Friday, December 28, 2012

नया जमाना

बृहस्पतिवार, 27 दिसम्बर 2012

बलात्कारकांड ,सुभाष तोमर की मौत और फेसबुक पर उठे सवाल


मीडिया कवरेज में जनता के असभ्य व्यवहार को कवरेज देकर भीड़ को उकसाया है। लाइव कवरेज के नाम पर अधिकांश टीवी चैनलों में संपादकीय नीति अनुपस्थित थी। मसलन् सरकारी संपत्ति तोड़ती भीड़ को कवरेज दिया।भीड़ में फांसी की मांग करने वालों को कवरेज देकर सही नहीं किया। टीवी पत्रकारों ने लगातार उत्तेजना पैदा करने का काम किया। पत्रकारों ने अपनी जिम्मेदारी को संयम के साथ नहीं निभाया। बलात्कार की घटना पर मीडिया ने उत्तेजना पैदा करने का काम करने जनता की अपूर्णीय क्षति की है। हाल ही में अमेरिका में 27 बच्चों की हत्या की घटना पर मीडिया ने वहां पर आम जनता को संयम बरतने और धैर्य से काम लेने की भूमिका अदा की। भारत में सामूहिक बलात्कार काड पर आम जनता को उत्तेजित करने से बचा जाना चाहिए। पहले से ही उत्तेजित भीड़ को भड़काया है।


दैनिक हिन्दू अखबार ने लिखा है-यह रिपोर्ट उन सभी दावों को खारिज करती है जिनके जरिए आम आदमी पार्टी अपने नए तर्कशास्त्र गढ़ रही है।पढें रिपोर्ट-

A controversy raged on Wednesday over the cause of death of constable Subhash Tomar during violent demonstrations last Sunday with eyewitnesses and a government hospital claiming there were no injuries on his person while the post mortem report contradicted these versions.
The Delhi Police late in the evening released excerpts of report of the post mortem done by a Board of Doctors in the government-run Ram Manohar Lohia (RML) Hospital, where he died on Tuesday. 
Following contradictory versions, Delhi Police asked its Crime Branch to investigate the case in which murder charges have been invoked. 
“Myocardial infarction (cardiac arrest) and its complications that could be precipitated by multiple ante-mortem (before death) injuries to neck and chest produced by blunt force impact,” Additional Commissioner of Police (New Delhi) K.C. Dwivedi said quoting from the report as the cause of 47-year-old Tomar’s death. 
The Delhi Police statement came on a day when various claims emerged about the cause of Tomar’s death with two eyewitnesses claiming that they did not spot any injuries on his person when they tried to revive him after he collapsed near India Gate during violent protests against the gang-rape of a girl in a moving bus on December 16. 
To add to this, Medical Superintendent of RML Dr. T.S. Sidhu, said, there were “no major external injury marks except for some cuts and bruises. …In all our records, there are no severe internal injuries recorded but the post-mortem will tell everything.” 
Asked whether it was a case of cardiac arrest, Dr. Sidhu said, “I don’t know. That is not my comment. He came, he was in serious shock and we revived him. He came in a state of total collapse.” 
Yogendra, a journalism student, and his friend Paoline, who have rushed Tomar to the hospital, contradicted the police version that the constable was beaten up by protesters leading to his death. He fell down on his own, they said. 
Mr. Yogendra claimed, “I was at India Gate with a female friend who was injured. I saw one policeman who was running after protesters and then suddenly collapsing. We rushed towards him and some policemen were also there. Suddenly, policemen started running after other protesters. 
“So I rushed to a nearby PCR van. They took him to hospital. I also went in the same vehicle. I saw him in hospital and his body didn’t have any injuries. He wasn’t trampled by a mob, he wasn’t assaulted. The claims of police are false. I am surprised to hear that eight were arrested over Tomar’s death.” 

Ms. Paoline said she saw him falling down. “We removed his jacket and shoes. I asked whether he can hear me and then I asked him to breathe... He was sweating profusely and there were no injuries on his body. If we had not been there, he would have been dead on the spot,” she said. 
Tomar’s family refuted the eyewitness claims, saying he died after suffering injuries caused in the chaos. 
“My father died because of the chaos during the protests at India Gate. Protesters pushed him, they trampled upon him. He had internal injuries. The claims that he did not receive injuries are false,” Tomar’s son Aditya said. 
Tomar’s family claimed that the policeman did not have a history of heart problems. “Tomar was attacked by protesters. He did not suffer from any heart-related problems,” Tomar’s relative Naveen Chaudhary said. 
The post-mortem report said Tomar’s third, fourth and fifth ribs on left side had fractures and there was “mid-calibaculur bleeding” at several places. 
Police sources said effusion of blood was present in tissues and neck muscles and ante-mortem injuries were caused when the body suffered heavy blows from a blunt object. 
“He had a lot of injuries. His ribs had fractures. These multiple injuries aggravated his condition and led to cardiac arrest,” Mr. Dwivedi, the Additional Commissioner of Police, said. 
Asked whether after the post mortem report, police would initiate action against doctors at RML, Mr. Dwivedi said he has no comments to offer as investigations were with Crime Branch. “I can’t comment on doctors or eyewitness comments,” he said. 
Police have slapped murder charges in the case. Earlier, eight persons, including an activist of the Arvind Kejriwal-led Aam Aadmi Party (AAP) were arrested on Monday on charges of attempt to murder. 
Following the claims of the eyewitnesses, the AAP demanded sacking of Delhi Police Commissioner Neeraj Kumar alleging that police was misleading people by arresting eight “innocent youth” in connection with the incident. 
Mr. Kejriwal said Mr. Yogendra’s account was opposite of what police said. “Is police lying,” he asked. 
AAP chief spokesperson Manish Sisodia alleged police was “politicising” Tomar’s death to cover their mistakes and demanded that Mr. Kumar be sacked. 

“Delhi Police should have dealt with the matter with sensitivity and honoured the constable’s death. But, the police have politicised the death to cover their own mistakes. We feel that the Delhi Police are involved in a conspiracy. The Police Commissioner should be sacked,” he said. 
Meanwhile, the Home Ministry has announced an ex-gratia of Rs. 10 lakh to the next of kin of Tomar. 

दिल्ली पुलिस के सिपाही सुभाष तोमर की मौत की वजहों को लेकर हो रहे अलग-अलग दावों से यह गुत्थी लगातार उलझती जा रही है। इस मामले में ताजा घटना यह है कि पुलिस ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के हवाले से दावा किया है कि मौत की वजह सीने पर लगी चोट है। चोट के बाद ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा जिससे उनकी मौत हुई। 
कायदे से इस रिपोर्ट के आने के बाद टीवी ट्रायल बंद कर दिए जाने चाहिए। अदालत को जांच करने दें और देश के अन्य मसले पर ध्यान दे मीडिया। इस प्रसंग में आम आदमी पार्टी के नेताओं का बार बार टीवी पर बहसों में उलझना अनेक सवाल खड़े करता है। अन्य दल इस मसले पर तकरीबन चुप हैं। 


सुभाष यादव की हत्या के आरोप में पकड़े गए आठों में 4 लोगों ने एनडीटीवी को बताया कि वे निर्दोष हैं और घटना के समय घटनास्थल पर नहीं थे। टीवी चैनल की इस तरह की प्रस्तुतियां अदालत के काम में हस्तक्षेप कही जा सकती हैं।


दिल्ली पुलिस के पीआरओ भगत ने कहा कि कुछ भी कहना प्रिमेच्योर होगा। कमिश्नर ने सीधे कहा कि सुभाष के किन किन अंगों पर चोट लगी है।जीन्यूज के अनुसार यह अन्तर्विरोध गैंगरेप कांड से ध्यान हटाने की कोशिश है।


यूपी में एक माह में ऑनलाइन के जरिए स्त्री उत्पीडन की 61 हजार शिकायतें आई हैं, इनमें14 हजार फोन पर अश्लील बातें करने की शिकायतें हैं। हाय रे भारतमाता। कैसे कुपूत हैं तेरे देश में।


अजीब स्थिति है कि योगेन्द्र के बयान के साथ जीन्यूज ने अपनी पोजीशन रख दी है कि वे उसके बयान से सहमत नहीं हैं।


दूसरी चश्मदीद पाओलीन ने कहा कि सुभाषतोमर लोगों को हटाने के चक्कर में पहुँचे उनके गिरते ही 2मिनट में पुलिस वाले पहुँच गए थे। एबीपी न्यूज का खुलासा।


राममनोहर लोहिया अस्पताल के डाक्टर ने कहा है सुभाष तोमर के शरीर पर गंभीरचोट के निशान नहीं थे। एक्सरे में हड्डी टूटने वाली बात नहीं।


सुभाष तोमर की मौत के बाद जिस तरह के अन्तर्विरोधी बयान आ रहे हैं उनके कारण सुभाष तोमर की निष्पक्ष-पेशेवर मेडीकल जांच कराकर तथ्यों को सरकार उजागर करे। हेडलाइन टुडे के अनुसार अभी तक दिल्ली पुलिसकर्मियों ने सुभाष के परिवार को अपनी एकदिन की पगार सहायता के रूप में देने के लिए दो करोड़ रूपये एकत्रित किए हैं।


एनडीटीवी इंडिया ने सुभाष तोमर की मौत के चश्मदीद गवाह की बातों पर यकीन कर लिया है और वह बार बार इस गवाह को पेश करके साफ कर देने पर आमादा है कि चश्मदीद गवाह का सत्य परमसत्य है।
आज सुबह भी उसे लाइव कवरेज के लिए इस्तेमाल किया गया। यह सीधे केजरीवाल एंड कंपनी द्वारा मीडिया उडान में पुलिस कवरेज को पछाड़कर बढ़त लेने या प्रौपेगैण्डा करने की योजना का अभिन्न अंग लगता है।


एनडीटीवी पर चश्मदीद गवाह ने माना- " ये गिर गए वहां पर मैं इनको लेकर चला आया। " यह बात योगेन्द्र ने अस्पताल में उसी दिन कही थी। एनडीटीवी रिपोर्टर ने अभी पुलिस सूत्रों के हवाले कहा कि सुभाष तोमर को पीसीआर बैन अस्पताल लेकर गई।जबकि लड़के ने पहले कहा कि वो लेकर गया। यह उसने अपने बयान पहला झूठ बोला। अभी उसने ( योगेन्द्र) पलटा खाया और कहा कि पीसीआर बैन लेकर गयी।


अफसोस यह है कि मीडिया से लेकर फेसबुक तक प्रबुद्धलोगों का एक वर्ग है जो सुभाष तोमर की मौत पर एक युवा की बातों को तोमर की मौत के संदर्भ में प्रमाण के रूप में पेश कर रहा है।

स्थिति की अतिरंजना का आलम यह है कि लोग गांधी को भी इस मौके पर याद कर रहे हैं। साथ ही सूचना के दुरूपयोग की संभावनाओं को एकसिरे से खारिज कर रहे हैं। आज के दौर में कैमरे के सामने किसी घटना विशेष के बारे जो व्यक्ति बोल रहा है और प्रमाणस्वरूप इमेजों को पेश कर रहा है। उसके बारे में कोई भी मूल्य निर्णय करना सही नहीं होगा। हो सकता है उस युवक का दावा तहकीकात में प्रमाणित ही न हो पाए।

होसकता है तहकीकात में पुलिस का दावा गलत साबित हो, लेकिन इसकी तहकीकात के लिए सबसे उपयुक्त स्थान अदालत है मीडिया नहीं।

जिस लड़के के पास ये प्रमाण हैं उन प्रमाणों को अपनी डिफेंस में वे लोग अदालत में पेश करें जो गिरफ्तार किए गए हैं।

मीडिया मेंउस लड़के का महाप्रमाण के रूप में आना सारे मसले को मीडिया तथ्य नें नहीं गॉसिप में बदल रहा है।

सुभाष तोमर के बेटे का बयान भी इस प्रसंग में देखें जिसमें वह बार बार कह रहा है कि उसके पिता को गहरी चोटें आई थीं। अफसोस है कि केजरीवाल एंड कंपनी के लोग इस कांड में धरे गए हैं, होसकता है पुलिस ने गलत लोगों को पकड़ा हो, यह भी हो सकता है सही लोग धरे गए हों, हमें उन पुलिस वालों के बयानों पर भी गौर करना होगा जिन्होंने इन 8 लोगों को मौके से पकड़ा है। अंततः फैसला मीडिया में नहीं अदालत में होगा गांधी या अन्य के विचारों की रोशनी में अदालत विचार नहीं करती, वहां ठोस प्रमाण की जरूरत होती है मीडिया गॉसिप की नहीं।


मीडिया को छेड़खानी का कवरेज देते समय स्त्री का फोटो दिखना से बचना चाहिए, उसे शोहदों के ऊपर केन्द्रित करना चाहिए। इस तरह के मसले पर ध्यान हटाने से भी बचने की जरूरत है शोहदों पर न्यूज का केन्द्रित होना जरूरी है। मुश्किल यह है कि टीवीवाले पुलिस-नेताओं को पीटने लगते हैं।इससे मूल मसले से ध्यान हट जाता है। पुलिस -नेताओं को पीटने से भी ज्यादा जरूरी है शोहदों को पीटना। हाल ही में बलात्कार कांड के खिलाफ जो आंदोलन कवरेज आया उसमें उन लोगों पर कम जानकारी आई जो अपराधी हैं।


छेड़खानी हो या स्त्री उत्पीडन के अन्य रूप हों मीडिया को उनको व्यापक कवरेज देना चाहिए और अपराध में शामिल लोगों के चेहरे बार बार दिखाए जाने चाहिए और प्रत्येक चैनल को अपनी बेवसाइट पर मनचले शोहदों की स्वतंत्र सीरीज चलानी चाहिए।


सुभाष तोमर की मौत पर एनडीटीवी पर टीवी ट्रायल चल रहा है। एक चश्मदीद गवाह आया है जो विस्तार से विवरण दे रहा है। कायदे से मौत के बाद इस तरह का ट्रायल सही नहीं है। पुलिस मुखिया नीरज कुमार ने कहा कि गरदन,पेट और सीने पर गहरी चोट लगी हैं। असल में यह फैसला अदालत करे टीवीवाले नहीं। यह अदालत के काम में हस्तक्षेप है और अनैतिक है।


सिपाही सुभाष तोमर की मौत के बाद 8लोगों पर हत्या के केस लगाए गए हैं।


दिल्ली पुलिस का महाझूठ कि रेप विरोधी आंदोलन की आड़ में आतंकी इंडियागेट पर हमला कर सकते हैं।


तीन विदेशी कंपनियों के एरिया मैनेजर साकेत मॉल में लड़कियों के साथ छेड़खानी करतेहुए धरे गए।


दिल्ली के बर्बर बलात्कारकांड ने कामकाजी महिलाओं के आत्मविश्वास को हिला दिया है। कवरेज में हिंसा पर नहीं न्याय और दण्ड पर जोर दिया जाना चाहिए।पढें इकोनॉमिक टाइम्स (24दिसम्बर 2012)-

The horrendous rape case in Delhi has not only shaken the confidence of working women in the National Capital Region (NCR) but also in other major cities, a survey has said.

Most of the respondents felt that it is the time the quality of governance should be improved and the obsession of the police "bandobast" with the VVIPs be changed, Assocham said in a survey.

"Majority of respondents, who are working in companies located in Gurgaon, Noida, Delhi, Sonepat and Faridabad, said they have begun insisting on leaving offices on dot, immediately after duty hours following the atmosphere of insecurity," it said.

After the brutal gang-rape of a 23-year-old girl in a moving bus about a week back, people in many parts of the country have been demanding quick justice for her and also to make stringent laws against rape cases.

"About 88 per cent of women respondents said the anxiety is more among the guardians of those women who travel by chartered buses," the survey said.

These respondents said that now they get more calls while at work from home -- parents or husbands -- after the incident, it added.

The chamber said that it surveyed about 2,500 women and men in various cities.

The survey said those who use the Delhi Metro feel relatively secure as long as they are within the premises of the metro stations.

However, they said the moment they deboard the train, their anxiety levels increase as the basic infrastructure from the stations to the colonies is found lacking.

The survey said majority of respondents feel that the deployment of more police personnels would be there for few days and after that everything will be back to usual, the survey said.

"It is not difficult to wire the major and vulnerable parts of the region with CCTVs, which should be properly monitored and action taken," Assocham Secretary General D S Rawat said.

The fear of law must be instilled among those who are prone to commit heinous crime, he added.

The chamber said that accountability must be fixed not among the junior functionaries but also among the higher-ups. Those found guilty of incompetence and complacency should be simply sacked. "The fear of losing job would work."

Besides, the survey said that if the confidence of workforce is shaken, the NCR would lose its eminent position among even investors.

The respondents also wanted companies human resource departments to devise new ways of ensuring increased staff security, especially among those who work on night duties, it said.

मंगलवार, 25 दिसम्बर 2012

दामिनी बलात्कारकांड और फेसबुक


देश में सारी व्यवस्था चरमरा गयी है,देश में न तो पर्याप्त जज हैं और न अदालतें हैं , न अदालतों की सुविधाएं हैं, ऊपर से करोड़ों केस हैं जो लंबित पड़े हैं। लोग परेशान हैं और लुट रहे हैं लेकिन सरकार सोई है,जजों ने कान में तेल डाला हुआ है। आखिर कब तक लोग इंतजार करेंगे,मनमोहन सरकार ने यदि न्यायव्यवस्था को दुरूस्त और सक्षम नहीं बनाया तो वह दिन दूर नहीं जब जजों से लेकर सांसदों तक लोग घेरेंगे और कानून अपने हाथ में लेंगे। न्याय अब अदृश्य है उसे दृश्य बनाने का काम सरकार का है। जो काम वर्मा कमीशन अभी करेगा वह काम काफी पहले क्यों नहीं किया गया, क्या सरकार नहीं जानती कि सालाना डेढ़ लाख से ज्यादा सालाना बलात्कार हो रहे हैं। जनता के लिए सरकार का निकम्मापन अब असहनीय महसूस हो रहा है इसलिए वो सड़कों पर निकल रही है।


इंडियागेट पर तैनात कांस्टेबिल सुभाष की मौत की खबर आई है। यह मौत बहुत ही दुखद है। सुभाष की मौत के जिम्मेदार लोगों को जेल में पहुँचाया जाना चाहिए।

इंडियागेट पर हाल ही में जो आंदोलन चला उसके आखिरी दिन सुभाष को चारों ओर से घेरकर आंदोलनकारियों ने सिर में लट्ठों से मार-मारकर अधमरा कर दिया था,आज सिपाही सुभाष ने दम तोड़ दिया है।

यह असामान्य मौत है । यह मौत संदेश दे रही है कि जुनूनी लोग हिंसक भी हो सकते हैं। वैसे आंदोलनकर्ताओं को ईमानदारी से काम लेना चाहिए और उन लोगों को पुलिस के हवाले करना चाहिए जिनलोगों का सुभाष की मौत में हाथ है।

सरकार ने लाठीचार्ज करनेवालों पर एक्शन लिए हैं और जांच चल रही है । कायदे से टीवीवालों को ईमानदारी से उसशाम के सारे फुटेज सरकार को सौंपने चाहिए जिससे सुभाष पर हमला करने वालों की शिनाख्त हो सके।हमें उनलोगों की भी शिनाख्त करनी चाहिए जो इस आंदोलन में हिंसा फैला रहे थे।

मनमोहन सरकार ने जो कदम आंदोलन के दबाब में उठाए उनको यदि पहले ही उठाते तो यह नौबत ही नहीं आती। सरकार के निकम्मेपन को नंगा किया है इस आंदोलन ने। हिंसा हुई वह निंदनीय है। लेकिन दैनन्दिन बलात्कार हो रहे हैं और मनमोहन सरकार कोई कदम नहीं उठा रही,इस पहलू पर सोचें।यह भी सोचें कि भारत में मनमोहनजी 9साल से शासन में हैं वे कोई कदम बिना दबाब के क्यों नहीं उठाते? लोकतंत्र में सरकार की पहलकदमी का महत्वपूर्ण है सरकार का काम है नेतृत्व करना। यहां उल्टा हो रहा है सरकार को जनता डिक्टेट कर रही है।


