2022

परम गुरु हुज़ूर महाराज का भण्डारा मनाए जाने के संबंध में परामर्श - दिसम्बर, 2022


            परम गुरु हुज़ूर महाराज का भंडारा भारत व विदेशों की विभिन्न ब्रांचों में रविवार, 25 दिसम्बर, 2022 को दोपहर बाद के सत्र में खेतों में (सुपरवाइज़्ड वीडियो ट्रांस्मिशन के साथ) मनाया जाएगा। दयालबाग़ में भंडारा सप्ताह 23.12.2022 से 27.12.2022 तक मनाया जाएगा।

            1. अनुमति प्राप्त क्षेत्रों के सभी सतसंगी तथा रजिस्टर्ड जिज्ञासु (बायोमेट्रिक कार्ड तथा UID के साथ) जो शारीरिक रूप से स्वस्थ तथा खाँसी, ज़ुकाम व बुख़ार के लक्षणों से रहित हैं तथा मॉडर्न मेडिसन के रजिस्टर्ड डॉक्टर तथा/या आयुष (रजिस्ट्रेशन नम्बर के साथ) द्वारा प्रमाणित हैं और इसके अतिरिक्त सरन आश्रम हॉस्पिटल द्वारा जिनकी जाँच कर ली गई है, वे 25 दिसम्बर, 2022 के भंडारे के अवसर पर दयालबाग़ में सेवा के लिए आ सकते हैं। खाँसी, ज़ुकाम व बुख़ार के लक्षण वाले लोग दयालबाग़ में बिल्कुल नहीं आएंगे। (जैसा कि सभा द्वारा जारी किए गए पत्र दिनांक 18.04.2022 में परामर्श दिया गया है कि यदि कोई भी इन लक्षणों से पीड़ित पाया गया तो उसे तत्काल वापस भेज दिया जाएगा तथा उस ब्रांच विशेष के सभी सतसंगियों को अग्रिम आदेश तक दयालबाग़ आने से वंचित कर दिया जाएगा)।

            यात्रा से पूर्व, यात्रा के दौरान तथा यात्रा के बाद वे सभी सावधानियों जैसे- मास्क व हैलमेट का प्रयोग तथा हाथों की सफ़ाई व सामाजिक दूरी के मानकों का पालन करेंगे। वे अपना ब्रांच का पहचान कार्ड अवश्य लेकर आएँ अन्यथा उन्हें दयालबाग़ में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

            2. दिसम्बर, 2022 के भंडारे में शामिल होने वाले अनुमति प्राप्त सतसंगी तथा रजिस्टर्ड जिज्ञासु - (a) दिल्ली, महाराष्ट्र व गुजरात राधास्वामी सतसंग एसोसिएशन, शिमला डिस्ट्रिक्ट सतसंग एसोसिएशन, दयालबाग़ राधास्वामी सतसंग एसोसिएशन ऑफ़ ऑस्ट्रेलेशिया (DRSA): (b) दयालबाग़ निवासी/ सभा मेम्बर्स/ सभा और सोसायटीज़ के कर्मचारी/ सेवक/ पार्ट-टाइम सेवक-उनके पति/पत्नी और बच्चे (पति/पत्नी के साथ) व उनके आश्रित बच्चे: (c) पवित्र कुल के सदस्य: (d) रीजनल प्रेसीडेन्ट्स अपने पति/पत्नी के साथ तथा रीजनल सेक्रेटरीज़ केवल/अकेले, को दयालबाग़ में भंडारे में शामिल होने की अनुमति है।

            3. इस अवसर पर दयालबाग़ उत्पादों की प्रदर्शनी दयालबाग़ में आयोजित नहीं की जाएगी।

            4. जो लोग नियमित रूप से दयाल भंडार से भोजन लेते हैं तथा जो सतसंगी/ जिज्ञासु व उनके परिवार के सदस्य दयालबाग़ में भंडारे में शामिल होने के लिए आयेंगे उन्हें छोड़कर, दयालबाग़ निवासी व अन्य लोगों को दयाल भंडार से भोजन नहीं दिया जाएगा। दयालबाग़ निवासी जो दयाल भंडार से नियमित रूप से भोजन नहीं लेते हैं तथा अन्य सभी, को परामर्श दिया जाता है कि वे भंडारे का भोजन अपने-अपने घर से बना कर लायें।

(क्रमशः)

 

कलियुग केवल नाम अधारा,सुमिर-सुमिर नर उतरहिं पारा.....

