Monday, November 26, 2012

राजस्थानी लोक संगीत परंपरागत




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  • Pakistan's popular folk and Sufi singer Mohammed

    [ तस्वीर 29257211 [ फोटो ]] राजस्थानी लोक संगीत बेताज Ssfi फकीर हैं

    पाकिस्तान के लोकप्रिय लोक गायक और सूफी फकीर मोहम्मद Ssfi बाड़मेर जिले के मूल निवासी. 1965 में रहस्यवादी परिवार भारत पाकिस्तान में सिंध में ले जाया गया था. क्षेत्र संत पिता - ज्ञात लोक गायक था. है थार लोक पाकिस्तान में संगीत और गाने , वह झंडा लहराया. उसके पिता , लोक गीत - गंभीरता से लिया संत संगीत खजाने से विरासत में मिला. रहस्यवादी में लोक गीत नायाब शैली में गाते हैं. पाकिस्तान में बेहद लोकप्रिय Ssfi Shufiyana एक फकीर की तरह था. Ssfi एक संत की तरह अद्भुत क्योंकि जल्द ही अंतरराष्ट्रीय मंच मिला संगीत .

    धूम Antararashtyy मंचों Ssfi संत बनाया गया था. रहस्यवादी लोक गीतों की Ssfi तो रसीले और सुरीले हैं वही कर रहे हैं , संगीत भक्ति में उन्हें जवाब नहीं है. Shufiyana लगता है जब रहस्यवादी अमीर खुसरो , शाह बाबा धर्म, माधो शाह हुसैन, सुलतान बहू , ख्वाजा गुलाम फरीद की रचनाएं गाते हैं, दर्शकों को पागल हो जाना . कई रहस्यवादी Hshaoan सिंधी, मारवाड़ी , Ssiraqui , पंजाबी , उर्दू और पूर्व की तरह अपनी एक अलग गायन , जब दर्शकों को उनके संगीत के रस में डूबे हैं.
    बाड़मेर थार क्षेत्र Ssfi Maangniyar पारंपरिक लोक के जिले में 1961 में अपने पिता से संगीत संत जन्मे और Commaycha गायन सीखा. वह बाद में सारंगी वादक उस्ताद मजीद खान, जो प्रसिद्ध गायक और सारंगी खिलाड़ी पाक रेडियो के समय में लोक गीत - संगीत ब्योरा सीखा था और गायन में साधन सिद्ध हो . जबकि परिवार के साथ शाम में संगीत Shufi उस्ताद सलामत अली खान साहब की तफ़सील 84 सीखा.

    Ssfi मीरा , कबीर, तुलसीदास , अब्दुल लतीफ Hitai , मोबाइल Sarmaast शाह बाबा धर्म भक्ति रचनाओं को बहुत गंभीरता से गाते हैं. Ssfi Maangniyar बच्चों के लोक गीत - संगीत प्रशिक्षण के द्वारा पारंपरिक लोक गीत - संगीत की परंपरा पर निर्माण कर रहे हैं . रहस्यवादी अपने कार्यक्रमों के माध्यम से भारत को कई बार Shufi और भक्ति संगीत स्वर, आभा फैला है.
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    हुरमुचो भारत की प्राचीन और पारम्परिक कशीदा शैलि

    बाड़मेर. कशीदाकारी भारत का पुराना और बेहद खूबसूरत हुनर है । बेहद कम साधनों और नाममात्र की लागत के साथ शुरु किये जा सकने वाली इस कला के कद्रदान कम नहीं हैं । रंग बिरंगे धागों और महीन सी दिखाई देने वाली सुई की मदद से कल्पनालोक का ऎसा संसार कपड़े पर उभर आता है कि देखने वाले दाँतों तले अँगुलियाँ दबा लें । लखनऊ की चिकनकारी,बंगाल के काँथा और गुजरात की कच्छी कढ़ाई का जादू हुनर के शौकीनों के सिर चढ़कर बोलता है। इन सबके बीच सिंध की कशीदाकारी की अलग पहचान है ।

