Tuesday, August 30, 2022

सत्य की खोज / ओशो

 च्वांगत्सु चीन में हुआ, एक फकीर था। लोगों ने उसे हंसते ही देखा था, कभी उदास नहीं देखा था। एक दिन सुबह उठा और उदास बैठ गया झोपड़े के बाहर! उसके मित्र आये, उसके प्रियजन आये और पूछने लगे, आपको कभी उदास नहीं देखा। चाहे आकाश में कितनी ही घनघोर अंधेरी छायी हो और चाहे जीवन पर कितने ही दुखदायी बादल छाये हों, आपके होठों पर सदा मुस्कुराहट देखी है। आज आप उदास क्यों हैं? चिंतित क्यों हैं?


च्वांगत्सु कहने लगा, आज सचमुच एक ऐसी उलझन में पड़ गया हूं, जिसका कोई हल मुझे नहीं सूझता।


लोगों ने कहा, हम तो अपनी सब समस्याएं लेकर आपके पास आते हैं और सभी समस्याओं के समाधान हो जाते हैं। आपको भी कोई समस्या आ गयी! क्या है यह समस्या?


च्वांगत्सु ने कहा, बताऊंगा जरूर, लेकिन तुम भी हल न कर सकोगे। और मैं सोचता हूं कि शायद अब इस पूरे जीवन, वह हल नहीं हो सकेगी!

रात मैंने एक सपना देखा। उस सपने में मैंने देखा कि मैं एक बगीचे में तितली हो गया हूं और फूलों-फूलों पर उड़ता फिर रहा हूं।

लोगों ने कहा, इसमें ऐसी कौन सी बड़ी समस्या है? आदमी सपने में कुछ भी हो सकता है।


च्वांगत्सु ने कहा, मामला यही होता तो ठीक था। लेकिन जब मैं जागा तो मेरे मन में एक प्रश्न पैदा हो गया कि अगर च्वांगत्सु नाम का आदमी सपने में तितली हो सकता है तो कहीं ऐसा तो नहीं है कि तितली सो गयी हो और सपना देखती हो कि च्वांगत्सु हो गयी! मैं सुबह से परेशान हूं। अगर आदमी सपने में तितली हो सकता है तो तितली भी सपने में आदमी हो सकती है। और अब मैं तय नहीं कर पा रहा हूं कि मैं तितली हूं, जो सपना देख रही है आदमी होने का या कि मैं आदमी हूं, जिसने सपना देखा तितली होने का! और अब यह कौन तय करेगा? मैं बहुत मुश्किल में पड़ गया हूं।


शायद यह कभी तय नहीं हो सकेगा। च्वांगत्सु ठीक कहता है, जो हम बाहर देखते हैं, वह भी क्या एक खुली आंख का स्वप्न नहीं है? क्योंकि आंख बंद होते ही वह मिट जाता है और खो जाता है और विलीन हो जाता है। आंख बंद होते ही हम किसी दूसरी दुनिया में हो जाते हैं। और आंख खोलकर भी जो हम देखते हैं, उसका मूल्य सपने से ज्यादा मालूम नहीं होता।


आपने जिंदगी जी ली है--किसी ने पंद्रह वर्ष, किसी ने चालीस वर्ष,किसी ने पचास वर्ष। अगर आप लौटकर पीछे की तरफ देखें कि उन पचास वर्षों में जो भी हुआ था, वह सच में हुआ था या एक स्वप्न में हुआ था? तो क्या फर्क मालूम पड़ेगा? पीछे लौटकर देखने पर क्या फर्क मालूम पड़ेगा? जो भी था-- जो सम्मान मिला था, जो अपमान मिला था-- वह एक सपने में मिला था या सत्य में मिला था?


मरते क्षण आदमी को क्या फर्क मालूम पड़ता है? जो जिंदगी उसने जी थी, वह एक कहानी थी या जो उसने सपने में देखी थी, सच में ही वह जिंदगी में घटी थी।

इस जमीन पर कितने लोग रह चुके हैं हमसे पहले! हम जहां बैठे हैं, उसके कण-कण में न-मालूम कितने लोगों की मिट्टी समायी है, न मालूम कितने लोगों की राख है। पूरी जमीन एक बड़ा श्मशान है, जिसमें न जाने कितने अरबों-अरबों लोग रहे हैं और मिट चुके हैं। आज उनके होने और न होने से क्या फर्क पड़ता है? वे जब रहे होंगे,तब उन्हें जिंदगी मालूम पड़ी होगी कि बहुत सच्ची है। अब न जिंदगी रही उनकी, न वे रहे आज, सब मिट्टी में खो गये हैं।