रेप पर फांसी की सजा लागू होने पर अनेकदलों के नेता झूलते नजर आएंगे। साथी इन सभी नेताओं के ऊपर लगे रेप केसों को भी फास्ट ट्रैक कोर्ट के हवाले कर देना चाहिए। देखते हैं मोदी की विधानसभा और देश की लोकसभा से कितने नेता अंदर जाते हैं।


औरत होने की सजा

सीताराम येचुरी (माकपा पोलित ब्यूरो सदस्य)

देश की राजधानी के भीड़-भाड़ वाले इलाके में एक चलती बस में हुई सामूहिक बलात्कार तथा नृशंसता की घटना ने पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है। पीड़िता अस्पताल में जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रही है, तथा देश भर में विक्षुब्ध जनता स्वतःस्फूर्त तरीके से विरोध के लिए उठ खड़ी हुई है।

इसकी प्रतिध्वनि संसद के दोनों सदनों में भी हुई और सांसदों ने गृहमंत्री को यह भरोसा दिलाने के लिए मजबूर किया कि दोषियों के खिलाफ तत्परता से कार्रवाई की जाएगी और कानून व व्यवस्था को मजबूत करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाएंगे। हालांकि ऐसे आश्वासन लोगों के मन में कोई खास भरोसा शायद ही पैदा कर पाएंगे।
इसकी वजह तो यही है कि ताजातरीन घटना कोई अकेली नहीं है। महिलाओं के खिलाफ यौन अपराध देश भर में चिंताजनक रफ्तार से बढ़ते जा रहे हैं। हरियाणा में ही पिछले कुछ महीनों में नृशंस बलात्कार के एक के बाद एक पंद्रह मामले सामने आए थे, जिनमें ज्यादातर सामूहिक बलात्कार के थे। 
इसी तरह, इसी महीने की शुरुआत में अमृतसर में एक पुलिस अधिकारी की सिर्फ इसलिए हत्या कर दी गई, क्योंकि वह यौन उत्पीड़न से अपनी बेटी को बचाने की कोशिश कर रहा था। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़े दिखाते हैं कि 1953 से 2011 के बीच बलात्कार की घटनाओं में 873 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। बलात्कार की वारदातों की बढ़ोतरी की रफ्तार, तमाम संज्ञेय अपराधों की संख्या से तीन गुना ज्यादा बैठती है और हत्याओं में बढ़ोतरी की रफ्तार से साढ़े तीन गुना ज्यादा। पिछले पांच वर्षों में (2007 से 2011 के बीच) ही बलात्कार की वारदातों में 9.7 फीसद की वृद्धि हुई है। 
कुछ हफ्ते पहले ब्रिटिश अखबार द गार्जियन ने भारत को औरतों के लिए जी-20 के सभी देशों में बदतरीन जगह बताया था। महिला अधिकारों के लिए काम करने वाले सूचना व सहायता केंद्र, थॉमस रायटर्स ट्रस्ट लॉ वीमेन के एक सर्वे के अनुसार, भारत महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक जगहों में आता है और इस श्रेणी में उसका साथ देने वाले अन्य देश हैं, अफगानिस्तान, कांगो तथा सोमालिया। 

भारत में औसतन हर चालीस मिनट में एक महिला को देश में कहीं न कहीं अपहरण और बलात्कार का निशाना बनाया जा रहा होता है। महानगरों में दिल्ली शर्मनाक तरीके से बलात्कार की घटनाओं के मामले में सबसे आगे है। वर्ष 2007 से 2011 के बीच राजधानी में बलात्कार की 2,620 घटनाएं दर्ज हुई थीं। इसकी तुलना में मुंबई में 1,033, बंगलूरू में 383, चेन्नई में 293 और कोलकाता में 200 वारदातें ही दर्ज की गई थीं। इससे भी बदतर यह कि 2002 से 2011 के बीच, राजधानी में ही बलात्कार के चार में से तीन मामलों में आरोपी सजा से बचकर निकल गए थे। 
2002 से 2011 के बीच, यानी पिछले एक दशक में बलात्कार के 5,337 मामलों में फैसले आए थे और इनमें से 3,860 मामलों में आरोपियों को या तो बरी ही कर दिया गया था या फिर समुचित साक्ष्यों के अभाव में अदालतों ने छोड़ दिया। निवारक सजा की तो बात दूर, ऐसा लगता है कि हमारे देश में अपराध के लिए सजा दिए जाने का रिकॉर्ड इतना खराब होने के चलते ही, अपराधियों के मन में अब कानून का कोई डर ही नहीं रह गया है। 

कुछ ही महीने पहले देश के गृह सचिव आर के सिंह ने यह कुबूल किया था कि अब वक्त आ गया है, ‘कानून और व्यवस्था की बात करना बंद कर, न्याय दिलाए जाने की बात करना शुरू किया जाए।’वास्तव में, तफ्तीश का काम पूरा होने के बाद मुकदमों की तेजी से सुनवाई करने के लिए पर्याप्त जज ही हमारे देश में नहीं हैं। 
1987 में विधि आयोग ने इसका खाका तैयार किया था कि किस तरह पांच वर्ष में न्यायाधीश-आबादी अनुपात, एक लाख की आबादी पर 1.05 न्यायाधीश से बढ़ाकर पांच न्यायाधीश के स्तर पर पहुंचाया जाना चाहिए। लेकिन, उसके बाद पच्चीस बरस गुजर चुके हैं और यह अनुपात एक लाख की आबादी पर 1.4 न्यायाधीश से ऊपर नहीं ले जाया जा सका है। 
इसे देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय का ताजा हस्तक्षेप भी भरोसा नहीं जगाता है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि महिलाओं की हिफाजत करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाएं, जैसे सादा वर्दी में महिला पुलिस अधिकारियों को तैनात करना, सार्वजनिक परिवहन साधनों में क्लोज्ड सर्किट कैमरे लगाना और हैल्प लाइन स्थापित करना आदि। 
सचाई यही है कि हमारे देश के सभी राज्यों में और जाहिर है कि देश के स्तर पर भी, आबादी और पुलिस का अनुपात, दुनिया भर में सबसे निचले स्तर पर है। जब तक कानून का पालन कराने वाले बलों की कतारों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी करने तथा उन्हें समुचित प्रशिक्षण मुहैया कराने के लिए कदम नहीं उठाए जाते हैं, हालात सुधरने वाले नहीं हैं। 
द गार्जियन ने महिलाओं के लिए भारत के बदतरीन जगह होने के तथ्य को दर्ज करने के बाद एक सवाल पूछा हैः एक ऐसे देश में, जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने पर अपनी पीठ ठोंकता है, आखिर वहां ऐसा कैसे हो सकता है?’ ऐसा इसलिए हो रहा है कि कानून का पालन कराने वाली संस्थाएं तथा हमारी न्यायिक प्रणालियां बहुत ही खस्ता हालत में हैं। 
यह जरूरी है कि महिलाओं के खिलाफ ऐसे अमानवीय जुर्म करने वालों को जल्दी से जल्दी सजा दिलाने के लिए, विशेष अदालतें कायम की जाएं। साथ ही, उनकी सजा ऐसी होनी चाहिए, जो दूसरों को ऐसे अपराध करने से रोक सके और संभावित अपराधियों के मन में डर पैदा करने में समर्थ हो। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह ताजा जघन्यता देश को झकझोर कर तंद्रा से जगाएगी और यह सुनिश्चित करेगी कि भारत अब महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के प्रति शून्य सहिष्णुता की इच्छा दिखाएगा। 


जनांदोलन का दबाब किस तरह काम करता है और सरकार किस तरह सोई थी इस पर सोचें और पढ़ें कि आंदोलन से दुनिया में किस तरह असर होता है। बहुचर्चित दिल्ली गैंगरेप मामले में जल्द न्याय सुनिश्चित करने की कोशिशों के तहत इस मामले का ट्रायल 3 जनवरी से शुरू करने का फैसला किया गया है। इस मामले की रोज सुनवाई होगी। इसके साथ ही दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकार से निर्देश जारी किया है कि सरकार रेप के सभी मामले में फास्ट ट्रैक अदालतों में रोज सुनवाई के आधार पर मामला चलाया जाए।


दिल्ली गैंगरेप मामले में एसीपी (ट्रैफिक) मोहन सिंह डबास और एसीपी (पीसीआर) यादराम को सस्पेंड कर दिया गया। अधिकारियों को ड्यूटी में लापरवाही के चलते सस्पेंड कर किया गया। दिल्ली के उप राज्यपाल ले. तेजिंदर खन्ना ने सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस बात की जानकारी दी। हालांकि इसी बीच दिल्ली पुलिस ने रविवार को प्रदर्शन के दौरान हुए उपद्रवों पर भी अपना रुख और कड़ा करते हुए पूर्व सेनाध्यक्ष लेफ्टिनेंट जनरल वी के सिंह के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है। सवाल यह है कि जिस इलाके में यह घटना हुई थी उस इलाके के जिम्मेदार थानेदार और पेट्रोलिंग पुलिस अफसर को अभी तक न तो सस्पेंड किया है और न बर्खास्त किया गया है। केन्द्र सरकार को इस मामले में तेजी से ऊपर से नीचे तक कदम उठाने चाहिए।


इंडियागेट पर चले बलात्कार कांड विरोधी आंदोलन में 78 पुलिस वाले 65 आंदोलनकारी घायल हुए हैं। इससे यह बात साफ है कि 6दिन चले इस आंदोलन की दिशा अहिंसक नहीं थी। इतने लोग हाल-फिलहाल में किसी आंदोलन में घायल नहीं हुए। पुलिस की हिंसा इसकी जड़ में है।


इंडियागेट आंदोलन पर केन्द्र सरकार ने लाठीचार्ज के एक घंटे बाद ही पुलिस एक्शन के लिए पीड़ितों और आंदोलनकारियों से माफी मांगकर सही किया है। इससे यह पता चलता है कि जनता की कराह सरकार के कानों तक जा रही है।


बलात्कार कांड के खिलाफ आम लोगों का आक्रोश जायज है कल रात(रविवार) को प्रधानमंत्री ने भी आंदोलन की भावनाओं को शेयर करते हुए बयान दिया है। पीड़िता के शीघ्र स्वस्थ हो जाने की कामना की है और आंदोलनकारियों से शांति बनाए रखने की अपील की है। यह स्वागतयोग्य बयान है।हम उम्मीद करते हैं कि गृहमंत्री ने जो आश्वासन दिए हैं उनको पूरा करने की दिशा में सरकार जल्द ही प्रयास करेगी।


मणिपुर में एक अभिनेत्री के साथ एक नागा आतंकी ने झेड़खानी की और उसके प्रतिवाद में वहां आज दूसरे दिन भी आंदोलन जारी है। आज वहां एक पत्रकार नानो सिंह की पुलिस फायरिंग में मौत हो गयी। दिल्ली में मीडिया पर पुलिस ने जमकर हमले किए हैं पुलिस का मीडिया विरोधी रवैय्या निंदनीय है। बड़े चैनल चुप क्यों हैं ?


हमारे मित्र है रणधीरसिंह सुमन ,एडवोकेट, उन्होंने जरूरी सवाल उठाए हैं,लिखा है-

देश बहुत बड़ा है। दिल्ली तक ही सीमित नहीं है। देश में तरह-तरह के लोग रहते हैं। एक थाने में लगभग 200 बलात्कार के प्रार्थना पत्र पेंडिंग हैं। इस क्षेत्र में विरोधियों के ऊपर बलात्कार के मुक़दमे दर्ज कराने का रिवाज है। किसी विरोधी को लोग कायदे से ठीक करना चाहते हैं तो कोई औरत खड़ी कर बलात्कार का मुकदमा दर्ज करा देते हैं। यदि सभी लिख लिए जाए तो 200 अगले दिन फिर आ जायेंगे। इसकी रोकथाम कैसे करोगे। न्याय के कुछ सिद्धांत हैं उनको बने रहने दो। तभी देश चलेगा। हर आदमी दंड देने का अधिकारी अगर हो जायेगा तो कुछ नहीं बचेगा। आज एक घटना को लेकर जन उभार मौजूद है लेकिन देश के अन्दर सोनी आदिवासी महिला के साथ जो हुआ उसके लिए कोई कुछ नहीं बोला। माननीय उच्चतम न्यायलय की जानकारी में सोनी का सम्पूर्ण प्रकरण है। अभी तक कोई कार्यवाई विशेष नहीं हुई है। सम्बंधित पुलिस अधिकारी को सरकार से इनाम मिल चूका है। मणिपुर में भारतीय सेना के बलात्कारों से ऊब कर महिलाओं का नग्न प्रदर्शन तक हो चुका है। दिल्ली गैंग रेप के मामले में सम्बंधित बस क्या उस वक्त यात्रियों को ले जाने के लिए अधिकृत थी ? बस का परमिट कहीं का बनता है और बस चलती कहीं और है। दिल्ली में पुलिस और प्रशासन की मेहेरबानी से अनाधिकृत वाहन चलते रहते हैं। जनता उसमें सफ़र करती रहती है। मीडिया को कुछ लोगों का प्रदर्शन तहरीर चौक का प्रदर्शन लगने लगता है और लाखों लोगो का प्रदर्शन जब होता है तब उसके बारे में एक लाइन भी नहीं लिखी जाती है। प्रदर्शनकारी क्या यह चाहते हैं कि अभियुक्तों को उनको सौप दिया जाए और वह सजा देंगे। अन्ना केजरीवाल के आन्दोलन के बाद कुछ लोगों की समझ में यह गलतफ़हमी हो गयी है कि वह पूरे देश का प्रतिनिधित्व करते है। दंड की मात्रा कितनी हो उसके भी सिद्धांत हैं और उन्ही सिद्धांतो पर कार्य होना चाहिए। फांसी की सजा अंतर्गत धारा 376 आई पी सी में बढ़ा देने से क्या बलात्कार रुक जायेंगे। प्रदर्शनकारियों को भी ईसा की कहानी याद रखनी चाहिए की जिसमे एक औरत पर छिनारा का आरोप था। उस समय सजा यह थी कि उस औरत को पत्थरों से पीट कर मार डाला जाए। ईशा ने कहा पहला पत्थर वह व्यक्ति मारे जिसने मन से, वचन से, कर्म से, इस काम के बारे में न सोचा हो। किसी ने भी एक पत्थर नहीं मारा और भीड़ चली गयी। नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली हज नहीं जाती है। समाज की स्तिथियाँ क्या हैं उसके बारे में भी सोच समझ कर बात करनी चाहिए।


एक मित्र ने अभी अभी ख़बर दी है कि इंडिया गेट के सारे रास्ते बंद कर दिए गए हैं और जंतर-मंतर पर जहाँ पर प्रदर्शनकारी खड़े हैं वहां की स्ट्रीट लाइट बंद कर दी गई है। प्रदर्शन स्थल पर अधिकतर विद्यार्थी और शिक्षक हैं।


इंडिया गेट पर आमतौर पर लोग तफरीहबाजी के लिए आते हैं और छुट्टी के दिन काफी हलचल रहती है। आज चूंकि वहां पर बलात्कार विरोधी आंदोलन भी चल रहा था अतः उनलोगों को अंदाजा ही नहीं था कि पुलिस के एक्शन के कारण उनकी तफरीबाजी तकलीफ में तब्दील हो जाएगी। कम से कम आंदोलन की जगह को तफरीबाजी की जगह न समझें।


इंडियागेट पुलिस एक्शन की सबसे निंदनीय घटना है मीडियाकर्मियों पर हमले, कई मीडियाकर्मियों को चोटें आई हैं और कई के सामान को पुलिस ने नष्ट किया है। सबसे खराब पक्ष है मध्यवर्ग युवाओं के मुँह से तालिबानी भाषा का निकलना।वे मांग कर रहे हैं बलात्कारी को सरेआम फांसी दो। ये लोग नहीं जानते कि जिन देशों में सीधे फांसी दी जाती हैं वहां औरत सबसे ज्यादा तकलीफ में है। अफगानिस्तान इसका आदर्श प्रमाण है।


।दामिनी बलात्कार कांड के खिलाफ दिल्ली में चले 6दिवसीय आंदोलन का आरंभ स्वतःस्फूर्त्त ढ़ंग से हुआ था लेकिन धीरे धीरे इस पर केजरीवाल,रामदेव और संघ परिवार के अ-नियोजित मंच ने कब्जा जमा लिया। यह मंच अराजकतावादी राजनीति की अभिव्यक्ति साबित हुआ है। खासकर इस आंदोलन के दौरान अंत में शाम को इंडिया गेट पर आज जो लाठीचार्ज हुआ उसकी सारी जिम्मेदारी आंदोलनकारियों के निर्णय न लेने की स्थिति ने पैदा की। किसी भी जेनुइन आंदोलन को ये लोग अराजकता में तब्दील करने में सफल रहे। जनतंत्र के लिए वे लोग खतरनाक हैं जो जनता को आंदोलन के दौरान अनाथ छोड देते हैं।


केजरीवाल,रामदेव और संघ परिवार के अ-नियोजित मंच ने इंडियागेट पर एक ही काम किया-जो तेरा है वो मेरा है।


इंडियागेट पर पुलिस लाठीचार्ज और आंसूगैस के गोले छोड़ने के बाद सारा माहौल रणक्षेत्र में बदल गया है।इंडियागेट से लोग हटाए जा चुके हैं। कायदे से इस स्थिति से बचना चाहिए था। लेकिन केजरीवाल,रामदेव और संघ परिवार के लोगों के अनियोजित मंच ने निर्णय लेने में देरी की और पुलिस के हाथों आंदोलन का आज समापन करा दिया।


इंडियागेट आंदोलन हिंसक और अराजक होने की ओर जा रहा है। इंडियागेट के एक तरफ शांतिपूर्ण आंदोलनकर्मी हैं दूसरी ओर हिंसक भीड़ है जो सार्वजनिक संपत्ति की तोड़फोड़ कर रही है। पुलिस पर पथराव कर रही है।


नई दिल्ली में नए किस्म की युवा राजनीतिक कतारबंदी उभरकर आई है ,यह कतारबंदी अन्ना आंदोलन के गर्भ से जन्मी है। इसमें कई रंगत के संगठन हैं इन संगठनों की सक्रियता प्रशंसनीय है लेकिन ये लोग आंदोलन आरंभ करके पीछे हटना नहीं जानते या सुचिंतित मंशा के तहत पीछे नहीं हटते।

युवा आंदोलन को संघर्ष के हित में आगे जाने के साथ पीछे हटने का राजनीतिक कौशल भी आना चाहिए। वरना युवा आंदोलन के नष्ट होने की संभावनाएं हैं।


अभी कुछ देर पहले धर्मेन्द्र कुमार (विशेष पुलिस कमिश्नर दिल्ली )ने एक प्रेस कॉफ्रेंस में कहा है कि बलात्कार कांड के खिलाफ जो आदोलन चल रहा है उसकी तीनों मांगें मान ली गयी हैं , इसके बाद भी लोग आंदोलन करना चाहते हैं तो वे शांति से आंदोलन करें। शांति से एक स्थान पर बैठकर आंदोलन करें। कमिश्नर ने कहा कि वे आंदोलनकारियों को नहीं हटाएंगे।

आंदोलनकारियों में एक तबका उन लोगों का है जो सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचा चुके हैं। ये लोग मांग कर रहे हैं बलात्कारियों को सीधे फांसी की सजा जब तक नहीं दी जाती तब तक वे आंदोलन करते रहेंगे। हम यही कहना चाहते हैं कानूनी कार्रवाई इंडियागेट पर नहीं होगी। गृहमंत्री के आश्वासन पर विश्वास करके आंदोलन को तुरंत वापस लिया जाना चाहिए।


युवाओं के आंदोलन के दबाब केन्द्र सरकार ने दिल्ली गैंग रेपकांड के संदर्भ में अधिकांश मांगे मान ली हैं। इसके बाद इन युवाओं को अपना आंदोलन खत्म कर देना चाहिए। उनको इंतजार करना चाहिए कि आगे क्या होता है।

वे जिस तरह से अघोषित ढ़ंग से इंडिया गेट पर जमा हैं। उससे उनके आंदोलन में से अब कुछ नया तत्व निकलने वाला नहीं है। उनकी सारी मांगें मान ली गयी हैं तो उनको अपना आंदोलन वापस ले लेना चाहिए। यदि वे आंदोलन वापस नहीं लेते हैं तो इस आंदोलन के पीछे सक्रिय राजनीतिक ताकतें अपने निहित स्वार्थों के लिए दुरूपयोग करने से बाज नहीं आएंगी।


कहां सोए है टीवी चैनलवाले,

संजय निरूपम के स्मृति ईरानी को अपमानित करने वाले बयान पर सकारात्मक हस्तक्षेप करने वाले चैनलों से अपील है कि सुषमाजी पर दबाब बनाएं और भाजपानेत्री सुषमा स्वराज को बलात्कार की शिकार लड़की को जिंदा लाश कहने के लिए माफी मांगनी चाहिए। किसी भी नेता या नेत्री को स्त्री को अपमानित करने का हक नहीं है।

Girish Mishra ने लिखा- What Nirupam said was stupid but why was there no condemnation of Modi's utterance as regards Tharoor's wife and that of RSS's characterisation of Indira Gandhi?


