Saturday, September 5, 2020

रोजाना वाक्यात, प्रेमपत्र

 **राधास्वामी!! 05-09-2020-

 आज सुबह के सतसंग में पढे गये पाठ-

                            

  (1) करूँ बेनती राधास्वामी आज। काज करो और राखो लाज।।-(मैं जंगी तुम हो राधास्वामी। जोड मिलाया तुम अंतरजामी।।) (सारबचन-शब्द-3,पृ.सं.166)                                                               

 (2) आज गावे सुरत गुरु आरत सार।।टेक।। प्रेम भरी गुरु सन्मुख आई। तन मन दीना वार।।-(राधास्वामी मेहर पाय घर चाली। सहज उतर गई भौजल पार।।) (प्रेमबानी-2-पृ.सं.301)                           

 🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**

परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज

 -रोजाना वाक्यात -31 दिसंबर 1932 -शनिवार- 

आज कैंप तोड़ दिया गया। लोग वापस होने शुरू हो गये। कुल इंतजामात कामयाब साबित हुए । वॉलण्टिर्यस ने तन तोड़कर काम किया । न कोई मर्ज फैला न किसी को सुख चैन , या खाने-पीने के मुतअल्लिक़ तकलीफ हुई। 12000 मर्द औरत व बच्चे इतने दिन सत्संग के मेहमान रहे और बखैरियत तमाम दयालबाग का लुफ्त उठा कर घर लौट रहे हैं । 

प्रेमी भाइयों और प्रेमिन बहनों की श्रद्धा देखकर तबियत निहायत खुश हुई।  सभा के खजाने में अलावा ₹35000 के जो खर्चे जलसा के लिए 13 दिसंबर तक प्राप्त हो चुका था ₹35000 और इस माह में वसूल हुआ । इस रकम से सभा के सब घाटे पूरे हो गये।  राधास्वामी दयाल सभा के सब काम चलाते हैं।                                                        

 मेम्बराने सभा ने सहमति से मशवरा दिया की :" दीन व दुनिया" ड्रामा की फिल्म तैयार कराई जावे। और अगर यह फिल्म कामयाब साबित हो तो और फिल्में तैयार कराई जावें। सेठ चमरिया ने हर तरह की सहायता देने का वादा किया। लेकिन यह शर्त लगाई कि दस पंद्रह दिन कलकत्ता में कयाम करके हमारे रुबरु फिल्म बनवाई जावे। 

इधर देहली व इलाहबाद के भाई उन स्थानों में नुमाइश के लिये जोर दे रहे है। उधर राजाबरारी से पैगाम आया है कि परम्परानुसार माह जनवरी के आखिरी हफ्ते में.वहाँ का दौरा किया जावे। अफनी मर्जी का तनिक भी दखल नही है । जो मालिक जो मंजूर होगा वही होगा।।                           

 रात के सतसंग में सच्चे परमार्थी की रहनी गहनी के मजमून पर बातचीच हुई।।             

🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**


[*परम गुरु हुजूर महाराज -प्रेम पत्र- भाग 1- कल से आगे:-

 

निर्मल चेतन देश में, जो संतों के सच्चे मालिक का देश है, उस माया का नाम और निशान भी नहीं है।  यह सब दर्जे देहधारी के स्वरूप में सूक्ष्म रीति से मौजूद है, और हर एक दर्जे का चैतन्य उसी दर्जे के बाहर के चेतन मंडल से मिला हुआ है। जो सुरत चैतन्य उस निर्मल चैतन्य से धार रूप होकर पिंड में उतर कर ठहरी है , उस निर्मल चेतन देश के वासी और भेदी संत सतगुरु से मिलकर और रास्ते का भेद और जुगत उसी धार पर सवार होकर लौटने की दरियाफ्त  करके अभ्यास करें यानी अपने घट को मथन कर आवरण दूर करती जावे तथा उनको छेद कर ऊपर को चढ़ती जावे, तो वह सुरत एक दिन निर्मल चेतन देश में पहुंचकर उस पार और अनंत रूप से मिल कर एक हो जावेगी और देह की हद किसी तरह से उसके अपार और अनंत रूप में हारिज (खलल डालने वाली) और  मानै(असंभव बताने वाली)  नहीं होगी।  

जैसे कि मकान में ऊँचे दर्जे या खन की हवा का मेल साथ उसके मंडल के होने में मकान की रोकने वाली हद कोई रोक नहीं सकती , ऐसे जिस अभ्यासी सुरत का रास्ता नीचे से ऊपर तक घट में इस तौर से खुल गया, वहीं सुरत उस अरुपी, अनंत अपार रूप से मिलकर एक हो गई।

 पर बाहरमुख दृष्टि वालों की हददार और देह स्वरुप ही दिखलाई देती रहेगी, पर जो भेदी और अभ्यासी है वह उसके अपार और अनंत रूप की पहचान करके उसके साथ मालिक के मुआफिक  प्रेमपूर्वक बर्ताव करेंगे। 

। क्रमशः               

🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**


Friday, September 4, 2020

राधस्वामी के उपदेश

 *राधास्वामी!!      मिश्रित वचन 


 आज शाम के सत्संग में पढ़ा गया बचन- कल से आगे-( 98) ' 