 


प्रस्तुति -  रेणु दत्ता / आशा सिन्हा 



भगवान के नाम का तो इतना अवर्णनीय महत्व है जो सभी युगों के लिए है पर यहाँ एक प्रश्न उठता है कि कलियुग के लिए ही इसका महत्व क्यों बताया गया है? अन्य युगों में क्या और भी कोई आधार था?


 एक बार कुछ मुनि मिलकर विचार करने लगे कि किस समय में थोड़ा सा पुण्य भी महान फल देता है और कौन उसका सुखपूर्वक अनुष्ठान कर सकते हैं?


 वे जब कोई निर्णय नहीं कर सके,तब निर्णय के लिए मुनि व्यास के पास पहुंचे। व्यासजी उस समय गंगाजी में स्नान कर रहे थे। मुनि मंडली उनकी प्रतीक्षा में गंगाजी के तट पर स्थित एक वृक्ष के पास बैठ गयी……। 


वृक्ष के पास बैठे मुनियों ने देखा कि व्यासजी गंगा में डुबकी लगाकर जल से ऊपर उठे और “शूद्रः साधुः“,”कलिः साधुः” पढ़कर उन्होंने पुनः डुबकी लगायी…। । जल से ऊपर उठकर ‘योषितः साधु धन्यास्ताभ्यो धन्यरो स्ति कः ‘ कहकर उन्होंने पुनः डुबकी लगायी…। मुनिगण इसे सुनकर संदेह में पड़ गए। व्यासजी द्वारा कहे गए मन्त्र नदी स्नान-काल में पढ़े जानेवाले मंत्रो में से नहीं थे,वो जो कह रहे थे उसका अर्थ है ‘कलियुग प्रशंसनीय है,शूद्र साधु है,स्त्रियाँ श्रेष्ठ हैं,वे ही धन्य हैं,उनसे अधिक धन्य और कौन है!!!’ 


मुनिगण संदेह के समाधान हेतु आये थे,परन्तु यह सुनकर वे पहले से भी विकट संदेह में पड़ गए और जिज्ञासा से एक दुसरे को देखने लगे……कुछ देर बाद स्नान कर लेने पर नित्यकर्म से निवृत्त होकर व्यासजी जब आश्रम में आये,तब मुनिगण भी उनके समीप पहुंचे।


 वे सब जब यथायोग्य अभिवादन आदि के अनंतर आसनों पर बैठ गए तब व्यासजी ने उनसे आगमन का उद्देश्य पूछा। मुनियों ने कहा कि हमलोग आपसे एक संदेह का समाधान कराने आये थे,किन्तु इस समय उसे रहने दिया जाए,केवल हमें संभव हो तो यह बतलाया जाए कि आपने स्नान करते समय कई बार कहा था कि ‘कलियुग प्रशंसनीय है,शूद्र साधु है,स्त्रियाँ श्रेष्ठ हैं,वे ही धन्य हैं,सो बात क्या है? 


हमें कृपा करके बताएं। यह जान लेने के बाद हम जिस आतंरिक संदेह के समाधान के लिए आये थे,उसे कहेंगे।


व्यासजी उनकी बातें सुनकर बोले कि मैंने कलियुग,शूद्र और स्त्रियों को जो बार बार साधु,श्रेष्ठ कहा,आपलोग सुनें। जो फल सतयुग में दस वर्ष ब्रह्मचर्य आदि का पालन करने से मिलता है,उसे मनुष्य त्रेता में एक वर्ष,द्वापर में एक मास और कलियुग में सिर्फ एक दिन में प्राप्त कर लेता है…।


 जो फल सतयुग में ध्यान,त्रेता में यज्ञ और द्वापर में देवार्चन करने से प्राप्त होता है,वही कलियुग में सिर्फ इश्वर का नाम-कीर्तन करने से मिल जाता है। कलियुग में थोड़े से परिश्रम से ही लोगों को महान धर्म की प्राप्ति हो जाती है,इन कारणों से मैंने कलियुग को श्रेष्ठ कहा।"


