Thursday, December 15, 2011

सवाना घास भूमि

खोज के परिणाम

देवनागरी (Ctrl+M)

नामस्थानोंमें खोजें:

  
  
  
  
  
  
  
  
  
 
  • 280px | प्राकृतिक परिवेश में जिर्राफ thumb | right | 280px | सवाना, घास का मैदान ... जाती हैं कि सूर्य का प्रकाश भूमि पर नहीं पहुँच पाता और ...
    9 KB (676 शब्द) - 19:06, 8 अक्टूबर 2011
  • उपयोग में लिया जा सकता है जबकि साफ़ की गयी भूमि को चरागाह (en:pasture | pasture ) ... क्षेत्र भी शामिल हैं जिनमें सवाना की तरह का पारितंत्र है ...
    197 KB (15,634 शब्द) - 07:45, 9 दिसम्बर 2011
  • जगह नियमित अंतराल पर आग की वापसी से गैर देशीय, आक्रामक घास भर गयी हैं. ... जिसमें घास और बीज विद्यमान हों, भूमि को प्रभावी ढंग से बहाल किया जा ...
    74 KB (5,666 शब्द) - 13:50, 19 जुलाई 2011
  • अत्यन्त घने वन, विस्तृत घास के मैदान, बड़ी-बड़ी नदियाँ व झीलें तथा विचित्र जंगली ... सवाना घास के मैदान के दोनों ओर जहाँ की जलवायु अत्यन्त गर्म ...
    112 KB (7,780 शब्द) - 16:03, 12 दिसम्बर 2011
  • काफी लंबी घाटी बनाती है जिसके दोनों ओर की भूमि पतली पट्टी के रुप में शस्यश्यामला ... भाग में सवाना तुल्य ... उष्ण कटिबन्धीय घास का मैदान ...
    12 KB (840 शब्द) - 04:21, 4 दिसम्बर 2011
  • अफ्रीका में, सिंह सवाना घास की भूमि पर पाए जाते हैं जिनमें वितरित एकेसिया (बबूल) के वृक्ष होते हैं, जो छाया देते हैं भारत में उनका आवास ...
    237 KB (19,228 शब्द) - 01:10, 3 दिसम्बर 2011
  • जहाँ की अधिकांश भूमि समतल मैदानी है, पर चार प्रमुख नदियों- रूपारेल, ... सवाना घास के अलावा यहां Cynodon dactylon तथा Dicanthium annulatum किस्म ...
    29 KB (2,909 शब्द) - 04:41, 9 अगस्त 2011
  • वर्षा कम होती है शीतोष्ण कटिबन्धीय घास के मैदान पाए जाते हैं। इन्हें ... अर्जेटीना कृषि में अग्रणी है। कृषि योग्य भूमि के लगभग आधे भाग में ...
    98 KB (6,282 शब्द) - 17:38, 1 दिसम्बर 2011
  • वह समय जब तस्मानियाई डैविल ऑस्ट्रेलियाई मुख्य भूमि से गायब हुए थे ... और राज्य के दक्षिण पश्चिम में बटन घास के मैदानों में उनका जनसंख्या घनत्व ...
    203 KB (16,740 शब्द) - 15:22, 24 जून 2011
  • शामिल हैं - डिएगो गार्सिया सबसे बड़ा भूमि का टुकड़ा है, और एक एटोल के ... तस्वीरें स्पष्ट रूप से घास के बड़े मैदान और बग़ीचे जैसे सवाना क्षेत्र ...
    175 KB (13,109 शब्द) - 22:04, 22 अक्टूबर 2011
  • सोयाबीन की खेती अधिक हल्‍कीरेतीली व हल्‍की भूमि को छोड्कर सभी प्रकार ... करें। 15 से 20 दिन की खड़ी फसल में घांस कुल के खरपतवारो को नष्‍ट करने ...
    26 KB (2,111 शब्द) - 10:09, 14 दिसम्बर 2011
  • मिस्र के विशाल क्षेत्र सवाना वृक्षों से भरे हुए थे और वहां चरने ... पटरों के बीच भरा पाया गया नरकट या घास जोड़ों को सील करने में मदद करता था. ...
    209 KB (16,346 शब्द) - 08:17, 22 जुलाई 2011
  • घास(झेरनीयां लाम्पलिया, भरूंटिया,घन्टिलिया, सीवणा) डाब( कुशा) कागलहर ... यहां की बनस्पति परवान पर होती है। भूमि के बढते प्रयोग के कारण जंगली ...
    20 KB (1,583 शब्द) - 19:29, 8 दिसम्बर 2011
  • घर के रूप में मैला नीचे प्रयोग 10 कच्छ केकड़ों सदाबहार पत्ते गीली घास., ... सदाबहार 'वन' का ही लेकिन scrubs और सवाना का भी रूप है, हो जाती है 19 ...
    57 KB (4,304 शब्द) - 05:44, 4 दिसम्बर 2011
  • यहां की भूमि सूखी और हर प्रकार से ऊजड़ ही है। किन्तु वर्षा ॠतु में घास ... है। लगातार कुछ दिनों तक इन जल का सेवन करने से लोग बीमार पड़ जाते हैं। ...
    10 KB (767 शब्द) - 05:11, 7 अगस्त 2010
  • इस घास से भरा हुआ, ज़ुल्फ़ असर बेल 5 मीटर तक की होती है. ... अन्य लोकप्रिय व्यंजनों करी के साथ तैयारी, गहरी मूंगफली या अन्य भूमि पागल के साथ ...
    32 KB (2,684 शब्द) - 08:04, 4 दिसम्बर 2011
  • क्योंकि वह जानवर कुछ घास खाना चाहता था जो टॉवर के शीर्ष पर उगी हुई थी. ... मास बैंड अंततः क्वींस पार्क सवाना पर एकत्र होता है ताकि "मंच पर से ...
    192 KB (14,102 शब्द) - 15:35, 14 मार्च 2011
  • विशेषताएं हैं यद्यपि अधिकांश ध्रुवीय भालू भूमि पर जन्म लेते हैं, वे ... जड़ें, और समुद्री घास , हालांकि इनमें से कोई भी उनके आहार का एक ...
    199 KB (17,247 शब्द) - 12:06, 21 नवम्बर 2011
  • यह एक कुंवारी भूमि और अपने समुदाय के संरक्षण के लिए पहला कदम बनाने ... दवा और placebo समूह में एक प्रकार का घास के बाद से प्राप्त परिणामों के ...
    65 KB (5,146 शब्द) - 15:18, 12 दिसम्बर 2011
  • यहाँ भूमि आम तौर पर उर्वरक काली मिट्टी (Black Cottan Soil) है, जो ... जो घास, बांस , अधपकी ईंटों, काली मिट्टी और लकड़ी से बनाये जाते हैं। ...
    140 KB (10,159 शब्द) - 03:00, 3 दिसम्बर 2011
देखें (पिछले 20) (अगले 20) (20 | 50 | 100 | 250 | 500)