पारस्कर ग्रह सूत्र' कांड १ कंडिका ३ में, जहाँ अर्घ और मधुपर्क की प्रथा का वर्णन आया है, लिखा है कि "मधुपर्क का उच्छिष्ट (जूठा बचा हुआ ) उत्तर की ओर बैठे हुए पुत्र और विद्यार्थि को देवें"  (सूत्र 22)। तथाच ' आपस्तंबीय गृह सूत्र'  के तेरहवें खंड में लिखा है कि "  आचार्य आदि पूज्य तीन बार स्वयं चाट कर शेष बचे मधुपर्क को अपने किसी प्रिय मित्र या भाई को देवे जिसने समावर्तन ठीक किया हो।

उससे भी शेष बचे तो वह भी समावर्तन किये शिष्य आदि को देवे और उक्त विधी से वे  भी प्राशन करें"। इन प्रमाणो से प्रकट है कि भारत वर्ष में प्राचीन काल से यह प्रथा चली आई है कि गुरु के उपयोग में आई हुई वस्तुओं को झूठा समझ कर फेंक नही दिया जाता किंतु उनका याग्य सत्कार किया जाता है । इस पुस्तक के दूसरे भागों में इस विषय पर विस्तृत रूप से विचार किया जायेगा।।                         

🙏🏻राधास्वामी🙏🏻

 यथार्थ प्रकाश- भाग पहला

 - परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज!



 आज शाम के सतसंग में पढे जाने वाले पाठ-  

             

    (1) राधास्वामी सतगुरु पूरे। मैं आया सरन हुजूरे।।-(अब मन में रहूँ मगन मैं। शब्दारस पिऊँ अपन में।। ) (प्रेमबानी-3-शब्द-17,पृ.सं.359)  

                                                       

(2) देखो दृष्टि पसार जगत सब धूल है। सब ही भोग बिलास भरम की सूल है।। घट का भेद अगाध कहूँ मैं खोल अब। लेव चित वाहि धार चिन्ता मेट सब।।

-( राधास्वामी कहें पुकार बचन यह सार है। समझ सोच लेव धार बेडा पार है।।) (प्रेमबिलास-शब्द-47,पृ.सं.59)                                                      

  (3) यथार्थ प्रकाश-भाग पहला-कल से आगे-               

  🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**


*परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज


 -रोजाना वाक्यात- 30 दिसंबर 1932 -शुक्रवार

- आज के दिन का बहुत सा हिस्सा मुलाकातों में गुजरा। 171 आदमियों से मुलाकातें कीं और भी 50 नाम बाकी है । इतनी भीड़ के मौके पर मुलाकातों के लिए वक्त निकालना निहायत असुविधाजनक है मगर न भी कहते नहीं बनता।।                                                    

 रायबहादुर डॉ किशोरी लाल चौधरी, असिस्टेंट डायरेक्टर पब्लिक हेल्थ डिपार्टमेंट , यहाँ इंतजामात  सफाई देखने के लिए आये थे । आते ही निमोनिया में गिरफ्तार हो गए और निमोनिया भी बड़ा तेज था। मगर शुक्र है की दया से अब मर्ज में आरोग्य लाभ हो रहा है। दैव योग से डॉक्टर जितेंद्र नाथ सेन गुप्ता, सिविल सर्जन ,सूबा बिहार, भी  आये हुए थे । आपने फौरन मरीज का चार्ज ले लिया। बेचारा इंसान इरादा ही कर सकता है। कामयाबी किसी दूसरे के हाथों में है।                                           

 रात के सत्संग में रात के मजमून पर मजीद रोशनी डाली गई । और बहुत से लोगों के शुबहे दूर किए गये। जब कोई नई बात कही जाती है तो ख्वामख्वाह लोगों के दिलों में शिकायतें पैदा हो जाती है लेकिन जब पुस्तकों से प्रमान पेश कर दिए जाते हैं तो सब शिकायतें निवृत हो जाती है। लंबी अवधि से इंसान पुस्तकों की परस्तिश करता रहा है इसलिए प्राकृतिक रूप से उसके दिल में लिखित वाक्य में ज्यादा श्रद्धा है। एक सतसंगी का यह सवाल था कि अगर मालिक हरकत है तो उसके चरणों में पहुंचने पर हमारी सुरत को कभी चैन न मिलेगा। 

जवाब में बतलाया गया - शक्ति जब गुप्त रहती है तो अरुप व अनाम होती है और कोई काम नहीं करती लेकिन जब कार्यरत होती है तो नाम व रूप धारण करती है और निरंतर काम करती है ।

 चुनाँचे जब रचना नहीं थी तो मालिक की शक्ति गुप्त थी और अब जबकि रचना हो गई है तो मालिक की शक्ति प्रकट है और मुतवातिर हरकत में है। और चूँकि दोनों की हरकतें Harmonized  है इसलिये हमारी सुरत मालिक  के चरणो में मिलाप होकर ही सच्चा आराम मिल सकता है।

🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻


*परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज- 04-09-2020

【 स्वराज्य】- 

कल से आगे:

- वजीर मेरा मतलब यही था कि अकेले मुझसे राज्य का काम नहीं चल सकता- अगर दीवान अमीरचन्द्र मंत्री की पदवी स्वीकार करलें तो अलबत्ता मैं राज्य का बोझ अपने सिर ले सकता हूँ।।    

                                   

छोटे मुसाहिब- तो दीवान जी का काम किसके सुपुर्द होगा?  दीवान- दानाध्यक्ष जी आसानी से कर सकेंगे । 

राजपंडित- वाह! धन्य है सभासद महाशय -सब काम कैसे प्रेम से तय कर लिया है, मगर यह तो बताओ कि दानाध्यक्ष कौन बनेगा?  