आज हम जिंदा बैठे हैं, कल हम भी खो जायेंगे। आज से हजार वर्ष बाद हमारी राख पर लोगों के पैर चलेंगे। तो जो जिंदगी आखिर में राख हो जाती हो, उस जिंदगी के सच होने का कितना अर्थ है? जो जिंदगी अंततः खो जाती हो, उस जिंदगी का कितना मूल्य है?


नेति नेति (सत्य की खोज)

ओशो

Monday, August 29, 2022

❤️❤️कृष्ण 🙏🙏 / ओशो

 कृष्ण जैसे व्यक्ति किसी काम के लिए नहीं जीते।

निश्चित ही जिस रास्ते वे गुजरते हैं उस रास्ते पर अगर कांटे पड़े हों तो हटा देते हैं। यह भी उनके आनंद का हिस्सा है। लेकिन कृष्ण उस रास्ते से कांटों को हटाने के लिए नहीं निकले थे। निकले थे और कांटे पड़े थे तो वे हटा दिए हैं।

जिंदगी हमारे हाथों में है। और कृष्ण जैसे लोगों के तो बिलकुल हाथों में है। वे जैसे जीना चाहते हैं, वैसा ही जीते हैं। न कोई समाज, न कोई परिस्थिति, न कोई बाहरी दबाव उसमें कोई फर्क ला पाता है। उनका होना अपना होना है।

कृष्ण कहते हैं कि जब-जब धर्म की हानि होती है, तब तब मैं आऊंगा।

यह वही व्यक्ति कह सकता है, जो परम स्वतंत्र हो। आप तो नहीं कह सकते कि जब-जब ऐसा होगा, मैं आऊंगा। आप यह भी नहीं कह सकते कि अगर ऐसा नहीं होगा तो मैं नहीं आऊंगा। हमारा आना बंधा हुआ आना है। लंबे कर्मों का बंधन है हमारा।

कृष्ण भलीभांति जानते हैं कि मारने से कुछ मरता नहीं। दुष्ट का अंत तभी होता है जब उसे साधु बनाया जा सके, और कोई उपाय नहीं। मारने से दुष्ट का अंत नहीं होता। इससे सिर्फ दुष्ट का शरीर बदल जाएगा, और कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। दुष्ट का अंत एक ही स्थिति में होता है, जब वह साधु हो जाए।

समस्त जीवन का नाम विष्णु है।

विष्णु के अवतार का मतलब यह नहीं है कि विष्णु नाम के व्यक्ति राम में हुए, फिर कृष्ण में हुए, फिर किसी और में हुए। नहीं, विष्णु नाम की ऊर्जा राम में उतरी, कृष्ण में उतरी, सब में उतरती है, उतरती रहेगी।

शंकर नाम की ऊर्जा है, उसे विदा देती रहेगी।

कृष्ण के ओंठों पर बांसुरी संभव हो सकी, क्योंकि वह लंबी धारा में अपने को छोड़े हुए आदमी हैं।

नदी जहां ले जाती है, जाने को राजी हैं।

अगर मथुरा के घाट से छूट गया सब तो द्वारका में घाट बन जाएगा, हर्ज क्या है? 

अनाग्रहशील व्यक्तित्व का वह लक्षण है।


#कृष्ण_जन्माष्टमी_की_शुभकामनाएं🙏

ढाई अक्षर

 "पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय ढाई अक्षर प्रेम के, पढ़े सो पंडित होय"

प्रस्तुति - रेणु दत्ता / आशा सिन्हा



अब पता लगा है कि, ढाई अक्षर है क्या..?