सोनिया गांधी ने देर से ही सही लेकिन सही कदम उठाया है वे प्रतिवादी युवाओं से मिली हैं, कायदे से प्रधानमंत्री को हस्तक्षेप करके युवाओं को बुलाना चाहिए और उनकी मांगों पर आश्वासन देना चाहिए। जागो मनमोहन जागो। इसके अलावा राष्ट्र के नाम सीधे संदेश देना चाहिए। इस तरह के मामलों पर अति सक्रिय होकर हस्तक्षेप करने की जरूरत है।


बलात्कार कांड पर युवाओं में जायज आक्रोश है और वे ठीक कर रहे हैं कि निरंतर आंदोलन कर रहे हैं और पीड़ित लड़की के लिए तुरंत न्याय की मांग कर रहे हैं। लेकिन बलात्कार की समस्या कानून की समस्या मात्र नहीं है। समाज में बलात्कार न हों इसके लिए जरूरी है कि हम इस समाज को ही बदलें। राजनीतिकतौर पर सजकता और सक्रियता बढ़ाएं। राजनीति से दूर न रहें बल्कि लोकतांत्रिक छात्र-युवा राजनीति में शिरकत करें।

इसके अलावा अपने परिवार के ढ़ाँचे को लोकतांत्रिक बनाएं,परिवार को लोकतांत्रिक बनाने से समाज भी लोकतांत्रिक बनेगा। परिवार को लोकतांत्रिक बनाने का अर्थ है परिवार में सभी सदस्य समान हों,कोई न छोटा होगा और बड़ा होगा। प्रत्येक सदस्य की स्वायत्तता और निजता का सम्मान किया जाय,साथ ही उसके विवेक पर विश्वास किया जाय। दबाब,हस्तक्षेप आदि से परिवार को पूरी तरह मुक्त किया जाए।

परिवार में किसी का वर्चस्व न हो।यहां तक कि माता-पिता का भी नहीं। सब मिलकर तय करें और प्रत्येक सदस्य की स्वायत्तता और भावनाओं का दिल से सम्मान करें। स्त्री के प्रति दुर्व्यवहार परिवार से आरंभ होता है। अतःपरिवार को बदलने की जरूरत है। परिवार बदलेगा तो समाज बदलेगा।


भाजपानेत्री सुषमा स्वराज ने बलात्कार की शिकार लड़की को जिंदा लाश कहकर अपने मन में बैठे प्रतिक्रियावादी भावबोध की अभिव्यक्ति की है। प्रतिक्रियावादी भावबोध के अनुसार बलात्कार कलंक है और स्त्री कलंकित स्त्री है।फलतः वह समाज में बहिष्कृत है। जबकि सच यह है बलात्कारी कलंकित है और अपराधी है और उसका बहिष्कार किया जाना चाहिए। उसे जिंदा लाश कहा जाना चाहिए। पीड़िता तो निर्दोष और निष्कलंक है।वह इस समाज की जीती-जागती सदस्य है।


प्रतिवाद को राजनीतिक लक्ष्यों से दूर रखें आंदोलनकारी युवा। सोनिया गांधी जब बोल रही हैं तो उनकी बात पर विश्वास किया जाना चाहिए और इंतजार करना चाहिए कि सरकार क्या करती है।


कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने एक महिला के नाते बड़ी ही संजीदगी के साथ दिल्ली बलात्कार कांड की निंदा की है और शीघ्र एक्शन की मांग की है। सवाल यह है कि वे घर के बाहर निकलें और प्रदर्शनकारियों से मिलें। यह पत्र देकर एक्शन कराने का समय नहीं है। सरकारी बाधाओं से बाहर आकर मिलने और बयान देने का समय है।


बलात्कार की घटनाएं रूकें और औरतों पर शारीरिक हमले न हों इसके लिए जरूरी है कि राजनीतिक तौर पर नार्मल सक्रिय माहौल बनाया जाय। एक्शन केन्द्रित माहौल अस्थायी होता है। आज की दो बड़ी बलात्कार की खबरें हैं जो टाइम्स ऑफ इण्डिया में बेव पर हैं।

1. Woman gang-raped, stripped naked in Tripura; seven arrested .

2.Three-year-old girl raped in Delhi playschool, owner's husband held

बलात्कार का मसला राष्ट्रीय मसला है यह स्त्री के प्रति समग्र नजरिए को बदलने की मांग करता है। भारत में जो लोग औरत को परिवार और परंपरा की बंदिशों में बांधे रखना चाहते हैं वे ही सबसे ज्यादा औरतों पर हमले करते हैं। औरत पर शारीरिक हमले से भी ज्यादा पीड़ादायक हैं वाचिक हमले।

औरत के सम्मान के लिए उसे परंपरा और परिवार के पुंस वर्चस्व से मुक्त करे समाज। साथ ही औरत पर शारीरिक और वाचिक हमले बंद किए जाएं।


आश्चर्य की बात है कि बलात्कार कांड पर राहुल गांधी ने कोई बयान तक जारी नहीं किया।


बलात्कार कांड की घटना के प्रतिवाद में हजारों युवाओं के बलात्कार विरोधी आक्रोश को जिस तरह टीवी चैनलों ने पॉजिटिव कवरेज दिया है उसने युवाओं के आक्रोश की मात्रा में इजाफा किया है। अपराध के खिलाफ समाचार चैनलों की इसी तरह आक्रामक भूमिका की भारत को जरूरत है।


दिल्ली के इतिहास में यह विलक्षण दृश्य है कि कई दिनों से हजारों युवा बलात्कार कांड और दिल्ली में कानून-व्यवस्था के बिगडने के खिलाफ गुस्से का इजहार कर रहे हैं।

अभी भी हजारों युवा विजयचौक पर जमे हुए हैं। केन्द्र सरकार को संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए। आज जिन अधिकारियों ने जनविरोधी एक्शन लिया है उनको सस्पेंड किया जाय।


दिल्ली बलात्कार काड की पीड़ित लड़की की हालत में सुधार आ रहा है। आज उसने जूस पिया है और उसके चेहरे पर कोई निराशा नहीं है।

हम चाहते हैं कि वो जल्दी ठीक होकर सामान्य जीवनयापन करे। दिल्ली में औरतों का सुरक्षित जीवन सरकार सुनिश्चित करे।

औरतों के खिलाफ शोहदों की हरकतों को पुलिस सख्ती से रोके और शोहदों को पकड़ते ही थाने में बंद करने के पहले शहर में गधे पर बिठाकर घुमाया जाय जिससे इस तरह के अपराध के खिलाफ आमलोगों में सचेतनता बढायी जाय।


आज दिल्ली में बलात्कार कांड के खिलाफ व्यापक जनरोष दिखाई दिया। हजारों युवाओं ने प्रदर्शन किया। मनमोहन सरकार ने इन युवाओं के खिलाफ पुलिस का निर्ममता के साथ दुरूपयोग किया है।

त्रासद पहलू है कि लाठीचार्ज,आंसूगैस के गोले ,पानी की बौछारें फेंककर सैंकड़ों युवाओं को घायल कर दिया गया।

कायदे से केन्द्रीय गृहमंत्री को इन आंदोलनकारी युवाओं से बाहर आकर मिलना चाहिए। इस तरह के मसले पर कमरों में नेताओं के द्वारा बैठना लोकतंत्र का अपमान है ।


'The protest I participated in the morning was hijacked later in the afternoon by self-serving politicians and people who perhaps had other agendas to pursue,' Aseem Chhabra notes in this first person account of what happened:

The messages had been mixed from the beginning of the protests, following last week's shocking gang-rape of a 23-year-old young woman in a moving bus in south Delhi [ Images ].

Even during the quieter candlelight vigils at India [ Images ] Gate, there were loud voices of hysteria calling for death penalty for the alleged rapists, and disturbing demands like chemical castration, which would probably turn the Indian democracy into a State with Taliban [ Images ] form of justice.

But this whole week, while I was in Delhi, I was more than curious about the protests that were growing larger by the day at India Gate. The latest tragedy and growing cases of rape in and around Delhi and other parts of India called for major action -- greater police protection for women, faster legal responses to the crimes and, most important, a drastic change in Indian society where women are often treated as commodities, as second grade citizens to be tossed around by the men in their lives.

On Saturday the protestors had attempted to reach all the way up to Rashtrapati Bhavan [ Images ] and the Delhi police used teargas, water cannon and even a lathi-charge to disperse them. But still, on Sunday morning, when a friend sent out a tweet saying that protestors were gathering near Humayun's tomb, I decided to join the group.

At noon there were about 100 people gathered at the meeting point, mostly students from Delhi's Jawaharlal Nehru [ Images ] University -- my alma mater. Wrapped in jackets, sweaters and scarves, they were prepared with large signs and placards. The surprise for me was to meet two JNU professors, who were my peers at the university 31 years ago.

In half hour the group got bigger, as a busload of JNU students joined us and we started the march to India Gate on the flyover that leads to Dr Zakir Hussain [ Images ] Marg. The JNU Student Union president -- a member of the Students Federation of India, the student wing of the Communist Party of India-Marxist -- was there, along with many participants from the All India Students' Association and All India Progressive Women's Association -- both groups affiliated with the CPI-Marxist-Leninist.

My life had come full circle. Just as three decades ago, I was again on the streets of Delhi with left-wing student groups and surrounded by spirited slogans that had not changed over time. Another JNU professor handed me a small placard that said in Hindi that the death sentence and hanging were not the solution to increasing cases of rape in India.

Walking among a large number of red flags, and even a couple of Indian national flags, I heard the marchers yell out 'Lal Salaam', 'Inquilab Zindabad', 'Dilli police Hai-Hai', and 'Dilli police sharm karo. And there were calls for azaadi, women asking for freedom from patriarchy, and the desire to dress as they wanted to and whenever they wanted to without being questioned by society.

The Delhi police had reportedly imposed Section 144 of the Criminal Procedure Code, banning gatherings in the India Gate area, but we were able to walk peacefully all the way up to Delhi's central section.

We did see some police along the way, outside the Golf Club -- perhaps assuring security for Delhi's elite -- but the protest was peaceful. The protestors were spirited, somewhat angry after Saturday's clashes with the police and naturally about the issue of rape, but they were under control.

As we reached India Gate, I made it clear to a friend who was marching with me, along with his two European tourist friends, that I would leave the gathering if things turned violent. I had no plans to get arrested, or lathi-charged.

At India Gate, suddenly the picture became clearer. There was indeed a massive police presence, along with several television vans and large cameras. There were also many more protestors who had gathered.

In one such group I saw many protestors carrying placards that called for the death sentence and hanging of the alleged rapists in the gang rape case. I saw two young girls standing with placards that boldly stated the word 'castration'. And I wondered if they even knew the meaning of the word or what the act entails.

We stood along with our original group of protestors looking straight at Rajpath all the way up to Rashtrapati Bhavan. And although it was a cold foggy day, one thing was clear -- the police had completely shut down the entire Rajpath. It was a very surreal sight.

That is when I first heard a loud explosion, perhaps like a gunshot. It was followed by smoke at a distance. "That's teargas," I told the two Europeans, who started to run. Within seconds there was another explosion and I saw a smoking teargas shell land just five feet away from me.

And so I ran too, back to India Gate where things appeared a lot calmer, although there were other dispirited groups yelling slogans such as 'We Want Justice.' Some had decided to sit on the street right besides India Gate.

We heard another tear gas being shot towards the protestors and that was enough indication for us to leave the area altogether. I spent the rest of the afternoon at home following reports of more and more violence as the protestors were joined by Arvind Kejriwal, Baba Ramdev [ Images ] and then according to one media outlet youth groups affiliated with the Bharatiya Janata Party [ Images ] also showed up.

By the evening one police constable was fighting for his life and over 40 protestors were injured. Images from India Gate showed that what started off as a peaceful protest had turned the area into a war-like zone.

Bloggers and other folks on Twitter were trying to figure out which political groups were responsible for the protests turning violent.

I had joined the protest hoping something good would come out from the demands for a change in the police's policies and practices, and society at large.

I had naively believed that for the rape-related crisis to be resolved the young protestors would have walked along with the police, with the hope of eventually working out issues with the elected officials and the law enforcement personnel.

The protest as I participated in the morning was hijacked later in the afternoon by self-serving politicians and people who perhaps had other agendas to pursue.

The day ended with a wider gap between the authorities and the protestors, and I do not know if there is a middle ground to resolve the crisis.

Aseem Chhabra( जेएनयूएसयू के पूर्व पदाधिकारी)

शनिवार, 22 दिसम्बर 2012

नरेन्द्र मोदी का मीडिया असत्य और फेसबुक

मीडिया में लाइव कमेंट्री के दौरान पत्रकारों और राजनीतिक विशेषज्ञों ने अमूमन नरेन्द्र मोदी की जीत पर भावविभोर होकर बातें की। विश्लेषकों का भावविभोर होना सही नहीं है। विश्लेषक को टीवी पर सत्य को सामने लाने का काम करना चाहिए और उन्माद से बचना चाहिए। उन्माद से बचने के लिए विधानसभा चुनाव परिणामों के इतिहास का बारीकी से ज्ञान होना चाहिए। 

आमतौर पर विश्लेषक गुजरात और मोदी पर बात करते हुए सरलीकरण और झूठ का सहारा ले रहे थे। जो झूठ बोले गए उनमें से एक बड़ा झूठ यह है कि ‘विधानसभा चुनाव के इतिहास में मोदी ने तीसरीबार जीतकर इतिहास रचा है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।’ यह बात एकसिरे से गलत है।यह बात गुजरात के संदर्भ में सही है लेकिन देश के संदर्भ में नहीं।

मसलन्, ज्योतिबाबू के लोकप्रियता के मानक से काफी पीछे हैं नरेन्द्रमोदी और उनकी पार्टी भाजपा। मीडियापंडितों के द्वारा मोदी की प्रशंसा में अहर्निश झूठ कहा गया। तथ्य बताते हैं कि ज्योतिबाबू 23साल मुख्यमंत्री रहे,वाममोर्चे की तीन-चौथाई बहुमत से चार बार विजय हुई।यह रिकार्ड पार करना किसी भी दल के लिए संभव नहीं है।

विद्या सुब्रहमण्यम ने हिन्दू ( 22दिसम्बर2012) में लिखा पश्चिम बंगाल में वाममोर्चे को सन् 1977 से 1996 के बीच में तीन-चौथाई बहुमत के रूप में 294 के सदन में क्रमशः 225,228,242 और 241 सीटें मिली थीं।इसके बाद वाममोर्चे के नम्बरों में कमी आई तो 1996 में उसे दो-तिहाई बहुमत मिला तो वाममोर्चे को 202 सीटें मिलीं और 68.70फीसदी वोट मिले थे। वाममोर्चे के वोट 47 प्रतिशत से लेकर 51 प्रतिशत के बीच में घूमते रहे। इसी तरह शीला दीक्षित और नवीन पटनायक भी तीसरीबार मुख्यमंत्री बने हैं।

मोदी पर बातें करते समय मोदी के अलोकतांत्रिक चरित्र को वोट की राजनीति और उनके भाषणों की बाइटस की ओट में छिपाने की कोशिश की गयी। मोदी की अलोकतांत्रिक कार्यप्रणाली का आलम यह है कि राज्य में समूचा प्रशासन दलतंत्र के मातहत कर दिया गया है। राज्य में सांस्कृतिक बहुलतावाद और जातीय बहुलतावाद को हाशिए पर डालकर सुनियोजित ढ़ंग से हिन्दुत्वकी विचारधारा के मातहत रख दिया गया है। राज्य में धर्मनिरपेक्ष विचारधारा पर राज्यप्रशासन में बैठे लोग आए दिन हमले करते रहते हैं। इसके कारण एक खासकिस्म का साम्प्रदायिक जहर आमजीवन में फैल गया है। इस दहर का ही दुष्परिणाम है कि भाजपा ने एक भी मुसलमान को विधानसभा का टिकट नहीं दिया यहां तक अपने केन्द्रीय मुस्लिम नेताओं की सार्वजनिकसभाएं नरेन्द्र मोदी के साथ नहीं कीं।

यह भी कहा गया कि मुसलमानों का मोदी ने बड़ा ख्याल रखा है। सवाल यह है 2002 में मुसलमानों की जो क्षति की है उसकी भरपायी आनेवाले 100सालों में नहीं होगी। मुसलमानों की पूरी जमी-जमायी अर्थव्यवस्था को 2002 के दंगों ने तबाह कर दिया, जिन लोगों की संपत्ति उस दौरान नष्ट हुई वे आज भी पामाली झेल रहे हैं। दूसरी बात मुसलमानों की ओर जितना पैसा अभी राज्य खर्चा करता है उसमें केन्द्र की स्कीमों से ही अधिकांश पैसा खर्च हो रहा है। राज्य की ओर से विशेष कुछ भी नहीं किया गया है। उलटे राज्य प्रशासन में मुस्लिमविरोधी जहर भर दिया है। इस जहर से न्यायपालिका तक प्रभावित हुई है इसके कारण सुप्रीमकोर्ट को आदेश देकर 2002 के दंगों के केस राज्य के बाहर सुनवाई के लिए भेजने पड़े हैं। सुप्रीमकोर्ट का इस तरह का फैसला अपने आपमें मोदी प्रशासन की अल्पसंख्यक विरोधी मानसिकता को नंगा करता है।

मोदी के इसबार के चुनावप्रचार अभियान में हाईटेक का जमकर इस्तेमाल किया गया। इंटरनेट,ब्लॉग,फेसबुक आदि का भी खूब प्रयोग हुआ है। इस प्रचार से कितना प्रभाव पड़ा यह कहना कठिन है लेकिन इंटरनेट और हाईटेक का प्रभावशाली ढ़ंग से वे इस्तेमाल करने में सफल रहे हैं। इस मामले में कांग्रेस उनसे काफी पीछे रही है।


भारतीय लोकतंत्र को हठधर्मी और अलोकतांत्रिक दिमाग ने घेर लिया है। कांग्रेस को गुजरात में अपनी हार को शालीनता से मान लेना चाहिए। वहीं पर भाजपा को हिमाचल में अपनी हार को स्वीकार कर लेना चाहिए।

सबको शालीनता का पाठ पढ़ाने वाले इन दोनों दलों के नेताओं में कोई शालीनता नजर नहीं आती। मसलन् गुजरात में हारकर भी कांग्रेस के नेताओं को मोदी को बधाई देनी चाहिए। यही स्थिति हिमाचल में भाजपा को भी करना चाहिए। धूमलजी को वीरभद्र सिंह को बधाई घर जाकर देनी चाहिए। मैं कल सारे दिन टीवी देखता रहा लेकिन एक-दूसरे को बधाई देने वाले दृश्य नहीं देख पाया।


मोदी को किसी ने यूपी में प्रचार करते नहीं देखा, वे उत्तराखंड भी नहीं गए,पंजाब भी नहीं गए, हिमाचल भी नहीं गए. फिर वे देश में अपनी शक्ति का कब प्रदर्शन करेंगे।


टाइम्स नाउ चैनल पर अभी एक पत्रकार (जे.स्वामीनाथन अय्यर) ने कहा- "गुजरात का शेर हिमाचल का बकरा।" योगेन्द्र यादव ने कहा कि भावी परिणाम के रूप में मोदी की जीत लोकतंत्र का डार्कसाइड है।


गुजरात में भाजपा को 115,कांग्रेस को 61 सीटें मिली हैं। सन् 1985 के बाद पहलीबार कांग्रेस को 60 से ऊपर सीटें मिली हैं। भाजपा को रिकॉर्ड 51 फीसदी मत मिले हैं। तकरीबन एक बार वाममोर्चे को भी पश्चिम बंगाल में 52 फीसदी मत मिले थे। अतः मोदी का यह कहना सही नहीं है वे अकेले नेता हैं जो इतिहास बना रहे हैं।


हिन्दी में बोलना राष्ट्रीय नेता होना नहीं है। मोदी का हिन्दी स्पीच से चुनाव प्रचार का आरंभ और समापन हुआ। हिन्दी बोलने से पीएम बनना आसान होता तो अटलजी को 40साल न लगते पीएम बनने में और आडवाणी तो अभी भी इंतजार में हैं ,लेकिन देवगौड़ा पीएम बन गए बिना हिन्दी जाने। हिन्दी में बोलने का मतलब है हिन्दी चैनलों के लिए बोलना।


मोदी ने कहा कि मेरे खिलाफ झूठ का बबंडर चला है। वे (मीडियावाले) मेरे खिलाफ गंदी भाषा बोल रहे थे।


फेसबुक पर बातें करते समय दलीय बुद्धि से नहीं । बुद्धि से काम लें मित्रलोग। दलीय नजरिए के लिए वे अपने अपने दल के वॉल पर जाएं ,यहां पर वस्तुगत बहस के लिए आएं।


अहमदाबाद में नरेन्द्र मोदी ने विजय रैली में सुंदर भाषण दिया। उनके भाषण का निचोड़ यही है वे गुजरात छोड़ने नहीं जा रहे। इस रैली में उन्होंने मीडिया आलोचकों की कड़ी आलोचना की। अपने आलोचकों की बातों को मोदी ने बौद्धिक व्यभिचार की संज्ञा दी।


गुजरात में भाजपा की यह पांचवीं जीत है। मोदी की तीसरी जीत है। इसके बावजूद हिमाचल में क्यों हारे मोदी के नायकत्व से हिमाचल में मदद नहीं मिली,तो यूपी-बिहार में क्या मोदी से 2014 में मदद मिलेगी ?