वजीर -क्या आप किसी का नाम तजवीज कर सकते हैं? 

बड़े मुसाहिब- पंडित जी ! आपके बड़े पुत्र अगर इस पदवी को मंजूर करें तो बड़ा ही अच्छा हो । 

राजपंडित -भाई! सोमदेव से पूछ लो - मैं उसके मामले में नहीं पड़ता - वह जाने उसका काम जाने- मुश्किल काम तो मंत्री का है सो दीवन अमीरचंद जी ने कृपा करके स्वीकार कर लिया है।

  खड़गसिंह - तुम सब के सब बेईमान हो -तुममें से एक भी राज्य की भलाई चाहने वाला नहीं है - घर से मिलीभगत करके आये हो और मिलकर लूट मचा रहे हो - मुझे यह इंतिजाम मंजूर नहीं है- राज्य का काम राजकुमारी जी के नाम से चलाया जाये और सब सभासद अपना अपना काम बदस्तूर करते रहे- क्या आप लोगों में से किसी के भी दिल में महाराज उग्रसेन की पुत्री के लिए श्रद्धा नहीं रही है?  

राजपंडित -(खफा होकर ) तुम्हें कैसे मालूम किसी के दिल में श्रद्धा नहीं रही है?  

खड़ग सिंह-- आप ही बतावें- राजकुमारी जी अब कहाँ है उनका क्या हाल है?  

राजपंडित- रनवास में होगीं और कहाँ होगीं (आहिस्ता से) और हाल अच्छा ही होगा - कोई बुरा हाल तो इन दिनों सुनने में नहीं आया।

  वजीर -राजकुमारी जी निहायत अच्छी तरह है -उनका सब इंतजाम देवदासी बांदी के सुपुर्द है और वह राजकुमारी जी को अपने पुत्री के समान पालती है -इससे ज्यादा आप क्या आशा रखते हैं ? 

खड़गसिंह --अगर आप मर जायँ और आपकी पुत्री किसी दासी के सुपुर्द कर दी जाए तो क्या इससे आपकी आत्मा प्रसन्न होगी ? 

दानाध्यक्ष-(मुहँ बिगाड कर)  क्या अशुभ बचन मुख से निकालते हो। अपना ही दृष्टांत क्यों नहीं दे दिया? 

 वजीर-( नाराज होकर) अच्छा! अब मैं न मंत्री का काम करूँगा और न राजपदवी मँजूर करूँगा- 

खड़गसिंह जी जैसा चाहे काम चलावें।  

राजपंडित-(जोश म़े आकर कर) खडगसिँह जी!  खुद राजा बना चाहते हो राजकुमारी जी के बहाने गढते हो -जब तक हम में से एक भी जीता है आपकी चाल चलने नहीं पायेगी। 

खड़गसिंह-( कडक कर) पंडित जी! जरा जबान संभाल कर बोलिये और भूल न जाइये कि खड़गसिंह कौम का क्षत्रिय है। 

राजपंडित- अरे क्षत्रिय है तो क्या- यहाँ भी तो ब्राह्मण है- क्या किसी की गर्दन काटोगे? (गर्दन आगे बढाकर खडग सिंह के सामने करके)- अगर  सचमुच क्षत्रियपुत्र हो तो लो काटो गर्दन- करो ब्रह्महत्या- और जाओ सात कुलों समेत सीधे नरक में- नाम खडगसिँह धरा के बनते हो बडे सूरमा- निकालो न तलवार?  

क्रमशः                     

  🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**lllll



प रम गुरु हुजूर महाराज- प्रेम पत्र -भाग 1-



 कल से आगे-( 26 )-

 उस अपार और अनंत रूप मालिक का हर जगह और देहधारी स्वरूप में मौजूद होना इस दृष्टांत से साफ तौर पर समझ में आ सकता है। जैसे की हवा या आकाश हर घर में मौजूद है और उस घर की लंबाई और चौड़ाई के मुआफिक सीमित मालूम होता है, पर वह कभी हिस्से और टुकड़े नहीं हुआ, बाहर के मंडल से जो निहायत विस्तृत है हमेशा मिला हुआ है और दर्जे बदर्जे ऊँचे की तरफ लतीफ और सूक्ष्म होता चला गया है।  और यह हाल उस मकान के दर्जे या खानों से है जो 5 या 7 होंवें, मालूम हो सकता है। 

सबसे ऊपर के दर्जे की हवा या आकाश निहायत सूक्ष्म और साफ होता है और हर दर्जे की हवा और आकाश बाहर के मंडल के उसी दर्जे या तह से मिले हुए हैं । फिर तो जुगत के साथ नीचे के दर्जे या खन की हवा मथन करके  ऊपर चढ़ाई जावें तो वह बिल्कुल साफ और निर्मल और सूक्ष्म हो कर अपने मंडल के साथ मिल जाएगी । 

और वहाँ पर न वह मकान के अंदर में कहीं नहीं जा सकती है और न बाहर और कोई हद उसकी नहीं है, यानी अंदर और बाहर एक ही है और मुआफिक अपने मंडल के अपार और बेहद है। इसी तरह से मालिक सब जगह और सब देहों में बगैर टुकड़े और हिस्से होने के मौजूद  है और जितने दर्जे कि उस चैतन्य में कहे जा सकते हैं, वह बसबब माया की मिलौनी के हुए हैं और माया भी किसी मुकाम पर पैदा हुई है। 

क्रमशः                 

🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**


Thursday, September 3, 2020

शादी संबंधों में सतर्कता

 एक गोत्र में शादी क्यूँ नहीं....? 