तब से मन शांत हो गया ढाई अक्षर के ब्रह्मा

 और, ढाई अक्षर की सृष्टि..ढाई अक्षर के विष्णु और, ढाई अक्षर की लक्ष्मी

ढाई अक्षर की दुर्गा और, ढाई अक्षर की शक्ति

 ढाई अक्षर की श्रद्धा और, ढाई अक्षर की भक्ति

 ढाई अक्षर का त्याग

और, ढाई अक्षर का ध्यान

ढाई अक्षर की इच्छा और, ढाई अक्षर की तुष्टि ढाई अक्षर का धर्म और, ढाई अक्षर का कर्म ढाई अक्षर का भाग्य और, ढाई अक्षर की व्यथा

ढाई अक्षर का ग्रन्थ

और, ढाई अक्षर का सन्त

ढाई अक्षर का शब्द और, ढाई अक्षर का अर्थ

 ढाई अक्षर का सत्य और, ढाई अक्षर की मिथ्या

 ढाई अक्षर की श्रुति और, ढाई अक्षर की ध्वनि

 ढाई अक्षर की अग्नि और, ढाई अक्षर का कुण्ड

 ढाई अक्षर का मन्त्र और, ढाई अक्षर का यन्त्र

 ढाई अक्षर की श्वांस

 और, ढाई अक्षर के प्राण

 ढाई अक्षर का जन्म और, ढाई अक्षर की मृत्यु

 ढाई अक्षर की अस्थि और, ढाई अक्षर की अर्थी

 ढाई अक्षर का प्यार और, ढाई अक्षर का युद्ध ढाई अक्षर का मित्र और, ढाई अक्षर का शत्रु

 ढाई अक्षर का प्रेम और, ढाई अक्षर की घृणा

 जन्म से लेकर मृत्यु तक

 हम, बंधे हैं ढाई अक्षर में

हैं ढाई अक्षर ही वक़्त में और, ढाई अक्षर ही अन्त में..

समझ न पाया कोई भी,

है रहस्य क्या ढाई अक्षर में

महापुरुषों की गूढ़

रहस्यों से भरी भाषा को

शत-शत नमन जय श्री राम

✨🌱🚩🕉🐦🙏💗🔥🔱

❤️❤️🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏❤️❤️❤️❤️


#साभार

Sunday, August 28, 2022

राग से नहीं अनुराग से गायन


प्रस्तुति -  रेणु दत्ता / आशा सिन्हा


*मीराबाई कृष्णप्रेम में डूबी, पद गा रही थी , एक संगीतज्ञ को लगा कि वह सही राग में नहीं गा रही है!*


*वह टोकते हुये बोले: "मीरा, तुम राग में नहीं गा रही हो।*


*मीरा ने बहुत सुन्दर उत्तर दिया: "मैं राग में नहीं, अनुराग में गा रही हूँ।*

*राग में गाउंगी तो दुनियां मुझे सुनेगी*


*अनुराग में गाउंगी तो मेरा कान्हा मुझे सुनेगा।*

*मैं दुनियां को नही, अपने श्याम को रिझाने के लिये गाती हूँ।*

*रिश्ता होने से रिश्ता नहीं बनता,*

*रिश्ता निभाने से रिश्ता बनता है।*

*"दिमाग" से बनाये हुए "रिश्ते"*

*बाजार तक चलते है,,,!*

*"और "दिल" से बनाये "रिश्ते"*

*आखरी सांस तक चलते है,*.

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏


❤️❤️❤️❤️❤️❤️

Friday, August 26, 2022

दरस पाय नित मगन रहूँ।

 रा धा स्व आ मी!

                                 