"शास्त्रों में लिखा है कि कलियुग में भगवान का अवतरण होता है 'नाम' के रूप में। कलियुग में जो युग-धर्म है वह है नाम संकीर्तन। भगवान चैतन्य महाप्रभु ने भी कहा है कि कलियुग में केवल हरिनाम ही हमारा उद्धार कर सकता है। इसके अलावा किसी भी अन्य साधना से सद्गति नहीं है। यही बात नानक देव ने भी कही है, 'नानक दुखिया सब संसार, ओही सुखिया जो नामाधार।' 


रामचरितमानस में भी यही लिखा है, कागभुशुण्डि जी गरूड़जी को नाम का महत्व बता रहे हैं,


* एहिं कलिकाल न साधन दूजा। जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा॥

रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि। संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि॥


भावार्थ:-(तुलसीदासजी कहते हैं-) इस कलिकाल में योग, यज्ञ, जप, तप, व्रत और पूजन आदि कोई दूसरा साधन नहीं है। बस, श्री रामजी का ही स्मरण करना, श्री रामजी का ही गुण गाना और निरंतर श्री रामजी के ही गुणसमूहों को सुनना चाहिए॥


  किसी भी संत के पास चले जाओ, किसी भी शास्त्र को उठाओ, सब यही इंगित करते हैं कि कलियुग में भगवान का अवतरण उनके नाम के रूप में हुआ है। इसी से उद्धार होगा।


यहां पर मैं एक बात कहना चाहूंगा कि यह भगवद् नाम अन्य भौतिक नामों की तरह जड़ नहीं है। भौतिक जगत में हम देख सकते हैं कि एक व्यक्ति का नाम लक्ष्मीपति है परंतु वह है एक भिखारी। अथवा नयनमणि नाम वाला व्यक्ति एक आँख से काना है। किंतु भगवद् राज्य में ऐसा नहीं होता। लक्ष्मीपति भगवान वास्तव में लक्ष्मी के पति ही हैं व सबसे धनी हैं। गोविंद सभी इंदियों के स्वामी हैं व इंदियां उनकी सेवा में नियुक्त हैं। कृष्ण नाम जिनका है, वे वास्तव में सभी को आकषिर्त करने वाले हैं।


भगवद् नाम हमारी दुष्टों से रक्षा करेगा, हमें इस भव सागर से पार कराएगा, हमें हमारी इच्छानुसार वरदान देगा। वह सब कुछ करेगा, किंतु इसके लिए हमें पूर्ण रूप से समपिर्त होकर नाम कीर्तन करना होगा। यह तभी होगा। आखिर दौपदी ने वस्त्र हरण के समय जब तक पूर्ण शरणागत होकर दोनों हाथ उठा कर भगवान को नहीं पुकारा था, तब तक भगवान नहीं आए थे।"


"एक बार राजा परीक्षित जंगल से गुजर रहे थे तो उन्होंने एक बैल को एक टांग पर खड़ा देखा। जब राजा ने बैल से पूछा तो उसने कुछ स्पष्ट नहीं बताया क्योंकि वे और कोई और नहीं बल्कि स्वयं साक्षात् धर्मराज और धर्मराज कैसे किसी निंदा कर सकते थे? 


तब परीक्षित ने ध्यान बल से पता लगाया कि इनकी ऐसी दशा का जिम्मेदार कलियुग है। राजा ने सोचा कि कलियुग के आने पर संसार में चारों तरफ लूट-पट चोरी डकैती आदि नाना प्रकार के पापकर्मों की वृद्धि हो जायेगी अतः इस कलियुग का अंत कर देना चाहिए। 


जब उन्होंने कलियुग का अंत करने का पूरा मानस बना लिया था तभी उनके मन में एक विचार आया, जिसके कारण उन्होंने कलियुग का अंत करने का विचार त्याग दिया। उन्होंने सोचा कि कलियुग में सभी प्रकार की बुराइयां हैं, लेकिन इस में एक बहुत बड़ी अच्छाई भी है जिसका लाभ कलियुग में सबको प्राप्त होगा और वो वह है कि कलियुग में ईश्वर की प्राप्ति के लिए लोगों को बड़े-बड़े यज्ञ नहीं करने पड़ेंगे। 