गुजरात के बारे में एग्जिट पोल सर्वे की तुलना करें तो सच और कल्पना का अंतर साफ नजर आएगा। पहली बात यह कि मोदी को 51 फीसद वोट मिले हैं ,कांग्रेस को 41 फीसदी वोट मिले हैं , अधिकांश सर्वे जो सीटें बता रहे थे उससे भी परिणाम का मेल नहीं बैठता। खासकर कांग्रेस की सीटों के बारे में अधिकांष अनुमान गलत साबित हुए हैं। एग्जिट पोल देखें-

टाइम्स नाउ के लिए सी-वोटर द्वारा कराए गए एग्जिट पोल में भाजपा को गुजरात की कुल 182 सीटों में से 119 से 129 सीटें तथा कांग्रेस को 49 से 59 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है।
न्यूज 24 ने दिखाया कि भाजपा को वर्ष 2007 में 117 सीटों के मुकाबले इस बार 140 सीटें मिलने की संभावना है। ऐसा इसलिए क्योंकि पार्टी को कुल पड़े मतों में से 46 प्रतिशत मिलने की संभावना है। चैनल के लिए एग्जिट पोल चाणक्य द्वारा कराया गया। इसमें अनुमान लगाया गया है कि कांग्रेस को 40 सीटें मिलेंगी, जो उसे वर्ष 2007 में मिली 59 सीटों से 19 कम होंगी। 
हेडलाइंस टुडे ने अनुमान लगाया कि भाजपा को 118 से 128 के बीच सीटें मिलेंगी जबकि कांग्रेस को 50 से 56 सीटें मिलने की संभावना है। कांग्रेस को कुल पड़े मतों में से 37 प्रतिशत मिलने की संभावना है। 
एबीपी न्यूज ने अनुमान लगाया कि भाजपा को इस चुनाव में 126 सीटें मिलेंगी और कांग्रेस 50 सीटों पर जीत दर्ज करेगी। भाजपा के बागी केशुभाई की जीपीपी को मात्र 2 सीटें, जबकि अन्य के खाते में 4 सीटें जाने का अनुमान है। सी-वोटर ने अनुमान लगाया कि भाजपा को कुल पड़े मतों में से 46 प्रतिशत और कांग्रेस को 37 प्रतिशत मत मिलेंगे। वहीं चाणक्य ने कहा कि भाजपा को 50 प्रतिशत वोट जबकि कांग्रेस को 35 प्रतिशत वोट मिलेंगे। 


हिमाचल के बारे में एग्जिट पोल सर्वे गलत साबित हुए हैं। इन सर्वेक्षणों में जो अनुमान भाजपा के बारे में लगाए गए थे वे सही साबित नहीं हुए हैं। मसलन्

सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटी द्वारा कराए गए सर्वे के मुताबिक कांग्रेस और भाजपा में कड़ी टक्कर है। इस सर्वे में कांग्रेस को 41 फीसद और भाजपा को 40 फीसद वोट मिलने की बात कही गई है। सीटों के हिसाब से देखें तो इस सर्वे में कांग्रेस को 29-35 सीटों पर जीत दिखाई गई है तो भाजपा को भी कमोबेश इतनी ही सीटें दी गई हैं। वहीं सीवोटर्स द्वारा कराए गए सर्वे में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत हासिल करते हुए दिखाया गया है। इसमें कांग्रेस को 40 सीटों पर विजयी दिखाया गया है जबकि भाजपा के खाते में कुल 24 सीटें ही दिखाई गई हैं। वहीं सीएनएन आईबीएन के सर्वे में भी कांग्रेस और भाजपा में कड़ी टक्कर होने की बात सामने आई है। इस सर्वे में कांग्रेस को कुल मतों का 41 फीसद और भाजपा को 40 फीसद मत मिलने का दावा किया गया है।
न्यूज 24 के सर्वे में हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत दिया है। इस सर्वे में कांग्रेस को 40 सीट और भाजपा को 23 सीटें दी गई हैं। 
ताजा परिणाम बताते हैं कि भाजपा को 26 और कांग्रेस को 36 सीटें मिली हैं। 


कहा जा रहा है कांग्रेस में व्यक्तिपूजा होती है भाजपा में नहीं, अरे विज्ञजनों कांग्रेस में सोनिया-राहुल हैं ,तो भाजपा में आडवाणी-मोदी आदि हैं ।

व्यक्तिपूजा के बिना बुर्जुआ समाज में राजनीति संभव ही नहीं है।


हिमाचल और गुजरात में पहले भाजपा की राज्य सरकार थी, इसबार वे हिमाचल में हारे हैं। इसबार के चुनाव भाजपा के लिए वाटरलू साबित हुए हैं। भाजपा अपने किले नहीं बचा पायी है। यह हाल तब है जब कांग्रेस के खिलाफ व्यापक गुस्सा रहा है।


हमने फेसबुक पर 18तारीख को लिखा था-
एग्जिट पोल के परिणाम कई बिंदुओं पर सही साबित नहीं हो सकते।हमारा व्यक्तिगत अनुमान है रि भाजपा सरकार तो बनाएगी लेकिन उसके मतों और सीटों में गिरावट आने की संभावनाएं हैं। कांग्रेस और अन्यदलों ने जिस तरह की ढ़ीला प्रचार किया है उसने मोदी की जीत को काफी आसान कर दिया है। लेकिन आम वोटरों में मतों के पैटर्न में बदलाव आएगा। यह चुनाव मोदी के राजनीतिक ह्रास के आरंभ का प्रस्थान बिंदु है। 
हमारी राय गुजरात परिणामों से सही साबित हुई है। 


मोदी तीसरीबार गुजरात के मुख्यंत्री बनेंगे ,सवाल यह है कि जब वे पिछलीबार जीतकर केन्द्र में भाजपा को नहीं ला पाए तो इसबार ले ही आएंगे ,इसका आधार क्या है ?


मोदी शेर हैं तो धूमल क्या हैं ? गुजरात की जीत पर भाजपा के लोग नाच रहे हैं ,लेकिन हिमाचल की हार पर रोनेवाले कहां हैं टीवी इमेजों में .


मोदी को नायक बनाया भाजपा ने,मीडिया ने भी उछाला,लेकिन हिमाचल पर मोदी का कोई असर नहीं पड़ा, ऐसे में देश पर कितना असर होगा कल्पना कर सकते हैं।


भाजपा का दावा था उन्होंने हिमाचल-गुजरात में विकास किया, लेकिन जनता ने हिमाचल में हराया और गुजरात में जिताया है। क्या यह भाजपा मार्का विकास की जीत है ? शायद नहीं.


मोदी ने मुसलमानों को भाजपा की ओर से गुजरात में मौका न देकर साफ कर दिया है कि यदि वे केन्द्र की राजनीति में आते हैं तो मुस्लिम विरोधी एजेण्डा जारी रखेंगे।


गुजरात में कांग्रेस 60सीटों के ऊपर पहलीबार जाती दिख रही है। यह भाजपा के पैर में कांटा है।


गुजरात में कांग्रेस यदि अपनी पुरानी सीटें बनाए रखती है और वोट बढ़ा ले जाती है तो यह उसकी सफलता मानी जाएगी। कांग्रेस पर मीडिया का कोई असर नहीं हुआ लगता है।


जो लोग कह रहे हैं कि चुनाव में भ्रष्टाचार मुद्दा बना है, वे गलतफहमी में हैं , राज्य विधानसभा चुनाव में लोकल कारक प्रधान कारक हैं,राष्ट्रीय भ्रष्टाचार प्रधान कारक नहीं है।


आने वाले दिनों में भाजपा का भविष्य क्या होगा इसे हिमाचलप्रदेश की हवा से पहचान सकते हैं।गुजरात की तुलना में हिमाचल का हिन्दीभाषीक्षेत्रों पर असर ज्यादा होगा।


मजेदार बात यह है कल तक जो लोग टीवी चैनलों में मोदी को भावी प्रधानमंत्री बना रहे थे आज किसी भी चैनल पर उनको प्रधानमंत्री बनाने की बात नहीं कर रहे। भाजपा के लिए दो राज्यों (गुजरात, हिमाचलप्रदेश) के परिणाम कई सबक देते हैं। पहला यह कि कोई क्षेत्रीयनेता राष्ट्रीयनेता नहीं बन सकता। मोदी-धूमल लोकल नेता है।


टीवी चैनलों पर बैठे राजनीति विशेषज्ञों का हाल यह है कि वे लोकल को जानते नहीं है लेकिन सरलीकरण के जरिए व्याख्याएं कर रहे हैं। विधानसभा चुनाव अंततः लोकल मसले पर होते हैं,लोकल कारक प्रधान होते हैं। विचारधारात्मक कारक गौण होते हैं।


टीवी पर मोदी विमर्श का खोखलापन यह है कि उसमें से गुजरात में पूंजीवाद का असमान विकास कभी प्रमुख एजेण्डा नहीं बन पाया।

समाचार प्रस्तुति की नई शैली एबीपी न्यूज में देखें कि किस तरह दीपक चौरसिया बोल रहे हैं, जैसे कोई शेयर मार्केट में आवाज लगाते 5-5, 6 और 6 ,ये लोग कहां ले जाएंगे खबरों को ? 

शुक्रवार, 21 दिसम्बर 2012

राजारहाट –न्यूटाउन के प्रति ममता की बेरूखी

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी धीरे धीरे समझ रही है कि उनके हाथ से समय निकलता जा रहा है। वे अपने सांगठनिक पचड़ों और अपनी पुरानी राजनीतिक मनोदशा के जंजाल से मुक्त होने के बारे में नए सिरे से संगठित होने की कोशिश कर रही हैं। इस कोशिश के क्रम में उन्होंने विगत सोमवार को शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर समिति के अफसरों ,उद्योगपतियों और भवन निर्माताओं के प्रतिनिधियों के साथ मीटिंग की। पश्चिम बंगाल के शहरों में शहरी सुविधाओं का व्यापक अभाव है। राज्य के शहरों से जुड़े इलाकों में सामान्य शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर की न्यूनतम सुविधाओं का अभाव आज एक ठोस वास्तविकता है। मुख्यमंत्री के साथ हुई इस बैठक में शहरी विकास मंत्रालय के अधिकारियों के अलावा भवन निर्माताओं के प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया था। 

भवन निर्माताओं ने मुख्यमंत्री से शहरी लैण्डशिलिंग एक्ट को तुरंत समाप्त करने की मांग रखी और कहा कि देश के अधिकांश शहरों में यह कानून खत्म किया जा चुका है लेकिन कोलकाता में अभी तक यह खत्म नहीं हुआ है। इस कानून के कारण भवन निर्माण के क्षेत्र में तेजी लाने में मुश्किलें आ रही हैं। साथ ही नए पूंजी निवेश का मार्ग भी रूका हुआ है। कई भवननिर्माताओं ने राजारहाट-न्यूटाउन में सिंडीकेट की दादागिरी का मसला भी उठाया और यह कहा कि मुख्यमंत्री के सिंडीकेट के खिलाफ बयान दिए जाने के बाबजूद सिंडीकेट की दादागिरी कम नहीं हुई है। मुख्यमंत्री ने इनलोगों की बातों को गंभीरता से सुना और तुरंत कार्रवाई का वायदा किया। उल्लेखनीय है कि यह मीटिंग हाल में सम्पन्न बंगाल विल्ड कॉन्क्लेव के अग्रिम कदम के तौर पर बुलाई गई थी।

राजारहाट न्यूटाउन के प्रसंग में कई प्रमुख तथ्य हैं जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। पहली सच्चाई यह है कि इस नए शहर में सिंडीकेट का आतंक है। सिंडीकेट के बिना कोई काम नहीं किया जा सकता। सिंडीकेट की दादागिरी ममताशासन आने के बाद पैदा नहीं हुई है बल्कि यह वामशासन के दौर में ही इसका जन्म हुआ था। सिंडीकेट दादाओं ने वामपंथी शासकों से लेकर ममता शासन तक सबको ठेंगा दिखाकर रखा है और इस इलाके में उनकी समानान्तर सत्ता है। इसका समूचे इलाके के विकास पर बुरा असर पड़ा है। ममताशासन को खासतौर पर इस संदर्भ में कुछ अप्रिय फैसले लेने होंगे। सिंडीकेट सरगनाओं के खिलाफ स्थानीय पुलिस प्रशासन को सख्ती से निबटने के आदेश दिए जाने चाहिए। साथ ही इस इलाके में सिंडीकेट के आतंक के खिलाफ राज्य के विभिन्न दलों के नेतागण सिंडीकेट दादाओं के समर्थन की नीति त्यागें।

भारत में राजारहाट एक बेहतरीन नवीन शहर के रूप में विकसित होने वाला अत्याधुनिक शहर है। इसकी शहरी योजना को सभी स्तरों पर प्रशंसा मिली है। यहां तक कि यूएनओ ने भी बेहतरीन नियोजित शहर के रूप में इसकी प्लानिंग को स्वीकृति दी है।

आज राजारहाट की स्थिति बेहद खराब है वहां बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षा का अभाव है। अनेकों बहुमंजिला भवन पूरे के पूरे बने खड़े हैं और उनमें कोई ऑफिस तक नहीं खुला है। यही हाल रिहायशी इमारतों का है। वहां पर जो लोग रह रहे हैं उनके पास न्यूनतम बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं। यहां तक कि डाकसेवा के पहुँचने की भी व्यवस्था नहीं है। दसियों हाउसिंग सोसायटी बनी खड़ी हैं लेकिन उनमें कोई रहने वाला नहीं है। स्थिति की भयावहता का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि ममता सरकार बनने के बाद अचानक इस इलाके में सिण्डीकेट का आतंक चरम पर पहुँच गया और तकरीबन समूचे इलाके में निर्माण कार्य ठप्प हो गया ।

एक अनुमान के अनुसार राजारहाट न्यूटाउन में विभिन्न कंपनियों का तकरीबन 70हजार करोड़ रूये से ज्यादा पैसा लग चुका है और सारा कमकाज जहां का तहां रूका हुआ है। कंपनियां परेशान हैं कि किस तरह इस संकट से निकला जाय। सोमवार की बैठक में बिल्डरों ने अपनी आर्थिक दुर्दशा से भी मुख्यमंत्री को अवगत कराया है। एक बिल्डर ने बताया कि मुख्यमंत्री ने हमलोगों की बातें सुनीं लेकिन कोई ठोस समाधान पेश नहीं किया। उनके सामने जब हुडको के अधिकारियों और पुलिस अफसरों की बैठक के बारे में जिक्र किया गया तो मुख्यमंत्री ने कहा कि वे बात करेंगी।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ उद्योगपतियों को बैठक करते समय एक दिक्कत आ रही है कि मुख्यमंत्री कभी भी खुले मन से मीटिंग में शामिल नहीं होतीं। वे अपने एजेण्डे के साथ आती हैं और अपनी बात कहकर चली जाती हैं। इसके कारण उद्योग जगत के साथ राज्य प्रशासन का दुतरफा संवाद नहीं बन पा रहा है। कायदे से बिल्डरों और उद्योगपतियों के साथ बातचीत में उन समस्याओं पर बातें होनी चाहिए जिन समस्याओं को वे लोग उठाते हैं। लेकिन नौकरशाही ने सारा माहौल इस कदर खराब किया हुआ है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ खुलकर विचार विनिमय हो ही नहीं पा रहा है। अकेले में जो उद्योगपति उनसे मिलता है उसकी वे सुनती हैं लेकिन समूह में वे सिर्फ अपनी कहती हैं। राजारहाट-न्यूटाउन को लेकर ममता सरकार ने अब तक जिस बेरूखी का परिचय दिया है उससे उद्योग जगत परेशान है।

नरेन्द्र मोदी,विकास और फेसबुक


गुजरात विधानसभा चुनाव के बारे में हाल ही में जो परिणाम पूर्व सर्वे आए हैं उनमें भाजपा फिर से सरकार बनाने जा रही है। लोकतंत्र में एकतंत्र का यह परिणाम है। इस तरह के परिणाम एक जमाने में पश्चिम बंगाल से वाम मोर्चे की जीत के छहबार आए हैं। मोदी ने सांगठनिक तौर पर गुजरात में माकपा के मॉडल को लागू किया है और विपक्ष को बेकार करके रख दिया है।

यही स्थिति एक जमाने में पश्चिम बंगाल में 1977से 2009 तक वाममोर्चे की भी रही है।

मोदीतंत्र मूलतःदलतंत्र है इसमें लोकतंत्र नहीं बिकता,दलीय वर्चस्व बिकता है। जो लोग सोच रहे हैं मोदी ठीक कर रहे हैं ,विकास कर रहे हैं वे मुगालते में हैं। यह भ्रम टूटेगा लेकिन कुछ समय लेगा।


गरीबी में आई कमी के आधार पर गुजरात 20 राज्यों की सूची में 10वें पायदान पर है।


सेंटर फॉर डेवलपमेंट अल्टरनेटिव्स के निदेशक और अर्थशास्त्र की प्राध्यापक इंदिरा हीरवे कहती हैं, 'गरीबी का स्तर कम हुआ है लेकिन शहरी क्षेत्रों में जहां 43 फीसदी आबादी रहती है, वहां गरीब उन्मूलन की रफ्तार सुस्त हुई है।' उनका कहना है कि गुजरात में गरीबी में आई कमी दूसरे प्रतिस्पर्धी राज्यों की तुलना में काफी कम है।


मोदी प्रशंसक ध्यान दें- गुजरात मजदूरी और इसमें बढ़ोतरी के मामले में 20 बड़े राज्यों में क्रमश: 14वें और 15वें स्थान पर आता है जो संपन्न और विपन्न लोगों के बीच बढ़ती दूरी को दर्शाता है।


मोदी के शासन में शिक्षा क्षेत्र में किस तरह की तबाही चल रही है इस पर बिजनेस स्टैंडर्ड ने एक गैर सरकारी संगठन के सर्वे के हवाले से चौंकाने वाली बातें कही हैं।