    तेज़ रफ़्तार ज़िन्दगी में जबकि हर काम मशीनों से होने लगा है, सिंधी कशीदाकारों की कारीगरी "हरमुचो" किसी अजूबे से कम नज़र नहीं आती । बारीक काम और चटख रंगों का अनूठा संयोजन सामान्य से वस्त्र को भी आकर्ष्क और खास बना देता है । हालाँकि वक्त की गर्द इस कारीगरी पर भी जम गई है । नई पीढ़ी को इस हुनर की बारीकियाँ सिखाने के लिये भोपाल के राष्ट्रीय मानव संग्रहालय ने पहचान कार्यक्रम के तहत हरमुचो के कुशल कारीगरों को आमंत्रित किया । इसमें सरला सोनेजा, कविता चोइथानी और रचना रानी सोनेजा ने हरमुचो कला के कद्रदानों को सुई-धागे से रचे जाने वाले अनोखे संसार के दर्शन कराये ।

    हुरमुचो सिंधी भाषा का शब्द है जिसका शब्दिक अर्थ है कपड़े पर धागों को गूंथ कर सज्जा करना। हुरमुचो भारत की प्राचीन और पारम्परिक कशीदा शैलियों में से एक है। अविभाजित भारत के सिंध प्रांत में प्रचलित होने के कारण इसे सिंधी कढ़ाई भी कहते हैं। सिंध प्रांत की खैरपुर रियासत और उसके आस-पास के क्षेत्र हरमुचो के जानकारों के गढ़ हुआ करते थे। यह कशीदा प्रमुख रूप से कृषक समुदायों की स्त्रियाँ फसल कटाई के उपरान्त खाली समय में अपने वस्त्रों की सज्जा के लिये करती थीं। आजादी के साथ हुए बँटवारे में सिंध प्रांत पाकिस्तान में चला गया किंतु वह कशीदा अब भी भारत के उन हिस्सों में प्रचलित है, जो सिंध प्रान्त के सीमावर्ती क्षेत्र हैं। पंजाब के मलैर कोटला क्षेत्र, राजस्थान के श्री गंगानगर, गुजरात के कच्छ, महाराष्ट्र के उल्हासनगर तथा मध्य प्रदेश के ग्वालियर में यह कशीदा आज भी प्रचलन में है।

    हुरमुचो कशीदा को आधुनिक भारत में बचाए रखने का श्रेय सिंधी समुदाय की वैवाहिक परंपराओं को जाता है। सिंधियों में विवाह के समय वर के सिर पर एक सफेद कपड़ा जिसे ’बोराणी’ कहते है, को सात रंगो द्वारा सिंधी कशीदे से अलंकृत किया जाता है। आज भी यह परम्परा विद्यमान है। सिंधी कशीदे की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें डिजाइन का न तो कपड़े पर पहले कोई रेखांकन किया जाता है और न ही कोई ट्रेसिंग ही की जाती है। डिजाइन पूर्णतः ज्यामितीय आकारों पर आधारित और सरल होते हैं। जिन्हें एक ही प्रकार के टांके से बनाया जाता है जिसे हुरमुचो टांका कहते हैं। यह दिखने में हैरिंघ बोन स्टिच जैसा दिखता है परंतु होता उससे अलग है।

    पारम्परिक रूप से हुरमुचो कशीदा वस्त्रों की बजाय घर की सजावट और दैनिक उपयोग में आने वाले कपड़ों में अधिक किया जाता था। चादरों,गिलाफों,रूम- ाल,बच्चों के बिछौने,थालपोश,थैले- आदि इस कशीदे से सजाए जाते थे । बाद में बच्चों के कपड़े, पेटीकोट, ओढ़नियों आदि पर भी हरमुचो ने नई जान भरना शुरु कर दिया । आजकल सभी प्रकार के वस्त्रों पर यह कशीदा किया जाने लगा है।

    मैटी कशीदे की तरह सिंधी कशीदे में कपड़े के धागे गिन कर टांकों और डिजाइन की एकरूपता नहीं बनाई जाती। इसमें पहले कपड़े पर डिजाइन को एकरूपता प्रदान करने के लिए कच्चे टाँके लगाए जाते हैं। जो डिजाइन को बुनियादी आकार बनाते हैं। सिंधी कशीदा हर किस्म के कपड़े पर किया जा सकता है। सिंधी कशीदे के डिजाइन अन्य पारम्परिक कशीदो से भिन्न होते हैं।
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    [तस्वीर 29691424 [फोटो]] खिल उठा है सौन्दर्य ऎतिहासिक गड़ीसर तालाब का

    स्वर्णनगरी में रविवार की रात्रि में हुई झमाझम बारिश से ऎतिहासिक गड़ीसर तालाब में पानी की अच्छी आवक हुई है. लंबे समय से सूखे पड़े एवं मछलियां मरने के कारण दुर्गन्धयुक्त वातावरण से यह ऎतिहासिक सरोवर उपेक्षा का दंश झेल रहा था. अच्छी बारिश से तालाब में पानी की आवक हुई है और सरोवर का सौन्दर्य एक बार फिर से खिल उठा है.