सालों-साल तक तपस्या नहीं करनी पड़ेगी केवल एक बार सच्चे मन से जो व्यक्ति एक बार ईश्वर के नाम का उच्चारण करेगा और ईश्वर को याद करेगा बस उसे ही ईश्वर की प्राप्ति हो जायेगी। यह सोचकर उन्होंने उस समय कलियुग पर केवल पूर्णतया नियंत्रण कर लिया लेकिन उसका वध नहीं किया। इसी का उल्लेख तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में किया है -


* सुनु ब्यालारि काल कलि मल अवगुन आगार।

गुनउ बहुत कलिजुग कर बिनु प्रयास निस्तार॥


भावार्थ:-हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! सुनिए, कलिकाल पाप और अवगुणों का घर है, किंतु कलियुग में एक गुण भी बड़ा है कि उसमें बिना ही परिश्रम भवबंधन से छुटकारा मिल जाता है॥


* कृतजुग त्रेताँ द्वापर पूजा मख अरु जोग।

जो गति होइ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग॥


भावार्थ:-सत्ययुग, त्रेता और द्वापर में जो गति पूजा, यज्ञ और योग से प्राप्त होती है, वही गति कलियुग में लोग केवल भगवान्‌ के नाम से पा जाते हैं॥


* कृतजुग सब जोगी बिग्यानी। करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी॥

त्रेताँ बिबिध जग्य नर करहीं। प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं॥


भावार्थ:-सत्ययुग में सब योगी और विज्ञानी होते हैं। हरि का ध्यान करके सब प्राणी भवसागर से तर जाते हैं। त्रेता में मनुष्य अनेक प्रकार के यज्ञ करते हैं और सब कर्मों को प्रभु को समर्पण करके भवसागर से पार हो जाते हैं॥


* द्वापर करि रघुपति पद पूजा। नर भव तरहिं उपाय न दूजा॥

कलिजुग केवल हरि गुन गाहा। गावत नर पावहिं भव थाहा॥


भावार्थ:-द्वापर में श्री रघुनाथजी के चरणों की पूजा करके मनुष्य संसार से तर जाते हैं, दूसरा कोई उपाय नहीं है और कलियुग में तो केवल श्री हरि की गुणगाथाओं का गान करने से ही मनुष्य भवसागर की थाह पा जाते हैं॥


* कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना। एक अधार राम गुन गाना॥

सब भरोस तजि जो भज रामहि। प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि॥


भावार्थ:-कलियुग में न तो योग और यज्ञ है और न ज्ञान ही है। श्री रामजी का गुणगान ही एकमात्र आधार है। अतएव सारे भरोसे त्यागकर जो श्री रामजी को भजता है और प्रेमसहित उनके गुणसमूहों को गाता है,॥


Thursday, December 1, 2022

धर्मराज की गद्दी "_*

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*_“एक दिन के लिए- "धर्मराज की गद्दी "_*

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_एक हाथी था,वह मर गया तो धर्मराज के यहाँ पहुँचा। धर्मराज ने उससे पूछा- ‘अरे! तुझे इतना बड़ा शरीर दिया, फिर भी तू मनुष्य के वश में हो गया! तेरे एक पैर जितना था मनुष्य,उसके वश में तू हो गया!’_

            _वह हाथी बोला- ‘महाराज! यह मनुष्य ऐसा ही है।_

    _बड़े-बड़े इसके वश में हो जाते हैं!_

     _धर्मराज ने कहा-‘हमारे यहाँ तो अनगिनत आदमी आते हैं!’_

            _हाथी ने जवाब दिया-‘आपके यहाँ मुर्दे आते हैं, जो जीवित आदमी आये तो पता लगे!_ 

 _धर्मराज ने दूतों से कहा- *‘अरे! एक जीवित आदमी ले आओ!* दूतों ने कहा-‘ठीक है’।_

         _दूत घूमते ही रहते थे। गर्मी के दिनों में उन्होंने देखा कि छत के ऊपर एक आदमी सोया हुआ है। दूतों ने उसकी खाट उठा ली,और ले चले।_