एक गैर सरकारी संगठन प्रथम के मुताबिक ग्रामीण गुजरात में करीब 95 फीसदी बच्चे विद्यालयों में पंजीकृत हैं लेकिन ज्ञान का स्तर काफी कम है। पांचवीं कक्षा में पढऩे वाले करीब 55 फीसदी बच्चे दूसरी कक्षा के पाठ्यक्रम नहीं पढ़ पाते हैं। लगभग 65 फीसदी बच्चे ऐसे हैं जो गणित के सामान्य जोड़ घटाव भी नहीं कर पाते हैं।

बहुत सारे लोगों का कहना है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षक शराब पीकर आते हैं और ताश खेलते हैं। बारिया में बच्चों के लिए साल में 24 दिन का शिविर चलाने वाली हार्डीकर कहती हैं कि पांचवीं कक्षा के बच्चे अक्षर भी नहीं पहचान पाते हैं। उच्च शिक्षा की स्थिति के बारे में अर्थशास्त्री वाई के अलघ कहते हैं कि इसकी हालत भी खस्ता है। अहमदाबाद के समाज विज्ञानियों के मुताबिक ज्यादातर कॉलेज और विश्वविद्यालय ठगों और नाकाम प्रशासकों द्वारा चलाए जा रहे हैं। तकनीकी कॉलेजों में ही थोड़ी बहुत क्षमता है।


मोदी के विकास के मॉडल की जो लोग प्रशंसा करते हैं वे जरा इस सत्य को भी देखें कि स्वास्थ्यसेवाओं का क्या हाल है। बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार स्वास्थ्य के क्षेत्र में 96 गांवों को सेवाएं देने वाले राज्य द्वारा संचालित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पिछले सात साल से किसी बाल रोग विशेषज्ञ और स्त्री प्रसूति विशेषज्ञ चिकित्सक की तैनाती नहीं हुई है। बारिया स्थित इस प्रसूति गृह में खून चढ़ाने और नवजात शिशुओं की देखभाल की कोई व्यवस्था नहीं है। इस अस्पताल में ऐनेस्थिसिया विशेषज्ञ भी नहीं है। सबसे नजदीकी कस्बा गोधरा है जो 40 किमी दूर है और जरूरत के वक्त लोगों के पास यही विकल्प बचता है। खास बात यह है कि राज्य अस्पताल में भी स्त्री प्रसूति विशेषज्ञ की व्यवस्था नहीं है। शिक्षा क्षेत्र में भी हालत इतनी ही खराब है।


गुजरात का स्थान मानवविकास के मामले में भी काफी पीछे है। बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार असल में गुजरात की गिनती भी महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे विकसित राज्यों के साथ की जाती है जबकि मानव विकास के मामले में यह राज्य इन राज्यों की तुलना में काफी पीछे है। अभी तक आप गुजरात को उच्च विकास दर वाला राज्य मानते होंगे लेकिन शायद आप इन निराशाजनक आंकड़ों से अनजान होंगे। हमने देवगढ़ बारिया की पहाडिय़ों के बीच बसे खूबसूरत गांवों में नाइकों, भीलों और राठवों के बीच काम करने वाले आनंदी नाम के गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) की संस्थापक नीता हार्डीकर से बात की। यकीन मानिए इन जनजातियों के साफ सुथरे घरों और उनकी खूबसूरती को देखकर आप प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाएंगे। लेकिन इस ग्रामीण रमणीय जगह के पीछे भी एक सच्चाई छिपी है। हार्डीकर कहती हैं कि इन गांवों में पिछले दो महीनों के दौरान गर्भावस्था से जुड़ी करीब 10 मौतें हुई हैं। गांव वालों को स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने की कोई सरकारी व्यवस्था नहीं है। वह पूछती हैं, 'ऐसा विकास मॉडल किस काम का जो हमें सुविधाएं दे पाने में नाकाम है।'


भाजपा के अनुसार गुजरात में खूब तरक्की हुई है ,लेकिन बिजनेस स्टैंडर्ट अखबार के अनुसार इस राज्य में 44.6 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। हालांकि शिशु मृत्यु दर में कमी जरूर आई है लेकिन इस दर में गिरावट राष्ट्रीय औसत की तुलना में काफी कम है।

करीब 65 फीसदी ग्रामीण परिवारों और 40 फीसदी शहरी परिवारों के पास शौचालय की व्यवस्था नहीं है और उन्हें मजबूरी में खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है। राज्य में पुरुष महिला अनुपात कम है यानी 1000 पुरुषों पर 918 स्त्रियों का औसत है। यह भी राष्ट्रीय औसत से कम है।


मुसलमानों की वास्तन जिंदगी देखें तो भाजपा-मोदी की पोल खुल जाती है।मसलन् गरीबी की बात करें तो शहरी मुसलमान ऊंची जाति के हिंदुओं की तुलना में करीब 8 गुना ज्यादा गरीब हैं। सच कहा जाए तो इस राज्य को भी बिहार और मध्य प्रदेश जैसे अल्प विकसित राज्यों की कतार में शुमार किया जाना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं है।


अमरीश मिश्रा ने टाइम्स ऑफ इण्डिया ब्लॉग में लिखा है- A lot has been made out about the roads of Gujarat, the 24 hour electricity supply, the availability of water and so on and forth. Now basics of the science of economics will tell you that good roads, power and water are essential to build an infrastructure and provide a minimum living standard to a civil society citizen. However, this is not growth. To ensure productivity, three major sectors of economy-manufacturing, services and agriculture-have to grow. What is the use of electricity if the agricultural sector-which provides employment to 60% of Gujarat's population-stagnates at 2%-lower than Bihar- annually; roads are vital to manufacture-but what good will they do if manufacturing is limited to automobiles, Gujarat's once famed cotton textile industry is dying, and new investments-including a measly $ 7 billion FDI-are concentrated in SEZs with no benefits like job creation for locals? The service sector has traditionally been weak in Gujarat. Its marginal growth helped mainly, people in the urban areas. Modi could not generate a co-operative movement in Gujarat-the land of the white revolution-that might have helped the small farmer of the state. His record in introducing welfare and distributive policies for the poor and the Adivasis remains dismal. He failed in raising the minimum price for the farmer or built new irrigation networks. The channelizing of the Narmada affects only 5-10 % of Gujarat's vast rural population.

रविवार, 9 दिसम्बर 2012

सीमोन द बोउवार और फेसबुक


एक लड़की से माँ की तरह बनने की आशा की जाती है,पिता की तरह नहीं। लड़का जहाँ पिता की श्रेष्ठता को एक चुनौती की तरह लेता है,वहीं लड़की एक लाचरीभरी प्रशंसा पिता के प्रति समर्पित करती है। अपनी वैयक्तिकता को बिलकुल त्यागकर वह समर्पण की वस्तु बन जाती है।


भारतीय समाज पुरानी रूढ़ियों में इस कदर बंधा है कि स्त्री को जीते जी स्वतंत्रता नहीं देता।यहां तककि मरने के बाद भी औरत को स्वतंत्रता नहीं देता। स्त्री के मरने के बाद भी उसकी मिट्टी,संपत्ति आदि पर पुरूष का कब्जा बना रहता है।

जबकि भारतीय संविधान ऐसा नहीं मानता। त्रासद यह है कि जो मर्द संविधान मानते हैं वे स्त्री,परिवार आदि के संदर्भ में संविधान में बतायी गयी बातों को नहीं मानते। इसके कारण स्त्री विरोधी मनोदशा अभी तक हमारे सोच में बनी हुई है।


फेसबुकवीरों को अनेक नए विषयों पर जोर आजमाइश करते देखा है। लेकिन परिवार और स्त्री की संविधानविरोधी स्थितियों पर कभी भी बहस करते नहीं देखा।

स्त्रियों के रसीले वाक्य,सुंदर फोटो,लोकलुभावन कथन से भी ज्यादा मूल्यवान है स्त्री के प्रति आधुनिक नजरिया। यह नजरिया भारत के संविधान में प्रदत्त अधिकारों के दायरे में नए सिरे से बहस में लाने की जरूरत है।


स्त्री का रहस्यमय रूप ही पुरूष को सबसे अधिक मान्य है। जिसका हम वर्णन नहीं कर पाते उसे रहस्यमय बना देते हैं। रहस्यमय बनाने का अर्थ है स्त्री को न समझना। यह काम हमारे फेसबुक मित्र भी खूब करते हैं,इस काम में स्त्रियां भी फेसबुक पर उनकी मदद करती हैं।


भारतीय स्त्री की मनोदशा यह है कि निज व्यक्तित्व के उद्धार के प्रयत्नशील होने की बजाय चुपचाप गुलामी की स्थिति को स्वीकार कर लेना आसान समझती है। हमारे यहां जीवित से अधिक मृतक के अनुकूल बना लेने में स्वर्गानुभूति मिलती है। यह मनोदशा स्त्री के कष्ट की जड़ है। किसी भी रूप में अतीत की स्थिति को स्वीकार करना न तो वांछित है और न सही है। स्त्री अपने लिए जीना सीखें बंधनों और निषेधों के लिए जीना बंद करे।


भारत में परिवार नामक संस्था की आड़ में आएदिन परिवार के सदस्यों (व्यक्ति) की स्वायत्तता ,स्वतंत्रता और निजता पर आएदिन हमले होते रहते हैं, प्रतिदिन लाखों युवाओं को अकल्पनीय दुख दिए जाते हैं। इसके बावजूद हम परिवार नामक संस्था की जय-जयकार करते हैं। भारत में परिवार नामक परंपरागत फंडामेंटलिज्म का बड़ा स्रोत है। उसकी खुलकर आलोचना होनी चाहिए। आधुनिक मनुष्य के लिए नए किस्म के परिवार की जरूरत है जो व्यक्ति की निजता और स्वतंत्रता को माने और परिवारीजनों में समानता के आधार पर टिका हो।


भारत में स्त्री को पुरूष के साथ नत्थी करके देखने का रिवाज है।यह रिवाज बदले। स्त्री को हम व्यक्ति के रूप में देखें। स्त्री को जब एक स्वतंत्र व्यक्ति माना जाता है तो ,उसे उसकी इच्छा के विरूद्ध वश में नहीं किया जा सकता।

ज्ञानक्रांति का फैसला कब लेंगी ममता

सपने देखना अच्छी बात है। सपनों में आनंद लेना भी अच्छी बात है लेकिन सपनों को साकार करना उससे भी अच्छी बात है। जो राजनेता सपने देखता है और सपने साकार करता है वह विज़नरी कहलाता है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को यदि पश्चिम बंगाल का सही अर्थ में आइकॉन बनना है तो राजनेता की बजाय विज़नरी बनना होगा। कथनी और करनी के भेद को खत्म करना होगा। भाषण कम और काम ज्यादा। जलसे कम और एक्शन ज्यादा की कर्मसंस्कृति पैदा करनी होगी। राज्य में पूंजीनिवेश भाषणों से नहीं होता। कोई भी उद्योगपति भाषणों से प्रभावित होकर राज्य में पूंजी निवेश नहीं करता। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि उनके हाथ से राज्य का यथार्थ खिसकता चला जा रहा है। वे जब से मुख्यमंत्री बनी हैं उनकी आमलोगों से दूरी बढ़ी है ,राज्य की समस्याओं से भी अलगाव बढ़ा है। वे अपने दल के कॉकस और नौकरशाही के घेरे में कैद हैं। कॉकस और नौकरशाही उनको खुलेमन से न तो सोचने देती है और नहीं अपने ही लोगों पर विश्वास करने देती है। जनता और यथार्थ से अलगाव के कारण व्यापक पैमाने पर मुख्यमंत्री के मन में संदेह और अविश्वास बढ़ा है। संदेह और अविश्वास के कारण इनदिनों वे जो भी बोल रही हैं उसमें साफतौर पर फांक नजर आती है। इस फांक के दर्शन इसबार आईआईटी2012 के ग्लोबल सम्मेलन में उनके द्वारा दिए गए भाषण में भी साफ नजर आई। 

एकजमाना था ममता सबको अपील करती थी, लेकिन विगत शुक्रवार को वे जब साइंस सिटी में बोल रही थीं तो वे किसी को प्रभावित नहीं कर पा रही थीं। जानकारों की राय में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का भाषण किसी भी दृष्टि से अपील नहीं कर पा रहा था। मुख्यमंत्री के राजनीतिक स्वप्न और आईआईटी के युवाओं के सपनों में कोई मेल नहीं दिख रहा था। इस मौके पर एक आईआईटी स्नातक ने कहा कि ममताजी के शासन में आने के बाद हमें इस राज्य में आईटी का कोई भविष्य ही नजर नहीं आ रहा। मैंने ऐसे ही पूछा कि उन्हें मुख्यमंत्री की अपील पर भरोसा क्यों नहीं है ? उसने कहा कि आईटी क्षेत्र कोई कुटीर उद्योग नहीं है कि कम पूंजी से आरंभ किया जाय। राज्य सरकार के पास कोई विज़न नहीं है।ममता नहीं जानती कि राज्य में सूचना प्रौद्योगिकी किस तरह आए और किस तरह युवाओं को रोजगार मिले। इस युवा आईआईटी स्नातक ने कहा कि अनेक आईटी कंपनियां अपना कारोबार फिलहाल पश्चिम बंगाल में न करने का फैसला ले चुकी हैं और कई कंपनियों ने अपने कारोबार को धीरे धीरे हैदराबाद एवं बंगलौर के केन्द्रों में शिफ्ट कर दिया है। सेक्टर पांच में इन दिनों कोई नई कंपनी आने को तैयार नहीं है। विगत डेढ़ साल में एक भी नई आईटी कंपनी ने अपना काम कोलकाता में आरंभ नहीं किया है।

एक अन्य स्नातक ने गुस्से में कहा कि मुख्यमंत्री को आईटी क्षेत्र को इस राज्य में लाना है तो पहले माफिया और फिरौतीबाजों को नियंत्रित करना होगा। सॉल्टलेक के सेक्टर पांच में भाड़े की दर में आई जबर्दस्त गिरावट बताती है कि राज्य की अर्थव्यवस्था एकदम चरमरा गयी है।

ममता सरकार के आने के पहले सेक्टर पांच में 65-80 रूपये प्रति वर्गफुट भाड़ा था आज यह भाड़ा गिरकर 25-30 रूपये प्रति वर्गफुट हो गया है। बड़ी बड़ी बिल्डिगें खाली पड़ी हैं उनमें कोई भी व्यक्ति नजर नहीं आता। भारत के महानगरों में इस तरह का सुनसान माहौल कहीं पर भी नजर नहीं आएगा जैसा सेक्टर पांच में बन रहा है। नई कंपनियों का न आना और पुरानी कंपनियों का अपने कारोबार का विस्तार न करना,इस बात का संदेश है कि कहीं न कहीं मंदी और राज्य प्रशासन की नौकरशाही के कारण आईटी क्षेत्र के उद्यमी हतोत्साहित हुए हैं।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जब आईआईटी ग्लोबल सम्मेलन 2012 को सम्बोधित कर रही थीं तो युवा उद्यमी राज्य सरकार की ओर से किसी नई सुविधाओं की घोषणाओं की उम्मीद कर रहे थे। लेकिन इसबार मुख्यमंत्री ने नए उद्यमियों को आकर्षित करने के लिए कोई नया पैकेज घोषित नहीं किया। इस सम्मेलन में 600 आईआईटी स्नातक भाग ले रहे हैं। सम्मेलन में भाग ले रहे दिल्ली से आए यशवंत सिंहा ने कहा कि ममताजी को यदि राज्य में सूचना तकनीक को जनप्रिय बनाना है तो उनको सीधे स्कूल,कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कम्प्यूटर के प्रयोग को बढ़ावा देना चाहिए। विश्वविद्यालय शिक्षा का आधुनिकीकरण करना चाहिए,शिक्षकों और छात्रों को लैपटॉप-आईपैड आदि मुहैय्या कराने चाहिए। सूचना तकनीक के प्रति अपील पैदा करने लिए उसे दैनंदिन अकादमिक कामकाज और कम्युनिकेशन का हिस्सा बनाना बेहद जरूरी है और यह भी जरूरी है कि उच्चशिक्षा को परंपरागत शिक्षण-प्रशिक्षण की पद्धति के बाहर लाया जाय। इसके लिए इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जाय और शिक्षा के आधुनिकीकरण को प्रमुख एजेण्डा बनाया जाय। मुख्यमंत्री यदि चाहती हैं कि पश्चिम बंगाल फिर से भारत के मानचित्र पर उभर कर सबसे ऊपर आए इसके लिए पहली जरूरत है राज्य की समूची शिक्षा व्यवस्था का उच्च कम्युनिकेशन तकनीक के साथ एकीकृत करके आधुनिकीकरण किया जाय। उच्चमाध्यमिक से लेकर एमए-पीएचडी करने वालों तक राज्य सरकार मुफ्त लैपटॉप बांटे और शिक्षकों को मुफ्त इंटरनेट कनेक्शन दिए जाएं। एक अन्य आईआईटी स्नातक ने कहा कि पश्चिम बंगाल में यदि बिजली की सप्लाई सही है और बिजली कभी नहीं जाती है तो परंपरागत विश्वविद्यालयों को सूचना तकनीक के उपयोग बड़ा क्षेत्र बना देना चाहिए। अकादमिक जगत में आधुनिकशिक्षा को लाने में 19वीं सदी में बंगाल अग्रणी था ,लेकिन नए आधुनिक माहौल में पश्चिम बंगाल की समूची शिक्षा व्यवस्था को समुन्नत संचार तकनीक से जोड़कर ज्ञानक्रांति के क्षेत्र में अग्रणी बनाया जाना चाहिए। हैदराबाद से आए पी.राजू का कहना था कि इंटरनेट कनेक्शन को केन्द्र सरकार को नाममात्र के शुल्क के आधार पर मुहैय्या कराना चाहिए। इससे इंटरनेट-कम्प्यूटर आदि के उपयोग में तेजी से इजाफा होगा।

शुक्रवार, 7 दिसम्बर 2012

फेसबुक और भीमराव आंबेडकर


'मैंने जाति-व्यवस्था समाप्त करने के उपाय और साधनों से संबंधित प्रश्न पर जोर इसलिए दिया है ,क्योंकि मेरे लिए आदर्श से अवगत होने के अपेक्षाकृत उचित उपायों और साधनों की जानकारी प्राप्त कर लेना अधिक महत्वपूर्ण है। यदि आपको वास्तविक उपाय और साधनों की जानकारी नहीं है तो आपके सभी प्रयास निष्फल रहेंगे।'


13 अक्टूबर 1929 को पुणे के प्रसिद्ध पार्वती मंदिर में अस्पृश्यों के प्रवेश के लिए दलितनेताओं और सवर्णनेताओं ने मिलकर आंदोलन किया। मिलकर आंदोलन करने वाले नेता थे- शिवराम जानबा कांबले, पा.ना.राजभोज, श्री.स. थोरात. लांडगे,विनायकराव भुस्कुटे, (सभी दलितनेता) और वा.वि.साठे, देशदास रानाडे,ग.ना.कानिटकर,केशवराव जेधे,न.वि.गाडगिल (सभी सवर्ण) । इस आंदोलन में कुछ आर्यसमाजी भी शामिल हुए थे। इस आंदोलन में आंबेडकर किसी व्यस्ततावश पहुंच नहीं पाए।

फिर भी उन्होंने बम्बई की एक सभा में इस आंदोलन का समर्थन करते हुए कहा था- ''पुणे के दलितवर्ग द्वारा अपने अधिकार प्राप्त करने के लिए चलाए संघर्ष को केवल हार्दिक समर्थन देना ही बम्बई के दलितवर्ग का कर्तव्य नहीं , उन्हें आर्थिक सहायता देनी चाहिए।आवश्यकता पड़ने पर सत्याग्रह का समर्थन करने के लिए पुणे जाने के लिए तैयार रहना चाहिए। "


आंबेडकर ने दलितों के लिए मूल्यवान सलाह दी कि - ''अस्पृश्य समाज को अपनी यथास्थिति में बने रहने की वृत्ति छोड़ देनी चाहिए।''


बाबासाहब आंबेडकर ने सबसे महान कार्य यह किया कि उन्होंने अस्पृश्यों के दुख और जातिप्रथा की बुराईयों से सारी दुनिया को अवगत कराया। उनको सामाजिक परिवर्तन का प्रधान राजनीतिक विषय बनाया।


बाबासाहब आंबेडकर की अपने जमाने के दिग्गज ब्राह्मण विद्वानों के साथ मित्रता थी। एक ही नमूना काफी है। यह नमूना इसलिए दे रहे हैं कि नए विचारक आंबेडकर के जमाने के बारे में और खासकर ब्राह्मणों के साथ उनके संबंधों के बारे में मिथ्याप्रचार करते रहे हैं। वाकया है आचार्य प्रह्लाद केशव अत्रे के विवाह का। अत्रे साहब पक्के ब्राह्मण थे और उन्होंने वैश्य कन्या से शादी की थी। आंबेडकर ने अत्रे का बहिष्कृत भारत में लेख लिखकर अभिनंदन किया था। लिखा था-

''अत्रे,देशस्थ ब्राह्मण और उनकी पत्नी गोंदूताई शामराव मुंगी, वैश्य! कवि केशवकुमार नाम से वे साहित्यभक्तों को परिचित हैं।उनका लेखन ऐसा मौलिक है कि उपहासात्मक काव्य लिखने में उनका सानी अन्य मराठी कवि नहीं है। वर-वधू के स्वतंत्र और स्वावलंबी होने के कारण यह मिश्र विवाह हर दृष्टि से उचित और आदर्श माना जाना चाहिए।''


आंबेडकर ने कई महत्वपूर्ण बातें कही हैं,उनमें से एक है, 'हमारे हिन्दुस्तान देश के हीनत्व का अगर कोई कारण होगा तो वह देवतापन है। '


आंबेडकर के अछूतोद्धार के काम में ब्राह्मणों की सक्रिय भूमिका थी। स्वयं आंबेडकर भी चाहते थे कि अस्पृश्यता को खत्म करने के काम में ब्राह्मणों की सक्रिय भूमिका हो। उस समय जेधे-जवलकर जैसे नेताओं ने आंबेडकर को कहा कि महाड़ सत्याग्रह (1927)में ब्राह्मणों को शामिल न किया जाय। आंबेडकर ने उनकी राय नहीं मानी और कहा , 'हमें यह शर्त मंजूर नहीं कि अस्पृश्योद्धार के आंदोलन से ब्राह्मण कार्यकर्ताओं को बाहर निकाला जाए। ' उन्होंने आगे कहा, 'हम यह मानते हैं कि ब्राह्मण लोग हमारे दुश्मन न होकर ब्राह्मण्यग्रस्त लोग हमारे दुश्मन हैं। ब्राह्मण्यरहित ब्राह्मण हमें नजदीक का लगता है। ब्राह्मण्यग्रस्त ब्राह्मणेतर हमें दूर का लगता है। '

कृपया इन शब्दों को पढ़ें नए तथाकथित दलित चिंतक .


