Sunday, October 16, 2011

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गांधी के विचार



रविवार, २१ नवम्बर २०१०


विचार-६९ :: गांधीजी और गांधीवाद-७ :: विवाह - विषयासक्त प्रेम

गांधीजी और गांधीवाद-७
विवाह - विषयासक्त प्रेम
"एक अच्छा विचार, हमें फ़िज़ूल के श्रम से बचाता है!"
नित्यमस्नान-शौच-बाध्यो बलवान्‌ रागमलावलेपः।
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नाशयति न दिंमोह इवोन्मार्गप्रवर्तकः पुरुषमत्यासंगो विषयेषु।
(बाणभट्ट, कादम्बरी)
  • अर्थात्‌ विषयासक्ति रूपी मल का लेप नित्य स्नान और शुद्धता से भी नष्ट नहीं होता। विषयों में आसक्ति भी उसी प्रकार मनुष्य को कुमार्ग पर ले जाकर नष्ट कर देती है जिस प्रकार दिग्भ्रम।
  • गांधी जी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। आज उसी की चर्चा।
  • तेरह वर्ष की उम्र में 1882 में गांधीजी का विवाह हुआ। तीन सगाइयों के बाद उनका विवाह हुआ। दो में तो कन्या मर गई। तीसरी सगाई सात साल की उम्र में हुई थी। उनकी पत्नी का नाम कस्तूरबा बाई था। कस्तूरबा बाई के वे अत्यंत दिवाने थे पर बाद के दिनों में उन्हें अपनी इस विषयासक्ति पर शर्म महसूस होती थी। हो सकता है इसी कारण ने बाल-विवाह पर उनके मन में बड़े कठोर विचारों को जन्म दिया और वे इसे भीषण बुराई मानते रहे।
  • उन दिनों बाल-विवाह क़ानून वैध था। उन दिनों तो इसे इस हिसाब से अच्छा माना जाता था कि लोग शादी हो जाने के बाद दुनियाई आकर्षण से बचेंगे। प्रायः ऐसी शादी सुखी होती थी। कम से कम गांधी जी के बारे में तो ऐसा ही था। उन्होंने जीवन भर कस्तूरबा बाई में अपने जीवन की सुखशांति पाई।
  • पर बचपन में गांधी जी, जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, विषयासक्त थे। और साथ ही ईर्ष्यालू भी। वे कस्तूरबा बाई पर दबाव डालते कि बिना पूछे कहीं मत जाओ, यहां नहीं जाओ, वहां नहीं जाओ। पर वो अधिक स्वतंत्रता से काम लेतीं और इससे चिढकर कई बार दोनों में बोलचाल बंद हो जाती।
  • शादी के बाद कस्तूरबा बाई छह महीने गांधी जी के साथ रहती थीं। छह महीने बाद कस्तूरबा बाई मायके चली जाती थीं। यह उन दिनों की प्रथा थी। जिसकी निष्ठा सच्ची है, उसकी रक्षा भगवान ही कर देते हैं। जहां समाज में बाल विवाह जैसी घातक परंपरा थी तो वहीं इससे मुक्ति दिलाने वाला यह रिवाज़ भी था जिससे गांधी जी की विषयासक्ति से बचाव भी हो पाता था। १३ साल से १९ साल की उम्र तक यह क्रम चलता रहा।
  • घर की प्रथा ऐसी थी कि गांधी जी उनसे सिर्फ़ रात में ही मिल सकते थे। उन दिनों बड़ों के सामने तो स्त्री को देखा भी नहीं जा सकता था, बात-चीत तो दूर की बात थी। वो अनपढ थीं। इसलिए गांधी जी उन्हें बहुत कुछ सीखाना चाहते थे। गांधी जी के विषयासक्त प्रेम ने उन्हें समय ही नहीं दिया। इसका गाधी जी को काफ़ी पश्चाताप था। यहां तक कि अपनी आत्मकथा में इसकी आत्म-निंदा करते हुए कहते हैं,
“मैं मानता हूं कि अगर मेरा प्रेम विषय से दूषित न होता, तो आज वह विदुषी होतीं। मैं उनके पढने के आलस्य को जीत सकता था, क्योंकि मैं जानता हूं कि शुद्ध प्रेम के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है।”
  • गांधी जी जैसा विषयासक्त प्रेमी थे वैसे ही वहमी पति भी थे। उनके वहम को उनकी मित्रता भी बढाती थी। मित्रों की बात में आकर वे धर्मपत्नी को कष्ट पहुंचाते थे। पत्नी सब सहन करती थी। स्त्री तो होती ही हैं सहनशीलता की मूर्ति। बाद में जब गांधी जी को अहिंसा का सूक्ष्म ज्ञान हुआ तो और जब वो ब्रह्मचर्य की महिमा को समझे तो उन्हें यह बात समझ में आई कि पत्नी सहचारिणी है, सहधर्मिणी है, दासी नहीं। सन्देह में जिए गए अपने दिनों को बाद में याद कर गांधी जी लिखते हैं,
“मुझे अपनी मूर्खता और विषयान्ध निर्दयता पर क्रोध आता है और मित्रता-विषयक अपनी मूर्च्छा पर दया आती है।”
  • योगवासिष्ठ में कहा गया है, ‘भोगा भवमहारोगाः तृष्णाश्चमृगतृष्णिकाः।’ अर्थात्‌ विषयभोग संसार के महारोग हैं और तृष्णाएं मृगतृष्णा है।
  • इसी तरह की मृगतृष्णा में हुई भूल को महात्मा गांधी जी ने अपने जीवन का काला दाग मानते हुए इसे ‘दुहरा कलंक’ कहा है। यह घटना उनके पिता की मृत्यु जे जुड़ी है। उस समय गांधी जी सोलह साल के थे। उनके पिता जी बीमार रहते थे। गांधी जी अपने पिता की सेवा-सुश्रुषा करते थे। उनके घाव धोने से लेकर मरहम लगाना, दवा पिलाना और रात में पैरों की मालिश करने का काम भी करते थे। पैर दबाते-दबाते जब पिताजी सो जाते थे तब गांधी जी सोने जाते थे।
  • उन दिनों गांधी जी के चाचाजी भी वहीं थे। वे उनके पास ही सोते थे। कस्तूरबा बाई भी घर में ही थीं, इसलिए गांधी जी अपने ‘विषयासक्त प्रेम’ में भी मगन थे। एक रात चाचा के द्वारा इज़ाज़त दिए जाने के बाद गांधी जी बीमार पिता के सिरहाने से उठकर अपने शयन-गृह में पहुंचे और गहरी नींद में सो रही कस्तूरबा बाई को जगाया। वे तब गर्भावस्था में थीं। पांच-सात मिनट बाद ही नौकर ने दरवाज़ा खटखटाया और पिता के देहावसान की सूचना दी। गांधी जी को बहुत पश्चाताप हुआ कि अगर वे विषयान्ध न होते तो उस अंतिम घड़ी में अपने पिताजी के साथ होते। सेवा के समय भी विषय की इच्छा के काले दाग को गांधी जी कभी भूल नहीं पाए। पिता के प्रति सब कुछ छोड़ सकने वाले गांधी जी विषय को नहीं छोड़ सके, और इसे वे अक्षम्य त्रुटि मानते रहे। इसीलिए एक पत्नी और एक पति व्रत को ब्रह्मचर्य व्रत मानने वाले और एक पत्नी व्रत का पालन करने वाले गान्धी जी अपने को विषयान्ध मानते थे।
  • कस्तूरबा बाई ने जिस बच्चे को जन्म दिया वह भी ३-४ दिन ही जीवित रहा। इस पूरे प्रकरण में गांधी जी की पीड़ा बहुत गहन थी। काफ़ी दिनों तक यह उन्हें सालती रही।
  • भारवि ने किरातार्जुनीय में कहा है, ‘आपातरम्या विषयाः पर्यन्तपरितापिनः।’ अर्थात्‌ विषय-भोग तत्काल ही रमणीय प्रतीत होते हैं, अन्ततः वे ताप ही पहुंचाते हैं।
आज की चर्चा गुरुभक्त सिंह ‘भक्त’ के विक्रमादित्य की इन पंक्तियों से करना चाहूंगा,

यौन शिक्षा

विकिपीडिया, एक मुक्त ज्ञानकोष से

वीसवीं शताब्दी के आरम्भिक दिनों का एक पोस्टकार्ड में अनवांछित गर्भ की समस्या का चित्रण
यौन शिक्षा (Sex education) एक विस्तृत संकल्पना है जो मानव यौन अंगों , जनन, संभोग या रति क्रिया , यौनिक स्वास्थ्य, जनन-सम्बन्धी अधिकारों एवं यौन-आचरण सम्बन्धी शिक्षा से सम्बन्धित है। माता-पिता एवं अभिभावक, मित्र-मण्डली, विद्यालयी पाठ्यक्रम, सार्वजनिक स्वास्थ्य जागरूकता के कार्यक्रम आदि यौन शिक्षा के प्रमुख साधन हैं।

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विवाह पूर्व यौन संबंधों के बारे में बाइबल क्या कहती है?