       _उस आदमीं की नींद खुली तो देखा कि क्या बात है! वह कायस्थ था। ग्रन्थ लिखा करता था। ग्रंथो में धर्मराज के दूतों के लक्षण आते हैं। उसने जेब से कागज और कलम निकली। कागज पर कुछ लिखा और जेब में रख लिया। उसने सोचा कि हम कुछ चीं-चपड़ करेंगे तो गिर जायेंगें, हड्डियाँ बिखर जायँगी! वह बेचारा खाट पर पड़ा रहा कि जो होगा, देखा जायगा।_


     _सुबह होते ही दूत पहुँच गये। धर्मराज की सभा लगी हुई थी। दूतों ने खाट नीचे रखी। उस कायस्थ ने तुरन्त जेब से कागज निकाला और दूतों को दे दिया कि धर्मराज को दे दो-उस पर विष्णु भगवान् का नाम लिखा था। दूतों ने यह कागज धर्मराज को दे दिया। धर्मराज ने पत्र पढ़ा- उसमें लिखा था- ‘धर्मराज जी से नारायण की यथायोग्य! यह हमारा मुनीम आपके पास आता है  इसके द्वारा ही सब काम कराना-  दस्तखत।_


*_नारायण, वैकुण्ठपुरी_*


_*पत्र पढ़कर- धर्मराज ने अपनी गद्दी छोड़ दी और बोले:* ‘आइये महाराज! गद्दी पर बैठो। धर्मराज ने कायस्थ को गद्दी पर बैठा दिया-कि भगवान् का हुक्म है।_

   _अब दूत दूसरे आदमी को लाये। कायस्थ बोला- ‘यह कौन है.....?’ दूत-महाराज! यह डाका डालने वाला है  बहुतों को लूट लिया,बहुतों को मार दिया| इसको क्या दण्ड दिया जाय?’_ _*कायस्थ:-‘* इसको वैकुण्ठ में भेजो।_


*_‘यह कौन है,,,,?’_*


_‘महाराज! यह दूध बेचने वाली है। इसने पानी मिलाकर दूध बेचा जिससे बच्चों के पेट बढ़ गये,वे बीमार हो गये| इसका क्या करें?’_

     _‘इसको भी वैकुण्ठ में भेजो।’ ‘यह कौन है?_

          _‘इसने झूठी गवाही देकर बेचारे लोगों को फँसा दिया। इसका क्या किया जाय?’_

_‘अरे, पूछते क्या हो? वैकुण्ठ में भेजो।_

       _*अब तो व्यभिचारी आये,पापी आये,हिंसा करने वाला आये, कोई भी आये,उसके लिए एक ही आज्ञा कि ‘वैकुण्ठ में भेजो।’* अब धर्मराज क्या करें? गद्दी पर बैठा मालिक जो कह रहा है,वही ठीक! उधर वैकुण्ठ में जाने वालों की कतार लग गयी।_     

             _भगवान् ने देखा कि अरे......! इतने लोग यहाँ कैसे आ रहे हैं...? कहीं मृत्युलोक में कोई महात्मा प्रकट हो गये क्या....?_

      _बात क्या है,जो सभी को बैकुण्ठ में भेज रहे हैं? कहाँ से आ रहे हैं? देखा कि ये तो धर्मराज के यहाँ से आ रहे हैं।_

      _भगवान् धर्मराज के यहाँ पहुँचे। भगवान् को देखकर सब खड़े हो गये।_

         _धर्मराज भी खड़े हो गये।_

       _वह कायस्थ भी खड़ा हो गया।_

 _*भगवान् ने पूछा:* धर्मराज! आपने सबको वैकुण्ठ भेज दिया,बात क्या है? क्या इतने लोग भक्त हो गये?’_

_*धर्मराज बोले:* -‘प्रभो! मेरा काम नहीं है। आपने जो *मुनीम* भेजा है,उसका काम है।’_