वैज्ञानिक कारण हैं..


एक दिन डिस्कवरी पर जेनेटिक

बीमारियों से सम्बन्धित एक ज्ञानवर्धक कार्यक्रम

देख रहा था ... उस प्रोग्राम में एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने कहा की जेनेटिक बीमारी न हो इसका एक ही इलाज है और वो है "सेपरेशन ऑफ़

जींस".. मतलब अपने नजदीकी रिश्तेदारो में विवाह नही करना चाहिए ..क्योकि नजदीकी

रिश्तेदारों में जींस सेपरेट (विभाजन) नही हो पाता और जींस लिंकेज्ड

बीमारियाँ जैसे हिमोफिलिया, कलर ब्लाईंडनेस, और

एल्बोनिज्म होने की १००% चांस होती है ..

फिर मुझे

बहुत ख़ुशी हुई जब उसी कार्यक्रम में ये

दिखाया गया की आखिर हिन्दूधर्म में

हजारों सालों पहले जींस और डीएनए के बारे में

कैसे

लिखा गया है ? हिंदुत्व में कुल सात गोत्र होते

है

और एक गोत्र के लोग आपस में शादी नही कर

सकते

ताकि जींस सेपरेट (विभाजित) रहे.. उस वैज्ञानिक ने

कहा की आज पूरे विश्व

को मानना पड़ेगा की हिन्दूधर्म ही विश्व का

एकमात्र

ऐसा धर्म है जो "विज्ञान पर आधारित" है !

हिंदू परम्पराओं से जुड़े ये वैज्ञानिक तर्क:


1- कान छिदवाने की परम्परा: 


भारत में लगभग सभी धर्मों में कान छिदवाने की परम्परा है।

वैज्ञानिक तर्क-

दर्शनशास्त्री मानते हैं कि इससे सोचने की शक्त‍ि बढ़ती है। जबकि डॉक्टरों का मानना है कि इससे बोली अच्छी होती है और कानों से होकर दिमाग तक जाने वाली नस का रक्त संचार नियंत्रित रहता है।


2-: माथे पर कुमकुम/तिलक


महिलाएं एवं पुरुष माथे पर कुमकुम या तिलक लगाते हैं। 

वैज्ञानिक तर्क- आंखों के बीच में माथे तक एक नस जाती है। कुमकुम या तिलक लगाने से उस जगह की ऊर्जा बनी रहती है। माथे पर तिलक लगाते वक्त जब अंगूठे या उंगली से प्रेशर पड़ता है, तब चेहरे की त्वचा को रक्त सप्लाई करने वाली मांसपेशी सक्रिय हो जाती है। इससे चेहरे की कोश‍िकाओं तक अच्छी तरह रक्त पहुंचता 


3- : जमीन पर बैठकर भोजन


भारतीय संस्कृति के अनुसार जमीन पर बैठकर भोजन करना अच्छी बात होती है। 

वैज्ञानिक तर्क- पलती मारकर बैठना एक प्रकार का योग आसन है। इस पोजीशन में बैठने से मस्त‍िष्क शांत रहता है और भोजन करते वक्त अगर दिमाग शांत हो तो पाचन क्रिया अच्छी रहती है। इस पोजीशन में बैठते ही खुद-ब-खुद दिमाग से एक सिगनल पेट तक जाता है, कि वह भोजन के लिये तैयार हो जाये।


4- : हाथ जोड़कर नमस्ते करना


जब किसी से मिलते हैं तो हाथ जोड़कर नमस्ते अथवा नमस्कार करते हैं।

वैज्ञानिक तर्क- जब सभी उंगलियों के शीर्ष एक दूसरे के संपर्क में आते हैं और उन पर दबाव पड़ता है। एक्यूप्रेशर के कारण उसका सीधा असर हमारी आंखों, कानों और दिमाग पर होता है, ताकि सामने वाले व्यक्त‍ि को हम लंबे समय तक याद रख सकें। दूसरा तर्क यह कि हाथ मिलाने (पश्च‍िमी सभ्यता) के बजाये अगर आप नमस्ते करते हैं तो सामने वाले के शरीर के कीटाणु आप तक नहीं पहुंच सकते। अगर सामने वाले को स्वाइन फ्लू भी है तो भी वह वायरस आप तक नहीं पहुंचेगा।


5-: भोजन की शुरुआत तीखे से और अंत मीठे से


जब भी कोई धार्मिक या पारिवारिक अनुष्ठान होता है तो भोजन की शुरुआत तीखे से और अंत मीठे से होता है। 

वैज्ञानिक तर्क- तीखा खाने से हमारे पेट के अंदर पाचन तत्व एवं अम्ल सक्रिय हो जाते हैं। इससे पाचन तंत्र ठीक तरह से संचालित होता है। अंत में मीठा खाने से अम्ल की तीव्रता कम हो जाती है। इससे पेट में जलन नहीं होती है।


6-: पीपल की पूजा

तमाम लोग सोचते हैं कि पीपल की पूजा करने से भूत-प्रेत दूर भागते हैं। 

वैज्ञानिक तर्क- इसकी पूजा इसलिये की जाती है, ताकि इस पेड़ के प्रति लोगों का सम्मान बढ़े और उसे काटें नहीं। पीपल एक मात्र ऐसा पेड़ है, जो रात में भी ऑक्सीजन प्रवाहित करता ह


