Tuesday, December 13, 2022

भारत-पाकिस्तान सीमा

 

भारत और पाकिस्तान सीमा, अन्तर्राष्ट्रीय सीमा (आईबी) के रूप में भारत और पाकिस्तान के बीच एक अन्तर्राष्ट्रीय सीमा है, जो भारतीय राज्यों को पाकिस्तान के चार प्रांतों से अलग करती है। यह सीमा उत्तर में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलओसी) से, जो पाकिस्तान द्वारा नियंत्रित कश्मीर को भारतीय कश्मीर से अलग करती है, वाघा तक तक जाती है, जो कि पंजाब प्रांत और पाकिस्तान के पंजाब प्रांत को पूर्व में विभाजित करती है। दक्षिण में शून्य बिंदु, भारत के गुजरात और राजस्थान को पाकिस्तान के सिंध प्रांत से अलग करता है।[1]

भारत-पाकिस्तान सीमा(रेडक्लिफ रेखा)
India-Pakistan Border at Night.jpg
रात के समय सीमा का पैनोरमा, अरब सागर से लेकर हिमालय की तलहटी तक फैला हुआ है।
विशेषताएँ
शामिल देश भारत  पाकिस्तान
लम्बाई3,323 किलोमीटर (10,902,000 फीट)
इतिहास
स्थापित17 अगस्त 1947

भारत के विभाजन के बाद सर सिरिल रेडक्लिफ द्वार रेडक्लिफ रेखा के निर्माण के बाद।
वर्तमान आकार2 जुलाई 1972

शिमला संधि के अनुसमर्थन के बाद नियंत्रण रेखा का सीमांकन।
संधियाँकराची समझौताशिमला समझौता
टिप्पणियाँकश्मीर, भारत और पाकिस्तान के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा द्वारा बटा हुआ है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त नहीं है।
भारत-पाकिस्तान सीमा का मानचित्र

1947 में रेडक्लिफ रेखा के आधार पर तैयार किया गया और बनाया गया सीमा, जो पाकिस्तान और भारत को एक दूसरे से विभाजित करती है, विभिन्न शहरी इलाकों से लेकर निर्जन रेगिस्तान के विभिन्न इलाकों से होकर जाती है। आगे चल कर यह सीमा अरब सागर में, पाकिस्तान के मनोरा द्वीप से मुंबई के हार्बर के मार्ग पर चलती हुई दक्षिण पूर्व तक जाती है।

भारत और पाकिस्तान सीमा पर स्वतंत्रता के बाद से, दोनो देश के बीच कई संघर्ष और युद्ध देख चुका है, और यह दुनिया की सबसे जटिल सीमाओं में से एक है।[2] पीबीएस द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार सीमा की कुल लंबाई 2,900 किमी (1,800 मील) है।[2] यह 2011 में विदेश नीति में लिखे गए लेख के आधार पर, दुनिया की सबसे खतरनाक सीमाओं में से एक है।[3] भारत द्वारा लगभग 50 हजार खम्बों पर 150,000 तेज रोशनी वाले बल्ब स्थापित किये जाने के कारण रात में इसे अंतरिक्ष से भी देखा जा सकता है।[4][5][6]

वाघा,भारत-पाकिस्तान सीमा

मेरे तो रा धा स्व आ मी दयाल , दूसरो न कोई ।।

 मेरे तो रा धा स्व आ मी दयाल , दूसरो न कोई। तेरे तो रा धा स्व आ मी दयाल , दूसरो न कोई।।                                             

     मेरे तो रा धा स्व आ मी दयाल , दूसरो न कोई। मेरे तो , तेरे तो , सबके तो रा धा स्व आ मी दयाल , दूसरो न कोई ।।                                                                                            

 धार नरदेह हुए प्रगट , परम पुरुष सोई। मेरे तो रा धा स्व आ मी दयाल , दूसरो न कोई ।। दया दृष्टि डारी मो पै , प्रेम बेल बोई अब तो बेल फैल गई , आनंद फल देई। 

मेरे तो रा धा स्व आ मी दयाल , दूसरो न कोई ।।                                                                                   


  छांड़ि दई मन की मानी , सुमिरन लीन होई सतगुरु ढिंग बैठि बैठि , जनम सुफल कियो री 

मेरे तो रा धा स्व आ मी दयाल , दूसरो न कोई ।। चरनन में दीनी ठौर , भाग मोर जगो री हाथ निज धरा सिर पर , तार लियो मोही।