     _*भगवान् ने कायस्थ से पूछा-‘* तुम्हें किसने भेजा यहाँ. ....?’_

               _*कायस्थ:-‘* आपने महाराज!’_

_*‘हमने कैसे भेजा?’*_

_‘क्या मेरे बाप के हाथ की बात है- जो मैं यहाँ आता? आपने ही तो भेजा है। *आपकी मर्जी के बिना कोई काम होता है भला?* क्या यह मेरे तपोबल से हुआ है..... ?’_

        _‘ठीक है!,पर तूने यह क्या किया?’_

         _‘मैंने क्या किया महाराज?’_


_‘तूने सबको वैकुण्ठ में भेज दिया!’_

    _‘यदि वैकुण्ठ में भेजना खराब काम है! तो जितने *संत-महात्मा हैं,उनको दण्ड* दिया जाय! यदि यह *खराब* काम नहीं है- तो फिर *उलाहना* किस बात की?_

       _इस पर भी आपको यह पसंद न हो तो सब को वापस भेज दो।_

        _परन्तु भगवद्गीता में लिखा यह श्लोक आपको निकालना पड़ेगा- *‘यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परम मम’* अर्थात एक बार ‘मेरे धाम में आकर , फिर पीछे लौटकर कोई नहीं आता।_


_‘बात तो ठीक है। कितना ही बड़ा पापी हो,यदि वह वैकुण्ठ में चला जाए-तो पीछे लौटकर थोड़े ही आयेगा! उसके पाप तो सब नष्ट हो गये। पर यह काम तूने क्यों किया?’_

            _‘मैंने क्या किया महाराज..? मेरे हाथ में जब कोई अधिकार आयेगा- तो मैं यही करूँगा,सबको वैकुण्ठ भेजूँगा। मैं किसी को दण्ड क्यों दूँ? मै जानता हूँ- कि थोड़ी देर देने के लिए गद्दी मिली है,तो फिर अच्छा काम क्यों न करूँ? लोगों का उद्धार करना खराब काम है क्या प्रभु....!?’_


_भगवान् ने धर्मराज से पूछा-‘धर्मराज! तुमने इसको गद्दी कैसे दे दी?_


_*धर्मराज बोले:* -‘महाराज! देखिये,आपका कागज आया है। नीचे साफ-साफ *आपके दस्तखत* हैं।_

_*भगवान् ने कायस्थ से पूछा-‘* क्यों रे....!, ये कागज मैंने कब दिया तेरे को....?’_

         _*कायस्थ बोला:‘* आपने गीता में कहा है:~ *‘'सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः’‘* मै सबके हृदय में रहता हूँ। अतः हृदय से आज्ञा आयी कि कागज लिख दे- तो मैंने लिख दिया। हुक्म तो आपका ही हुआ ना....? यदि आप इसको मेरा मानते हैं: तो गीता में से *उपर्युक्त बात निकाल दीजिये!’*_


_*भगवान् ने कहा-‘* ठीक है!’ और फिर धर्मराज से पूछा- *‘अरे धर्मराज!* बात क्या है? यह मनुष्य जीवित कैसे आया?’_


_*धर्मराज बोले:-‘* महाराज! कैसे क्या आया, आपका पुत्र ले आया!’ दूतों से पूछा-‘यह जीवित मनुष्य ऊपर कैसे आया?’_

                _*दूत बोले:-‘* महाराज! आपने ही तो एक दिन कहा था- कि प्रथ्वी-लोक से,एक जीवित आदमी लाना है।_


_*धर्मराज:*-‘तो वह यही है क्या? अरे,परिचय तो कराते!’_


_*दूत:-‘* हम क्या परिचय कराते महाराज! आपने तो कागज लिया-और इसको सीधे गद्दी पर बैठा दिया। हमने सोचा कि इनसे आपका पहले से-परिचय होगा। फिर भला हमारी हिम्मत कैसे होती आपसे बोलने की?’_

        _हाथी वहाँ खड़ा सब देख रहा था,वो यमराज जी से बोला: *‘जै रामजी की!* आपने कहा था- कि तू कैसे आदमी के वश में हो गया....?_

     _मैं क्या वश में हो गया?यहाँ तो वश में धर्मराज जी क्या....? साक्षात भगवान नारायण भी आदमी के वश में हो गए!_