7-: दक्ष‍िण की तरफ सिर करके सोना


दक्ष‍िण की तरफ कोई पैर करके सोता है, तो लोग कहते हैं कि बुरे सपने आयेंगे, भूत प्रेत का साया आ जायेगा, आदि। इसलिये उत्तर की ओर पैर करके सोयें। 

वैज्ञानिक तर्क- जब हम उत्तर की ओर सिर करके सोते हैं, तब हमारा शरीर पृथ्वी की चुंबकीय तरंगों की सीध में आ जाता है। शरीर में मौजूद आयरन यानी लोहा दिमाग की ओर संचारित होने लगता है। इससे अलजाइमर, परकिंसन, या दिमाग संबंधी बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है। यही नहीं रक्तचाप भी बढ़ जाता है।


8-सूर्य नमस्कार

हिंदुओं में सुबह उठकर सूर्य को जल चढ़ाते हुए नमस्कार करने की परम्परा है। 

वैज्ञानिक तर्क- पानी के बीच से आने वाली सूर्य की किरणें जब आंखों में पहुंचती हैं, तब हमारी आंखों की रौशनी अच्छी होती है।


9-सिर पर चोटी


हिंदू धर्म में ऋषि मुनी सिर पर चुटिया रखते थे। आज भी लोग रखते हैं। 

वैज्ञानिक तर्क- जिस जगह पर चुटिया रखी जाती है उस जगह पर दिमाग की सारी नसें आकर मिलती हैं। इससे दिमाग स्थ‍िर रहता है और इंसान को क्रोध नहीं आता, सोचने की क्षमता बढ़ती है।


10-व्रत रखना


कोई भी पूजा-पाठ या त्योहार होता है, तो लोग व्रत रखते हैं।

वैज्ञानिक तर्क- आयुर्वेद के अनुसार व्रत करने से पाचन क्रिया अच्छी होती है और फलाहार लेने से शरीर का डीटॉक्सीफिकेशन होता है, यानी उसमें से खराब तत्व बाहर निकलते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार व्रत करने से कैंसर का खतरा कम होता है। हृदय संबंधी रोगों, मधुमेह, आदि रोग भी जल्दी नहीं लगते।


11-चरण स्पर्श करना


हिंदू मान्यता के अनुसार जब भी आप किसी बड़े से मिलें, तो उसके चरण स्पर्श करें। यह हम बच्चों को भी सिखाते हैं, ताकि वे बड़ों का आदर करें। 

वैज्ञानिक तर्क- मस्त‍िष्क से निकलने वाली ऊर्जा हाथों और सामने वाले पैरों से होते हुए एक चक्र पूरा करती है। इसे कॉसमिक एनर्जी का प्रवाह कहते हैं। इसमें दो प्रकार से ऊर्जा का प्रवाह होता है, या तो बड़े के पैरों से होते हुए छोटे के हाथों तक या फिर छोटे के हाथों से बड़ों के पैरों तक।


12-क्यों लगाया जाता है सिंदूर


शादीशुदा हिंदू महिलाएं सिंदूर लगाती हैं। 

वैज्ञानिक तर्क- सिंदूर में हल्दी, चूना और मरकरी होता है। यह मिश्रण शरीर के रक्तचाप को नियंत्रित करता है। चूंकि इससे यौन उत्तेजनाएं भी बढ़ती हैं, इसीलिये विधवा औरतों के लिये सिंदूर लगाना वर्जित है। इससे स्ट्रेस कम होता है।


13- तुलसी के पेड़ की पूजा

तुलसी की पूजा करने से घर में समृद्ध‍ि आती है। सुख शांति बनी रहती है। 

वैज्ञानिक तर्क- तुलसी इम्यून सिस्टम को मजबूत करती है। लिहाजा अगर घर में पेड़ होगा, तो इसकी पत्त‍ियों का इस्तेमाल भी होगा और उससे बीमारियां दूर होती हैं।


अगर पसंद आया तो शेयर कीजिये

अगर हिंदू परम्पराओं से जुड़े ये वैज्ञानिक तर्क आपको वाकई में पसंद आये हैं, तो इस लेख को शेयर कीजिये, ताकि आगे से कोई भी इस परम्परा को ढकोसला न कहे।

बुल्लेशाह की जय हो

 Chandra Bhushan

बुल्लेशाह को फिर से खोजें

'बुल्ला की जाणा मैं कौन?' अकेले में शून्य को थैया-थैया नाच दिखाकर थक गए फकीर बुल्लेशाह ने कोई तीन सदी पहले किसी दिन यह सवाल खुद से ही पूछा होगा। लेकिन बात पुरानी है। योगवाशिष्ठ में ठीक यही सवाल राम अपने गुरु वशिष्ठ से करते हैं। किसी अंधियारी रात में वह गुरु के घर का दरवाजा खटखटाते हैं। भीतर से गुरु पूछते हैं- कौन? राम बाहर से बोलते हैं- 'यही तो जानने आया हूं कि मैं हूं कौन?' 