Saturday, December 10, 2011

हिंदी का पाठक बदवा साहित्य नहीं


बदला, साहित्य नहीं
Feb 03, 01:18 pm
नई दिल्ली [संजीव गुप्ता]। संकेत साफ हैं, भले ही हिंदी के मठाधीश इसे स्वीकार नहीं करें। हिंदी का पाठक बदला है, उसका मिजाज बदला है। किताबें वह अब भी खरीदना चाहता है, लेकिन उपन्यास और कविता नहीं। वह ऐसी किताबें मांग रहा है, जो उसके करियर में सहायक हों और उसे जीवन के विविध रूपों का साक्षात कराती हों।
दिल्ली में चल रहा विश्व पुस्तक मेला हिंदी के सीमित संसार का बोध कराता है। रुचि और बिक्री के इस सत्य का बयान कोई और नहीं, किताब छापने वाले प्रकाशक ही कर रहे हैं। हिंदी लेखक न लिखने के कारणों पर बहस कर रहे हैं, और उधर किताबों की दुनिया बदल चुकी है। क्या हिंदी में वह सब है, जो पाठक चाहता है। प्रकाशकों के मुताबिक जिन पुस्तकों में आजकल युवाओं की खासी दिलचस्पी है, उनमें प्रबंधन, व्यक्तित्व विकास, कंप्यूटर साइंस, आईटी, सफलता प्राप्ति के लिए क्या करें, कुकरी, योग, ध्यान, पत्रकारिता, विज्ञान की पुस्तकें शामिल हैं। हिंदी में ऐसी अधिकतर पुस्तकें अनुवाद रूप में हैं।
डायमंड पाकेट बुक्स के नरेंद्र वर्मा कहते हैं, 'आज किसी के पास लंबे-चौड़े उपन्यास पढ़ने का समय नहीं। जो वक्त मिला, उसमें लोग अपने मतलब की पुस्तकें पढ़ना पसंद करते हैं, खासकर करियर संबंधित। शायद ऐसा रोजी-रोटी की चिंता के कारण हो।' बदलाव साहित्य की मांग में साफ दिखता है। प्रभात, वाणी, राजकमल, सामयिक प्रकाशन, हिंदी बुक सेंटर, किताबघर प्रकाशन और अनुभव प्रकाशन के संचालक मानते हैं कि साहित्यिक पुस्तकों के प्रति पाठकों का रुझान काफी बदला है। काव्य संग्रह लगभग हाशिए पर हैं। काव्य संग्रह नामी कवि का हो तो भले बिक जाए, वरना इन्हें कोई नहीं खरीदता। इनकी जगह गजल और व्यंग्य संग्रह ज्यादा बिकते हैं। कहानी संग्रह की तुलना में उपन्यास कम पढ़े जा रहे हैं। हालांकि प्रेमचंद के उपन्यासों और कहानी संग्रहों की मांग पहले जैसी है। अनुभव प्रकाशन, गाजियाबाद के श्याम निर्मम भी स्वीकार करते हैं कि अब कहानी संग्रह की मांग है, उपन्यास या कविताओं की नहीं।
इसके विपरीत धार्मिक पुस्तकों की मांग पहले जैसी है। आहूजा प्रकाशन के इंद्रमोहन आहूजा बताते हैं कि रामचरित मानस, बाइबिल, गीता, विभिन्न कर्मकांडों की पुस्तकें, आरती संग्रह, कुरान शरीफ, महाभारत की मांग बरकरार है। यह बात अलहदा है कि इन पुस्तकों के खरीदार युवा कम होते हैं, बड़ी उम्र के व्यक्ति और महिलाएं ज्यादा। आहूजा मानते हैं कि 'ट्रेंड' बदला है, लेकिन धार्मिक पुस्तकों की मांग में कमी नहीं है। सामयिक प्रकाशन के महेश भारद्वाज स्पष्ट करते हैं, 'पुस्तक मेलों की तुलना व्यापार मेले या आटो एक्सपो से नहीं की जा सकती। यहां दर्शक नहीं आते, क्योंकि यहां 'देखने' के लिए कुछ नहीं होता। यहां केवल पाठक आता है, इसलिए उनकी संख्या के आधार पर यह तय नहीं हो सकता कि पुस्तकों के प्रति झुकाव बढ़ा है या घट रहा है।'

.यमुनानगर में तोजेन्द्र


यमुनानगर। डीएवी गर्ल्स कॉलेज में प्रवासी साहित्य पर चल रही अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन प्रवासी साहित्य की प्रवृतियों को लेकर खासतौर पर चर्चा की गई। इस परिचर्चा सत्र की अध्यक्षता मशहूर लेखक और हंस पत्रिका के संपादक राजेंद्र यादव, के साथ ही मध्य प्रदेश कला परिषद की पत्रिका कलावार्ता के संपादक हरि भटनागर व केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड के उपनिदेशक भगवान दास मोरवाल ने की। 

इस सत्र में प्रवासी लेखकों की कहानियों की मीमांसा करते हुए महेंद्र मिश्र ने कहा कि किसी भी लेखक की एक कहानी पढक़र उसके बारे में अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। कथा के जरिए मानवीय संबंधों का फर्क उभर कर समाने आता है। उन्होंने कहा कि भोगे हुए अनुभवों पर ही कहानी नहीं लिखी जा सकती। अनुभव दायरे की चीज नहीं अपितु यथार्थ है। उन्होंने बुर्जुगों के एकाकी जीवन पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि दिव्या माथुर की बचाव कहानी स्त्री की अस्मिता को बचाने पर आधारित है। जबकि २०५० कहानी अच्छी कल्पनाशीलता का परिचय देती है। मिश्र के मुताबिक कहानी २०५० मशीनी सभ्यता के भविष्य को भी खूबसूरत अंदाज में पेश करने में सफल हुई है। उन्होंने कहा कि फंतासी द्वारा प्रभावशाली कथ्य प्रस्तुत किया जा सकता है। 