प्रश्न: विवाह पूर्व यौन संबंधों के बारे में बाइबल क्या कहती है?

उत्तर:
सारी अन्य प्रकार की यौन-अनैतिकताओं के साथ ही विवाह पूर्व संबंधों को पवित्र शास्त्र में लगातार दोषी ठहराया गया है (प्रेरितों के काम १५:२०; रोमियो १:२९; १कुरिन्थियों ५:१; ६:१३१८; ७:२; १०:८; २कुरिन्थियों १२:२१; गलतियों ५:१९; इफिसियों ५:३; कुलुस्सियों ३:५; १थिस्सलुनीकियो ४:३; यहूदा ७) । बाइबल विवाह पूर्व आत्मसंयम का समर्थन करती है । विवाह पूर्व यौन संबंध उतने ही गलत हैं जितना कि व्यभिचार तथा अन्य प्रकार की यौन अनैतिकताऐं, क्योंकि उन सब में यौन संबंध किसी ऐसे व्यक्ति के साथ होते हैं जिनसे आप विवाहित ना हों । एक पति तथा पत्नी के बीच यौन संबंधों ही परमेश्वर को मान्य है (इब्रानियों १३:४) ।

विवाह पूर्व यौन संबंध कई कारणो से समान्य हो गया है। अधिकतर हम यौन संबंधों के मन बहलाव के पहलू की ओर केन्द्रित रहते हैं, बिना उसके पुनर्जन्म के पहलू को पहचाने । हाँ, यौन संबंध आनन्ददायक होते हैं । परमेश्वर ने उनको इसी तरह का बनाया है । वो चाहता है कि पुरूष और स्त्री यौन क्रियाओं का आनन्द लें (विवाह की सीमाओं में रहकर) । यद्यपि, यौन-संबंधों का मूल उद्देश्य आनन्द नहीं है, परन्तु वस्तुतः प्रजनन है । परमेश्वर विवाह पूर्व यौन संबंधों को अवैद्य इसलिये नहीं घोषित करता कि वो हमसे हमारा आनन्द वंचित कर दे, परन्तु हमें उन अनचाही गर्भावस्थाओं से तथा उन बच्चों के जन्म से जिन्हें मॉ-बाप नहीं चाहते हैं या उनके लिए तैयार नहीं है को बचाना है । कल्पना करें कि हमारा संसार कितना अच्छा हो जायेगा अगर हम परमेश्वर के यौन संबंधों के प्रतिमान का अनुसरण करें : कम यौन प्रेषित रोग, कम कुऑरी माताऐं, कम अनचाही गर्भाव्स्थायें, कम गर्भपात वगैरह । आत्म-संयम ही परमेश्वर की एकमात्र नीति है जब विवाह पूर्व यौन संबंधों की बात आती है । आत्मसंयम जिंदगियॉ बचाता है, शिशुओं की रक्षा करता है, यौन संबंधों को उचित मूल्य देता है, तथा सबसे महत्वपूर्ण रूप से परमेश्वर को सम्मान देता है ।



Friday, October 14, 2011

छत्रपति शिवाजी

शिवाजी

मुक्त ज्ञानकोष विकिपीडिया से
शिवाजी राजे भोंसले
छत्रपति

रायगढ़ में शिवाजी की प्रतिमा
राज का समय १६७४१६८०
जन्म १९ फरवरी, १६३०

शिवनेरी दुर्ग
मृत्यु ३ अप्रैल, १६८०

रायगढ़
पूर्वाधिकारी शाहजी
उत्तराधिकारी सम्भाजी
पिता शाहजी
माता जीजाबाई
छत्रपति शिवाजी राजे भोसले (१६३०-१६८०) ने १६७४ में पश्चिम भारत में मराठा साम्राज्य की नींव रखी। उसने कई वर्ष औरंगज़ेब के मुगल साम्राज्य से संघर्ष किया।

अनुक्रम

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[संपादित करें] आरंभिक जीवन

शाहजी भोंसले की प्रथम पत्नी जीजाबाई की कोख से शिवाजी महाराज का जन्म १९ फरवरी, १६३० को शिवनेरी दुर्ग में हुआ था। शिवनेरी का दुर्ग पूना (पुणे) से उत्तर की तरफ़ जुन्नार नगर के पास था। उनका बचपन राजा राम, गोपाल, संतों की कहानियों और सत्संग मे बीता । वो सभी कलाओ मे माहिर थे, उन्होने बचपन मे राजनीति एवं लडाई की शिक्षा ली थी । उनके पिता अप्रतिम शूरवीर थे और अपनी दूसरी पत्नी तुकाबाई मोहिते थी । जीजाबाई उच्चकुल में उत्पन्न असाधारण प्रतिभाशाली थी । जीजाबाई जाधव वंश की थी और उनके पिता एक शक्तिशाली सामन्त थे । शिवाजी महाराज के चरित्र पर माता-पिता का बहुत प्रभाव पड़ा। बचपन से ही वे उस युग के वातावरण और घटनाओँ को भली प्रकार समझने लगे थे। शासक वर्ग की करतूतों पर वे झल्लाते थे और बेचैन हो जाते थे। उनके बाल-हृदय में स्वाधीनता की लौ प्रज्वलित हो गयी थी। उन्होंने कुछ स्वामिभक्त साथियों का संगठन किया। अवस्था बढ़ने के साथ विदेशी शासन की बेड़ियाँ तोड़ फेंकने का उनका संकल्प प्रबलतर होता गया।
शिवाजी महाराज का विवाह सन् १४ मइ १६४० में साइवाईं निम्बालकर के साथ लाल महल,पुना में हुआ था ।

[संपादित करें] सैनिक वर्चस्व का आरंभ

शिवाजी महाराज ने अपने संरक्षक कोणदेव की सलाह पर बीजापुर के सुल्तान की सेवा करना अस्वीकार कर दिया । उस समय बीजापुर का राज्य आपसी संघर्ष तथा विदेशी आक्रमणकाल के दौर से गुजर रहा था । ऐसे साम्राज्य के सुल्तान की सेवा करने के बदले उन्होंने मावलों को बीजापुर के ख़िलाफ संगठित करने लगे । मावल प्रदेश पश्चिम घाट से जुड़ा है और कोई 150 किलोमीटर लम्बा और 30 किमी चौड़ा है । वे संघर्षपूर्ण जीवन व्यतीत करने के कारण कुशल योद्धा माने जाते हैं । इस प्रदेश में मराठा और सभि जाति के लोग रहते हैं । शिवाजी महाराज इन सभि जाति के लोगो को लेकर मावलों (मावळा) नाम देकर सभि को सन्घटित किया और उनसे सम्पर्क कर उनके प्रदेश से परिचित हो गए थे । मावल युवकों को लाकर उन्होंने दुर्ग निर्माण का कार्य आरंभ कर दिया था । मावलों का सहयोग शिवाजी महाराज के लिए बाद में उतना ही महत्वपूर्ण साबित हुआ जितना शेरशाह सूरी के लिए अफ़गानों का साथ ।
उस समय बीजापुर आपसी संघर्ष तथा मुगलों के आक्रमण से परेशान था । बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह ने बहुत से दुर्गों से अपनी सेना हटाकर उन्हें स्थानीय शासकों या सामन्तों के हाथ सौंप दिया था । जब आदिलशाह बीमार पड़ा तो बीजापुर में अराजकता फैल गई और शिवाजी महाराज ने अवसर का लाभ उठाकर बीजापुर में प्रवेश का निर्णय लिया । शिवाजी महाराज ने इसके बाद के दिनों में बीजापुर के दुर्गों पर अधिकार करने की नीति अपनाई । सबसे पहला दुर्ग था तोरण का दुर्ग ।