मित्रों से एक अन्य बात कहनी है कि फेसबुक स्टेटस को एक सहज सामान्य कम्युनिकेशन विधा के रूप में लें उसे वैचारिक और किसी को ओछा बनाने या मूल्य निर्णय के आधार पर कम से कम न देखें। यहां एक सामान्य कम्युनिकेशन है जो हम लोग करते रहते हैं। सामान्य कम्युनिकेशन को गंभीर मूल्य निर्णय की ओर जो भी ले जाता है वह सही नहीं करता। किसी के भी बारे में कोई भी राय कम से कम फेसबुक स्टेटस के आधार पर नहीं बनायी जा सकती। कोई रचना हो तो उसके आधार पर गंभीर बात हो सकती है।

अंत में, फेसबुक कम्युनिकेशन को समझें तो बेहतर होगा। यह मूल्य-निर्णय का मीडियम नहीं है।


भीमराव आंबेडकर के मित्र थे श्रीधरपंत तिलक (लोकमान्य तिलक के बेटे) ,वे आंबेडकर के चहेते थे। वे प्रगतिशील विचार रखते थे। उनका मानना था कि हिन्दू संगठन का लक्ष्य है चारों वर्णों का विनाश हो। ब्रिटिश नौकरशाही और भिक्षुकशाही ओछीवृत्ति है। उन्होंने 1927 के गणपति महोत्सव के समय केसरी के समर्थकों के विरोध को न मानकर,अस्पृश्य कार्यकर्ता राजभोज के श्रीकृष्णमेले का कार्यक्रम गायकवाड़ बाड़े में आयोजित किया। बाद में पुणे के अस्पृश्यों ने एक सभा बुलाकर श्रीधरपंत तिलक का सार्वजनिक अभिनंदन किया था।

यह घटना इसलिए लिखनी पड़ी कि इनदिनों इंटरनेट पर अजीब माहौल बनाया जा रहा है ,आंबेड़कर के साथ कोई ब्राह्मण नहीं था। आंबेडकर के साथ अनेक यशस्वी सवर्ण थे जो उनके विचारों को मानते थे।


सन् 1983 में मई के दिनों में मैंने माकपा के पोलिट ब्यूरो मेम्बर माकपा के बड़े नेता और तेलंगाना के महान आंदोलन के समय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव रहे बीटी रणदिवे से सवाल किया था कि आप अपनी आत्मकथा क्यों नहीं लिखते, उसके जबाव में उन्होंने कहा कि हमने ऐसा क्या किया है जो आत्मकथा लिखें। मुझे यह बात आज भी प्रासंगिक लगती है।कम्युनिस्टनेताओं ने बेशुमार कुर्बानियां दीं,बड़ी लडाईयां लड़ीं। लेकिन आत्मकथा नहीं लिखी।

इधर हिन्दीलेखकों में यह फैशन चल निकला है कि वे वोल्यूम दर वोल्यूम आत्मकथा लिख रहे हैं जबकि उनकी आत्मकथाओं में स्कूल के दाखिले, कॉलेज का जीवन, गांव या मुहल्ले के वर्णन और ब्यौरों के अलावा कुछ नहीं होता। काश ,ब्यौरे के बाहर आकर वे जीवन में कुछ कर पाते ? जीवन के ब्यौरे महान नहीं बनाते महान कर्म महान बनाते हैं,बेहतरीन लेखन महान बनाता है। आत्मकथा महान नहीं बनाती।


ब्राह्मणों या सवर्णों पर प्रामाणिक लेखन के लिए जब ब्राह्मण या सवर्ण के गर्भ से जन्म लेना जरूरी नहीं है तो दलित पर प्रामाणिकलेखन के लिए दलित के गर्भ से जन्मलेना क्यों जरूरी है ? मजेदार बात यह है कि दलितलेखक अपने को ब्राह्मणों (सवर्ण) पर लिखने का अधिकारी विद्वान मानते हैं। लेकिन ज्योंही कोई ब्राह्मण लेखक दलितों पर लिखता है तो सीधे कहते हैं आप दलित हुए बिना दलित पर नहीं लिख सकते। यह लेखन के संदर्भ में क्या जरूरी सवाल है कि लेखक किसके घर पैदा हुआ है ?

रामकृष्ण परमहंस और फेसबुक


रामकृष्ण परमहंस ने प्रेम की जो परिभाषा दी है वो शानदार है। लिखा है- "पहला जो 'साधारण' प्रेम है उसमें प्रेमी केवल अपना ही सुख देखता है। वह इस बात की चिन्ता नहीं करता कि दूसरे व्यक्ति को भी उससे सुख है अथवा नहीं। इस प्रकार का प्रेम चन्द्रावली का श्रीकृष्ण के प्रति था।

दूसरा प्रेम जो 'सामंजस्य' रूप होता है उसमें दोनों एक-दूसरे के सुख के इच्छुक होते हैं।यह एक ऊँचे दर्जे का प्रेम है।

परन्तु तीसरा प्रेम सबसे उच्च है। इस समर्थ प्रेम में प्रेमी अपनी प्रेमिका से कहता है तुम सुखी रहो ,मुझे चाहे कुछ भी हो। राधा में यह प्रेम विद्यमान था। श्रीकृष्ण के सुख में उन्हें सुख था।गोपियों ने भी यह उच्चावस्था प्राप्त की थी।


भीष्मदेव देह छोड़ना चाहते हैं,शरों की शय्या पर लेटे हुए हैं ,सब पाण्डव श्रीकृष्ण के साथ खड़े हैं.सब ने देखा, भीष्म की आंखों में आंसू बह रहे हैं।अर्जुन

श्रीकृष्ण से बोले , भाई यह तो बड़े आश्चर्य की बात है कि पितामह -जो स्वयं भीष्मदेव ही हैं,सत्यवादी है,जितेन्द्रिय,ज्ञानी,आठों वसुओं में से एक हैं- वेभी देह छोड़ते समय माया में पड़े रो रहे हैं। यही बात भीष्मदेव से जब श्रीकृष्ण ने कही तो भीष्मदेव ने कहा ,कृष्ण ,तुम तो खूब जानते हो कि मैं इसलिए नहीं रो रहा हूँ। जब सोचता हूँ कि जब स्वयं भगवान पाण्डवों के सारथि हैं ,फिर भी उनके दुःख और विपत्तियों का अंत नहीं होता तब यही सोचकर आंसू बहाता हूँ कि परमात्मा के कार्यों का कुछ भी भेद न पाया।


रामकृष्ण परमहंस ने लिखा है," जिसका मन जिस पर रमता है वह उसी को चाहता है;कहां रहता है,उसकी कितनी कोठियां हैं, कितने बगीचे हैं,कितना धन है ,परिवार में कौन-कौन हैं,नौकर कितने हैं -इसकी खबर कौन लेता है ?"


फेसबुकप्रेम तो ईश्वरप्रेम की तरह है।इसके रास्ते में जितने बढोगे उतने ही कर्म छूटे चले जाएंगे।


जैसे ब्रह्मभोज में पहले खूब शोरगुल मचता है ।जब सभी के आगे पत्तल पड़ जाती है तब गुलगपाड़ा कुछ घट जाता है।केवल 'पूड़ी लाओ,पूड़ी लाओ' की आवाज होती रहती है। फिर जब लोग पूड़ी-तरकारी खाना शुरू करते हैं तब बारह आना शब्द घट जाता है। जब दही आया तब सप्-सप् -शब्द मानो होता ही नहीं। और भोजन के बाद निद्रा।तब सब चुप !


रामकृष्ण परमहंस ने अपने भक्त शिवनाथ को देखकर कहा ,"क्या शिवनाथ तुम आए हो ,देखो तुम लोग भक्त हो,तुम लोगों को देखकर बड़ा आनंद होता है। गंजेड़ी का स्वभाव होता है कि दूसरे गंजेड़ी को देखते ही वह खुश हो जाता है,कभी तो उसे गले ही लगा लेता है।"

फेसबुकिए की दशा भी क्या गंजेडी जैसी है ?


रामकृष्ण परमहंस ने जातिप्रथा को समाप्त करने के लिए एक सुंदर सुझाव दिया है, उन्होंने कहा- "एक उपाय से जातिभेद उठ सकता है।वह उपाय है -भक्ति।भक्तों के जाति नहीं है।"


रामकृष्ण परमहंस ने एक जगह लिखा है ''कलकत्ते के लोग हुल्लड़बाज हैं। '' यह बात सौ फीसद आज भी सत्य है।

सोमवार, 3 दिसम्बर 2012

मीडिया कौंसिल से ही थमेगी मीडिया ब्लैकमेलिंग

फिरौती लेना गुंडों और माफिया गिरोहों का काम रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में जबसे पेडन्यूज की संस्कृति मीडिया में आई है तब से फिरौती वसूली और ब्लैकमेलिंग की प्रवृत्ति मीडिया में भी आ गई है। पहले कभी-कभार छुटभैय्ये पत्रकार लोकल खबरों को छापने को लेकर ब्लैकमेलिंग करते थे,लेकिन जब से टीवी न्यूज चैनल आए हैं उनके संपादक और मालिक सीधे समाचारों का समय और टॉकशो का समय सीधे बेच देते हैं। विगत महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के मौके पर प्रिंट से लेकर इलैक्ट्रोनिक मीडिया तक पेडन्यूज की संस्कृति छायी रही और यह सब चुनाव आयोग की आंखों के सामने हुआ, इस धंधे में सभी प्रमुख राजनीतिक दल शामिल थे। इसी तरह जब से भ्रष्टाचार के बड़े घोटाले सामने आए हैं तबसे भ्रष्ट्र लोगों द्वारा मीडियाप्रबंधन पर अच्छी खासी रकम खर्च की जा रही है। स्थिति यहां तक खराब है कि केन्द्रीय मंत्रीमंडल में इच्छित विभाग पाने, खासक्षेत्र का खास सौदा हासिल करने के लिए मीडिया-जनसंपर्क फर्मों की मदद ली जा रही है। नीरा राडिया की जनसंपर्क कंपनी यही काम करती रही है।इसके अलावा पिछलीबार तमिलनाडु के एक नेता को केन्द्र में संचारमंत्री बनाने के लिए दिल्ली स्थित दो मीडिया घरानों के बड़े पदाधिकारियों ( वीर सिंघवी और बरखा दत्ता) की सक्रिय मदद ली गयी। इनलोगों की मंत्री की नियुक्ति में सक्रिय हिस्सेदारी को सप्रमाण मीडिया में पेश भी किया गया लेकिन इनके मालिकों ने इन दोनों को न तो नौकरी से निकाला और न अदालत ने इनके इस अनैतिक कर्म का संज्ञान लिया,लेकिन इस सारे फजीहत में टाटा समूह का नाम आ गया,उन कंपनियों और व्यक्तियों के नाम आए जो इस धंधे में शामिल थे और अंतमें नीरा राडिया एंड कंपनी ने भारत से अपना जनसंपर्क का कारोबार खत्म कर दिया। लेकिन इस प्रक्रिया में कारपोरेट घरानों और मीडिया के मुखियाओं की सत्ता के साथ भ्रष्ट मित्रता उजागर हो गई।यह भी उजागर हुआ कि केन्द्र सरकार किस तरह इस तरह के दलालों से घिरी है। 

विगत तीन सालों में जिस तरह धड़ाधड़ भ्रष्टाचार के मामले सामने आए हैं। उनकी वजह से कारपोरेट घरानों ने मीडिया प्रबंधन पर ज्यादा ध्यान देना आरंभ कर दिया है। वे अब सीधे मीडिया के पूरे समूह के अधिकांश शेयरों को खरीदकर मालिकाना अधिकार अपने पास रख रहे हैं या फिर पिछले दरवाजे से मीडिया को खरीदने की कोशिशें कर रहे हैं जिससे भ्रष्टाचार की खबरों को नियंत्रित किया जाय। खासकर टीवी न्यूज चैनलों के प्रबंधन पर खास ध्यान दिया जा रहा है। यही वो परिप्रेक्ष्य है जिसमें कोलगेट कांड की रिपोर्टिंग और उसके बहाने फिरौती की 100 करोड़ रूपये वसूली की खबर पहले सामने आई,उस खबर के आने के 40 दिन बाद जी न्यूज के दो प्रमुख मीडियाकर्मियों की गिरफ्तारी हुई और अब जिंदल कारपोरेट घराना और जीन्यूज मीडिया घराने आमने –सामने हैं। इसमें सत्य क्या है यह तो भविष्य ही बताएगा ,लेकिन एकबात साफ है कि जिंदल ग्रुप कोलगेटकांड में सबसे ज्यादा घिरा हुआ है और उसके ऊपर कानून तोड़ने के संगीन आरोप लगे हैं। उसी तरह जीन्यूज ने कोलगेटकांड की न्यूज को दबाने के बदले 100 करोड़ रूपये की मांग करके मीडिया को शर्मसार किया है।

सवाल यह है कि जीन्यूज ने एक भ्रष्ट कारपोरेट घराने से अपने चैनल के लिए 100 करोड़ रूपये क्यों मांगे ? ये रूपये किसी भी रूप में हो,लेकिन मांगे गए,ये रूपये ऐसे समय में मांगे गए जब कोलगेट कांड को लेकर संसद से लेकर आम मीडिया तक जिंदल ग्रुप घिरा हुआ था और उनकी कंपनी पर सवाल उठ रहे थे। यानी समूचे मीडिया में खबरों का फ्लो जिंदल ग्रुप के खिलाफ था। ऐसे में जीन्यूज के दो प्रमुख कर्मियों ने सौदेबाजी के लिए जिंदल ग्रुप के लोगों से बातचीत की और यह मीडिया एथिक्स के खिलाफ है। इस बारे में सांसद नवीन जिंदल ने वीडियो टेप मीडिया को जारी किए और उनकी वैधता की पुष्टि फोरेंसिक लैव की रिपोर्ट से भी हो गई है।फोरेंसिक विभाग की रिपोर्ट आने के बाद 40 दिन बाद जीन्यूज के दो प्रमुखकर्मियों सुधीरचौधरी (संपादक जी न्यूज) और जी बिजनेस के संपादक समीर अहलुवालिया की गिरफ्तारी हुई और मामला अदालत के सामने है।अदालत में पेशी के बाद इनदोनों को अदालत ने दो दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया।बाद में 14दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया,फिलहाल इनदोनों की जमानत याचिकाएं अदालत के सामने विचाराधीन हैं।

इस प्रसंग में जीन्यूज के पांच बड़े अधिकारियों से पुलिस आनेवाले दिनों में पूछताछ करेगी। इनमें जी ग्रुप के मालिक सुभाषचन्द्र भी हैं। समस्या यह है कि सुभाषचन्द्र यदि इस प्रसंग में लिप्त पाए जाते हैं तो क्या पुलिस उनको भी गिरफ्तार करेगी ? कायदे से इस मामले में जो भी लिप्त पाया जाए उसकी गिरफ्तारी होनी चाहिए। क्योंकि गिरफ्तार किए गए संपादकद्वय निजीतौर पर इतनी बड़ी रकम की जिंदल ग्रुप से वसूली का फैसला नहीं कर सकते। केस का परिणाम कुछ भी आए। इससे जिंदल ग्रुप और जीन्यूज वाले दूध के धुले साबित नहीं होते। कारण यह है कि ये दोनों ही इस भ्रष्टाचार में शामिल हैं एक कोलगेट की लूट के जरिए दूसरा न्यूज के बदले धनवसूली के जरिए। यह अभिव्यक्ति की आजादी के हनन का मसला नहीं है। यह तो लूट में हिस्सेदारी का मामला है। सबसे बुरी बात यह हुई कि जीन्यूज ने अपने दो कर्मियों की गिरफ्तारी के तत्काल बाद प्रेस कॉफ्रेस की। प्रेस कॉफ्रेंस की बेचैनी क्यों ? प्रेस कॉफ्रेस में जी न्यूज ने कोई नया सबूत भी नहीं रखा और नहीं वीडियो टेप की प्रामाणिकता को ही झूठा साबित कर पाए। सवाल यह है कि जब मामला अदालत के विचाराधीन है तब प्रेसकॉफ्रेंस क्यों ? यह सीधे मीडिया के दबाब के जरिए अदालत की कार्यवाही को प्रभावित करने की कोशिश है।

दूसरी ओर जीन्यूज को घेरकर जिंदल ग्रुप को फिलहाल एक बड़ा लाभ मिला है अचानक मीडिया में कोलगेट पर चुप्पी छा गयी है और संसद भी शांत है। कहीं पर भी कोलगेट पर हंगामा नहीं हो रहा। असल में जिंदल ग्रुप यही चाहता था कि मीडिया में कोलगेटकांड की खबर दबा दी जाय और उसके लिए उसने जो जाल बिछाया उसके परिणाम सामने दिख रहे हैं।

मीडिया में सभी पुण्यात्मा निवास नहीं करते, मीडिया में जो लोग गलत काम करते हैं , उनके खिलाफ शिकायत आने पर पुलिस को उनके खिलाफ एक्शन लेना चाहिए।

जीन्यूज के दो कर्मियों की गिरफ्तारी का मीडिया की स्वतंत्रता से कोई संबंध नहीं है,यह तो व्यापार की स्वतंत्रता का मामला है। खबरें जब व्यापार होंगी तो इस तरह के केस और भी सामने आएंगे और भविष्य में इसके लिए विशेष अदालतें बनानी होंगी। मीडिया का मामला खाली धोखाधड़ी,ठगई,ब्लैकमेलिंग का मामला नहीं है यह तो कवरेज के सामाजिक प्रभाव से भी जुड़ा है और इस मामले में जजों को ज्यादा समझ नहीं होती। ऐसी स्थिति में भारत सरकार को कानूनसम्मत और संवैधानिक-कानूनी अधिकारों से लैस मीडियाकौंसिल का जल्द गठन करना चाहिए। अब तक के भारत में मीडिया नैतिकता के मानकों को आत्मनियंत्रण के जरिए लागू करने में मीडियाघराने असफल रहे हैं और इसके भविष्य में सुधरने की संभावनाएं भी नहीं हैं। फलतः इलैक्ट्रोनिक मीडिया को नियमित करने के लिए मीडिया कौंसिल का तुरंत गठन किया जाय।