 08/22-आज सुबह सतसंग में पढ़ा जाने वाला दूसरा शब्द पाठ:-                                                        


 8।।                                                             

  दरस पाय नित मगन रहूँ।

मेरे यही अभिलाषा हो॥२॥                                                               

प्रेम रंग भीजत रहँ।

😄 नित तुमहिं घियाता हो।।३॥                                                               

 मेरे सर्व अंग में बसि रहो।

 नित तुम गुन गाता हो॥४॥                                                           

।    माया के सब बिधन हटाओ।

काल रहे मुरझाता हो॥५॥                                                                  मन इंद्री का ज़ोर न चाले। नित्त रहूँ रँग राता हो॥६॥                                                               भोग बिलास जगत के सारे। मोको कुछ न सुहाता हो॥७॥                                                                 यह बख़्शिश करो रा धा स्व आ मी प्यारे। अब क्यों देर लगाता हो॥८॥                              *◆◆26-08-22-कल से आगे।◆◆                                           देर देर में होत अकाजा। योंहि दिन बीते जाता हो॥९॥                                                                 यह बिनती मानो मेरे प्यारे। रा धा स्व आ मी पित और माता हो।।१०॥                                                                 प्रेम दात बिन सुनो मेरे प्यारे। यह मन नाच नचाता हो॥११॥                                                                मेरा बस यासे नहिं चाले। भोगन में मदमाता हो॥१२॥                                                                दया करो मेरी मुरत चढ़ाओ। घट में शब्द बजाता हो॥१३॥                                                                जो तुम दया करो मेरे प्यारे। फला अँग न समाता हो॥१४॥                                                                नाम तुम्हार सुनाऊँ सबको। जग में धूम मचाता हो॥१५॥                                                                बल बल जाउँ चरन पर तुम्हरे। छिन छिन तुम्हें रिझाता हो॥१६॥                                                                 खुल खुल खेलूँ मुन में प्यारे। काटूँ करम विधाता हो॥१७॥                                                                खेलूँ बिगसूँ संग तुम्हारे। दया पाय इतराता हो।।१८॥                                                                मगन रहूँ नित घट में अपने। चरनन सँग इठलाता हो॥१६॥                                                                सुन सुन शब्द होय मतवाला। छिन छिन अमी चुआता हो॥२०॥                                                                ऐसी मौज करो अब प्यारे। दम दम बिनय सुनाता हो॥२१॥                                                                होय निचिंत मेरे प्यारे रा धा स्व आ मी। तुम चरनन माहिं समाता हो॥२२॥(प्रेमबानी-4-शब्द-1- भाग-9- पृ.सं.79,80,81)*

सतगुरु चरन पकड़ दृढ़ प्यारे।

 

सतगुरु चरन पकड़ दृढ़ प्यारे।

क्यों जम हाट विकाय॥१॥                                                               

करम धरम में सब जिव अटके।


गुरु सँग हेत न कोई लाय॥२॥                                                               

भागहीन सब पड़े काल बस।

गुरु दयाल की सरन न आय॥३॥                                                             

 जिन पर मेहर करें रा धा स्व आ मी।

 उन हिरदे यह बचन समाय॥४॥                                                              

 गुरु चरनन की क्या कहूँ महिमा।

बिरले प्रेमी ध्यावत ताय॥५॥                                                             

 भाव भक्ति कोइ क्या दिखलावे।

निज कर रहे चरन लिपटाय॥६॥                                                             


  सतगुरु रूप निरख हिये अंतर।

 तन मन की सब सुध बिसराय॥७॥                                                                

 ऐसी सुरत पिरेमी जाकी।

तिन गुरु मेहर मिली अधिकाय।।८।।                                                             

 जोगी ज्ञानी और बैरागी।

 यह सब झूठे ठौर न पाय॥९॥                                             

  बड़ा भाग उन प्रेमी जागा।

जिनको लिया गुरु गोद बिठाय॥१०॥                                                             

   रा धा स्व आ मी चरन धार हिये अंतर।

 यह आरत अनुरागी गाय॥११॥


 (प्रेमबानी-2-शब्द-29- पृ.सं.42,43)


Tuesday, August 23, 2022

नमामि देवी नर्मदे...।

चिरकुंवारी नर्मदा की अधूरी प्रेम-कथा*

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कहते हैं नर्मदा ने अपने प्रेमी शोणभद्र से धोखा खाने के बाद आजीवन कुंवारी रहने का फैसला किया लेकिन क्या सचमुच वह गुस्से की आग में चिरकुवांरी बनी रही या फिर प्रेमी शोणभद्र को दंडित करने का यही बेहतर उपाय लगा कि आत्मनिर्वासन की पीड़ा को पीते हुए स्वयं पर ही आघात किया जाए। नर्मदा की प्रेम-कथा लोकगीतों और लोककथाओं में  मिलती है लेकिन हर कथा का अंत कमोबेश वही कि शोणभद्र के नर्मदा की दासी जुहिला के साथ संबंधों के चलते नर्मदा ने अपना मुंह मोड़ लिया और उलटी दिशा में चल पड़ीं। सत्य और कथ्य का मिलन देखिए कि नर्मदा नदी विपरीत दिशा में ही बहती दिखाई देती है। 


कथा 1👉  नर्मदा और शोण भद्र की शादी होने वाली थी। विवाह मंडप में बैठने से ठीक एन वक्त पर नर्मदा को पता चला कि शोण भद्र की दिलचस्पी उसकी दासी जुहिला(यह आदिवासी नदी मंडला के पास बहती है) में अधिक है। प्रतिष्ठत कुल की नर्मदा यह अपमान सहन ना कर सकी और मंडप छोड़कर उलटी दिशा में चली गई। शोण भद्र को अपनी गलती का एहसास हुआ तो वह भी नर्मदा के पीछे भागा यह गुहार लगाते हुए' लौट आओ नर्मदा'... लेकिन नर्मदा को नहीं लौटना था सो वह नहीं लौटी। 


अब आप कथा का भौगोलिक सत्य देखिए कि सचमुच नर्मदा भारतीय प्रायद्वीप की दो प्रमुख नदियों गंगा और गोदावरी से विपरीत दिशा में बहती है यानी पूर्व से पश्चिम की ओर। कहते हैं आज भी नर्मदा एक बिंदू विशेष से शोण भद्र से अलग होती दिखाई पड़ती है। कथा की फलश्रुति यह भी है कि नर्मदा को इसीलिए चिरकुंवारी नदी कहा गया है और ग्रहों के किसी विशेष मेल पर स्वयं गंगा नदी भी यहां स्नान करने आती है। इस नदी को गंगा से भी पवित्र माना गया है। 


मत्स्यपुराण में नर्मदा की महिमा इस तरह वर्णित है -‘कनखल क्षेत्र में गंगा पवित्र है और कुरुक्षेत्र में सरस्वती। परन्तु गांव हो चाहे वन, नर्मदा सर्वत्र पवित्र है। यमुना का जल एक सप्ताह में, सरस्वती का तीन दिन में, गंगाजल उसी दिन और नर्मदा का जल उसी क्षण पवित्र कर देता है।’ एक अन्य प्राचीन ग्रन्थ में सप्त सरिताओं का गुणगान इस तरह है।


गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। 

नर्मदा सिन्धु कावेरी जलेSस्मिन सन्निधिं कुरु।। 


कथा 2👉  इस कथा में नर्मदा को रेवा नदी और शोणभद्र को सोनभद्र के नाम से जाना गया है। नद यानी नदी का पुरुष रूप। (ब्रह्मपुत्र भी नदी नहीं 'नद' ही कहा जाता है।) बहरहाल यह कथा बताती है कि राजकुमारी नर्मदा राजा मेखल की पुत्री थी। राजा मेखल ने अपनी अत्यंत रूपसी पुत्री के लिए यह तय किया कि जो राजकुमार गुलबकावली के दुर्लभ पुष्प उनकी पुत्री के लिए लाएगा वे अपनी पुत्री का विवाह उसी के साथ संपन्न करेंगे। राजकुमार सोनभद्र गुलबकावली के फूल ले आए अत: उनसे राजकुमारी नर्मदा का विवाह तय हुआ। 


नर्मदा अब तक सोनभद्र के दर्शन ना कर सकी थी लेकिन उसके रूप, यौवन और पराक्रम की कथाएं सुनकर मन ही मन वह भी उसे चाहने लगी। विवाह होने में कुछ दिन शेष थे लेकिन नर्मदा से रहा ना गया उसने अपनी दासी जुहिला के हाथों प्रेम संदेश भेजने की सोची। जुहिला को सुझी ठिठोली। उसने राजकुमारी से उसके वस्त्राभूषण मांगे और चल पड़ी राजकुमार से मिलने। सोनभद्र के पास पहुंची तो राजकुमार सोनभद्र उसे ही नर्मदा समझने की भूल कर बैठा। जुहिला की ‍नियत में भी खोट आ गया। राजकुमार के प्रणय-निवेदन को वह ठुकरा ना सकी। इधर नर्मदा का सब्र का बांध टूटने लगा। दासी जुहिला के आने में देरी हुई तो वह स्वयं चल पड़ी सोनभद्र से मिलने। 


वहां पहुंचने पर सोनभद्र और जुहिला को साथ देखकर वह अपमान की भीषण आग में जल उठीं। तुरंत वहां से उल्टी दिशा में चल पड़ी फिर कभी ना लौटने के लिए। सोनभद्र अपनी गलती पर पछताता रहा लेकिन स्वाभिमान और विद्रोह की प्रतीक बनी नर्मदा पलट कर नहीं आई। 