[संपादित करें] दुर्गों पर नियंत्रण

तोरण का दुर्ग पूना के दक्षिण पश्चिम में 30 किलोमीटर की दूरी पर था । उन्होंने सुल्तान आदिलशाह के पास अपना दूत बेजकर खबर भिजवाई कि वे पहले किलेदार की तुलना में बेहतर रकम देने को तैयार हैं और यह क्षेत्र उन्हें सौप दिया जाय । उन्होने आदिलशाह के दरबारियों को पहले ही रिश्वत देकर अपने पक्ष में कर लिया था और अपने दरबारियों की सलाह के मुताबिक आदिलशाह ने शिवाजी महाराज को उस दुर्ग का अधिपति बना दिया । उस दुर्ग में मिली सम्पत्ति से शिवाजी महाराज ने दुर्ग की सुरक्षात्मक कमियों की मरम्मती का काम करवाया । इससे कोई 10 किलोमीटर दूर राजगढ़ का दुर्ग था और शिवाजी महाराज ने इस दुर्ग पर भी अधिकार कर लिया ।
शिवाजी महाराज की इस साम्राज्य विस्तार की नीति की भनक जब आदिलशाह को मिली तो वह क्षुब्ध हुआ । उसने शाहजी राजे को अपने पुत्र को नियंत्रण में रखने को कहा । शिवाजी महाराज ने अपने पिता की परवाह किये बिना अपने पिता के क्षेत्र का प्रबन्ध अपने हाथों में ले लिया और अतिव्यय का बहाना बनाकर नियमित लगान बन्द कर दिया । राजगढ़ के बाद उन्होने चाकन के दुर्ग पर अधिकार कर लिया और उसके बाद कोंडना के दुर्ग पर । कोंडना (कोन्ढाणा) पर अधिकार करते समय उन्हें घूस देनी पड़ी । कोंडना पर अधिकार करने के बाद उसका नाम सिंहगढ़ रखा गया । शाहजी राजे को पूना और सूपा की जागीरदारी दी गई थी और सूपा का दुर्ग उनके सम्बन्धी बाजी मोहिते के हाथ में थी । शिवाजी महाराज ने रात के समय सूपा के दुर्ग पर आक्रमण करके दुर्ग पर अधिकार कर लिया और बाजी मोहिते को शाहजी राजे के पास कर्नाटक भेज दिया । उसकी सेना का कुछ भाग भी शिवाजी महाराज की सेवा में आ गया । इसी समय पुरन्दर के किलेदार की मृत्यु हो गई और किले के उत्तराधिकार के लिए उसके तीनों बेटों में लड़ाई छिड़ गई । दो भाइयों के निमंत्रण पर शिवाजी महाराज पुरन्दर पहुँचे और कूटनीति का सहारा लेते हुए उन्होंने सभी भाइय़ों के बन्दी बना लिया । इस तरह पुरन्दर के किले पर भी उनका अधिकार स्थआपित हो गया । अब तक की घटना में शिवाजी महाराज को कोई युद्ध या खूनखराबा नहीं करना पड़ा था । 147 इस्वी तक वे चाकन से लेकर नीरा तक के भूभाग के भी अधिपति बन चुके थे । अपनी बढ़ी सैनिक शक्ति के साथ शिवाजी महाराज ने मैदानी इलाकों में प्रवेश करने की योजना बनाई ।
एक अश्वारोही सेना का गठन कर शिवाजी महाराज ने आबाजी सोन्देर के नेतृत्व में कोंकण के विरूद्ध एक सेना भेजी । आबाजी ने कोंकण सहित नौ अन्य दुर्गों पर अधिकार कर लिया । इसके अलावा ताला, मोस्माला और रायटी के दुर्ग भी शिवाजी महाराज के अधीन आ गए थे । लूट की सारी सम्पत्ति रायगढ़ में सुरक्षित रखी गई । कल्याण के गवर्नर को मुक्त कर शिवाजी महाराज ने कोलाबा की ओर रुख किया और यहाँ के प्रमुखों को विदेशियों के खिलाफ़ युद्ध के लिए उकसाया ।Deepak Tyagi

[संपादित करें] शाहजी की बन्दी और युद्धविराम

बीजापुर का सुल्तान शिवाजी महाराज की हरकतों से पहले ही आक्रोश में था । उसने शिवाजी महाराज के पिता को बन्दी बनाने का आदेश दे दिया । शाहजी राजे उस समय कर्नाटक में थे और एक विश्वासघाती सहायक बाजी घोरपड़े द्वारा बन्दी बनाकर बीजापुर लाए गए । उनपर यह भी आरोप लगाया गया कि उन्होंने कुतुबशाह की सेवा प्राप्त करने की कोशिश की थी जो गोलकोंडा का शासक था और इस कारण आदिलशाह का शत्रु । बीजापुर के दो सरदारों की मध्यस्थता के बाद शाहाजी महाराज को इस शर्त पर मुक्त किया गया कि वे शिवाजी महाराज पर लगाम कसेंगे । अगले चार वर्षों तक शिवाजी महाराज ने बीजीपुर के ख़िलाफ कई आक्रमण नहीं किया । इस दौरान उन्होंने अपनी सेना संगठित की एक्।

[संपादित करें] प्रभुता का विस्तार


बिरला मंदिर, दिल्लीमें शिवाजी की मूर्ति
शाहाजी की मुक्ति के शर्तों के मुताबिक शिवाजी ने बीजापुर के क्षेत्रों पर आक्रमण तो नहीं किया पर उन्होंने दक्षिण-पश्चिम में अपनी शक्ति बढ़ाने की चेष्टा की । पर इस क्रम में जावली का राज्य बाधा का काम कर रहा था । यह राज्य सतारा के सुदूर उत्तर पश्चिम में वामा और कृष्णा नदी के बीच में स्थित था । यहाँ का राजा चन्द्रराव मोरे था जिसने ये जागीर शिवजि से प्राप्त की थी । शिवाजी ने मोरे शासक चन्द्रराव को स्वराज मे शमिल होने को कहा पर चन्द्रराव बीजापुर के सुल्तान के साथ मिल गया । सन् १६५६ में शिवाजी ने अपनी सेना लेकर जावली पर आक्रमण कर दिया । चन्द्रराव मोरे और उसके दोनों पुत्रों ने शिवाजी के साथ लड़ाई की पर अन्त में वे बन्दी बना लिए गए पर चन्द्रराव भाग गया। स्थानीय लोगों ने शिवाजी के इस कृत्य का विरोध किया पर वे विद्रोह को कुचलने में सफल रहे । इससे शिवाजी को उस दुर्ग में संगृहीत आठ वंशों की सम्पत्ति मिल गई । इसके अलावा कई मावल सैनिक[मुरारबाजी देशपाडे] भी शिवाजी की सेना में सम्मिलित हो गए ।

[संपादित करें] मुगलों से पहली मुठभेड़

शिवाजी के बीजीपुर तथा मुगल दोनों शत्रु थे । उस समय शहज़ादा औरंगजेब दक्कन का सूबेदार था । इसी समय 1 नवम्बर, 1656 को बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह की मृत्यु हो गई जिसके बाद बीजापुर में आराजकता का माहौल पैदा हो गया । इस स्थिति का लाभ उठाकर औरंगजेब ने बीजापुर पर आक्रमण कर दिया । और् शिवाजी ने औरंगजेब का साथ देने की बजाय उसपर धावा बोल दिया । उनकी सेना ने जुन्नार नगर पर आक्रमण कर ढेर सारी सम्पत्ति के साथ 200 घोड़े लूट लिये । अहमदनगर से 700 घोड़े, चार हाथी के अलावा उन्होंने गुण्डा तथा रेसिन के दुर्ग पर भी लूटपाट मचाई । इसके परिणामस्वरूप औरंगजेव शिवाजी से खफ़ा हो गया और मैत्री वार्ता समाप्त हो गई । शाहजहाँ के आदेश पर औरंगजेब ने बीजापुर के साथ संधि कर ली और इसी समय शाहजहाँ बीमार पड़ गया । उसके व्याधिग्रस्त होते ही औरंगजेब उत्तरभारत चला गया और वहाँ शाहजहाँ को केद कर के बाद मुगल साम्राज्य का शाह बन गया ।

[संपादित करें] कोंकण पर अधिकार

दक्षिण भारत में औरंगजेब की अनुपस्थिति और बीजापुर की डवाँडोल राजनैतिक स्थित को जान् कर शिवाजी ने समरजी को जंजीरा पर आक्रमण करने को कहा । पर जंजीरा के सिद्दियों के सथ उनकि लडाइ कए दिनो तक चलि । इसके बाद शिवाजी ने खुद जंजीरा पर आक्रमण किया और दक्षिण कोंकण पर अधिकार कर लिया और दमन के पुर्तगालियों से वार्षिक कर एकत्र किया । कल्य़ाण तथा भिवण्डी पर अधिकार करने के बाद वहाँ नौसैनिक अड्डा बना लिया । इस समय तक शिवाजी 40 दुर्गों के मालिक बन चुके थे ।