इस चर्चा में भाग लेते हुए मशहूर लेखक प्रेम जनमेजय ने कहा कि विदेशों में हिन्दी  की अच्छी चीजों को अपनाया जा रहा है। भारत में हिन्दी  पढ़ाना बेगार का काम माना जाता है, जबकि विदेश में जो हिन्दी  पढ़ाते हैं, वे वीआईपी की श्रेणी में आते है। इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि वहाँ  पर हिन्दी  का क्या स्थान है। 

डीएवी गर्ल्स कॉलेजमें प्रवासी साहित्य पर चल रही अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन सुप्रसिद्ध कथाकार एवं हंस पत्रिका के संपादक राजेंद्र यादव ने चार पुस्तकों का विमोचन किया। जिसमें दिल्ली से आए भगवानदास मोरवाल की पुस्तक रेत का उदूं अनुवाद , लंदन से आई दिव्या माथुर की पुस्तक २०५० और अन्य कहानियां, आबूधावी से पधारे लेखक कृष्ण बिहारी की कहानी संग्रह स्वेत श्याम रतनार, कथा यूके के महासचिव तेजेंद्र शर्मा के कहानी संग्रह का पंजाबी अनुवाद कल फ़ेर आंवीं का विमोचन किया गया। तेजेंद्र शमां के  कहानी संग्रह का अनुवाद महेंद्र सिंह विरदी ने किया है। इस मौके पर संगोष्ठी के संयोजक अजित राय ने बताया कि रेत के उर्दू अनुवाद को प्रकाशित करने में नई प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी का प्रयोग किया गया है। कहानी संग्रह २०५० में लंदन में वहाँ  के जन जीवन का चित्रण किया गया है। स्वेत श्याम रतनार में अरब के वातावरण को दिखाया गया है। खाड़ी के देशों में गए लोगों की समस्याओं को उठाया गया है। कल फ़ेर आंवीं कहानी संग्रह में भारत व विदेश की संस्कृति का सामंज्सय दिखाया गया है। 

प्रवासी साहित्य पर चल रहे अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन प्रवासी साहित्य में स्त्री जीवन विषय पर संगोष्ठी आयोजित की गई। अध्यक्षता कनाडा से आई वसुधा हिन्दी  साहित्य पत्रिका की संपादक स्नेह ठाकुर ने की। जबकि शरजाह से आई अभिव्यक्ति (इंटरनेट पत्रिका) की संपादक पूर्णिमा वर्मन अतिथि के रुप में उपस्थित रहीं। 

ठाकुर ने कहा कि प्रवासी कथाकारों ने अपने साहित्य में स्त्री जीवन के सभी पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। भारतीय संस्कृति में नारी को प्रथम स्थान दिया गया है। लेकिन विदेशों में ऐसा नहीं है। विदेशों में स्त्रियों का जीवन कैसा है, इसके बारे में भारतीय लेखक बहुत कम जानते हैं। लेकिन विदेशी साहित्यकारों को उसका अनुभव बखूबी है। उन्होंने कहा कि लिखने के लिए संस्कृति को छोडऩे की जरुरत नहीं है। क्योंकि वहीं हमारी थाती है। उन्होंने सभागार में बैठे लोगों से आह्वान किया कि वे पूरब और पश्चिम की संस्कृति में से अच्छी चीजों को जोडक़र एक नई संस्कृति बनाएँ और उससे युवा पीढ़ी को अवगत कराएँ। तभी हमारा प्रयास सार्थक होगा। हमें अच्छा साहित्य और अच्छे विचार ग्रहण करने चाहिए, भले ही वे कहीं के भी क्यों न हो। 

इंटरनेट पत्रिका अभिव्यक्ति की संपादक पूर्णिमा ने कहा कि प्रवासी कहानी हिन्दी  के अंतर्राष्ट्रीयकरण की दिशा में सशक्त कदम उठा रही है। उन्होंने कहा कि प्रवासी कहानीकारों का शिल्प अलग तरह का होता है। प्रवासी लेखकों के कथानक अजीब नहीं, बल्कि अलग है। प्रवासी कहानी व भारतीय कहानी के अपने-अपने क्षेत्र है। उन्होंने कहा कि मीडिया ने संवेदनाओं और सोच का वैसा वैश्वीकरण नहीं किया, जितना होना चाहिए। फिलहाल प्रवासी लेखन भाषा के एक गंभीर संकट से गुजर रहा है। 

नीरजा माधव ने स्त्री के बारे में विचार विमर्श किया। उन्होंने बताया कि उनकी अभी तक स्त्रियों पर ३६ से ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। उन्होंने कहा कि हिन्दी  में हमारे संस्कार विद्यमान है। 
दिल्ली से आए पत्रकार महेश दर्पण ने कहा कि जब एक लडक़ी मुस्लिम लडक़े से प्रेम करती है और उसे धर्म बदलने के लिए कहा जाता है, तो वह इंकार कर देती है। ऐसा क्यों होता है। इससे हमें स्त्री की मानसिकता का पता चलता है। 

मुंबई से आई मधु अरोड़ा ने प्रवासी साहित्य में स्त्री जीवन पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय सोच भारतीय मानसिकता को दिखाती है। तेजेंद्र शर्मा की रचना नारी पात्र में बताया गया है कि विदेशी संस्कृति में शोर शराबा वर्जित है। 
जय वर्मा ने मानवीय संबंध और नारी पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रवासी साहित्य में कलात्मकता और रचनात्मकता दोनों का मिश्रण है। डा. कृष्ण कुमार ने कहा कि हिन्दी  साहित्य में प्रवासी नाम की कोई चीज नहीं है। हिन्दी  में प्रवास के गलत मायने दिए गए हैं। जो घर से दो दिन बहार रहे वह प्रवासी कहलाता है। संगोष्ठी के दौरान महेंद्र मिश्र, विजय श्र्मा, प्रेमजनमेजय, बृजेश के बर्मन, नीलम शर्मा अंशु, अजंता शर्मा, निर्मला, उर्मिला शुक्ला, ने अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया। 