    _यह काले माथेवाला आदमी ना बड़ा विचित्र है- महाराज! यह चाहे तो बड़ी उथल-पुथल कर दे! यह तो खुद ही संसार में फँस गया।_

    _*'तभी अचानक भगवान् ने कहा:'* अच्छा, जो हुआ सो हुआ,अब तो नीचे चला जा।_

        _*कायस्थ बोला:-‘* गीता में आपने कहा है- *‘मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते’* ‘मेरे को प्राप्त होकर पुनः जन्म नहीं लेता’ तो बतायें, मैं आपको प्राप्त हुआ कि नहीं?_

    *_भगवान्-‘अछ भाई, तू चल मेरे साथ।’_*


_*पुनः कायस्थ बोला:‘* महाराज! केवल मैं ही चलूँ.....? हाथी पीछे रहेगा बेचारा....? इसकी कृपा से ही तो मैं यहाँ आया। इसको भी तो लो! साथ में!’_

              _*हाथी बोला: ‘* मेरे बहुत-से भाई यहीं नरकों में बैठे हैं, उनको भी साथ ले लो।_

          _*भगवान् बोले-‘* चलो भाई, सबको ले लो!’ भगवान् के आने से हाथी का भी कल्याण हो गया, कायस्थ का भी कल्याण हो गया और अन्य जीवों का भी कल्याण हो गया!_

            _यह कहानी तो *कल्पित* है, पर इसका *सिद्धांत* पक्का है-कि अपने हाथ में कोई अधिकार आये- तो सबका भला करो। जितना कर सको,उतना भला करो। अपनी तरफ से किसी का बुरा मत करो,किसी को दुःख मत दो- गीता का सिद्धांत है- *‘सर्वभूतहिते रताः’* अर्थात ‘प्राणिमात्र के हित में प्रीति हो"।अधिकार हो,या पद-प्रतिष्ठा हो,थोड़े ही दिन रहने वाला है। सदा रहने वाला नहीं है। इसलिये सबके साथ अच्छे- से- अच्छा बर्ताव करो।_

*_🌸🌷 जय श्री राधे 🌷🌸_*

*_🪴🌷।।सीताराम।। 🌷🪴_*

(((((((( दान का भाव ))))))))))

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एक शिव मंदिर के पुजारी जी को भोले नाथ ने सपने में दर्शन दिए औऱ कहा कि कल सुबह नगर के सभी भक्तों, विद्वानों, दान-पुण्य करने वालों और साधु-महात्माओं को मंदिर में जमा करो।


पुजारी ने शहर में मुनादी करा दी कि महादेव का ऐसा आदेश है. शहर के सारे गणमान्य लोग अगली सुबह मंदिर पहुंचे.


पूजा-अर्चना हुई और पुजारी जी ने विस्तार से स्वप्न बताया तभी मंदिर में एक अद्भुत तेज प्रकाश हुआ. लोगों की आंखें चौंधिया गईं.


जब प्रकाश कम हुआ तो लोगों ने देखा कि शिवलिंग के पास एक रत्नजड़ित सोने का पात्र है. उसके रत्नों में दिव्य प्रकाश की चमक थी. उस पर लिखा था कि सबसे बड़े दयालु और पुण्यात्मा के लिए यह उपहार है.


पुजारी जी ने वह पात्र सबको दिखाया. वह बोले-प्रत्येक सोमवार को यहां विद्वानों की सभा होगी. जो स्वयं को सबसे बड़ा धर्मात्मा सिद्ध कर देगा, यह स्वर्णपात्र उसका होगा.


देश भर में चारों ओर यह समाचार फैल गया. दूर-दूर से तपस्वी, त्यागी, व्रती, दान-पुण्य करने वाले लोग काशी आने लगे.


एक तपस्वी ने कई महीने लगातार चन्द्रायण व्रत किया था. वह उस स्वर्ण पात्र को लेने आए. जब स्वर्ण पात्र उन्हें दिया गया, उनके हाथ में जाते ही वह मिट्टी का हो गया. उसकी ज्योति नष्ट हो गई.


लज्जित होकर उन्होंने स्वर्ण पात्र लौटा दिया. पुजारी के हाथ में जाते ही वह फिर सोने का हो गया और रत्न चमकने लगे.