[संपादित करें] बीजापुर से संघर्ष

इधर औरंगजेब के आगरा (उत्तर की ओर) लौट जाने के बाद बीजापुर के सुल्तान ने भी राहत की सांस ली । अब शिवाजी ही बीजापुर के सबसे प्रबल शत्रु रह गए थे । शाहजी को पहले ही अपने पुत्र को नियंत्रण में रखने को कहा गया था पर शाहजी ने इसमे अपनी असमर्थता जाहिर की । शिवाजी से निपटने के लिए बीजापुर के सुल्तान ने अब्दुल्लाह भटारी (अफ़ज़ल खाँ) को शिवाजी के विरूद्ध भेजा । अफ़जल ने 120000 सैनिकों के साथ 1659 में कूच किया । तुलजापुर के मन्दिरों को नष्ट करता हुआ वो सतारा के 30 किलोमीटर उत्तर वाई, शिरवल के नजदिक नामक स्थान तक आ गया । पर शिवाजी प्रतापगढ़ के दुर्ग पर हि रहे । अफजल खाँ ने अपने दूत कृष्णजी भास्कर को सन्धि-वार्ता के लिए भेजा । उसने उसके मार्फत ये संदेश भिजवाया कि अगर शिवाजी बीजापुर की अधीनता स्वीकार कर ले तों सुल्तान उसे उन सभी क्षेत्रों का अधिकार दे देंगे जो शिवाजी के नियंत्रण में हैं । साथ ही शिवाजी को बीजापुर के दरबार में एक सम्मानित पद प्राप्त होगा । हँलांकि शिवाजी के मंत्री और सलाहकार अस संधि के पक्ष मे थे पर शिवाजी को ये वार्ता रास नहीं आई । उन्होंने कृष्णजी भास्कर को उचित सम्मान देकर अपने दरबार में रख लिया और अपने दूत गोपीनीथ को वस्तुस्थिति का जायजा लेने अफजल खाँ के पास भेजा । गोपीनाथ और कृष्णजी भास्कर से शिवाजी को ऐसा लगा कि सन्धि का षडयंत्र रचकर अफजल खाँ शिवाजी को बन्दी बनाना चाहता है । अतः उन्होंने युद्ध को बदले अफजल खाँ को एक बहुमूल्य उपहार भेजा और इस तरह अफजल खाँ को सन्धि वार्ता के लिए राजी किया । सन्धि स्थल पर दोनों ने अपने सैनिक घात लगाकर रखे थे मिलने के स्तन पर जब दोनो मिले तब अफजल खन ने अपने कट्यार से शिवजि पे वार किया बचाव मे शिवाजी ने अफजल खाँ को अपने वस्त्रो वाघनखो से मार दिया [१० नवमबर १६५९]|
अफजल खाँ की मृत्यु के बाद शिवाजी ने पन्हाला के दुर्ग पर अधिकार कर लिया । इसके बाद पवनगढ़ और वसंतगढ़ के दुर्गों पर अधिकार करने के साथ ही साथ उन्होंने रूस्तम खाँ के आक्रमण को विफल भी किया । इससे राजापुर तथा दावुल पर भी उनका कब्जा हो गया । अब बीजापुर में आतंक का माहैल पैदा हो गया और वहाँ के सामन्तों ने आपसी मतभेद भुलाकर शिवाजी पर आक्रमण करने का निश्चय किया । 2 अक्टूबर, 1665 को बीजापुरी सेना ने पन्हाला दुर्ग पर अधिकार कर लिया । शिवाजी संकट में फंस चुके थे पर रात्रि के अंधकार का लाभ उठाकर वे भागने में सफल रहे । बीजापुर के सुल्तान ने स्वयं कमान सम्हालकर पन्हाला, पवनगढ़ पर अपना अधिकार वापस ले लिया, राजापुर को लूट लिया और श्रृंगारगढ़ के प्रधान को मार डाला । इसी समय कर्नाटक में सिद्दीजौहर के विद्रोह के कारण बीजापुर के सुल्तान ने शिवाजी के साथ समझौता कर लिया । इस संधि में शिवाजी के पिता शाहजी ने मध्यस्थता का काम किया । सन् 1662 में हुई इस सन्धि के अनुसार शिवाजी को बीजापुर के सुल्तान द्वारा स्वतंत्र शासक की मान्यता मिली । इसी संधि के अनुसार उत्तर में कल्याण से लेकर दक्षिण में पोण्डा तक (250 किलोमीटर) का और पूर्व में इन्दापुर से लेकर पश्चिम में दावुल तक (150 किलोमीटर) का भूभाग शिवाजी के नियंत्रण में आ गया । शिवाजी की सेना में इस समय तक 30000 पैदल और 1000 घुड़सवार हो गए थे ।

[संपादित करें] मुगलों के साथ संघर्ष

उत्तर भारत में बादशाह बनने की होड़ खतम होने के बाद औरंगजेब का ध्यान दक्षिण की तरफ गया । वो शिवाजी की बढ़ती प्रभुता से परिचित था और उसने शिवाजी पर नियंत्रण रखने के उद्येश्य से अपने मामा शाइस्ता खाँ को दक्षिण का सूबेदार नियुक्त किया । शाइस्का खाँ अपने १,५०,००० फोज लेकर सूपन और चाकन के दुर्ग पर अधिकार कर पूना पहुँच गया । उसने ३ साल तक मावल मे लुटमार कि । एक रात शिवाजी ने अपने ३५० मवलो के साथ उनपर हमला कर दिया । शाइस्ता तो खिड़की के रास्ते बचनिकलने में कामयाब रहा पर उसे इसी क्रम में अपनी चार अंगुलियों से हाथ धोना पड़ा । शाइस्ता खाँ के पुत्र, तथा चालीस रक्षकों और अन्गिनत फोज का कत्ल कर दिया गया । इस घटना के बाद औरंगजेब ने शाइस्ता को दक्कन के बदले बंगाल का सूबेदार बना दिया और शाहजादा मुअज्जम शाइस्ता की जगह लेने भेजा गया ।

[संपादित करें] सूरत में लूट

इस जीत से शिवाजी की प्रतिष्ठा में इजाफ़ा हुआ । 6 साल शास्ताखान ने अपनी १५०००० फोउज लेकर राजा शिवाजी का पुरा मुलुख जलाकर तबाह कर दिया था। ईस् लिए उस् का हर्जाना वसूल करने के लिये शिवाजी ने मुगल क्षेत्रों में लूटपाट मचाना आरंभ किया । सूरत उस समय पश्चिमी व्यापारियों का गढ़ था और हिन्दुस्तानी मुसलमानों के लिए हज पर जाने का द्वार । यह एक समृद्ध नगर था और इसका बंदरगाह बहुत महत्वपूर्ण था । शिवाजी ने चार हजार की सेना के साथ छः दिनों तक सूरत को के धनड्य व्यापारि को लूटा आम आदमि को नहि लुटा और फिर लौट गए । इस घटना का जिक्र डच तथा अंग्रेजों ने अपने लेखों में किया है । उस समय तक यूरोपीय व्यापारियों ने भारत तथा अऩ्य एशियाई देशों में बस गये थे । नादिर शाह के भारत पर आक्रमण करने तक (1739) किसी भी य़ूरोपीय शक्ति ने भारतीय मुगल साम्राज्य पर आक्रमण करने की नहीं सोची थी ।
सूरत में शिवाजी की लूट से खिन्न होकर औरंगजेब ने इनायत खाँ के स्थान पर गयासुद्दीन खां को सूरत का फौजदार नियुक्त किया । और शहजादा मुअज्जम तथा उपसेनापति राजा जसवंत सिंह की जगह दिलेर खाँ और राजा जयसिंह की नियुक्ति की गई । राजा जयसिंह ने बीजापुर के सुल्तान, यूरोपीय शक्तियाँ तथा छोटे सामन्तों का सहयोग लेकर शिवाजी पर आक्रमण कर दिया । इस युद्ध में शिवाजी को हानि होने लगी और हार कीसम्भावना को देखते हुए शिवाजी ने सन्धि का प्रस्ताव भेजा । जून 1665 में हुई इस सन्धि के मुताबिक शिवाजी 23 दुर्ग मुगलों को दे देंगे और इस तरह उनके पास केवल 12 दुर्ग बच जाएंगे । इन 23 दुर्गों से होने वाली आमदनी 4 लाख हूण सालाना थी । बालाघाट और कोंकण के क्षेत्र शिवाजी को मिलेंगे पर उन्हें इसके बदले में 13 किस्तों में 40 लाख हूण अदा करने होंगे । इसके अलावा प्रतिवर्ष 5 लाख हूण का राजस्व भी वे देंगे । शिवाजी स्वयं औरंगजेब के दरबार में होने से मुक्त रहेंगे पर उनके पुत्र शम्भाजी को मुगल दरबार में खिदमत करनी होगी । बीजापुर के खिलाफ शिवाजी मुगलों का साथ देंगे ।