हिन्दी  के साथ कलम का ही नहीं अपितु दिल का भी रिश्ता है। हम जब भी कलम उठते है, तो हिन्दी  का ही साहित्य लिखते है। बावजूद इसके उन्हें प्रवासी कह कर पुकारा जा रहा है। हिन्दी  के साथ हमारी संवेदनाएँ जुड़ी हुई है। हिन्दी  व हिंदुस्तान के लिए इतना करने के बावजूद भी हम प्रवासी ही है। अब तो प्रवासी सुनना बड़ा कटु लगता है। उक्त वेदना कनाडा से आई वसुधा हिन्दी  साहित्य पत्रिका की संपादक स्नेह ठाकुर ने प्रवासी साहित्य पर डीएवी गर्ल्स कॉलेजमें आयोजित अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में व्यक्त की। 
स्नेह ठाकुर ने कहा कि लोग अपने मायके पर गौरवान्वित महसूस करते हैं, लेकिन उसे अपनी ससुराल पर नाज़ है। क्योंकि उनकी ससुराल हरियाणा के करनाल जिले में हैं। उसने स्वयं को कभी प्रवासी नहीं सोचा। उसका दिल आज भी हिंदुस्तानी है। यहाँ  की संस्कृति, रीति-रिवाज व भाषा उसके रोम-रोम में बसी हुई है। इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि हिन्दी  व हिंदुस्तान के साथ उनका रिश्ता कैसा है। 
प्रवासी टुडे मासिक पत्रिका के संपादक डा. जय वर्मा ने प्रवासी साहित्यकारों की पीड़ा को रेखांकित करते हुए कहा कि अपने ही देश में हिन्दी  के लेखकों को आज हीनभावना से देखा जा रहा है। जो कि गलत है। 

इस मौके पर कृष्ण बिहारी ने कहा कि साहित्य तो साहित्य होता है। चाहे वह विदेश में बैठ कर लिखा गया हो या फिर देश में। भाषा तो अभिव्यक्ति का एक माध्यम है। वह तो सिर्फ लोगों के दिलों में बसती है। हमें प्रवासी साहित्कार कह कर संबोधित न करें। क्योंकि भले ही हम विदेश में रह रहे हैं, लेकिन किसी न किसी रूप से तो आज भी हिंदुस्तान के साथ जुड़े हुए हैं। 

डा. कृष्ण कुमार ने कहा कि प्रवासी साहित्यकारों ने शोध करके जिस साहित्य की रचना की है, वह अतुलनीय है। प्रवासी साहित्यकारों ने स्वयं को कभी भी भारत से अलग नहीं समझा। फिर यहाँ  के बाशिंदे क्यों हमारे साथ भेदभाव की नजरिया रखते हैं, यह समझ के परे की बात है। जब लोग उन्हें प्रवासी कहते हैं, तो उनकी भावनाएँ आहत होती है। जो कि गलत है। हम तो सिर्फ  साहित्य के माध्यम से सृजन करना चाहते हैं। प्रवासी साहित्यकारों को भी मुख्य धारा की श्रेणी से जोड़ा जाए, ताकि आने वाली पीढ़ी के सामने एक मिशाल कायम हो सके।



तेजेन्देर शर्मा-साहिर लुधियानवी एक रोमांटिक कारवां

 
        कथा यूके के कार्यक्रम में गूंजे उनके गीत
  • स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम
साहिर लुधियानवी एक रोमांटिक कारवां