    पानी से भरा होने के कारण स्थानीय लोग यहां घूमने, प्राकृतिक वातावरण का लुत्फ उठाने और पिकनिक व सैर सपाटे के लिए पहुंच रहे हैं. काफी इंतजार के बाद तालाब में पानी की अच्छी आवक होने से यहां फिर से - चहल पहल दिखाई देने लगी है.

    खिल उठा सौन्दर्य
    गड़ीसर तालाब पानी की आवक से एक बार फिर आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. बारिश के बाद अब यहां पानी की आवक से पर्यटक यहां कलात्मक छतरियों व सुन्दर घाटों के बीच सुखद अनुभूति महसूस करने लगे हैं. स्थानीय लोग प्राकृतिक वातावरण में घंटों तक बैठे रहते हंै. पानी की आवक होने से यहां नौकायन व्यवसाय को नवजीवन मिलने एवं पर्यटकों का यहां रूझान बढ़ने की उम्मीद जगने लगी है. स्वर्णनगरी में मेहरबान हुए इन्द्रदेव के कारण यहां लंबे समय बाद सौंदर्य का साम्राज्य स्थापित हो गया है.

    बढ़ा स्वीमिंग का शौक
    लबालब हुए तालाबों में तैरना सीखने व तैरने के शौकीन लोगों की - चहल पहल यहां काफी देखने को मिल रही है. छोटे बच्चे अपने परिजनों की देखरेख में यहां तैरना सीख रहे हैं, वहीं किशोर व वयस्क घंटो तक पानी में नहाते हैं.

    पिकनिक व गोठों का दौर
    स्वर्णनगरी में पिकनिक व गोठों का दौर एक बार फिर शुरू हो गया है. बारिश के बाद से ही यह दौर शुरू हो गया है. तालाब के किनारे बड़ी संख्या में लोग यहां पिकनिक व गोठों के लिए पहुंच रहे हैं.
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    राजस्‍थान लोक साहित्‍य में विशिष्‍ट स्‍थान है बाघा भारमली की अमर प्रेम कहानी की
    बाड़मेर: प्रेम की कथा अकथ है, अनिवर्चनीय है। फिर भी प्रेम कथा विविध प्रकार से कही जाती है, कही जाती थी और कही जाएगी। थार के इस रेगिस्‍तान में कई प्रेम गाथाओं ने जन्म लिया होगा, मगर बाघा-भारमली की प्रेम कथा राजस्थान के लोक साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान रखती है।

    समाज और परम्पराओं के विपरित बाघा भारमली की प्रेम कथा बाड़मेर के कण-कण में समाई है। इस प्रेम कथा को रुठी रानी में अवश्य विस्तार मिला है। मगर, स्थानीय तौर पर यह प्रेम कथा साहित्यकारों द्वारा अपेक्षित हुई है। हालांकि, चारण कवियों ने अपने ग्रन्थों में इस प्रेम कथा का उल्लेख अवश्य किया है। कोटड़ा के किले से जो प्रेम कहानी निकली, वह बाघा-भारमली के नाम से अमर हुई।

    मारवाड़ के पश्चिमी अंचल बाड़मेर-जैसलमेर से सम्बन्धित यह प्रणय वृतान्त आज भी यहां की सांस्कृतिक परम्परा एवं लोक-मानस में जीवन्त है। इस प्रेमगाथा का नायक बाघजी राठौड़ बाड़मेर जिले के कोटड़ा ग्राम का था। उसका व्यक्तिव शूरवीरता तथा दानशीलता से विशेष रूप से सम्पन्न था। जैसलमेर के भाटियों के साथ उसके कुल का वैवाहिक संबंध होने के कारण वह उनका समधी (गनायत) लगता था।