[संपादित करें] आगरा में आमंत्रण और पलायन

शिवाजी को आगरा बुलाया गया जहाँ उन्हें लगा कि उन्हें उचित सम्मान नहीं मिल रहा है । इसके खिलाफ उन्होने अपना रोश भरे दरबार में दिखाया और औरंगजेब पर विश्वासघात का आरोप लगाया । औरंगजेब इससे क्षुब्ध हुआ और उसने शिवाजी को नज़रकैद कर दिया और उनपर ५००० सेनिको के पहरे लगा दीय॥ कुछ ही दिनो बाद[१८ अगस्त १६६६ को] राजा शिवाजी को मार डालने का इरादा ओंरन्ग्जेब का था । लेकिन अपने अजोड साहस ओर युक्ति के साथ शिवाजी और सम्भाजी दोनों इससे भागने में सफल रहे[१७ अगस्त १६६६] । सम्भाजी को मथुरा में एक विश्वासी ब्राह्मण के यहाँ छोड़ शिवाजी बनारस, गया, पुरी होते हुए सकुशल राजगढ़ पहुँच गए [२ सप्टेम्ब‍र १६६६] । इससे मराठों को नवजीवन सा मिल गया । औरंगजेब ने जयसिंह पर शक करके उसकी हत्या विष देकर करवा डाली । जसवंत सिंह के द्वारा पहल करने के बाद सन् 1668 में शिवाजी ने मुगलों के साथ दूसरी बार संधि की । औरंगजेब ने शिवाजी को राजा की मान्यता दी । शिवाजी के पुत्र शम्भाजी को 5000 की मनसबदारी मिली और शिवाजी को पूना, चाकन और सूपा का जिला लौटा दिया गया । पर, सिंहगढ़ और पुरन्दर पर मुगलों का अधिपत्य बना रहा ।
सन् 1670 में सूरत नगर को दूसरी बार शिवाजी ने लूटा । नगर से 132 लाख की सम्पत्ति शिवाजी के हाथ लगी और लौटते वक्त उन्होंने मुगल सेना को सूरत के पास फिर से हराया ।

[संपादित करें] राज्याभिषेक


छत्रपति शिवाजी
सन् १६७४ तक शिवाजी ने उन सारे प्रदेशों पर अधिकार कर लिया था जो पुरन्दर की संधि के अन्तर्गत उन्हें मुगलों को देने पड़े थे ।
६ जून १६७४ को शिवाजी ने शास्त्रानुसार अपना राज्याभिषेक करवाया । विभिन्न राज्यों के दूतों, प्रतिनिधियों के अलावा विदेशी व्यापारियों को भी इस समारोह में आमंत्रित किया गया । शिवाजी ने छत्रपति की उपाधि ग्रहण की । काशी के पण्डित विशेश्वर जी भट्ट को इसमें विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था । पर उनके राज्याभिषेक के 12 दिन बाद ही उनकी माता का देहांत हो गया । इस कारण से 4 अक्टूबर 1674 को दूसरी बार उनका राज्याभिषेक हुआ । दो बार हुए इस समारोह में लघभग 50 लाख रुपये खर्च हुए । इस समारोह में हिन्दू स्वराज की स्थापना का उद्घोष किया गया था । विजयनगर के पतन के बाद दक्षिण में यह पहला हिन्दू साम्राज्य था । एक स्वतंत्र शासक की तरह उस्ने अपने नामका सिक्का चलवाया ।इसके बाद बीजापुर के सुल्तान ने कोंकण विजय के लिए अपने दो सेनाधीशों को शिवाजी के विरूद्ध भेजा पर वे असफल रहे ।

[संपादित करें] दक्षिण में दिग्विजय

सन् 1677-78 में शिवाजी का ध्यान कर्नाटक की ओर गया । बम्बई के दक्षिण मे कोंकण, तुङभद्रा नदी के पश्चिम में बेलगाँव तथा धारवाड़ का क्षेत्र, मैसूर, वैलारी, त्रिचूर तथा जिंजी पर अधिकार करने के बाद 4 अप्रैल, 1680 को शिवाजी का देहांत हो गया ।

[संपादित करें] मृत्यु और उत्तराधिकार

तीन सप्ताह की बीमारी के बाद शिवाजी की मृत्यु अप्रैल 1680 में हुई । उस समय शिवाजी के उत्तराधिकार शम्भाजी को मिले। शिवाजी के ज्येष्ठ पुत्र शम्भाजी थे और दूसी पत्नी से राजाराम नाम एक दूसरा पुत्र था । उस समय राजाराम की उम्र मात्र 10 वर्ष थी अतः मराठों ने शम्भाजी को राजा मान लिया । उसि समय औरंगजेब राजा शिवजि का देहान्त देखकर अपनी पुरे भारत पर राज्य करने कि अभिलाशा से अपनी ५,००,००० सेना सागर लेकर दक्शिन भारत जीतने निकला । औरंगजेबने दक्शिन मे आतेही अदिल्शाहि २ दिनो मे ओर कुतुबशहि १ हि दिनो मे खतम कर दी । पर राजा सम्भाजी के नेत्रुत्व मे मराठाओने ९ साल युद्ध करते हुये अपनी स्वतन्त्रता बरकरा‍र रखी । औरंगजेब के पुत्र शहजादा अकबर ने औरंगजेब के खिलाफ विद्रोह कर दिया । शम्भाजी ने उसको अपने यहाँ शरण दी । औरंगजेब ने अब फिर जोरदार तरिकेसे शम्भाजी के खिलाफ आक्रमण करना शुरु किया । उसने अंततः 1689 में फितुरी से शम्बाजी को मुकरव खाँ द्वारा बन्दी बना लिया । औरंगजेब ने राजा सम्भाजी को बदसुलुकि ओउर बुरी हाल कर के मार दिया । अपनी राजा को औरंगजेब ने बदसुलुकि ओउर बुरी हाल मारा हुआ देखकर सबी मराठा स्वराज्य क्रोधीत हुआ । उन्होने अपनी पुरी ताकद से तीसरा राजा राम के नेत्रुत्व मे मुगलों से संघर्ष जारी रखा ।1700 इस्वी में राजाराम की मृत्यु हो गई । उसके बाद राजाराम की पत्नी ताराबाई ने 4 वर्षीय पुत्र शिवाजी द्वितीय की संरक्षिका बनकर राज करती रही । आखिरकार २५ साल मराठा स्वराज्य के यूदध लडके थके हुये औरंगजेब की उसी छ्त्रपती शिवाजी के स्वराज्य मे दफन हुये ।

[संपादित करें] शासन और व्यक्तित्व

शिवाजी को एक कुशल और प्रबुद्ध सम्राट के रूप में जाना जाता है हँलांकि उसे अपने बचपन में पारम्परिक शिक्षा कुछ खास नहीं मिली थी । पर वह् भारतीय इतिहास और राजनीति से वाकिफ़ था । उस्ने शुक्राचार्य तथा कौटिल्य को आदर्श मानकर कूटनीति का सहारा लेना कई बार उचित समझा था । अपने समकालीन मुगलों की तरह वह् भी निरंकुश शासक थ, अर्थात शासन की समूची बागडोर राजा के हाथ में ही थी । पर उस्के प्रशासकीय कार्यों में मदद के लिए आठ मंत्रियों की एक परिषद थी जिन्हें अष्टप्रधान कहा जाता था । इसमें मंत्रियों के प्रधान को पेशवा कहते थे जो राजा के बाद सबसे प्रमुख हस्ती था । अमात्य वित्त और राजस्व के कार्यों को देखता था तो मंत्री राजा की व्यक्तिगत दैनन्दिनी का खयाल रखाता था । सचिव दफ़ातरी काम करते थे जिसमे शाही मुहर लगाना और सन्धि पत्रों का आलेख तैयार करना शामिल होते थे । सुमन्त विदेश मंत्री था । सेना के प्रधान को सेनापति कहते थे । दान और धार्मिक मामलों के प्रमुख को पण्डितराव कहते थे । न्यायाधीश न्यायिक मामलों का प्रधान था ।