लंदन। 'साहिर लुधियानवी मूलतः एक रोमांटिक कवि थे। प्रेम में बार-बार मिली असफलता ने उनके व्यक्तित्व पर कुछ ऐसे निशान छोड़े जिसके नीचे उनके जीवन के अन्य दुःख दब कर रह गये। अपनी प्रेमिका की झुकी आखों के सामने बैठ साहिर उससे मासूम सवाल कर बैठते हैं- 'प्यार पर बस तो नहीं है मेरा लेकिन फिर भी, तू बता दे कि तुझे प्यार करूं या न करूं।' यह कहना था कथाकार एवं कथा यूके के अध्यक्ष तेजेन्द्र शर्मा का। अवसर था लंदन के नेहरू सेन्टर में एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स एवं कथा यूके के कार्यक्रम–साहिर लुधियानवी एक रोमांटिक क्रांतिकारी।
इससे पहले बीबीसी उर्दू सेवा के रज़ा अली आबिदी ने साहिर लुधियानवी (मूल नाम अब्दुल हैय) के बचपन, जवानी, साहित्यिक शायरी और फ़िल्मी नग़मों की चर्चा की। साहिर के मुंबई में बसने पर आबिदी ने कहा कि किसी शहर के रंग में रंग जाना बहुत सहज होता है मगर साहिर ने बम्बई को अपने रंग में रंग दिया। उन्होंने साहिर के गीत 'हम आप की ज़ुल्फ़ों में इस दिल को बसा दें तो?' (फ़िल्म–प्यासा) में 'तो' शब्द की अलग से व्याख्या करते हुए कहा कि उर्दू शायरी में इस शब्द का ऐसा प्रयोग कभी इससे पहले या बाद में नहीं किया गया।
तेजेन्द्र शर्मा ने चित्रकार मक़बूल फ़िदा हुसैन, फ़िल्मकार मुज्ज़फ़र अली, एवं संसद सदस्य वीरेंद्र शर्मा की उपस्थिति में अपने पॉवर पाइन्ट प्रेज़ेन्टेशन की शुरूआत फ़िल्म हम दोनों के भजन अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम से की। एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स की अध्यक्ष काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी ईद के त्योहार में व्यस्तता कारण कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सकीं मगर उन्होंने श्रोताओं के लिये ईद और गणेश चतुर्थी की बधाई का संदेश भेजा। साहिर की एक संपूर्ण रोमांटिक कवि की छवि स्थापित करने के लिये तेजेन्द्र शर्मा ने उनके जिन फ़िल्मी गीतों और ग़ज़लों को पर्दे पर दिखाया उनमें शामिल हैं फिर न कीजे मेरी गुस्ताख़ निगाही का गिला (फिर सुबह होगी-1958) तुम अगर मुझको न चाहो (दिल ही तो है-1963) जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा (ताजमहल-1961) चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों (गुमराह–1963) और तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक़ है तुमको (दीदी–1959) साहिर ने अपने एक ही गीत में गुस्ताख़ निगाही और यूं ही सी नज़र जैसे विशेषणों का इस्तेमाल कर फ़िल्मी गीतों को साहित्यिक स्तर प्रदान किया है।
यहां से शुरू हुआ साहिर का क्रांतिकारी रूप और इस रूप के लिये जिन गीतों का इस्तेमाल किया गया उनमें शामिल थे चीनो अरब हमारा (फिर सुबह होगी–1958) ये दुनियां अगर मिल भी जाए तो क्या है और जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहां है (प्यासा–1957) साहिर की विशेषता है कि वे सत्ता से सवाल भी करते हैं, हालात पर टिप्पणी भी करते हैं, और दुनियां को जला कर बदलने की बात भी करते हैं, तेजेन्द्र शर्मा ने आगे कहा कि साहिर ने फ़िल्मों में जो भी लिखा वो अन्य फ़िल्मी गीतकारों के लिये एक चुनौती बन कर खड़ा हो गया। उनका लिखा हर गीत जैसे मानक बन गए। उन्होंने फ़िल्मों में सर्वश्रेष्ठ कव्वाली न तो कारवां की तलाश है (बरसात की रात) सर्वश्रेष्ठ हास्य गीत सर जो तेरा चकराए (प्यासा) सर्वश्रेष्ठ देशप्रेम गीत ये देश है वीर जवानों का (नया दौर) सूफ़ी गीत लागा चुनरी में दाग़ छिपाऊं कैसे (दिल ही तो है) यहां तक कि शम्मी कपूर को नई छवि देने में भी साहिर का ही हाथ था जब उन्होंने तुमसा नहीं देखा के लिये गीत लिखा 'यूं तो हमने लाख हसीं देखे हैं' लिखा। कार्यक्रम में यह गीत भी दिखाया गया।
यादों के झरोखों में झांकते हुए तेजेन्द्र शर्मा ने साहिर के प्रेम प्रसंगों का ज़िक्र किया। ज़ाहिर तौर पर उसमें सुधा मल्होत्रा और अमृता प्रीतम के नाम शामिल थे। अमृता प्रीतम की एक स्मृति को तेजेन्द्र ने बहुत भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया। अमृता और साहिर दोनों मॉस्को गये थे जहां साहिर को सोवियत लैण्ड पुरस्कार मिलना था। वहां एक अफ़सर की ग़लतफ़हमी से दोनों के नाम के बिल्ले बदल गये। साहिर ने अमृता से बिल्ले वापिस बदलने के लिये कहा। मगर अमृता ने कहा कि वह बिल्ला वापिस नहीं करेगी, इस तरह साहिर अमृता के दिल के क़रीब रहेगा। भारत वापिस आने पर साहिर की चन्द दिनों में ही मृत्यु हो गई। अमृता ये सोच कर रोती रही कि दरअसल मौत उसकी अपनी आई थी, मगर उसके नाम का बिल्ला साहिर के सीने पर था। इसलिये मौत ग़लती से साहिर को ले गई।
तेजेन्द्र शर्मा का साहिर की भाषा पर टिप्पणी करते हुए कहना था कि किसी भी बड़े कवि या शायर की लिखी वही शायरी ज़िन्दा रही है जो आम आदमी तक प्रेषित हो पाई है। ग़ालिब की भी वही शायरी प्रसिद्ध हुई जो की सरल भाषा में लिखी गई। संप्रेषण किसी भी साहित्य की मुख्य विशिष्टता है। साहिर ने भी अपनी साहित्यिक रचनाओं की भाषा को फ़िल्मों के लिये सरल और संप्रेषणीय बनाया। इसीलिये उसकी वो रचनाएं अमर हो पाईं। इसका सबसे ख़ूबसूरत उदाहरण है जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहां हैं (प्यासा) जो कि साहित्यक रूप में कलिष्ट उर्दू भाषा में लिखी गई है। जबकि फ़िल्म के लिये उसे सरल भाषा में दोबारा लिखा गया। कबीर, तुलसी, मीरा, सूरदास, ग़ालिब, मीर और फ़ैज़ की तरह साहिर की शायरी भी आम आदमी को नये-नये मुहावरे दे जाती है। साहिर, शैलेन्द्र और शकील अपने समय के फ़िल्मी गीतों की ऐसी त्रिमूर्ति थे जिन्होंने फ़िल्मी मुहावरे में उत्कृष्ठ साहित्य की रचना की।
अपने प्रेज़ेन्टेशन में उन्होंने साहिर की शराब की रोज़ाना होने वाली पार्टियों का ज़िक्र किया और संगीतकार से एक रूपया अधिक पारिश्रमिक लेने की उनकी ज़िद के बारे में बताया। साहिर ने ही ऑल इण्डिया रेडियो में गीतकार का नाम शामिल करने की परम्परा शुरू करवाई। मुंबई के जुहू इलाक़े के जिस क़ब्रिस्तान में साहिर को दफ़न किया गया था वहीं मुहम्मद रफ़ी, मधुबाला, नौशाद, तलत महमूद, नसीम बानो, ख़्वाज़ा अहमद अब्बास, जॉ निसार अख़्तर और सरदार जाफ़री जैसी हस्तियां भी दफ़नाई गई थीं, मगर हाल ही में क़ब्रिस्तान को चलाने वाले बोर्ड ने बिना किसी को बताए इन क़ब्रों पर लगे क़ुतबे और छोटे-छोटे मक़बरे तोड़ दिये और ज़मीन को समतल कर दिया। वहां मिट्टी डाल कर नई क़ब्रों के लिये जगह बनाई गई है। उनका कहना है कि इस्लाम में मक़बरे बनाने की इजाज़त नहीं है। यह उस देश में हुआ जिस देश की एक पहचान एक मक़बरा भी है। पूरी दुनियां के लोग उसे ताजमहल कहते हैं और उसको देखने भारत आते हैं। शायद इसीलिये साहिर ने अपने जीवन में ताजमहल के बारे में कहा था, 'इक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर, हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक, मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझ को।'
कार्यक्रम की शुरूआत में नेहरू केन्द्र की निदेशक मोनिका मोहता ने अतिथियों का स्वागत किया। तेजेन्द्र शर्मा ने कथाकार महेन्द्र दवेसर, ग़ज़लकार प्राण शर्मा एवं जमशेदपुर की विजय शर्मा को धन्यवाद दिया जिन्होंने इस कार्यक्रम की तैयारी में कुछ सामग्री भेजी। अन्य लोगों के अतिरिक्त नसरीन मुन्नी कबीर, प्रोफेसर अमीन मुग़ल, ग़ज़ल गायक सुरेन्द्र कुमार, शिक्षाविद अरुणा अजितसरी, दिव्या माथुर एवं उच्चायोग के जितेन्द्र कुमार भी शामिल थे।