    कथा की नायिका भारमली जैसलमेर के रावल लूणकरण की पुत्री उमादे की दासी थी। 1536 ई में उमा दे का जोधपुर के राव मालदेव (1531-62ई) से विवाह होने पर भारमली उमा दे के साथ ही जोधपुर आ गई। वह रुप-लावण्य तथा शारीरिक-सौष्ठव में अप्सराओं जैसी अद्वितीय थी।

    विवाहोपरान्त मधु-यामिनी के अवसर पर राव मालदेव को उमा दे रंगमहल में पधारने का अर्ज करने हेतु गई दासी भारमली के अप्रतिम सौंदर्य पर मुग्ध होकर मदमस्त राव जी रंगमहल में जाना बिसरा भारमली के यौवन में ही रम गये। इससे राव मालदेव और रानी उमा दे में ‘रार’ ठन गई, रानी रावजी से रुठ गई। यह रुठन-रार जीवनपर्यन्त रही, जिससे उमा दे ‘रुठी रानी’ के नाम से प्रसिद्व हुईं।

    राव मालदेव के भारमली में रत होकर रानी उमा दे के साथ हुए विश्वासघात से रुष्ट उसके पीहर वालों ने अपनी राजकुमारी का वैवाहिक जीवन निर्द्वन्द्व बनाने हेतु अपने योद्वा ‘गनायत’ बाघजी को भारमली का अपहरण करने के लिए उकसाया। भारमली के अनुपम रुप-यौवन से मोहित हो बाघजी उसका अपहरण कर कोटड़ा ले आया एवं उसके प्रति स्वंय को हार बैठा। भारमली भी उसके बल पौरुष हार्द्विक अनुसार के प्रति समर्पित हो गई, जिससे दोनों की प्रणय-वल्लरी प्रीति-रस से नित्‍य प्रति सिंचित होकर प्रफुल्ल और कुसुमित-सुरभित होने लगी।

    इस घटना से क्षुब्ध राव मालदेव द्वारा कविराज आसानन्द को बाघाजी को समझा-बुझा कर भारमली को लौटा लाने हेतु भेजा गया। आसानन्द के कोटड़ा पहुंचने पर बाघ जी तथा भारमली ने उनका इतना आदर-सत्कार किया कि वे अपने आगमन का उद्देश्य भूल वहीं रहने लगे। उसकी सेवा-सुश्रूषा एवं हार्दिक विनय-भाव से अभिभूत आसाजी का मन लौटने की बात सोचता ही नहीं था। उनके भाव विभोर चित्त से प्रेमी-युगल की हृदयकांक्षा कुछ इस प्रकार मुखरित हो उठी-

    ‘जहं तरवर मोरिया, जहं सरवर तहं हंस।
    जहं बाघो तहं भारमली, जहं दारु तहं मंस।।’

    उसके बाद आसानन्द, बाघजी के पास ही रहे। इस प्रकार बाघ-भारमली का प्रेम वृतान्त प्रणय प्रवाह से आप्‍लायित होता रहा। बाघजी के निधन पर कवि ने अपना प्रेम तथा शोक ऐसे अभिव्यक्त किया-

    ‘ठौड़ ठौड़ पग दौड़, करसां पेट ज कारणै।
    रात-दिवस राठौड़, बिसरसी नही बाघनै।।’
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    अनूठी है कौड़ी कला की हस्तशिल्प विरासत
    : चंदन भाटी
    बाड़मेर: एक जमाने में मुद्रा के रूप में उपयोग की जाने वाली कौड़ियों को वर्तमान में बहुत उपयोगी नहीं माना जाता। आज ‘कौड़ियों के भाव’ मुहावरे का अर्थ किसी चीज को बहुत सस्ते में खरीदना या बेचना माना जाता हैं। कभी मूल्यवान रहीं ये कौड़ियां धीरे-धीरे घर-परिवारों से लुप्त होती जा रही हैं, लेकिन राजस्थातन के बाड़मेर जिले के हस्तशिल्पियों ने अपनी सृजनात्मक ऊर्जा के बल पर कौड़ियों को साज-सज्जा के एक अद्भुत साधन का रूप प्रदान करने का सफल प्रयास किया है।