छत्रपति शिवाजी द्वारा चलाया गया सिक्का
मराठा साम्राज्य तीन या चार विभागों में विभक्त था । प्रत्येक प्रान्त में एक सूबेदार था जिसे प्रान्तपति कहा जाता था । हरेक सूबेदार के पास भी एक अष्टप्रधान समिति होती थी । कुछ प्रान्त केवल करदाता थे और प्रसासन के मामले में स्वतंत्र । न्यायव्यवस्था प्राचीन पद्धति पर आधारित थी । शुक्राचार्य, कौटिल्य और हिन्दू धर्म शास्त्रों को आधार मानकर निर्णय दिया जाता था । गाँव के पटेल फौजदारी मुकदमों की जाँच करते थे । राज्य की आय का साधन भूमिकर था पर चौथ और सरदेशमुखी से भी राजस्व वसूला जाता था । चौथ पड़ोसी राज्यों की सुरक्षा की गारंटी के लिया वसूलेजाने वाला कर था । शिवाजी अपने को मराठों का सरदेशमुख कहता थ और इसी हैसियत से सरदेशमुखी कर वसूला जाता था ।

[संपादित करें] धार्मिक नीति

शिवाजी एक समर्पित कत्तर हिन्दु था पर वह् धार्मिक सहिष्णुता के पक्षपाती भी थे । उस्के साम्राज्य में मुसलमानों को धार्मिक स्वतंत्रता थी और मुसलमानों को धर्मपरिवर्तन के लिेए विवश नहीं किया जाता था । कई मस्जिदों के निर्माण के लिए शिवाजी ने अनुदान दिया । हिन्दू पण्डितों की तरह मुसलमान सन्तों और फ़कीरों को भी सम्मान प्राप्त था । उस्कि सेना में मुसलमानों की संख्या अधिक थी । पर वह् हिन्दू धर्म का संरक्षक था । पारम्परिक हिन्दू मूल्यों तथा शिक्षा पर बल दिया जाता था । वह् अपने अभियानों का आरंभ भी अक्सर दशहरा के मौके पर करते थे

[संपादित करें] चरित्र

शिवाजी महाराज को अपने पिता से स्वराज कि शिक्शा ही मिली जब बीजापुर के सुल्तान ने शाहजी राजे को बन्दी बना लिया तो एक आदर्श पुत्र ती तरह उस्ने बीजापुर के शाह से सन्धि कर शाहजी राजे को छुड़वा लिया । इससे उनके चरित्र में एक उदार अवयव ऩजर आता है । उसेक बाद उन्होने पिता की हत्या नहीं करवाई जैसाकि अन्य सम्राट किया करते थे । शाहजी राजे के मरने के बाद ही उन्होने अपना राज्याभिषेक करवाया हँलांकि वो उस समय तक अपने पिता से स्वतंत्र होकर एक बड़े साम्राज्य के अधिपति हो गये थे । उनके नेतृत्व को सब लोग स्वीकार करते थे यही कारण है कि उनके शासनकाल में कोई आन्तरिक विद्रोह जैसी प्रमुख घटना नहीं हुई थी ।
वह् एक अच्छे सेनानायक के साथ एक अछा कूटनीतिज्ञ भी था । कई जगहों पर उन्होने सीधे युद्ध लड़ने की बजाय भग लिया था । लेकिन येही उनकी कुट निती थी, जो हर बार बडेसे बडे शत्रुको मात देनेमे उनका साथ देती रही।
शिवाजी महाराज की "गनिमी कावा" नामक कुट निती, जिसमे शत्रुपर अचानक आक्रमण करके उसे हराया जाता है, विलोभनियतासे और आदरसहित याद किया जाता है।
शिवाजी महाराज के गौरव मे ये पन्क्तियान लिख गई है :-
"शिवरायांचे आठवावे स्वरुप । शिवरायांचा आठवावा साक्षेप । 
 शिवरायांचा आठवावा प्रताप । भूमंडळी ॥"

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Tuesday, October 11, 2011

जगजीत सिंह


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जगजीत सिंह

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JagjitSingh.jpg
जगजीत सिंह (8 फरवरी 1941 - 10 अक्टूबर, 2011) एक बहुत लोकप्रिय गज़ल गायक थे। उनका संगीत काफ़ी मधुर है, और उनकी आवाज़ संगीत के साथ खूबसूरती से विलय होती है। खालिस उर्दू जानने वालों की मिल्कियत समझी जाने वाली, नवाबों-रक्कासाओं की दुनिया में झनकती और शायरों की महफ़िलों में वाह-वाह की दाद पर इतराती ग़ज़लों को आम आदमी तक पहुंचाने का श्रेय अगर किसी को पहले पहल दिया जाना हो तो जगजीत सिंह का ही नाम ज़ुबां पर आता है। उनकी ग़ज़लों ने न सिर्फ़ उर्दू के कम जानकारों के बीच शेरो-शायरी की समझ में इज़ाफ़ा किया बल्कि ग़ालिब, मीर, मजाज़, जोश और फ़िराक़ जैसे शायरों से भी उनका परिचय कराया। जगजीत सिंह को सन २००३ में भारत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

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[संपादित करें] आरंभिक दिन

जगजीत जी का जन्म 8 फरवरी [[1941] म्रतु १०ओक्तुबर २०११ को राजस्थान के गंगानगर में हुआ था। पिता सरदार अमर सिंह धमानी भारत सरकार के कर्मचारी थे। जगजीत जी का परिवार मूलतः पंजाब के रोपड़ ज़िले के दल्ला गांव का रहने वाला है। मां बच्चन कौर पंजाब के ही समरल्ला के उट्टालन गांव की रहने वाली थीं। जगजीत का बचपन का नाम जीत था। करोड़ों सुनने वालों के चलते सिंह साहब कुछ ही दशकों में जग को जीतने वाले जगजीत बन गए। शुरूआती शिक्षा गंगानगर के खालसा स्कूल में हुई और बाद पढ़ने के लिए जालंधर आ गए। डीएवी कॉलेज से स्नातक की डिग्री ली और इसके बाद कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएशन भी किया.
बहुतों की तरह जगजीत जी का पहला प्यार भी परवान नहीं चढ़ सका। अपने उन दिनों की याद करते हुए वे कहते हैं, ”एक लड़की को चाहा था। जालंधर में पढ़ाई के दौरान साइकिल पर ही आना-जाना होता था। लड़की के घर के सामने साइकिल की चैन टूटने या हवा निकालने का बहाना कर बैठ जाते और उसे देखा करते थे। बाद मे यही सिलसिला बाइक के साथ जारी रहा। पढ़ाई में दिलचस्पी नहीं थी। कुछ क्लास मे तो दो-दो साल गुज़ारे.” जालंधर में ही डीएवी कॉलेज के दिनों गर्ल्स कॉलेज के आसपास बहुत फटकते थे। एक बार अपनी चचेरी बहन की शादी में जमी महिला मंडली की बैठक मे जाकर गीत गाने लगे थे। पूछे जाने पर कहते हैं कि सिंगर नहीं होते तो धोबी होते। पिता के इजाज़त के बग़ैर फ़िल्में देखना और टाकीज में गेट कीपर को घूंस देकर हॉल में घुसना आदत थी।

[संपादित करें] संगीत का सफ़र

बचपन मे अपने पिता से संगीत विरासत में मिला। गंगानगर मे ही पंडित छगन लाल शर्मा के सानिध्य में दो साल तक शास्त्रीय संगीत सीखने की शुरूआत की। आगे जाकर सैनिया घराने के उस्ताद जमाल ख़ान साहब से ख्याल, ठुमरी और ध्रुपद की बारीकियां सीखीं। पिता की ख़्वाहिश थी कि उनका बेटा भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में जाए लेकिन जगजीत पर गायक बनने की धुन सवार थी। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान संगीत मे उनकी दिलचस्पी देखकर कुलपति प्रोफ़ेसर सूरजभान ने जगजीत सिंह जी को काफ़ी उत्साहित किया। उनके ही कहने पर वे १९६५ में मुंबई आ गए। यहां से संघर्ष का दौर शुरू हुआ। वे पेइंग गेस्ट के तौर पर रहा करते थे और विज्ञापनों के लिए जिंगल्स गाकर या शादी-समारोह वगैरह में गाकर रोज़ी रोटी का जुगाड़ करते रहे। १९६७ में जगजीत जी की मुलाक़ात चित्रा जी से हुई। दो साल बाद दोनों १९६९ में परिणय सूत्र में बंध गए।