Bookmark and Share

प्रतिक्रिया ई-मेल करें
Hindi News Portal (swatantraawaz.com)   About Us | Contact Us  | Advertise With Us | Disclaimer

तेजेन्द्र शर्मा/ काला सागर

रचनाकार: तेजेन्द्र शर्मा संग्रह का मुखपृष्ठ: काला सागर / तेजेन्द्र शर्मा विमल महाजन ने आज दफ्तर से अवकाश ले रखा था. उन्हें कई दिनों से लग रहा था जैसे उनका शरीर आवश्यकता से अधिक थकता जा रहा है. उन्होंने फ़ैसला किया कि आज केवल आराम ही किया जाए, देर तक सोए. उठकर आराम से सुबह के कामों से निवृत्त हुए, और समाचार-पत्र लेकर बैठ गए. आजकल समाचार-पत्र पढने में उन्हें कोई विशेष रुचि नहीं रही थी. पंजाब में हो रही घटनाओं को पढ़ कर उन्हें एक अजीब-सी बेचैनी होने लगती. उन्हें हमेशा याद आता था अपना वह छोटा-सा गांव जगरांव जहां उनका जन्म हुआ था, लुधियाना के करीब ही. जब कभी बहुत प्रसन्न मुद्रा में होते, तो कहते, इस जगरांव में हिंदुस्तान की दो महान विभूतियों ने जन्म लिया है- एक थे लाला लाजपत राय, और दूसरा! और.. यह कह कर वे अपनी ओर देखते व वह हंस पडते. किंतु आजकल जैसे स्वयं से ही सवाल पूछते रहते थे, क्या हो गया है अपने पंजाब को? एक दिन बहुत भावुक होकर बोले, "रंजना, हम तो एकदम स्टेट-लेस होकर रह गए हैं. यहां बंबई वाले तो नारा लगाते हैं सुंदर मुंबई मराठी मुंबई, यानी हम तो यहां के कभी नहीं हो सकते. और पंजाब जाने का अर्थ है, मौत को दावत देना. इतना बुरा हाल तो सैंतालीस में भी नहीं हुआ था." और फिर वे एक गहरी सोच में डूब गए. कितना भयावह विचार है! आपकी मातृभूमि आपसे छिन जाए, बिना किसी अपराध के. विमल महाजन को एअरलाइन की नौकरी करते तीस वर्ष हो गए थे. बस, चार-पांच वर्ष में रिटायर होने वाले थे. सारी दुनिया ही उनके छोटे से संसार का हिस्सा बनी हुई थी. एक विमान-परिचारक की हैसियत से उन्होंने नौकरी शुरू की थी. परंतु अपनी मेहनत व ईमानदारी के बल पर इस उच्च पद पर पहुंच गए थे. इस बीच उनका विवाह भी हुआ और तीन बच्चे भी. कैसे समय निकलता जा रहा है उनकी मुठ्ठी से! वैसे उन्हें देखकर कोई यह नहीं मान सकता था कि वे दो-दो बच्चों के नाना भी हैं. इसका कारण संभवतः उनका पहनावा था, जिसके प्रति वे अतिरिक्त सचेत थे. इतने ही वे अपनी सेहत के बारे में भी थे. स्पष्टवादिता उनकी एक और विशेषता थी, जिसके कारण वे कभी प्रशंसा तो कभी आलोचना के पात्र बनते थे. विमल महाजन ने समाचार-पत्र को दो-तीन बार उलट-पुलटकर देख लिया था और आरामकुर्सी पर अलसा रहे थे तभी फ़ोन की घंटी बजी. उन्हें काफ़ी कोफ्त हुई. आज का दिन वे आराम से ही बिताना चाहते थे. टेलिफ़ोन या और कोई भी विघ्न उन्हें नहीं चाहिए था. अन्यमनस्क भाव से उन्होंने फ़ोन उठाया, फ़ोन एअरपोर्ट से ही था. वे झुंझलाए से स्वर में बोले, भई, आज तो आराम करने दो. महाजन साहब, गज़ब हो गया. जीरो नाइन वन क्रैश हो गई. लंदन के पास. क्या? मैं अभी पहुंचता हूं. विमल महाजन के जबडे थोडे भिंच गए थे. वे जैसे याद करने का प्रयत्न कर रहे थे कि जीरो नाइन वन, पर कौन-कौन क्रू-मेंबर होगा. लगभग बदहवासी की सी स्थिति में उन्होंने कपडे पहने और ऑफ़िस चलने को तैयार हो लिए. रंजना, उनकी पत्नी, समझ गई कि कोई गडबड अवश्य है. जब कभी विमल महाजन परेशान होते तो उनके जबडे भिंच जाते थे. क्या बात है? आप तो आज आराम करने वाले थे. फिर एकाएक कहां की तैयारी होने लगी है? रंजू, न्यूयार्क फ्लाइट क्रैश हो गई है. दफ्तर ़ ़ क्या? अरुण भी तो न्यूयार्क ही गया है. अरुण! हे भगवान! सब ठीक हो. देखों, मैं अभी ऑफ़िस जाकर तुम्हें फ़ोन करूंगा ़ ़. विमल महाजन का स्वर भर्रा उठा था और वे अपनी बात पूरी नहीं कर पाए थे. रास्ते-भर अरुण के विषय में ही सोचते रहे. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अरुण की पत्नी को वे कैसे समाचार दे पाएंगे. अरुण उन्हें अपने बेटे के समान प्रिय था. उसके विवाह में वे अपने सारे सिध्दांतों को ताक पर रखकर, सिर पर पगडी बांधकर, घोडी क़े सामने नाचे थे. अनुराधा, अरुण की पत्नी भी उनका बहुत आदर करती थी. उनके हाथ ठंडे हुए जा रहे थे. नास्तिक होते हुए भी, भगवान से प्रार्थना कर रहे थे कि अरुण सुरक्षित हो. दफ्तर के बाहर कुछ लोग जमा थे यानी खबर फैल चुकी थी. सबके चेहरों पर सहमी हुई उत्सुकता थी. सब दुर्घटना के विषय में जानना चाहते थे. पर कैसे पूछें, कौन पूछे. उनके सहायक अफ़जल खान ने ही उन्हें बताया, सर, फ्लाइट जीरो नाइन वन मांट्रियल से लंदन आ रही थी. रास्ते में ही लंदन के करीब सागर के ऊपर ही फ्लाइट में एक धमाका हुआ और फ्लाइट क्रैश हो गई. अभी पूरी डिटेल्स आनी बाकी है. विमल महाजन ने अपने आपको व्यवस्थित किया, और लंदन फ़ोन मिलाने लगे ताकि पूरा समाचार मिल सके और वे आगे की कार्यवाही आरंभ कर सकें. परंतु फ़ोन मिल नहीं पा रहा था. क्रू लिस्ट देखी. अरुण का नाम उसमें नहीं था. उन्हें काफ़ी राहत महसूस हुई. पर ़ ़पर जो लोग फ्लाइट पर थे, वे सभी उनके अपने परिचितों में से थे. रमेश कुमार! जिसका अभी-अभी तीन महीने पहले ही विवाह हुआ था. मां-बाप की इच्छा के विरुध्द एक पारसी एअर होस्टेस से विवाह किया था उसने. दोनों ही इस फ्लाइट पर थे. काश, यह खबर झूठी हो! वे मन-ही-मन प्रार्थना कर रहे थे. खबर फैलने के साथ-साथ लोगों की उत्सुकता बढती जा रही थी. फ़ोन-पर-फ़ोन आ रहे थे. पर विमल महाजन का मन हो रहा था कि वे कानों पर हाथ रखकर बैठ जाएं चुपचाप. किसी के प्रश्नों का कोई उत्तर न दें. पर चिंतित संबंधियों की जिज्ञासा शांत करना उनका कर्तव्य था. यदि विमल महाजन स्वयं इस दुर्घटना से इतने विचलित हो गए हैं तो जिनके भाई-बहन, मां-बाप, पति और न जाने कितने रिश्तेदार उस विमान में आ रहे थे, उनकी चिंता स्वाभाविक थी. और वे बिना अपना धैर्य खोए फ़ोन अटैंड करने लगे. टेलेक्स की खटखट शुरू हुई. लंदन से पहला संदेश आयाः अनुमान है कि विमान आतंकवाद का शिकार हुआ है. विमान में क्रू व यात्रियों सहित तीन सौ उनतीस लोग थे. अभी किसी के बचने की कोई सूचना नहीं ़ ़यदि कोई बचा भी तो क्या ठंडे एटलांटिक के बर्फ़ीले पानी में जीवित रह पाएगा? विमल महाजन के मस्तिष्क के घोडे ज़ा रहे थे कहां तो यात्री और क्रू-मेंबर लंदन पहुंचने के बारे में सोच रहे होंगे, और कहां गहरे सागर का काला अंधेरा! 'क्या आतंकवाद का कोई धर्म होता है? सोच जारी थी, क्या एक विमान उडा देने से आतंकवादियों की बातें मान ली जाएंगी? क्या इन तीन सौ उनतीस लोगों को भी शहीद कहा जाएगा? जलियांवाला बाग में भी तो बिल्कुल इतने ही लोग शहीद हुए थे. देश उन्हें आज तक नहीं भुला पाया. क्या इन शहीदों को भी लोग याद रख पाएंगे? मारा तो उन्हें भी गोरी सरकार के आतंकवादी/अफ़सरों ने था. निहत्थे वे भी थे और निहत्थे ये भी. क्या फिर ऊधमसिंह खडा होगा जो कि इन आतंकवादियों का सफ़ाया करेगा? टेलिफ़ोन की घंटी बजी. विमल महाजन की तंद्रा टूटी. फ़ोन घर से था. रंजना भी अरुण के लिए परेशान थी. शाम के सात बज गए थे. यात्रियों के नाते-रिश्तेदारों के टेलिफ़ोनों का तांता लग गया था. अब तो लोग एअरपोर्ट पर इकठ्ठे हो चुके थे. सबके मुंह पर एक ही सवाल था, कोई खबर आई? सब मन-ही-मन अपने संबंधियों की खैर की प्रार्थना कर रहे थे. उन सबकी भावनाओं के तूफ़ान को संभाल पाना एअरलाइन के कर्मचारियों के लिए कठिन पड रहा था. विमल महाजन स्वयं सबको तसल्लियां दे रहे थे. लंदन से विस्तृत समाचार की प्रतीक्षा हो रही थी. पत्नी का फ़ोन फ़िर आया. आप एक बार घर आकर खाना खा जाते. उन्होंने अपनी झुंझलाइट रंजना पर ही उतार दी. ऐसे में भला कोई खाने के विषय में कैसे सोच सकता है? ंकिंतु नहीं, उनके मातहत एक-एक करके अपने पेट को खूब शांत कर आए थे. केवल विमल महाजन स्वयं लोगों को दिलासा देने में व्यस्त थे. टेलेक्स से समाचार आ रहे थे. लंदन से सत्तर मील दूर आकाश में एक धमाका हुआ था और विमान सागर में खो गया था. यह भी कि नौकाएं और पनडुब्बियां खोज के लिए भेजी जा रही हैं. विमल महाजन यंत्रवत् अपना काम किए जा रहे थे. निश्चय हो गया था कि कोई नहीं बचा इस दुर्घटना में. जहाज के प्तान विक्रम सिंह विमल महाजन के मित्र थे. बंबई में जब कभी इकठ्ठे होते तो दोनों खार जिमखाना में शामें बिताया करते थे. ब्रिज दोनों का प्रिय खेल था. पर विमल महाजन कभी पैसे लगाकर ताश नहीं खेलते थे. कप्तान विक्रम सिंह सदा ही उन्हें पोंगा पंडित कहकर चिढाते थे. छः महीने में ही रिटायर होने वाले थे. पर अब जैसे कुछ भी शेष नहीं रहा था! न ब्रिज, न पोंगा पंडित कहने वाला उनका दोस्त. फ्लाइट परसर अनिरुध्द सेन की तो केवल छः महीने की बेटी है जब उनकी पत्नी को यह समाचार मिलेगा तो वह कैसे सहन कर पाएगी इस वज्रपात को? कई क्रू-मेंबर एअरपोर्ट पर इकठ्ठे हो गए थे. विमल महाजन ने कुछ लोगों को घरों में जाकर सूचना देने का काम सौंपा. बहुत कठिन काम था, वे जानते थे. समाचार सुनकर घर के सदस्यों की प्रतिक्रिया सोचकर उनका दिल बैठा जा रहा था. कैसे कहेंगे