 मेरे तो रा धा स्व आ मी दयाल , दूसरो न कोई मेरे तो , तेरे तो , सबके तो रा धा स्व आ मी दयाल , दूसरो न कोई ।।

Monday, December 12, 2022

तीन लोक 14 भुवन.../

प्रस्तुति - रेणु दत्ता / आशा सिन्हा 


Hamari

 

विष्णुपुराण के अनुसार लोकों या भुवनों की संख्या 14 है। इनमें से 7 लोकों को ऊर्ध्वलोक व 7 को अधोलोक कहा गया है। यहाँ 7 ऊर्ध्वलोकों का विवरण निम्न है।


1. भूलोक: वह लोक जहाँ मनुष्य पैरों से या जहाज, नौका आदि से जा सकता है। अर्थात  हमारी पूरी पृथ्वी भूलोक के अन्तर्गत है।


2. भुवर्लोक: पृथ्वी से लेकर सूर्य तक अन्तरिक्ष में जो क्षेत्र है वह भुवर्लोक कहा गया है और यहाँ उसमें अन्तरिक्षवासी देवता निवास करते हैं।


3. स्वर्लोक: सूर्य से लेकर ध्रुवमण्डल तक जो प्रदेश है उसे स्वर्लोक कहा गया है और इस क्षेत्र में इन्द्र आदि स्वर्गवासी देवता निवास करते हैं।


पूर्वोक्त तीन लोकों को ही त्रिलोकी या त्रिभुवन कहा गया है और इन्द्र आदि देवताओं का अधिकारक्षेत्र इन्हीं लोकों तक सीमित है।


4. महर्लोक: यह लोक ध्रुव से एक करोड़ योजन दूर है। यहाँ भृगु आदि सिद्धगण निवास करते हैं।


5. जनलोक: यह लोक महर्लोक से दो करोड़ योजन ऊपर है और यहाँ सनकादिक आदि ऋषि निवास करते हैं।


6. तपलोक: यह लोक जनलोक से आठ करोड़ योजन दूर है और यहाँ वैराज नाम के देवता निवास करते हैं।


7. सत्यलोक: यह लोक तपलोक से बारह करोड़ योजन ऊपर है और यहाँ ब्रह्मा निवास करते हैं अतः इसे ब्रह्मलोक भी कहते हैं और सर्वोच्च श्रेणी के ऋषि मुनि यहीं निवास करते हैं।


जैसा कि विष्णु पुराण में कहा गया है नीचे के तीनों लोकों का स्वरूप उस तरह से चिरकालिक नहीं है यहाँ जिस तरह से ऊपर के लोकों का है और वे प्रलयकाल में नष्ट हो जाते हैं जबकि ऊपर के तीनों लोक इससे अप्रभावित रहते हैं।


अतः भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक को ‘कृतक लोक’ कहा गया है और जनलोक, तपलोक और सत्यलोक को ‘अकृतक लोक’। महर्लोक प्रलयकाल के दौरान नष्ट तो नहीं होता पर रहने के अयोग्य हो जाता है अतः वहाँ के निवासी जनलोक चले जाते हैं। यहां इस कारण महर्लोक को ‘कृतकाकृतक’ कहा गया है।


यहाँ जिस तरह से ऊर्ध्वलोक हैं और उसी तरह से सात अधोलोक भी हैं जिन्हें पाताल कहा गया है। यहाँ इन सात पाताल लोकों के नाम निम्न हैं।


1. अतल: यह हमारी पृथ्वी से दस हजार योजन की गहराई पर है और इसकी भूमि शुक्ल यानी सफेद है।


2. वितल: यह अतल से भी दस हजार योजन नीचे है और इसकी भूमि कृष्ण यानी काली है।


3. नितल: यह वितल से भी दस हजार योजन नीचे है और इसकी भूमि अरुण यानी प्रातः कालीन सूर्य के रङ्ग की है।


4. गभस्तिमान: यह नितल से भी दस हजार योजन नीचे है और इसकी भूमि पीत यानी पीली है।


5. महातल: गभस्तिमान से यह दस हजार योजन नीचे है और इसकी भूमि शर्करामयी यानी कँकरीली है।


6. सुतल: यह गभस्तिमान से दस हजार योजन नीचे है और इसकी भूमि शैली अर्थात पथरीली बतायी गयी है।


7. पाताल: यह सुतल से भी दस हजार योजन नीचे है और इसकी भूमि सुवर्णमयी यानी स्वर्ण निर्मित है।