[संपादित करें] गुज़रा ज़माना

जगजीत सिंह फ़िल्मी दुनिया में प्लेबैक सिंगिंग (पार्श्वगायन) का सपना लेकर आए थे। तब पेट पालने के लिए कॉलेज और ऊंचे लोगों की पार्टियों में अपनी पेशकश दिया करते थे। उन दिनों तलत महमूद, मोहम्मद रफ़ी साहब जैसों के गीत लोगों की पसंद हुआ करते थे। रफ़ी-किशोर-मन्नाडे जैसे महारथियों के दौर में पार्श्व गायन का मौक़ा मिलना बहुत दूर था। जगजीत जी याद करते हैं, ”संघर्ष के दिनों में कॉलेज के लड़कों को ख़ुश करने के लिए मुझे तरह-तरह के गाने गाने पड़ते थे क्योंकि शास्त्रीय गानों पर लड़के हूट कर देते थे.” तब की मशहूर म्यूज़िक कंपनी एच एम वी (हिज़ मास्टर्स वॉयस) को लाइट क्लासिकल ट्रेंड पर टिके संगीत की दरकार थी। जगजीत जी ने वही किया और पहला एलबम ‘द अनफ़ॉरगेटेबल्स (१९७६)’ हिट रहा। जगजीत जी उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं, ”उन दिनों किसी सिंगर को एल पी (लॉग प्ले डिस्क) मिलना बहुत फ़ख्र की बात हुआ करती थी.” बहुत कम लोग जानते हैं कि सरदार जगजीत सिंह धीमान इसी एलबम के रिलीज़ के पहले जगजीत सिंह बन चुके थे। बाल कटाकर असरदार जगजीत सिंह बनने की राह पकड़ चुके थे। जगजीत ने इस एलबम की कामयाबी के बाद मुंबई में पहला फ़्लैट ख़रीदा था।

[संपादित करें] आम आदमी की ग़ज़ल

जगजीत सिंह ने ग़ज़लों को जब फ़िल्मी गानों की तरह गाना शुरू किया तो आम आदमी ने ग़ज़ल में दिलचस्पी दिखानी शुरू की लेकिन ग़ज़ल के जानकारों की भौहें टेढ़ी हो गई। ख़ासकर ग़ज़ल की दुनिया में जो मयार बेग़म अख़्तर, कुन्दनलाल सहगल, तलत महमूद, मेहदी हसन जैसों का था.। उससे हटकर जगजीत सिंह की शैली शुद्धतावादियों को रास नहीं आई। दरअसल यह वह दौर था जब आम आदमी ने जगजीत सिंह, पंकज उधास सरीखे गायकों को सुनकर ही ग़ज़ल में दिल लगाना शुरू किया था। दूसरी तरफ़ परंपरागत गायकी के शौकीनों को शास्त्रीयता से हटकर नए गायकों के ये प्रयोग चुभ रहे थे। आरोप लगाया गया कि जगजीत सिंह ने ग़ज़ल की प्योरटी और मूड के साथ छेड़खानी की। लेकिन जगजीत सिंह अपनी सफ़ाई में हमेशा कहते रहे हैं कि उन्होंने प्रस्तुति में थोड़े बदलाव ज़रूर किए हैं लेकिन लफ़्ज़ों से छेड़छाड़ बहुत कम किया है। बेशतर मौक़ों पर ग़ज़ल के कुछ भारी-भरकम शेरों को हटाकर इसे छह से सात मिनट तक समेट लिया और संगीत में डबल बास, गिटार, पिआनो का चलन शुरू किया..यह भी ध्यान देना चाहिए कि आधुनिक और पाश्चात्य वाद्ययंत्रों के इस्तेमाल में सारंगी, तबला जैसे परंपरागत साज पीछे नहीं छूटे।
प्रयोगों का सिलसिला यहीं नहीं रुका बल्कि तबले के साथ ऑक्टोपेड, सारंगी की जगह वायलिन और हारमोनियम की जगह कीबोर्ड ने भी ली। कहकशां और फ़ेस टू फ़ेस संग्रहों में जगजीत जी ने अनोखा प्रयोग किया। दोनों एलबम की कुछ ग़ज़लों में कोरस का इस्तेमाल हुआ। जलाल आग़ा निर्देशित टीवी सीरियल कहकशां के इस एलबम में मजाज़ लखनवी की ‘आवारा’ नज़्म ‘ऐ ग़मे दिल क्या करूं ऐ वहशते दिल क्या करूं’ और फ़ेस टू फ़ेस में ‘दैरो-हरम में रहने वालों मयख़ारों में फूट न डालो’ बेहतरीन प्रस्तुति थीं। जगजीत ही पहले ग़ज़ल गुलुकार थे जिन्होंने चित्रा जी के साथ लंदन में पहली बार डिजीटल रिकॉर्डिंग करते हुए ‘बियॉन्ड टाइम अलबम’ जारी किया।
इतना ही नहीं, जगजीत जी ने क्लासिकी शायरी के अलावा साधारण शब्दों में ढली आम-आदमी की जिंदगी को भी सुर दिए। ‘अब मैं राशन की दुकानों पर नज़र आता हूं’, ‘मैं रोया परदेस में’, ‘मां सुनाओ मुझे वो कहानी’ जैसी रचनाओं ने ग़ज़ल न सुनने वालों को भी अपनी ओर खींचा।
शायर बशीर बद्र जगजीत सिंह जी के पसंदीदा शायरों में हैं। निदा फ़ाज़ली के दोहों का एलबम ‘इनसाइट’ कर चुके हैं। जावेद अख़्तर के साथ ‘सिलसिले’ ज़बर्दस्त कामयाब रहा। लता मंगेशकर जी के साथ ‘सजदा’, गुलज़ार के साथ ‘मरासिम’ और ‘कोई बात चले’, कहकशां, साउंड अफ़ेयर, डिफ़रेंट स्ट्रोक्स और मिर्ज़ा ग़ालिब अहम हैं। जगजीत जी ने राजेश रेड्डी, कैफ़ भोपाली, शाहिद कबीर जैसे शायरों के साथ भी काम किया है।

[संपादित करें] फ़िल्मी सफ़रनामा

१९८१ में रमन कुमार निर्देशित ‘प्रेमगीत’ और १९८२ में महेश भट्ट निर्देशित ‘अर्थ’ को भला कौन भूल सकता है। ‘अर्थ’ में जगजीत जी ने ही संगीत दिया था। फ़िल्म का हर गाना लोगों की ज़ुबान पर चढ़ गया था। इसके बाद फ़िल्मों में हिट संगीत देने के सारे प्रयास बुरी तरह नाकामयाब रहे। कुछ साल पहले डिंपल कापड़िया और विनोद खन्ना अभिनीत फ़िल्म लीला का संगीत औसत दर्ज़े का रहा। १९९४ में ख़ुदाई, १९८९ में बिल्लू बादशाह, १९८९ में क़ानून की आवाज़, १९८७ में राही, १९८६ में ज्वाला, १९८६ में लौंग दा लश्कारा, १९८४ में रावण और १९८२ में सितम के गीत चले और न ही फ़िल्में। ये सारी फ़िल्में उन दिनों औसत से कम दर्ज़े की फ़िल्में मानी गईं। ज़ाहिर है कि जगजीत सिंह ने बतौर कम्पोज़र बहुत पापड़ बेले लेकिन वे अच्छे फ़िल्मी गाने रचने में असफल ही रहे। इसके उलट पार्श्वगायक जगजीत जी सुनने वालों को सदा जमते रहे हैं। उनकी सहराना आवाज़ दिल की गहराइयों में ऐसे उतरती रही मानो गाने और सुनने वाले दोनों के दिल एक हो गए हों। कुछ हिट फ़िल्मी गीत ये रहे-
प्रेमगीत’ का ‘होठों से छू लो तुम मेरा गीत अमर कर दो’ ‘खलनायक’ का ‘ओ मां तुझे सलाम’ ‘दुश्मन’ का ‘चिट्ठी ना कोई संदेश’ ‘जॉगर्स पार्क’ का ‘बड़ी नाज़ुक है ये मंज़िल’ ‘साथ-साथ’ का ‘ये तेरा घर, ये मेरा घर’ और ‘प्यार मुझसे जो किया तुमने’ ‘सरफ़रोश’ का ‘होशवालों को ख़बर क्या बेख़ुदी क्या चीज़ है’ ‘ट्रैफ़िक सिगनल’ का ‘हाथ छुटे भी तो रिश्ते नहीं छूटा करते’ (फ़िल्मी वर्ज़न) ‘तुम बिन’ का ‘कोई फ़रयाद तेरे दिल में दबी हो जैसे’ ‘वीर ज़ारा’ का ‘तुम पास आ रहे हो’ (लता जी के साथ) ‘तरक़ीब’ का ‘मेरी आंखों ने चुना है तुझको दुनिया देखकर’ (अलका याज्ञनिक के साथ)