बुधवार, 28 नवम्बर 2012

मैत्रेयी पुष्पा के बहाने स्त्री आत्मकथा के पद्धतिशास्त्र की तलाश

आत्मकथा में सब कुछ सत्य नहीं होता बल्कि इसमें कल्पना की भी भूमिका होती है। आत्मकथा या साहित्य में लेखक का 'मैं' बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। यह 'बहुआयामी होता है। उसी तरह लेखिका की आत्मकथा में 'मैं' का एक ही रूप नहीं होता। बल्कि बहुआयामी 'मैं' होता है। 

मैत्रेयी पुष्पा के पास एक लेखिका का 'मैं' है। साथ ही एकयुवा छात्रा,बिंदास युवती, परंपरागत पत्नी और माँ का भी 'मैं' है। आमतौर पर हिन्दी में लेखक के 'मै' पर जब भी बातें हुई हैं तो उसके एकल रूप की चर्चा हुई हैं। खासकर छायावादी लेखकों के संदर्भ में जो बहस चली है वह लेखक के एकल 'मैं' पर केन्द्रित है। रामविलास शर्मा से लेकर नामवर सिंह तक सबके नजरिए में छायावाद के लेखक का एकल 'मैं' है।यह 'मैं' के प्रति असंपूर्ण नजरिया है। इसके कारण एकल 'मैं' की स्टीरियोटाइप समझ बनी है। 'मैं' महज भावों की अभिव्यक्ति नहीं है बल्कि उसकी अस्मिता की भी अभिव्यक्ति है। इसमें व्यक्ति और समाज, समुदाय और व्यक्ति, लिंग और साहित्य घुले-मिले होते हैं। इसी तरह एक ही पाठ में लेखिका की जेण्डर पहचान के अंदर अनेक अस्मिताएं होती हैं जिनसे अस्मिता का उप-पाठ बनता है।

'मैं' के बहुआयामी रूपों को खोलने से उसके विभिन्न स्थितियों में विभिन्न भाव नजर आएंगे। मसलन् मैत्रेयी पुष्पा के छात्रा के रूप में जो 'मैं ' है उसमें मातहत भाव नहीं है। लेकिन पत्नी रूप में मातहत भाव है। छात्रा के अंतर्विरोध और पत्नी के सामाजिक अंतर्विरोध अलग किस्म के हैं। यानी आत्मकथा या साहित्य पढ़ते समय हमें व्यक्ति के अंदर व्यक्ति की खोज करनी चाहिए। किसी भी व्यक्ति में एक नहीं अनेक व्यक्ति होते हैं।

मैत्रेयी पुष्पा ने पत्नी भाव के बारे में लिखा है " मगर पत्नी की भूमिका। एक पतिव्रता!पति को क्या चाहिए,यह भी जानती थी। मन से ज्यादा तन का समर्पण और उसकी मौन आवृत्ति,कम नहीं,ज्यादा से ज्यादा करनी होती है। इसमें छल छद्म के लिए जगह नहीं। जैसे विवाहित जीवन की यही कसौटी हो । मैं संयत सन्तुलित सी स्त्री, जिसके लिए यह समय सन्तोष और आनन्दभरा था, क्योंकि देह-उत्तेजना अभी आदत में शुमार नहीं हुई थी। डॉक्टर साहब के लिए प्रेम का ,आकर्षण का, दाम्पत्य का और स्त्री –पुरूष के मानसिक और शारीरिक सम्बन्ध का अर्थ एक ही है। नहीं तो उनके गुस्से का उबाल ऐसा क्यों होता कि देह का द्वव विष हो जाए।'[1] यह एक मातहत 'मैं' है।जिसकी कल्पना स्वयं लेखिका कर रही है।पत्नी की अवस्था से भिन्न अवस्था में एक स्त्री के नाते जब सोचती हैं तो उसका 'मैं' कुछ और सोचता है। लिखा है, " बस ये लोग नहीं समझना चाहते कि बन्धन मुझे रास नहीं आते। बन्धनों में मैं छटपटाने लगती हूँ।"

आरंभ में लेखिका जी रही है पत्नी के रूप में और जीना चाहती है एक स्त्री के रूप में, और यहीं पर उसके अंदर छिपे कई 'मैं' सामने आते हैं। कहने का आशय यह है कि लेखिका की आत्मकथा पढ़ते हुए उसके अंदर छिपे विभिन्न किस्म के 'मैं' की तलाश की जानी चाहिए। प्रत्येक 'मैं' का संबंध भिन्न किस्म के विचारधारात्मक विमर्श के साथ है। प्रत्येक 'मैं' का समाज और नैतिकता के साथ भिन्न किस्म का संबंध है।

लेखिका का पार्टी में नाचना या डाक्टर सिद्धार्थ के साथ हंसकर बातें करना,पति के साथ बातें करना ये दो भिन्न किस्म की नैतिकता को सामने लाते हैं। व्यक्ति एक है, लेकिन उसके 'मैं' का समाज और नैतिकता से अलग किस्म का रिश्ता है।यहां नैतिकता के आधार पर भिन्न किस्म की अस्मिता भी बन रही है।खास किस्म की व्यक्तिगत अस्मिता भी बन रही है। इस क्रम में विभिन्न किस्म की अस्मिता, उनके साथ जुड़ी नैतिक मान्यताओं और सामाजिक संस्थानों की भूमिका की ओर भी लेखिका ने ध्यान खींचा है। यानी मैं,अस्मिता और नैतिकता का एक मूल्य त्रिकोण बनता है जो लगातार यह संदेश देता है कि अस्मिता के निर्माण में नैतिकता एक तरह से एजेण्ट की भूमिका अदा करती है। लेकिन इस नैतिक एजेण्ट को उसके ऐतिहासिक-सामाजिक संदर्भ के बिना समझना संभव नहीं है।

नैतिक एजेण्ट के ऊपर मैत्रेयी के यहां उनकी निजी इच्छाएं प्रबल हैं। वह नैतिकता के सवालों से इच्छा के आधार पर खड़े होकर चुनौती देती है। इस प्रसंग में वे अंश बेहद सुंदर हैं जहां पर लेखिका मन ही मन अपनी बात कहती है। लेखिका का इस प्रसंग में आत्मालाप बहुत ही महत्वपूर्ण पहलुओं को सामने लाता है। इस तरह के चित्रण के बहाने लेखिका ने पुंसवादी मूल्यों और नैतिक मान्यताओं को सीधे चुनौती दी है। स्त्री की चुनौतियों को दो स्तरों पर देखा जा सकता है। पहला ,उसके आत्मकथन और आत्मालाप, दूसरा , इच्छा व्यक्त करने या उसके आधार पर एक्शन में। स्त्री के एक्शन उसके प्रतिवादी रूप को व्यक्त करते हैं। मसलन् मैत्रेयी का अचानक डा. सिद्धार्थ के साथ नाचना स्वयं में पुंसवाद के खिलाफ प्रतिवाद है। इस प्रतिवाद या नाचने के दौरान लेखिका के मन में क्या घटा वह पढ़ें ,लिखा है ,

' डॉक्टर सिद्धार्थ!

मेरा हाथ पकड़कर उठाते हुए।पता नहीं कितना अपनत्व था,कितनी चुनौती थी ?

या परीक्षाकाल दोनों का ?

हाथ पकड़कर खींचनेवाला मीत... मैंने अनुमति के लिए पति की ओर देखा नहीं। अपना निर्णय अपने हाथ में ले लिया, खतरों के बारे में सोचा नहीं।

मैं नाच रही थी किसी के साथ-साथ, अनगढ़ और आदिम सा नाच...जैसे मेरे जीवन मूल्यों का हिस्सा यह भी हो। जब-जब मेरा पाँव डा.सिद्धार्थ के पाँव पर पड़ जाता, वे मुस्कराकर मुझे सँभाल लेते। यह परिचय का अगला चरण,उस जानकारी का मुझे कोई इल्म न था।"

मैत्रेयी पुष्पा ने जब डा.सिद्धार्थ के साथ नाचने के लिए कदम उठा दिए तो वे अपनी ज्ञानात्मक संवेदना,जिसमें पति रहता है,का अतिक्रमण करती हुई समाजशास्त्र में प्रवेश कर रही थीं और एक नए किस्म के सामाजिक विवाद को जन्म दे रही थीं, साथ ही अपने को भी नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश कर रही थीं। यहां पर उनकी निजी अस्मिता दांव पर लगी थी। इस क्रम में वह जहां अपनी पत्नी की अस्मिता के बने-बनाए साँचे को तोड़ रही थीं और अपने पति के मन में संशय पैदा कर रही थीं. टकरावों को जन्म दे रही थीं दूसरी ओर वे नैतिकता के प्रचलित मानकों को भी तोड़ रही थीं। ये दोनों क्रियाएं लेखिका के जीवन में नैतिकता की प्रगतिशील निरंतरता को बनाने में मदद कर रही थीं। इस क्रम में लेखिका के लिए मूल्यवान था उनका मन संतोष और इच्छा की संतुष्टि। उन्हें यह चिन्ता ही नहीं थी कि 'अन्य' क्या सोच रहे हैं ? उनके पति क्या सोच रहे हैं?

लेखिका के मन में नाचने के बाद किस तरह मानसिक तूफान उठा था इसका सुंदर चित्रण किया है। लिखा है ' जो लोग इलजाम लगा रहे हैं , उन्हें जाकर बता दो कि शादी के बाद मुझे मेरे हिसाब से कारावास मिला है,जिसके लौह-कपाट मैं तभी से तोड़ने में लगी हूं और देखना चाहती हूँ कि इस दुनिया के अलावा भी कोई दुनिया है ? पति के अलावा कितने लोग हैं बाहर ? वैसे पति से बैर भाव नहीं पाला ,मगर उनके किसी खूँटे से बँधना ? ... मैं भी अपने अन्दर भावनाएँ रखती हूँ,जैसे कोई गुप्त प्यार को बचा ले। नाचने की स्मृति मेरे साथ रहेगी।'

यहां पर मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी वैयक्तिकता को केन्द्र में रखकर नैतिकता को चुनौती दी है साथ ही आत्म-नजरिए से वे चीजों को नई व्याख्या दे रही हैं। वे जब नैतिकता को चुनौती दे रही हैं तो वे यह भी रेखांकित कर रही हैं कि नैतिकता के जो रूप प्रचलन में हैं खासकर स्त्री के संदर्भ में, वे स्त्री के मन या इच्छा को नहीं देखते। नैतिकता की सारी कसौटियां स्त्री के मन या इच्छा को बाहर रखकर तय की गयी हैं। यह असल में स्त्री का गतिशील 'मैं' है। इस गतिशील 'मैं' के आधार पर जब कोई व्यक्ति सोचता है तो वह जहां एक ओर आत्म और उससे जुड़ी नैतिकता को पुनर्परिभाषित करता है वहीं दूसरी ओर व्यक्ति को एक नैतिक मनुष्य के रूप में देखने की स्थितियों को भी चुनौती देता है और स्त्री के लिए वैकल्पिक नैतिकता की तलाश आरंभ कर देता है।

मैत्रेयी पुष्पा यह भी रेखांकित करती है कि मेरी पहचान को उन चीजों के आधार पर परिभाषित किया जाए जो मेरे लिए महत्वपूर्ण हैं। यानी स्त्री की अस्मिता को स्त्री के लिए जो मूल्यवान है उसके आधार पर परिभाषित किया जाए। इस क्रम में स्त्री की भाषा रचती है और उसके जरिए स्त्री की पहचान को निर्मित करती हैं। मैत्रेयी जब अपने आत्म को परिभाषित करती हैं तो वे अपने आसपास के वातावरण और संबंधियों-मित्रों आदि के संदर्भ में परिभाषित करने की कोशिश करती हैं।

आत्म को उसके आसपास के वातावरण के संदर्भ में ही परिभाषित किया जा सकता है। इस क्रम में वे बताती हैं कि वे क्या हैं ? किस धरातल पर खड़ी होकर बोल रही हैं ? परिवार में कौन-कौन हैं ?किस तरह के सामाजिक वातावरण में जी रही हैं ? वह सामाजिक भूगोल कैसा है जिसमें जी रही हैं।

जब भी कोई स्त्री अपनी आत्मकथा लिखती है तो वह निजी कथा के साथ स्त्री की सामाजिक कथा भी लिख रही होती है।फलतःआत्मकथा स्त्रियों की सामुदायिक व्यथा-कथा का रूप ग्रहण कर लेती है।

आत्मकथा में आए नैतिकता के एजेण्टों की सही ढ़ंग से पड़ताल करने की जरूरत है। स्त्रीचेतना के स्तर को जानने और उस पर नैतिकता के दबाबों को जानने में यह तथ्य खोजना चाहिए कि आखिरकार नैतिकता पर किससे संवाद हो रहा है अथवा किससे विचारधारात्मक संघर्ष चल रहा है। क्योंकि नैतिकता को उसके संवादियों को जाने बिना खोला नहीं जा सकता है। अनेक मर्तबा नैतिकता का स्वरूप आत्मालाप और आतामानुभूति में व्यक्त होता है। लेकिन अनेकबार नैतिकता की स्थितियां अन्य से संवाद करते हुए सामने आती हैं। खासकर ऐसे लोगों से बातें करते हुए सामने आती हैं जिनके सामाजिक-ऐतिहासिक विवरण और ब्यौरों को पाठक जानता है।

नैतिकता के प्रसंग में हमेशा यह तथ्य ध्यान रहे कि अंतर्मन में बैठे नैतिक मूल्य कभी तटस्थ नहीं होते। न वे तटस्थ भाव से मन में प्रवेश करते हैं और न तटस्थ रहने देते हैं। नैतिकता के दायरे और सरोकारों को सिर्फ सवालों के दायरे तक सीमित करके नहीं देखना चाहिए।बल्कि यह देखें कि नैतिकता के सामान्य लक्षण किस तरह व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। इस प्रसंग में व्यक्ति को समग्रता में देखना चाहिए और उसके संदर्भ में ही उसके आत्म की परीक्षा की जानी चाहिए। यानी लेखिका को 'मैं' को समग्र के अंश के रूप में देखना चाहिए। समग्र से काटकर लेखिका के 'मैं' को देखने से चीजें साफ ढ़ंग से समझ में नहीं आतीं।यह समग्र जेण्डर और समुदाय दोनों से बना है।इसका अर्थ यह है कि साहित्य का इतिहास पढ़ाते समय जब दलित या स्त्री आत्मकथा पर बात की जाय तो समुदाय,लिंग और जाति के आधार पर बातें की जाएं। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो मौजूदा दौर समुदाय और साहित्य के अन्तस्संबंध के आधार पर पढ़ने या विश्लेषित करने की मांग करता है। हमारे आलोचकों ने अभी तक साहित्य और समुदाय के अंतस्संबंध पर सोचा ही नहीं है। वे तो साहित्य और वर्ग, साहित्य और समाज के आधार की ही चर्चा करते रहे हैं। यानी साहित्य और समुदाय का अन्तस्संबंध एक नए पैराडाइम को जन्म दे रहा है। इस पैराडाइम के लक्षणों की विस्तार में जाकर पड़ताल करने की जरूरत है।

स्त्री- आत्मकथाओं में नैतिकता के सवाल महत्वपूर्ण हैं। इनके बारे में हमें पद्धति और शास्त्र दोनों ही स्तरों पर स्पष्ट समझ से काम लेना होगा। नैतिकता के मानकों को दिखाकर आमतौर पर स्त्री को अधिकारहीन बनाने की कोशिश की जाती है और उसे सार्वजनिक जीवन में अपनी स्वायत्त जगह बनाने से रोका जाता है।

इस परिप्रेक्ष्य में मैत्रेयी पुष्पा की सामाजिक स्थितियों और उनके इर्दगिर्द बुने हुए नैतिक मानकों को देखा जाना चाहिए। नैतिकता के तानेबाने को समग्रता में देखते हुए मैत्रेयी पुष्पा ने लिखा है , ' बन्धन मुझे रास नहीं आते।बन्धनों में मैं छटपटाने लगती हूँ।' यह कमोवेश प्रत्येक भारतीय स्त्री की स्थिति है।

हिन्दीभाषी औरत कैसे जीती है और उसके चारों ओर किस तरह की घेराबंदी है , उसके अनेक चित्रों का विस्तृत विवरण मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी आत्मकथा में दिया है। फलतः आत्मकथा में जेण्डर यानी लिंग और समुदाय की अवधारणा केन्द्र में चली आई है। अब आत्मकथा पढ़ते हुए आप एक लेखक की आत्मकथा नहीं पढ़ रहे बल्कि एक स्त्री और एक समुदाय का आख्यान पढ़ रहे हैं। आत्मकथा में एक स्त्री या एक दलित का प्रतिवाद या छटपटाहट या बेचैनी निजी होने के साथ साथ सामुदायिक भी है।

यानी रचना में एकाधिक प्रतिवादी इमेजों को हम पढ़ते हैं। ये दोनों चरित्र ( निजी चरित्र और सामुदायिक चरित्र) एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करते नजर आते हैं। इसके कारण आत्मकथा में एक साथ अनेक आख्यान चलते रहते हैं। अतः इस तरह के प्रतिवादी चरित्रों को एक महाख्यान में बांधना संभव नहीं है। कहने के लिए यह एक औरत की कहानी है लेकिन इसमें अनेक चरित्र हैं जो इस कहानी के साथ समानांतर कहानियों को जन्म दे रहे हैं। इसके अलावा संस्कृति के भी एकाधिक रूप सामने आते हैं। एक संस्कृति वह है जिसे लेखिका स्वयं जीना चाहती है और दूसरी संस्कृति वह है जिसे समाज जीना चाहता है या जी रहा है। समाज जिस संस्कृति को जी रहा है वह लेखिका के लिए समस्याएं खड़ी कर रही है। स्त्री के लिए मुश्किलें पैदा कर रही है। यही वजह है कि मैत्रेयी पुष्पा ने जगह-जगह बेहद चुटीली मुहावरेभरी भाषा का इस्तेमाल किया है। जैसे- 'स्त्रियों की छाती में थालियाँ छनछनाती हैं।' ,' कहते हैं कि पत्नी से बड़ा ' शॉक एब्जॉर्बर ' कोई नहीं होता।' ,' जो खुलकर हँसता है,उसे खुदा की जरूरत नहीं।', 'सूरत के साथ योग्यता न हो तो सुन्दरता अधूरी रहती है' आदि।

मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा में चुटीले वाक्य आमतौर पर वहां पर आए हैं जहां पर लेखिका पुनर्व्याख्या की मांग करती है। नए सिरे से कोई बात कहना चाहती है या नई बात की ओर ध्यान खींचना चाहती है ,यह उसकी ध्यान खींचने की कला हैं। इस तरह वह यह भी बताने की कोशिश करती है कि हमारे पास एकाधिक 'स्व' या 'मैं' हैं। या यों भी कह सकते हैं कि एक से अधिक आत्माएं हैं। एकाधिक 'मैं' के अभाव में असल में आख्यान नहीं बनता। नाटकीय इमेजों की सृष्टि नहीं होती। या छद्म की सृष्टि नहीं होती। साहित्य की कलात्मक रणनीति का यह अन्तर्ग्रथित हिस्सा है।

मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा की विशेषता यह है कि इसमें हिन्दी संस्कृति के तानेबाने को अतिवादी ढ़ंग से लेखिका खारिज नहीं करती बल्कि धीरे धीरे उसकी परत- दर-परत खोलती है। इससे संस्कृति की समझ बनती है और वे क्षेत्र उजागर होते हैं जहां कायदे से परिवर्तन की जंग को लड़ा जाना है। इसमें बड़ा क्षेत्र है पुंसवादी नजरिए का, और दूसरा है पुंसवादी व्यवस्था,संस्कार और आदतों का। इन दोनों क्षेत्रों की बारीकियों को बड़े ही सुंदर ढ़ंग से लेखिका ने पेश किया है।