एक धर्मात्मा ने बहुत से विद्यालय बनवाये थे, कई सेवाश्रम चलाते थे। दान करते-करते उन्होंने काफी धन खर्च कर दिया था. बहुत सी संस्थाओं को दान देते थे.


अखबारों में नाम छपता था. वह भी स्वर्ण पात्र लेने आए किन्तु उनके हाथ में भी जाकर मिट्टी का हो गया.


पुजारी ने कहा- ऐसा लगता है कि आप पद, मान या यश के लोभ से दान करते जान पड़ते हैं. नाम की इच्छा से होने वाला दान सच्चा दान नहीं है.


इसी प्रकार बहुत से लोग आए, किन्तु कोई भी स्वर्ण पात्र पा नहीं सका. सबके हाथों में वह मिट्टी का हो जाता था.


कई महीने बीत गए. बहुत से लोग स्वर्ण पात्र पाने के लोभ से भगवान के मंदिर के आस पास ही ज्यादा दान-पुण्य करने लगे.


लालच की पट्टी पड़ गई थी और मूर्खता वश यह सोचने लगे कि शायद मंदिर के पास का दान प्रभु की नजरों में आए. स्वर्ण पात्र उन्हें भी नहीं मिला.


एक दिन एक बूढ़ा किसान भोले नाथ के दर्शन को आया. उसे इस पात्र की बात पता भी न थी. गरीब देहाती किसान था तो कपड़े भी मैले और फटे थे.उसके पास कपड़े में बंधा थोड़ा सत्तू और एक फटा कम्बल था.

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लोग मन्दिर के पास गरीबों को कपड़े और पूरी मिठाई बांट रहे थे; किन्तु एक कोढ़ी मन्दिर से दूर पड़ा कराह रहा था. उससे उठा नहीं जाता था. सारे शरीर में घाव थे. कोढ़ी भूखा था लेकिन उसकी ओर कोई देखता तक नहीं था.


किसान को कोढ़ी पर दया आ गयी. उसने अपना सत्तू उसे खाने को दे दिया और कम्बल उसे ओढ़ा दिया. फिर वह मन्दिर में दर्शन करने आया.


मन्दिर के पुजारी ने अब नियम बना लिया था कि सोमवार को जितने यात्री दर्शन करने आते थे, सबके हाथ में एक बार वह स्वर्ण पात्र जरूर रखते थे.


किसान जब दर्शन करके निकला तो उसके हाथ में भी स्वर्ण पात्र रख दिया. उसके हाथ में जाते ही स्वर्णपात्र में जड़े रत्न पहले से भी ज्यादा प्रकाश के साथ चमकने लगे. यह तो कमाल हो गया था. सब लोग बूढ़े व्यक्ति की प्रशंसा करने लगे.


पुजारी ने कहा- जो निर्लोभ है, दीनों पर दया करता है, जो बिना किसी स्वार्थ के दान करता है और दुखियों की सेवा करता है, वही सबसे बड़ा पुण्यात्मा है.


किसान तुमने अपने सामर्थ्य से अधिक दान किया है. इसलिए महादेव के इस उपहार के तुम अधिकारी हो.


दान का रहस्य निस्वार्थ दान में है. कभी ये न सोचे की मुझे इस दान से क्या लाभ प्राप्त होगा. दान करते समय अपने आप को उस परमात्मा का सेवक समझे.


हम अक्सर सोचते हैं कि यदि हम भी बहुत ज्यादा संपत्ति वाले होते तो इतना दान करते, अमुक पुण्य कर्म करते.


दान शीलता के भाव का संपत्ति से कोई सरोकार नहीं. यदि आपके मन में दान का भाव है तो सूखी रोटी में से एक टुकड़ा जरूरत मंद को देंगे.


आपने अरब पतियों को गरीब दुखियारे का हक डकारते हुए भी देखा हो. यही संचित कर्म तय करते हैं कि अगले जन्म में आपकी क्या गति होगी. पुण्य संचित करिए।

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पूज्य हुज़ूर का निर्देश

  कल 8-1-22 की शाम को खेतों के बाद जब Gracious Huzur, गाड़ी में बैठ कर performance statistics देख रहे थे, तो फरमाया कि maximum attendance सा...