[संपादित करें] विवादों में रहे जगजीत

बहुत कम लोगों को पता होगा कि अपने संघर्ष के दिनों में जगजीत सिंह इस कदर टूट चुके थे कि उन्होंने स्थापित प्लेबैक सिंगरों पर तीखी टिप्पणी तक कर दी थी। हालांकि आज वे इसे अपनी भूल स्वीकारते हैं। स्टेट्टमैन लिखता है कि, किशोर दा ने जगजीत सिंह के उस बयान पर कमेंट किया था – ”how dare these so-called ghazal singers criticize an icon that Manna Dey, Mukesh and I dare not criticize. Rafi was unique.” ज़ाहिर है जगजीत जी ने महान पार्श्व गायक मोहम्मद रफ़ी साहब पर जो कहा वो उचित नहीं होगा। ये भी देखने वाली बात है कि जगजीत जी ने अपनी पसंद के जिन फ़िल्मी गानों का कवर वर्सन एलबम क्लोज़ टू माइ हार्ट में किया था.। उसमें रफ़ी साहब का कोई गाना नहीं था। ख़ैर, इसके बाद उनकी दिलचस्पी राजनीति में भी बढ़ी और भारत-पाक करगिल लड़ाई के दौरान उन्होंने पाकिस्तान से आ रही गायकों की भीड़ पर एतराज किया। तब जगजीत सिंह जी का कहना था कि उनके आने पर बैन लगा देना चाहिए। दरअसल, जगजीत जी को पाकिस्तान ने वीज़ा देने से इंकार कर दिया था.। लेकिन जब पाकिस्तान से बुलावा आया तब जगजीत सिंह जी की नाराज़गी दूर हो गई। ये इस शख़्स की भलमनसाहत थी कि जगजीत ने ग़ज़लों के शहंशाह मेहदी हसन के इलाज के लिए तीन लाख रुपए की मदद की.। उन दिनों मेहदी हसन साहब को पाकिस्तान की सरकार तक ने नज़रअंदाज़ कर रखा था।
घुड़दौड़ का शौक- ग़ज़ल गायकी जैसे सौम्य शिष्ट पेशे में मशहूर जगजीत जी का दूसरा शगल रेसकोर्स में घुड़दौड़ है। कन्सर्ट के बाद कहीं सुकून मिलता है तो वो है मुंबई महालक्ष्मी इलाक़े का रेसकोर्स। १९६५ में मुंबई मे जहां डेरा डाला था उस शेर ए पंजाब हॉटल में कुछ ऐसे लोग थे जिन्हें घोड़ा दौड़ाने का शौक था। संगत ने असर दिखाया और इन्हें ऐसा चस्का लगा कि आज तक नहीं छूटा है। (स्रोत-आउटलुक) इसी तरह लॉस वेगास के केसिनो भी उन्हें ख़ूब भाते हैं।

[संपादित करें] निधन

गजल के बादशाह कहे जानेवाले जगजीत सिंह का १० अक्टूबर २०११ की सुबह 8 बजे मुंबई में देहांत हो गया. उन्हें ब्रेन हैमरेज होने के कारण 23 सितम्बर को मुंबई के लीलावती अस्पताल में भर्ती करवाया गया था. ब्रेन हैमरेज होने के बाद जगजीत सिंह की सर्जरी की गई, जिसके बाद से ही उनकी हालत गंभीर बनी हुई थी. वे तबसे आईसीयू वॉर्ड में ही भर्ती थे। जिस दिन उन्हें ब्रेन हैमरेज हुआ, उस दिन वे सुप्रसिद्ध गजल गायक गुलाम अली के साथ एक शो की तैयारी कर रहे थे।


[संपादित करें] सम्मान और पुरस्कार

जगजीत सिंह को सन २००३ में भारत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

[संपादित करें] ऍलबम

[संपादित करें] ग़ज़ल ऍलबम

  • अदा (1993)
  • जगजीत और चित्रा सिंह के साथ एक शाम (An Evening with Jagjit and Chitra Singh)
  • ऐ मेरे दिल
  • जगजीत और चित्रा सिंह के श्रेष्ठ (Best of Jagjit and Chitra Singh)
"An Enchanting Hour with Jagjit and Chitra Singh" के रूप में भी
  • बिआंड टाइम (Beyond Time) (1987)
  • चिराग - इसके अलावा त्रिनिदाद में लाइव (1993) के रूप में जाना जाता है
  • कम अलाइव इन कॉन्सर्ट (Come Alive in Concert)
  • क्राई फार क्राई (Cry for Cry) (1995)
  • डिसाइर्स (Desires) (1994)
  • एकोस (Echoes) (1985)
  • एक्स्टसीज (Ecstasies) (1994)
  • इमोसन्स सेम ऍस द गोल्ड डिस्क (Emotions Same as The Gold Disc)
  • ओन्कोर (Encore) (1993)
  • एटर्निटी(Eternity) (1997)
  • फ़ेस तो फ़ेस (Face to Face) (1993)
  • फिल्म्स से गीत और गजल (Geets and Ghazals from Films) (1989)
  • द गोल्ड डिस्क
  • होप (Hope) (1991)
  • इन हारमोनी(In Harmony)
  • इन सर्च (In Search) (1992)
  • इनसाइट (Insight) (1994)
  • जाम उठा (1996)
  • कहकशां (1991)
  • द लेटेस्ट (The Latest) (1982)
  • लाइव एट रॉयल अल्बर्ट हॉल लाइव (Live at Royal Albert Hall) (1983)
  • लाइव इन कॉन्सर्ट एट वेम्बली (Live in Concert at Wembley) (1981)
  • लाइव इन कॉन्सर्ट (1987)
  • लाइव इन पाकिस्तान
  • जगजीत सिंह के साथ लाइव (Live with Jagjit Singh ) (1993)
  • लव इस ब्लाइड (Love is Blind) (1997)
  • मैजिक मोमेंट्स वित जगजीत एंड चित्रा सिंह (Magic Moments with Jagjit & Chitra Singh)
  • मैं और मेरी तंहाई (1981)
  • मारीशम (1999)
  • मेमोरियल गजल्स ओफ जगजीत एंड चित्रा (Memorable Gazals of Jagjit and Chitra) (1990)
  • अ माइलस्टोन (Milestone, A) (1980)
  • मिराज (1995)
  • मिर्जा गालिब (1988)
  • पैशन - "ब्लैक मैजिक" के रूप में भी जाना जाता है (1987)
  • द प्लेबैक इअर्स (Playback Years, The) (1998)
  • रेयर जेम्स (Rare Gems) (1992)
  • रिश्तो मे दरार आई
  • शहर (2000)
  • शज़दा (1991)
  • सलेक्शन फराम फिल्म्स
  • सिलसिले (1998)
  • समवन समवेहर (Someone Somewhere) (1990)
  • ए सांउड अफेअर (Sound Affair, A) (1985)
  • टूगेदर (Together)(1999)
  • अनफोरगेटबलस (Unforgettables) (1976)
  • द अनफोरगेटबलस हिट्स ओफ जगजीत एंड चित्रा (Unforgettable Hits of Jagjit and Chitra, The) (1987)
  • उनीक (Unique) (1996)
  • विज़न्स (Visions) (1992)
  • योर च्होस (Your Choice)

[संपादित करें] पंजाबी ऍलबम

  • Birha Da Sultan - Ghazals by Shiv Kumar Batalvi ((1995)
  • Ichhabal (Modern Punjabi Poetry)
  • Ishq di Mala (with Asha Bhonsle)
  • Jagjit Singh - Punjabi hits (1991
  • Man Jeetai Jagjeet (Gurbani)
  • Satnam Wahe Guru Ehee Naam Hai Adhara
  • The Greatest Punjabi Hits of Jagjit and Chitra Singh

[संपादित करें] भक्ति ऍलबम

  • Hare Krishna - Live Concert
  • Hey Gobind Hey Gopal
  • He Ram... He Ram.. Ram Dhun
  • Krishna Bhajans
  • Saanwara


[संपादित करें] बाहरी कडियाँ

पूज्य हुज़ूर का निर्देश

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