इन सात अधोलोकों में दैत्य, दानव और नाग निवास करते हैं।


हम यह कह सकते हैं कि अन्ततोगत्वा हर लोक भगवान् के अधीन है। यहां (हर ईश्वरवादी ऐसा ही मानेगा।) फिर भी हम अलग अलग लोकों की प्रकृति को देखें तो यह माननें को बाध्य होगें कि जिस प्रकार हमारे लोक में कई राज्य है और उनकी शासनपद्धति भिन्न है और यहां शासक भी भिन्न हैं उसी प्रकार से अन्य लोकों में भी यही बात है।


पाताललोकों के वर्णन से प्रकट होता है कि उसमें दैत्यों, दानवों और नागों के बहुत से नगर हैं और यहां इसी प्रकार से स्वर्ग में भी इन्द्र, वरुण, चन्द्रमा आदि के नगर हैं। ऊपर के लोक महर्लोक जनलोक, तपलोक और सत्यलोक के निवासी इतने उन्नत हैं कि वहाँ किसी सत्ता की आवश्यकता ही नहीं है।

हनुमान जी के बारह नाम

 #प्रस्तुति -  रेणु दत्ता / आशा सिन्हा 


हनुमान जी भगवान शिव के ग्यारहवें रूद्र अवतार हैं। हनुमान जी विजय के प्रतीक हैं। शक्ति, ज्ञान और भक्ति के उदाहरण है हनुमान जी। हनुमान जी बुराई के विनाशक और भक्तों के रक्षक हैं।


हनुमान जी आठ सिद्धियां और नौ निधियों के दाता हैं। हनुमान जी के इन बारह नामों का पाठ करने से हमें दसों दिशाओं और आकाश- पाताल से भी आशीर्वाद प्राप्त होता है ।


रामचरितमानस में कहा गया है,

"कलयुग केवल नाम आधारा सुमिरि-सुमिरि नर उतर ही पारा" 


1. हनुमान : हनुमान का अर्थ होता है अहंकार का हनन करना।


2. अंजनी सुत : हनुमान जी का दूसरा नाम है अंजनी सुत । अंजनी उनकी माता का नाम है और सुत का अर्थ होता है पुत्र अथार्त माता अंजनी के पुत्र।


3 महाबल : हनुमान जी को महाबल या महाबली भी कहते हैं। हनुमान जी बहुत ही बलशाली है।


4. पवन पुत्र : हनुमान जी को पवन पुत्र भी कहते हैं क्योंकि उनके पिता पवन देव हैं अर्थात वायु देव ।


5 रामेष्ठ : हनुमान जी श्री राम के अनन्य भक्त थे और श्री राम को भी हनुमान जी बहुत प्रिय थे इसलिए उन्हें रामेष्ठ भी कहा जाता है।


6 फाल्गुन सखा : हनुमान जी को फाल्गुन सखा भी कहा जाता है। यहां फाल्गुन से आशय है अर्जुन और हनुमान जी अर्जुन के मित्र हैं।


7 पिंगाक्ष : हनुमान जी को पिंगाक्ष भी कहते हैं। पिंगाक्ष का अर्थ होता है भूरे नेत्र वाला अर्थात भूरी आंखों वाला । 


8 अमित विक्रम: हनुमान जी को अमित विक्रम भी कहते हैं अमित विक्रम का अर्थ होता है वीरता की साक्षात मूर्ति।


9 उदधि क्रमण : हनुमान जी को उदधि क्रमण भी कहते हैं क्योंकि हनुमान जी ने उदधि अथार्त समुद्र को लांघा था।


10 सीता शोक विनाशन : हनुमान जी ने माता सीता के शोक का नाश किया था।


11 लक्ष्मण प्राण दाता : हनुमान जी को लक्ष्मण प्राण दाता भी कहा गया है। जब लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए थे तब हनुमान जी संजीवनी बूटी लेकर आए और लक्ष्मण जी को जीवित किया था ।


12 दशग्रीव दर्पहा: भगवान हनुमान को दशग्रीव दर्पहा भी कहा गया है। हनुमान जी ने रावण के घमंड को दूर किया था।


पूज्य हुज़ूर का निर्देश

  कल 8-1-22 की शाम को खेतों के बाद जब Gracious Huzur, गाड़ी में बैठ कर performance statistics देख रहे थे, तो फरमाया कि maximum attendance सा...