सवाल यह है कि आत्मकथा के विश्लेषण की पद्धति क्या हो ? क्या एक पद्धति से आत्मकथा समझ में आएगी ? आत्मकथा को एक पद्धति या शास्त्र या सिद्धांत से समझना संभव नहीं है। इस प्रसंग में पहली बात यह कि स्त्री का लिंग तय है और हमारा समाज स्त्री को सामाजिक निर्मिति न मानकर ईश्वरप्रदत्त या प्राकृतिक देन मानकर चलता है। पहली आवश्यकता है कि स्त्री को ईश्वरप्रदत्त न मानें। स्त्री के बारे में बनाए सभी कानूनों, मान्यताओं और संस्कारों को अपरिवर्तनीय, स्वाभाविक ,अनिवार्य और अपरिहार्य न मानें। स्त्री की निर्मिति की सामाजिक प्रक्रियाओं पर नजर रखें, इन प्रक्रियाओं की जितनी गहरी समझ होगी। स्त्री के बारे में उतने ही बेहतर मूल्यांकन की संभावनाएं भी होगी। जिस तरह समाज बदलता रहता है उसी तरह स्त्री भी बदलती रहती है। स्त्री कैसे बदल रही है उस प्रक्रिया को सहृदयभाव से समझने और स्वीकार करने की जरूरत है। स्त्री को जड़ और अपरिवर्तनीय रूप में देखने के कारण ही हमारे आलोचक एक खास किस्म के स्टीरियोटाइप से आगे जाकर स्त्रियों की समस्याओं को समझने में असमर्थ रहे हैं।

स्त्री सामाजिक निर्मिति है और परिवर्तनशील अवस्था में रहती है। उसके रूपान्तरित रूप का एक छोर पाठ में होता है और दूसरा छोर पाठक के मन में या सामयिक समाज में होता है जो पाठक पढ़ते समय बनाता है। इस नजरिए से यदि स्त्री को देखें तो स्त्री का पाठ भी गतिशील और परिवर्तनीय होता है।

मसलन् स्त्री की नैतिक मान्यताओं के सवाल को ही लें। स्त्री की नैतिकता को सामयिक सरोकारों की रोशनी में बार- बार परिभाषित करने की आवश्यकता है।हमें यह भी देखना चाहिए कि सामाजिक सरोकारों या स्त्री के सरोकारों का सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र कितना व्यापक है या कितने बड़े क्षितिज को स्त्री घेरती है। स्त्री के नैतिक मूल्यों और मान्यताओं को परिभाषित करने वाले संस्थानों का चरित्र किस तरह का है ? इन संस्थानों का चरित्र ही अंततःस्त्री के निजी और सामाजिक चरित्र का गठन करता है। यदि संस्थानों का चरित्र पुंसवादी है तो तय है स्त्री की मान्यताओं-संस्कारों और सामाजिक अवस्था की स्थितियों का पुंसवादी विचारधारा और संस्थानों के साथ टकराव होगा। यही वजह है ज्योंही कोई स्त्री तयशुदा फ्रेमवर्क के बाहर आकर सोचने-समझने या व्यक्त करने की कोशिश करती है उस पर लांछन लगने शुरू हो जाते हैं। स्त्री के प्रति लांछनों की अभिव्यक्ति इस बात का संकेत है सामाजिक संस्थानों का चरित्र पुंसवादी है और असहिष्णु है। इस नजरिए से देखें तो स्त्री के सामने दोहरी चुनौती है, उसे पुंसवादी संस्थानों के दबाब से अपने लिंग की रक्षा करनी है वहीं दूसरी ओर अपने लिए छोटे छोटे कामों, इच्छाओं, धारणाओं और मान्यताओं की अभिव्यक्ति के लिए जगह भी निकालनी है।

इस क्रम में स्त्री का 'समग्र' और 'अंश' दोनों ही नए सिरे से निर्मित करने की जरूरत है। स्त्री अपनी आत्मकथाओं में पुंसवादी विचारधारा से निर्मित अपने चरित्र,स्वभाव,स्थितियों आदि का व्यापक चित्रण करते हुए उन पहलुओं को सामने लाती है जहां पर वह बदल रही है या प्रतिवाद करके वैकल्पिक परिस्थितियों की खोज कर रही है। विचार विमर्श के लिए यह बेहतर प्रस्थान बिंदु हो सकता है। यहीं से वह अपने चरित्र में बदलाव की प्रक्रियाओं को सामने लाती है।

मसलन् एक स्त्री अपनी आत्मकथा को कहते समय जब उन पहलुओं को सामने लाती है जो लकीर से हटकर हैं तो वह रूपान्तरण की ओर ध्यान खींचती है। स्त्री समीक्षा को कायदे से स्त्री के रूपान्तरण पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि इसी बिंदु से उसका भविष्य का संसार सामने आता है। यही वह बिंदु है जहां पर उसकी मौजूदा अस्मिता और संभावित अस्मिता में तनाव और अन्तर्विरोध के दर्शन होते हैं। साथ ही उस आख्यान को भी खोल सकते हैं जो उसके 'समग्र' और 'अंश' के बीच में विभिन्न स्तरों पर बिखरा पड़ा है।

स्त्री के संदर्भ में एक और तथ्य महत्वपूर्ण है,वह है 'समग्र' और 'अंश' के बीच के अन्तर्विरोध। स्त्री अपनी आत्मकथा में अपने 'समग्र' को पेश करते समय जिन अंशों को पेश करती है वे अंश उसके समग्र के अनुकूल कभी नहीं होते। इस नजरिए से देखें तो पाएंगे कि स्त्री अपने समग्र को रचते समय 'अंश' के जरिए समग्र पर सवालिया निशान लगाती है। 'अंश' के जरिए 'समग्र' को अपदस्थ करने की कोशिश करती है। स्त्री आत्मकथा में 'अंश' वस्तुतः 'समग्र' के विकल्प की तलाश में ही रचे जाते हैं और यही वजह है कि स्त्री आत्मकथा में 'समग्र' और उसके 'अंश' का अन्तर्विरोध हमेशा बना रहता है।

जबकि अब तक का रिवाज है कि 'समग्र' और 'अंश' में एकता की बात कही गयी है। 'समग्र' की संगति और परिप्रेक्ष्य में 'अंश' को पढ़ने की वकालत की गयी है। यह आलोचना का पुंसवादी नजरिया है जिसमें 'समग्र' और 'अंश' में एकता को अनिवार्य माना गया है।स्त्री के यहां 'समग्र' और 'अंश' में अन्तर्विरोध होते हैं। वह 'समग्र' का हमेशा प्रतिवाद करती है। अपनी बनी-बनायी इमेज को अस्वीकार करती है।अतः स्त्री के 'अंश' के परिप्रेक्ष्य में 'समग्र' पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। स्त्री की आत्मकथा में नरेटिव और स्त्री के जीवन की परिवर्तन प्रक्रिया का यह सच है कि उसके जीवन के छोटे-छोटे अंश पूरे चरित्र की इमेज को क्रमशः बदलते रहते हैं। यहां 'अंश' से 'समग्र' में आए परिवर्तनों को देखा जाना चाहिए। मसलन् मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा का कोई एक 'अंश' देखें और समझने की कोशिश करें कि स्त्री की समग्र प्रचलित धारणा को नए अंश किस तरह बदलते हैं। अंश –दर- अंश बदलती औरत ही कालांतर में एकदम नई इमेज के साथ सामने आती है।

मैत्रेयी पुष्पा ने लिखा है, ' आज मैंने जापानी जॉरजट की सी-ग्रीन साड़ी निकाली,दिल्ली में यही फबेगी दो चोटियों के बदले एक चोटी गूँथी।पति को ऐसे मिली जैसे मैं पहले दिन से ही फैशन के रास्ते पर हूँ। मैं झाँसी की लड़की का झोला उतारकर ,जीवन के प्रबल प्रवाह को बाँधकर अपने व्यक्तित्व को सजावट के साधनों से आकर्षक बनाने पर तुलीगई,क्योंकि मान बैठी कि असली प्रेम विवाह के बाद होता है। प्रेमी,पति के सिवा कोई नहीं हो सकता। पत्नी यदि इसके अलावा किसी संवेग के दबाब में आती है तो पति को खोने में देर नहीं लगती। डॉ.शर्मा तो वैसे भी शर्महया वाली स्त्री को पसन्द करते हैं। वे सामाजिक प्रतिष्ठा, शिष्टाचार और सभ्यता के स्तंभ हैं। मैं आधुनिक होने के नशे में धुत, चाँदनी रात में उतर गई।हॉस्टल पर शुक्लपक्ष उतर रहा था और सफेदा के वृक्षों के लम्बे-लम्बे परदों के बीच जाड़े की रात पति की युवा बाँहों में मोहाविष्ट सी...' सचमुच सपनों का संसार मेरी राह देख रहा है'मैं सोच रही थी।पति को तन-मन से पाना है,जितना ही छोटा समय मिले। खुद को नादान दिखाते हुए या मूर्खता दिखाते हुए या कि उन्हें संभालते हुए, दुलराते और अपने भीतर उतारते हुए,किसी साहस दुस्साहस से गुजरकर भी। आज का दिन ,दिल्ली का दिन। हमारे प्रेम की आधुनिक शुरूआत का दिन न इसके पहले था न इसके बाद... मैं लहरों में उतरने के लिए तैयार,सम्मिलन की उत्ताल तरंगों की कल्पना कर रही हूँ। रात के दस बजे हैं। मैं पति की ओर बढ़ रही हूँ। मेरी खुशी का पारावार नहीं कि यहाँ छतों-छतों,छज्जे-छज्जों आने और खिड़कियोंसे झाँकनेवाला कोई नहीं। झाँककर बात उड़ानेवाला कोई नहीं,'प्रायवेसी' इसी का नाम है।

तभी दस्तक!'

इस पैराग्राफ में कई नई बातें हैं जिनके आधार पर स्त्री की पुरानी अस्मिता में से नई आधुनिक अस्मिता के अंश जन्म ले रहे हैं। परंपरागत औरत अपने पुराने कलेवर को छोड़ रही है और उसमें एक नए किस्म की, नई रूपसज्जा और नई मनोदशा की आधुनिक अनुभूतियों की तलाश करती औरत सामने आ रही है और यह प्रक्रिया आरंभ होती है औरत के सजने-संवरने से और वह तलाश कर रही है अपने लिए 'प्रायवेसी' ,यह एकदम नया बोध है। प्रायवेसी की धारणा के आने के साथ कहानी में यहां से एक नए पुरूष के प्रति आकर्षण का आरंभ भी दिखाई देता है और इस तरह एक औरत के मन में अन्य के प्रति अपील का जन्म भी होता है। दस्तक के बाद क्या होता है उसका बहुत सुंदर वर्णन किया है लेखिका ने। इस क्रम में लेखिका ने अपनी जिन अनुभूतियों को अभिव्यक्त किया उनके विपरीत विलक्षण लेकिन सत्याभास व्यक्त करने में लेखिका को सफलता मिली है। इस तरह के असंख्य चित्र मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा में बिखरे पड़े हैं। कहने का अर्थ यह है आत्मकथा में 'अंश' नए को सामने लाते हैं और इनसे एक नया व्यक्तित्व और मूल्यबोध भी सामने आता है। औरत इसी अर्थ में समग्रता के पैमाने से चीजें देखने का निषेध करती है। वह 'अंश' के आधार पर बनती-संवरती और बदलती है,समग्रता तो उसके विकास की बाधा है।

मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा में एक साथ दो अस्मिताएं प्रतिस्पर्धा करती नजर आती हैं। पहली अस्मिता है परंपरागत औरत की, दूसरी अस्मिता है आधुनिक औरत की। ये दोनों अपने ढ़ंग से एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करती हैं और संसार को बदलती हैं। इसे चाहें तो अस्मिताओं का संघर्ष भी कह सकते हैं। एक तरफ पुराने रूप ,स्वरूप,मूल्य और आदतें बनाए रखने का दबाव और दूसरी ओर पुराने से मुक्त होने की छटपटाहट। इस प्रतिस्पर्धा को समग्रता में देखेंगे तो लेखिका का पूरा व्यक्तित्व नजर आएगा। इस क्रम में मजेदार बात यह है कि प्रत्येक नई कहानी या नया उभरता रूप या जीवनक्षण स्वयं में संपूर्ण था। इस प्रक्रिया में लेखिका बार बार अपने हर कदम की व्याख्या भी करती जाती। इससे यह भी पता चलता है कि उसे अन्य की व्याख्या पर भरोसा नहीं है, वह अपने प्रत्येक कार्य-व्यापार को लेकर पारदर्शिता बनाए रखना चाहती है।इस व्याख्या के बहाने अपने अंदर छिपे एकाधिक अस्मिता के रूपों को वह वैधता प्रदान करती है और पाठकों से भी यह मांग करती है कि वे भी एकाधिक अस्मिताओं को वैधता प्रदान करें। रोचक बात यह है कि मैत्रेयी अपनी एक इमेज को वैध ठहराते हुए दूसरी इमेज को भी वैध ठहराती है और इससे एकाधिक मैं की उनकी रचना में अभिव्यक्ति होती है।

आमतौर पर मर्द लेखकों में एक 'मैं 'होता है। वे उसके इर्दगिर्द ही तानाबाना बुनते हैं। लेकिन मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा में एकाधिक मैं हैं और सभी मैं प्रतिस्पर्धा है, यहां 'आत्म' के उदघाटन के काम को लेखिका बड़ी शिद्दत के साथ संपन्न करती है। यह ऐसा 'स्व' है जो सतह पर देखने में सिलसिलेबार विकसित होता है लेकिन वास्तव अर्थ में ऐसा नहीं है। यहां स्त्री का सुनिश्चित 'स्व' सामने नहीं आता बल्कि रूपान्तरित होता 'स्व' सामने आता है। यहां परंपरागत 'स्व' और उदीयमान 'स्व' के बीच में तनाव साफ देखा जा सकता है। इस क्रम में लेखिका अपने परंपरागत 'स्व' को बचाने की चेष्टा नहीं करती बल्कि छोटे छोटे एक्शन के जरिए उसे तोड़ती है। यहां वह गुलामी और 'स्व' के बीच का अन्तर्विरोध भी विकसित करती है।

परंपरगत स्त्री वस्तुतः गुलाम औरत की इमेज है जिसके साथ उदीयमान स्त्री के 'स्व' का अन्तर्विरोध है। परंपरा औरत के साथ इतिहास जुड़ा है जबकि उदीयमान स्त्री की अस्मिता के साथ नया सामाजिक यथार्थ जुड़ा है। फलतः आत्मकथा में परंपरा और सामयिक यथार्थ का अन्तर्विरोध जन्म लेता है। परंपरागत औरत और नयी औरत के बीच के अन्तर्विरोध को अभिव्यक्ति तब मिलती है जब किसी खास समय लेखिका कोई एक्शन करती है। इस तरह आत्मकथा में परंपरा और समय के बीच अन्तर्विरोध(टाइम) विकसित होता है। लेखिका समय के साथ रहना पसंद करती है और परंपराओं से मुक्त करती चली जाती है। ये अन्तर्विरोध गुलामी और 'स्व' के बीच का भी है। इस क्रम में 'स्व' का विकास होता है और गुलामी का तानाबाना कमजोर होता चला जाता है।

मैत्रेयी पुष्पा ने ज्योंही परंपरागत स्त्री और नई स्त्री की अस्मिताओं के बीच की जंग या अन्तर्विरोधों को चित्रित किया त्योंही वह एक नई सामाजिक अस्मिता के उदय की ओर भी संकेत छोड़ती हैं। जब वे परंपरागत औरत को चित्रित करती हैं और उसके बरक्स रखकर आधुनिक 'स्व' को सामने लाती हैं तो 'स्व' में विभाजन नजर आता है। ऐसी स्थिति में परंपरागत औरत और 'स्व' में किसी भी किस्म का सामंजस्य बिठाना संभव नहीं दिखता।बल्कि विखंडित 'स्व' नजर आता है। इससे 'स्व' के दोहरे चरित्र के दर्शन भी होते हैं। वे अपने जीवन का लेखाजोखा पेश करते हुए बताती हैं कि सामाजिक संबंध, पति-पत्नी के संबंध, मित्रों और रिश्तेदारों के साथ संबंध किस तरह के होते हैं और वे किस तरह अपनी भूमिका अदा करते हैं। इस क्रम में वे गुलाम औरत के व्यापक अनुभव संसार को सामने लाती हैं।इस नजरिए से देखें तो वे आधुनिक स्त्री की गुलामी के विभिन्न चित्रों को उकेरने में सफल रही हैं। साथ ही अन्य किस्म के शोषण और दमन के रूपों को उदघाटित करने में भी उन्हें सफलता मिली है।

मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा में दोहरा जीवन,दोहरी अस्मिता, दुरंगे मूल्य,दुरंगे विचार,दोहरा सामाजिक जीवन आदि को बेपर्दा करती हैं। इस तरह वे दो मैं,दो अस्मिता,दो तरह का जीवन,दोहरी जिम्मेदारियां,दो तरह की चेतना, दो तरह के सामंजस्यहीन विचार और भावबोध को व्यक्त करने में सफल रही हैं। वे अपने जीवन में व्याप्त इस 'दो' को व्याख्या के जरिए बताती जाती हैं और उसके अनुभवों को ऐतिहासिक-सामाजिक संदर्भ में पेश करती हैं।

मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा पढ़ते समय हमें आत्मकथा मॉडल के प्रारूप पर भी विचार करना चाहिए। स्त्री आत्मकथा में लेखिका को एकल चरित्र को रूप में देखते समय स्त्री के निर्माण के ऐतिहासिक-सामाजिक कारणों पर नजर जाती है। वहां पर उसके आख्यान के ऐतिहासिक कारणों को देख सकते हैं। जबकि स्व या आत्म या मैं को देखते समय उसके परंपरागरूप के साथ स्व के अंतर्विरोधों का उदघाटन होता है। परंपरागत स्त्री में एक सुनिश्चित औरत नजर आती है जो परंपरागत कामों में पंक्चुअल है।लेकिन जहां यह स्त्री पंक्चुअल नहीं है वहां पर वह नई दिशाओं में अभिव्यक्त करती नजर आती है। यहां पर यह औरत एक समुदाय की सदस्या के रूप में सामने आती है ,एक जेण्डर के रूप में सामने आती है। ऐसी औरत है जिसका कोई इतिहास नहीं है,वह पहचान के उन रूपों को एकसिरे से खारिज करती है जो नैतिकता के तानेबाने में जकड़े हुए हैं।यहीं पर स्त्री के एकाधिक 'मैं' या 'स्व' की अभिव्यंजना भी होती है। यह बहुरूपी स्व वस्तुतःमुक्ति की प्रक्रिया के प्रयासों, नए को अर्जित करने के संघर्ष में ही सामने आता है।इस प्रक्रिया का अन्य कोई विकल्प नहीं है।इस क्रम में यह तथ्य भी उजागर होता है कि स्व का एक ही किस्म का स्वभाव या ओरिएण्टेशन नहीं होता।

'स्व" का बहुरूपी चरित्र स्त्री आत्मकथा विधा की विशेषता है। इसका प्रधान कारण है स्त्री का परंपरगत रूप और जीवन एक सामान्य आख्यान देता है जिसमें स्त्री दासता के अनेक रूप अभिव्यक्त होते हैं। यह रूप सम्प्रति,नैतिक तौर पर अप्रासंगिक है। इस परंपरागत रूप के आधार पर स्त्री की परिवर्तित स्थितियों का अंदाजा लगाना संभव नहीं है। इस रूप की जटिलताओं और असफलताओं या अप्रासंगिकता को परंपरागत सिद्धान्तों के जरिए नहीं समझा जा सकता। स्त्री के गुलाम रूप और स्वतंत्र,स्वायत्त आधुनिक रूपों को समझने के लिए स्त्रीवादी सैद्धान्तिकी के एकाधिक सिद्धान्तों की मदद लेने पर ही आत्मकथा खुलती है।


1 comment:

  1. I just got a check for $500.

    Sometimes people don't believe me when I tell them about how much money you can earn by taking paid surveys online...

    So I took a video of myself actually getting paid $500 for filling paid surveys to set the record straight.