यह कोई संयोग नहीं है कि इक्कीसवीं सदी में जाति, धर्म, सभ्यता, क्षेत्रीयता, राष्ट्रीयता आदि जैसे पहचान से जुड़े सवालों से खदबदा रहा दक्षिण एशिया कभी नुसरत फतेह अली खां, कभी वडाली बंधुओं, कभी रब्बी शेरगिल तो कभी ए. आर. रहमान के सुरों पर सवार बुल्लेशाह की रचनाओं में सुकून पा रहा है। बाबा का जीवनकाल 1680 से 1757 के बीच माना जाता है। वही दौर, जिसकी पहचान औरंगजेब की मजहबी तानाशाही और गुरु गोविंद सिंह की बगावत से जुड़ी है।


नवें गुरु तेग बहादुर के दिल्ली तख्त के सीधे निशाने पर होने के बावजूद इस फकीर ने उन्हें खुलेआम ग़ाज़ी (धर्मयोद्धा) करार दिया था। ऐसा योद्धा, जो धर्म के लिए लड़ता है, किसी एक धर्म के लिए नहीं। हिंसा-रक्तपात से भरे उस युग को ध्यान में रखें तो बाबा बुल्लेशाह की इस क़ाफ़ी (सूफी छंद) का अलग ही अर्थ निकलता है- ‘वाह-वाह माटी दी गुलजार। माटी घोड़ा, माटी जोड़ा माटी दा असवार। माटी माटी नूं दौड़ावे, माटी दी खड़कार। माटी माटी नूं मारन लागी, माटी दे हथियार...।’


मिट्टी का घोड़ा, मिट्टी का जोड़ा, मिट्टी का ही सवार। मिट्टी मिट्टी को दौड़ावे, मिट्टी की खड़कार। मिट्टी मिट्टी को मार रही है, मिट्टी के हथियार...वाह-वाह मिट्टी की गुलजार। बुल्लेशाह सूफी पंथ के कादरी सिलसिले से संबंध रखते थे, जो उस समय इस्लामी कट्टरपंथ के अग्रदूत के रूप में सक्रिय सरहिंदी तहरीक के मुकाबले उदार इस्लाम का प्रतिनिधित्व करता था। जहांगीर के बाद मुगल सल्तनत का सुसंस्कृत वारिस दारा शिकोह खुद को कादरी सिलसिले के बहुत करीब पाता था। दिल्ली तख्त पर जबतक उसका प्रभाव रहा, पंजाब में उदार और सहिष्णु इस्लाम की धारा बहती रही। 


लेकिन यह क्रम बाबा बुल्लेशाह की पैदाइश के ठीक तेरह साल पहले औरंगजेब के हाथों दारा शिकोह की पराजय के साथ टूट गया और कादरी सिलसिला अचानक उस समय की सभी सरकारों की नजर में धर्मद्रोह और बगावत के अड्डे की तरह जाना जाने लगा। बुल्लेशाह की कविता में कट्टरपंथ और शाही रौब-दाब को लेकर हिकारत एक हद तक उनके इस धार्मिक पंथ से भी प्रभावित है। हालांकि कवि की चेतना हमेशा सामूहिक से ज्यादा निजी ही हुआ करती है। 


‘बुल्ला की जाणा मैं कौन’ को ही गौर से सुनें तो फकीर बुल्लेशाह की विराट चेतना और उनके क्रांतिकारी अध्यात्म की सरहद छू सकते हैं। ‘ना मैं मोमिन विच्च मसीतां, ना मैं विच्च कुफर दिआं रीतां। ना मैं पाकां विच्च पलीतां, ना मैं मूसा ना फिरऔन। ना मैं अंदर बेद किताबां, ना विच भंगां होर शराबां। ना विच रिंदां मस्त खराबां, ना विच जागन ना विच सौन।... अव्वल आखर आप नूं जाना, ना कोई दूजा होर पिछाना। मैथों होर न कोई सियाना, बुल्ला शाह खड़ा है कौन।’ 


न तो मस्जिद में रमने वाला मोमिन हूं, न कुफ्र की रीत से कोई लेना-देना है। न पवित्र लोगों के बीच गंदा हूं, न मूसा हूं, न फराओ। न वेद और दूसरी किताबों में हूं, न भांग और शराबों में। न मस्त शराबियों के बीच खराब हुआ पड़ा हूं, न जागने वालों में हूं, न सोने वालों में।... प्रारंभ और अंत मैं खुद को ही जानता हूं। किसी और की मुझे पहचान नहीं है। मुझसे सयाना कोई और नहीं। बुल्लेशाह, तेरी शक्ल में ये कौन खड़ा है?


बुल्लेशाह के बारे में किस्सा है कि एक बार रमजान के महीने में वह अपने डेरे में बैठे बंदगी कर रहे थे और उनके चेले बाहर ड्योढ़ी पर पैर लटकाए गाजर खा रहे थे। कुछ रोजादार मुसलमान उधर से गुजरे और फकीर के डेरे पर लोगों को रोजे की परवाह न करते देख नाराज हो गए। पूछा- तुम लोग मुसलमान नहीं हो क्या? जवाब हां में मिला तो उनकी कुटाई कर दी। फिर उन्हें लगा कि कुछ सेवा उस उस्ताद की भी की जानी चाहिए, जिसके शागिर्द ऐसे हैं। 


भीतर जाकर पूछा- 'अरे तू कौन है बाबेया? हिंदू या मुसलमान?' बुल्लेशाह ने बाजू ऊपर करके एं-वें हाथ हिला दिए। मोमिनों को लगा, पागल है। बाद में चेलों ने पूछा, बाबा हमें तो बड़ी मार पड़ी, तुम बच कैसे गए? उन्होंने कहा, तुमसे कुछ पूछा था? वे बोले, मजहब पूछा था, मुसलमान बताया तो मारने लगे। बुल्लेशाह ने कहा- 'बेटा, कुछ बने हो, तभी मार खाई है। हम कुछ नहीं बने तो बच गए।'