    बाड़मेर जिला मुख्यालय से 28 किलोमीटर दूर स्थित देरासर गांव की रामदियों की बस्ती की हस्तशिल्पी श्रीमती भाणी, मिश्री खां व उनके साथियों ने कौड़ियों का नया संसार रच डाला है। कौड़ियों को रंग-बिरंगे धागों, झालरों को बारीक कसीदे और गोटों से खूबसूरती से गूंथकर पशुओं के श्रृंगार तथा घरेलू सौन्दर्य को बढ़ाने के लिए इस्ते माल किया जाता रहा है। लेकिन, आधुनिक जरूरतों को देखते हुए हस्तशिल्प को विस्तांर देने और उसके लिए बाजार बनाने का प्रयास हो रहा है।

    इस गांव के ज्यादातर हस्तशिल्पी मुसलमान (रामदिया) हैं तथा पशुपालन व विक्रय धंधा करते हैं। 95 घरों वाले इस गांव में पच्चीस घर रामदिया मुसलमानों के हैं, जो गुजरात और महाराष्ट्र के विभिन्न पशु मेलों में शरीक होकर पशु क्रय-विक्रय का धंधा करते हैं। ऐसे ही एक मेले में मिश्री खां अपनी पत्नी भाणी के साथ गुजरात गए, जहां ऊंट और घोड़ों के श्रृंगार को देखकर बेहद प्रभावित हुए। बैलों के श्रृंगार के लिए कौड़ियों की बनी मोर कलिया, गेठिये, घोडी के श्रृंगार के लिए मृणी लगाम, गोडिए, त्रिशाला और ऊंटो के लिए बने पऊछी गोरबन्ध मुहार, मोर आदि कौड़ी कला को देखकर आधुनिक नमूने तैयार करने के विषय में पूछताछ कर यहीं से इस दम्पति ने नई जिन्दगी की शुरूआत की।

    भाणी का पुश्तैनी कार्य कांच-कसीदाकारी का तो था ही, साथ ही भाणी ने इसी दौरान कौड़ी काम भी सीख लिया। पशु श्रृंगार की सामग्री के साथ-साथ भाणी ने गुडाल तथा अन्य झोपडों के लिए तोरण-तोरणिएं तथा अपाण के पलों पर कडों कौड़ी, खीलण कांच और भरत का कार्य करने में भी महारत हासिल कर ली। मुसलमान, मेघवाल आदि जातियों की शादियों पर कौड़ियों वाले मोर पर तो आज भी गांव वाले मोहित हैं। भाणी ने परम्परागत कौड़ी कला कार्य इण्डाणी गोरबन्ध के साथ-साथ इसी कला के थैले, पर्स बनाने आरम्भ कर दिए।

    हस्तशिल्पी बताते हैं कि कौड़ी कला युक्त इण्डाणियों की मांग शहर में बहुत हैं। शहर वाले परम्परागत इण्डानियों को देखकर मोहित हो जाते हैं। भाणी झालर वाली, बिना झालर वाली और बिना फुन्दी वाली इण्डाणी बनाती हैं। झालर वाली इण्डाणी बीस इंच लम्बी होती हैं, जिसके कारण शिल्पकार को इसे तैयार करने में तीन दिन लग जाते हैं। इस इण्डाणी में आधा किलो कौड़ी और लगभग डेढ़ सौ ग्राम ऊन लग जाता है। बिना झालर व फुन्दे वाली इण्डाणी एक ही दिन में तैयार हो जाती हैं। इसमें 100-125 ग्राम कौड़ी का उपयोग होता हैं। बिना झालर व फुन्दी वाली इण्डानी बनाने में एक दिन का समय लगता हैं।

    झालर वाली इण्डाणी में मूंजवाली रस्सी को गोलकर कपड़े से सिलाई कर दी जाती है और कौड़ी में बंद करके उसे कपड़े पर सील दिया जाता है। कौड़ी कला के कद्रदान आज कम बचे हैं। सरकारी स्तर पर इन हस्तशिल्पियों को सरंक्षण नहीं मिलने के कारण ये फाकाकशी में दिन गुजार रहे हैं। कौड़ी कला के हस्तशिल्पी देश भर में कम ही बचे हैं। मिश्री खान को दाद तो खूब मिलती है, मगर दो जून की रोटी का जुगाड़ करने में कोई मदद नहीं करता।

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