अब इस कथा का भौगोलिक सत्य देखिए कि जैसिंहनगर के ग्राम बरहा के निकट जुहिला (इस नदी को दुषित नदी माना जाता है, पवित्र नदियों में इसे शामिल नहीं किया जाता) का सोनभद्र नद से वाम-पार्श्व में दशरथ घाट पर संगम होता है और कथा में रूठी राजकुमारी नर्मदा कुंवारी और अकेली उल्टी दिशा में बहती दिखाई देती है। रानी और दासी के राजवस्त्र बदलने की कथा इलाहाबाद के पूर्वी भाग में आज भी प्रचलित है। 


कथा 3👉  कई हजारों वर्ष पहले की बात है। नर्मदा जी नदी बनकर जन्मीं। सोनभद्र नद बनकर जन्मा। दोनों के घर पास थे। दोनों अमरकंट की पहाड़ियों में घुटनों के बल चलते। चिढ़ते-चिढ़ाते। हंसते-रुठते। दोनों का बचपन खत्म हुआ। दोनों किशोर हुए। लगाव और बढ़ने लगा। गुफाओं, पहाड़‍ियों में ऋषि-मुनि व संतों ने डेरे डाले। चारों ओर यज्ञ-पूजन होने लगा। पूरे पर्वत में हवन की पवित्र समिधाओं से वातावरण सुगंधित होने लगा। इसी पावन माहौल में दोनों जवान हुए। उन दोनों ने कसमें खाई। जीवन भर एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ने की। एक-दूसरे को धोखा नहीं देने की।


एक दिन अचानक रास्ते में सोनभद्र ने सामने नर्मदा की सखी जुहिला नदी आ धमकी। सोलह श्रृंगार किए हुए, वन का सौन्दर्य लिए वह भी नवयुवती थी। उसने अपनी अदाओं से सोनभद्र को भी मोह लिया। सोनभद्र अपनी बाल सखी नर्मदा को भूल गया। जुहिला को भी अपनी सखी के प्यार पर डोरे डालते लाज ना आई। नर्मदा ने बहुत कोशिश की सोनभद्र को समझाने की। लेकिन सोनभद्र तो जैसे जुहिला के लिए बावरा हो गया था। 


नर्मदा ने किसी ऐसे ही असहनीय क्षण में निर्णय लिया कि ऐसे धोखेबाज के साथ से अच्छा है इसे छोड़कर चल देना। कहते हैं तभी से नर्मदा ने अपनी दिशा बदल ली। सोनभद्र और जुहिला ने नर्मदा को जाते देखा। सोनभद्र को दुख हुआ। बचपन की सखी उसे छोड़कर जा रही थी। उसने पुकारा- 'न...र...म...दा...रूक जाओ, लौट आओ नर्मदा। 


लेकिन नर्मदा जी ने हमेशा कुंवारी रहने का प्रण कर लिया। युवावस्था में ही सन्यासिनी बन गई। रास्ते में घनघोर पहाड़ियां आईं। हरे-भरे जंगल आए। पर वह रास्ता बनाती चली गईं। कल-कल छल-छल का शोर करती बढ़ती गईं। मंडला के आदिमजनों के इलाके में पहुंचीं। कहते हैं आज भी नर्मदा की परिक्रमा में कहीं-कहीं नर्मदा का करूण विलाप सुनाई पड़ता है। 


नर्मदा ने बंगाल सागर की यात्रा छोड़ी और अरब सागर की ओर दौड़ीं। भौगोलिक तथ्य देखिए कि हमारे देश की सभी बड़ी नदियां बंगाल सागर में मिलती हैं लेकिन गुस्से के कारण नर्मदा अरब सागर में समा गई।


नर्मदा की कथा जनमानस में कई रूपों में प्रचलित है लेकिन चिरकुवांरी नर्मदा का सात्विक सौन्दर्य, चारित्रिक तेज और भावनात्मक उफान नर्मदा परिक्रमा के दौरान हर संवेदनशील मन महसूस करता है। कहने को वह नदी रूप में है लेकिन चाहे-अनचाहे भक्त-गण उनका मानवीयकरण कर ही लेते है। पौराणिक कथा और यथार्थ के भौगोलिक सत्य का सुंदर सम्मिलन उनकी इस भावना को बल प्रदान करता है और वे कह उठते हैं।


नमामि देवी नर्मदे...।


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पूज्य हुज़ूर का निर्देश

  कल 8-1-22 की शाम को खेतों के बाद जब Gracious Huzur, गाड़ी में बैठ कर performance statistics देख रहे थे, तो फरमाया कि maximum attendance सा...