सूफी संतों की आम छवि पढ़ाई-लिखाई को घंट पर मारने वाले मस्त-मलंगों की ही हुआ करती आई है। लेकिन इस छवि से उलट बाबा बुल्लेशाह को लोग अपने समय के एक कुलीन परिवार से आए हुए काफी पढ़े-लिखे व्यक्ति के रूप में जानते थे। उनकी मानसिक गति गांधी की तरह ज्ञान से भावना की ओर, पढ़े से अपढ़ होने की ओर, तर्क्य से अतर्क्य की ओर बढ़ने की थी। ऐसा सुयोग संसार में कुछेक विरले बौद्धिकों को ही हासिल हो पाता है। और जिन्हें होता भी है, उनमें से गिने-चुने ही इससे उपजी ऐंठ से बच पाते हैं।


बुल्लेशाह की क़ाफ़ियां सुनने में तो अच्छी लगती ही हैं लेकिन उन्हें पढ़ने का एक अलग आनंद है। एक अर्से से ये देवनागरी लिपि में उपलब्ध हैं। इन्हें पढ़ने के लिए आप में सिर्फ पंजाबी जुबान की कामचलाऊ समझ होनी चाहिए, और धार्मिक राग-द्वेष से मुक्त एक खुला दिमाग, जिसमें एक संत कवि का मर्म थाहने की लगन हो। बाबा बुल्लेशाह की जन्मभूमि और कर्मभूमि दोनों अभी पाकिस्तानी पंजाब में है। पता नहीं वहां उभरते मजहबी कट्टरपंथ ने उनके घर में उनके बागी सुर के लिए अभी कोई जगह भी छोड़ी है या नहीं।

प्रेम उपदेश

 प्रेम उपदेश  (परम गुरु हुज़ूर महाराज)


 24. मन का क़ायदा है कि दर्शन के वास्ते बहुत जल्दी करता है और जबकि यह चाह ज़ाहिर में जल्दी पूरी नहीं होती, इस सबब से मन में संशय पैदा होता है। पर हुज़ूर राधास्वामी दयाल शब्द स्वरूप से हर एक जीव के सदा संग हैं, यानी उसके अंतर में मौजूद हैं। सतगुरु रूप से प्रगट दर्शन अक्सर नहीं देते हैं। और इसमें भेद है, नहीं तो दुरुस्ती और तरक़्क़ी परमार्थी की रुक जाने का डर है, यानी आगे रास्ता जैसा चाहिए नहीं चलेगा और मन नीचे स्थान पर स्वरूप के दर्शन में संतोष करके मगन हो जावेगा और जो वे इस तरह पर जैसा जल्दी मन चाहता है दर्शन देकर ऊपर को खींचेंगे, तो अजब नहीं है कि इधर से टूट जावे या बेहोश होकर या मतवाला सा पड़ा रहे। इस वास्ते जैसा जैसा मुनासिब है, वे आप दया करके सच्चे परमार्थी का काम बनाते हैं। हर दम शुकराना उनकी दया का करना और प्रीति और प्रतीति चरनों में बढ़ाना चाहिए और जब घबराहट हो, उसको सहना और अपने मन की कचाई और मलीनता पर चित्त में शरमाना और पछताना और प्रार्थना के साथ दया और मेहर माँगते रहना मुनासिब है। और इस बात का चित्त में दृढ़ निश्चय और भरोसा रखना चाहिए कि हुज़ूर राधास्वामी दयाल को हर एक की तरक़्क़ी और दुरुस्ती, जो जो सच्चे होकर सरन में आये हैं, उनकी चाह से विशेष मंज़ूर है।

          

  25. मन की अजब हालत है कि यह चरनों में सत्तपुरुष राधास्वामी दयाल के सच्चा होकर नहीं लगता है और न सचौटी से बरताव करता है और दुनियाँ के भोगों की चाहों को नहीं छोड़ता, बल्कि उन्हीं को माँगता है। असल तो यह है कि जब तक कि हुज़ूर राधास्वामी दयाल अपनी मेहर की मौज से इसको अंतर में ठेका और ठिकाना न बख़्शेंगे, तब तक यह मन डावाँडोल रहने में लाचार है। इसका बस नहीं चलता किधर लगे और यह किसी तरफ़ बिना लगे रह नहीं सकता। और जब तक कि उद्यम के काम में रहा कुछ याद न आई और जब उससे निश्चिंत हुआ तब क्या करे। जो हुज़ूर सतगुरु राधास्वामी दयाल की सेवा करना चाहे, जैसे पोथी का पाठ या नाम का सुमिरन या शब्द का श्रवन या स्वरूप का ध्यान, तो जब तक कि इसको उसमें रस और कुछ मज़ा न मिले और ठिकाना हाथ न लगे, तो कैसे लगे। और इसको भय और भाव ऐसा नहीं है कि सब काम और चाहें इधर की छोड़ कर प्यासे की तरह उधर को दौड़कर चरन में लिपट जावे। जो इस क़दर प्यास और चाह होती, तो कुछ मुश्किल न होती। जैसे हाकिम और रोज़गार के ख़ौफ़ से इधर घंटों बेख़बर होकर काम में लग जाता है, ऐसे ही चाहिए था कि सतगुरु और चरन रस का ख़ौफ़ और शौक़ करके इधर भी लग जाता।

 पर असल में घाटा प्रेम और शौक़ का है, चाहे उसे शौक़ कहो चाहे ख़ौफ़। पर यह प्रेम सतगुरु की दात है। जो वे चाहें तो यह मन एक छिन में लग सकता है और सब कैफ़ियत उस वक़्त प्राप्त हो सकती है, पर वास्ते प्राप्ति इस ख़ास दया के क़ाबिलियत यानी अधिकार चाहिए और नहीं तो टक्कर मारा करे और चक्कर खाया करे, कुछ नहीं बन पड़ता है। 


इस वास्ते क्या कहा जावे, सब तरह क़सूर अपने भाग और शौक़ का है। हुज़ूर राधास्वामी दयाल की दया में कुछ संदेह नहीं है और जो चरनों में लगा रहा, तो यह कसर शौक़ और भाग की भी वे ही अपनी मेहर से एक दिन मिटा देवेंगे। उन्हीं का भरोसा रखना चाहिए और जो कभी अभ्यास के समय विशेष आनंद प्राप्त होवे, या कभी कोई सख़्त तकलीफ़ सिर पर आ पड़े, तो उसके बरदाश्त और हज़्म करने की ताक़त भी वे ही अपनी मेहर से बख़्शेंगे।


राधास्वामी

महिमा #ढाई_अक्षर की

महिमा  #ढाई_अक्षर की 


ढाई अक्षर का वक्र,

और ढाई अक्षर का तुंड।

ढाई अक्षर की रिद्धि,

और ढाई अक्षर की सिद्धि।

ढाई अक्षर का शंभु,

और ढाई अक्षर की सत्ति


ढाई अक्षर का ब्रम्हा

और ढाई अक्षर की सृष्टि।

ढाई अक्षर का विष्णु

और ढाई अक्षर की लक्ष्मी

ढाई अक्षर का कृष्ण

और ढाई अक्षर की कांता। (राधा रानी का दूसरा नाम)


ढाई अक्षर की दुर्गा

और ढाई अक्षर की शक्ति

ढाई अक्षर की श्रद्धा

और ढाई अक्षर की भक्ति

ढाई अक्षर का त्याग

और ढाई अक्षर का ध्यान।


ढाई अक्षर की तृप्ति

और ढाई अक्षर की तृष्णा।

ढाई अक्षर का धर्म

और ढाई अक्षर का कर्म

ढाई अक्षर का भाग्य

और ढाई अक्षर की व्यथा।


ढाई अक्षर का ग्रन्थ,

और ढाई अक्षर का संत।

ढाई अक्षर का शब्द

और ढाई अक्षर का अर्थ।

ढाई अक्षर का सत्य

और ढाई अक्षर का मिथ्या।


ढाई अक्षर की श्रुति

और ढाई अक्षर की ध्वनि।

ढाई अक्षर की अग्नि

और ढाई अक्षर का कुंड

ढाई अक्षर का मंत्र

और ढाई अक्षर का यंत्र।


ढाई अक्षर की सांस

और ढाई अक्षर के प्राण

ढाई अक्षर का जन्म

ढाई अक्षर की मृत्यु

ढाई अक्षर की अस्थि

और ढाई अक्षर की अर्थी


ढाई अक्षर का प्यार

और ढाई अक्षर का स्वार्थ।

ढाई अक्षर का मित्र

और ढाई अक्षर का शत्रु

ढाई अक्षर का प्रेम

और ढाई अक्षर की घृणा।


जन्म से लेकर मृत्यु तक

हम बंधे हैं ढाई अक्षर में।

हैं ढाई अक्षर ही वक़्त में,

और ढाई अक्षर ही अंत में।

समझ ना पाया कोई भी

है रहस्य क्या ढाई अक्षर में।

Wednesday, September 2, 2020

प्रेमपत्र

 **परम गुरु हुजूर महाराज- प्रेम पत्र- भाग 1


कल से आगे-( 24 )-इस वास्ते सब जीवों को चाहिए कि संत बचन को माने और मुआफिक  उनके हूक्म के भक्ति करके और जो जुगत वे बताते हैं उनकी प्रेम के साथ कमाई करके,जो रास्ता कि उन्होंने बताया है, उसी रास्ते होकर पहले सत्तलोक में पहुंच कर दर्शन सत्तपुरुष का करें और वहां से सत्तपुरुष की मदद लेकर राधास्वामी पद में, जो कुल मालिक और सबका निज भंडार है, पहुँचे।                                                              ( 25)  बाजे आदमी कहते हैं कि देहधारी मालिक का स्वरूप कैसे हो सकता है, वह तो बेहद और अनंत और अपार है और देहधारी का स्वरूप हददार है। यह बात भी निहायत नादानी यानी अनजानताई की है, क्योंकि सब कहते हैं कि मालिक सर्वव्यापक है  यानी सब जगह है , तो जो वह सब जगह है तो आदमी में भी जरूर मौजूद है पर किसी को नजर नहीं आता। जो कोई संतो की जुक्ती की कमाई करके अपने अंतर में मथन करेगा उसको मालिक का रुप जरूर नजर आना चाहिए , क्योंकि वह आवरणों यानी परदो से ढका हुआ है । जब अभ्यास करके सब आवरण दूर किये जावें, तब उस मालिक का जलवा और जमाल नजर आना चाहिए। पर किसी को इस भेद की खबर नहीं है, इस सबब से अपनी तुच्छ बुद्धि से,  जो निहायत अनजान है, ऐसी उल्टी समझ निकालते हैं। क्रमशः 🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**

पूज्य हुज़ूर का निर्देश

  कल 8-1-22 की शाम को खेतों के बाद जब Gracious Huzur, गाड़ी में बैठ कर performance statistics देख रहे थे, तो फरमाया कि maximum attendance सा...