एक पत्नी को कि उसका पति अब कभी नहीं लौटेगा? कैसे कहेंगे एक बच्ची को कि तुम्हारे पापा अब कभी भी तुम्हारे लिए मिकी माउस और डोनाल्ड डक के खिलौने नहीं लाएंगे? तीन-चार दिन सब कुछ अस्त-व्यस्त रहा. एअरपोर्ट पर संबंधियों का तांता लगा रहा. विमल महाजन भी पिछली कई रातों से सो नहीं पाए थे. समाचार-पत्रों में भी एक ही समाचार सुर्खियों में था. विमान-दुर्घटना के कारणों का पता लगाना था, ब्लैक बॉक्स की चर्चा थी, जांच-समिति का गठन, और बहुत-सी औपचारिकताएं. दो दिनों से फाका करते, सडक़ के किनारे पर बैठे ननकू को भी कहीं से खबर लग गई थी. पोलियो ग्रस्त हाथ से सींगदाना चबाते हुए उसने अपने साथी पीटर को खबर सुनाई थी, यार, यह विमान अगर गिरना ही था, तो साला समुद्र में क्यों गिरा? सोच, कितनी बढिया-बढिया चीजें-वीसीआर, टीवी, सोना, साडियां सब-के-सब बेकार! यहीं कहीं अपने शहर के आसपास गिरता तो कुछ तो अपने हाथ भी लगता. ए मैन, अभी धंधे का टाइम है. खाली पीली टाइम वेस्ट करने का नहीं ़ ़क्या ़ ़हां भाई, गॉड का वास्ते इस गरीब को भी कुछ दे दो. जीजस क्राइस्ट भला करेगा. ़ ़ विदेश के कई आतंकवादी गुटों ने इस दुर्घटना का उत्तरदायित्व ओढा. जैसे कोई बहुत महान कार्य किया गया हो और वे उसका श्रेय लेना चाहते हों. बीमार, विकृत मानसिकता के लोग, जो निर्दोष लोगों को मौत की नींद सुलाकर गर्वान्वित अनुभव कर रहे हैं. विमल महाजन का मन वितृष्णा से भर गया. एअरलाइन के हेड क्वार्टर में कई मीटिंगें हुई. तय हुआ कि विदेशी नागरिकों का वहां के कानून के अनुसार मुआवजा दिया जाएगा और भारतीयों को भारतीय कानून के अंतर्गत. रंगभेद का यह भी एक रूप था, चमडी-चमडी में फ़र्क जो है. विमल महाजन ने प्रस्ताव रखा कि एक विमान चार्टर किया जाए और मरने वालों के निकटतम संबंधियों का लंदन भेजा जाए, जिससे वे अपने प्रियजनों की लाशें तो पहचान सकें. उच्च अधिकरियों ने स्वीकृति दे दी. 'क्रू यूनियन ने प्रत्येक मृतक क्रू-मेंबर के परिवार के लिए एक-एक लाख रुपया देने का फ़ैसला किया था. विमल महाजन को झटका-सा लगा जब रमेश कुमार के पिता उनसे मिलने दफ्तर पहुंचे. मिस्टर महाजन, मैं रमेश का पिता हूं. आजकल मैं और मेरी पत्नी तलाक लेकर अलग-अलग रह रहे हैं. आपको याद होगा कि पिछले क्रैश में मेरी बेटी नीना की मौत हो गई थी. उस समय भी एअरलाइन और क्रू-यूनियन ने मुआवजा मुझे ही दिया था. मैं चाहता हूं कि अब भी मेरे बेटे और बहू की मृत्यु का मुआवजा मुझे ही मिले. इससे पहले कि मेरी पत्नी इसके लिए अर्जी दे, मैं आपके पास अपने क्लेम की यह अर्जी छोडे ज़ा रहा हूं ताकि आप इन्साफ़ कर सकें. ़ ़मैं तो अब बूढा हो चला हूं. कमाई का अब और कोई जरिया है नहीं. ठीक है, आप अर्जी छोड ज़ाइए. समय आने पर उस पर विचार किया जाएगा. बडी क़ृपा होगी आपकी. नहीं तो इस उम्र्र में कोर्ट कचहरी जाने की तो शरीर में ताकत नहीं रह गई. चलता हूं. विमल महाजन ंकिंकर्तव्यविमूढ से कुर्सी पर बैठे थे. शिनाख्त के लिए संबंधियों को लंदन ले जाने की पूरी जिम्मेदारी विमल महाजन को ही सौंपी गई. लंदन जाने के लिए संबंधियों का तांता लग गया था. विमल महाजन तय नहीं कर पा रहे थे कि किसे भेजें, किसे रोकें. हर रिश्तेदार अपना रिश्ता अधिक नजदीकी बताता था . लंदन जाने के लिए विमान तैयार था. रोते-कलपते रिश्तेदारों के बीच विमल महाजन को स्वयं को संयत रख पाना काफ़ी मुश्किल लग रहा था. मिसेज वाडेकर की हिचकियां अभी भी जारी थीं. उनका बेटा विदेश से बंबई केवल विवाह करने के लिए आ रहा था. उन्हें क्या पता था लंदन जाना पडेग़ा, डोली के स्थान पर अर्थी लेने. मैं तो अपने बेटे को दूल्हा बनाकर ही विदा करूंगी. मिसेज वाडेकर विक्षिप्त अवस्था में बडबडाए जा रही थीं. मगनभाई की बीस वर्षीया पोती विदेश से अकेली आ रही थी. उसके पिता को छुट्टी नहीं मिल पाई थी उसके साथ आने के लिए. खिडक़ी के पास बैठे हुए वे जैसे शून्य में देख रहे थे. दो-दो मौतों का बोझ लिए दीपिंदर विमान में बैठा था. पिछले सप्ताह ही उसके पिता का देहांत हो गया था और उन्हीं के अंतिम संस्कार के लिए उसका भाई सुक्खी अमेरिका से आ रहा था. दुःख में सब एक थे. किसी का भी कोई धर्म, मजहब नहीं था. सुख में था भी तो आतंकवादियों को उससे कोई लेना-देना नहीं था. वह हर धर्म वाले को अपनी पशुता का शिकार बना लेते हैं. विश्व-भर से अलग-अलग एजेंसियों ने एटलांटिक में खोजबीन शुरू कर दी थी. पहले विमान के कुछ क्षतिग्रस्त हिस्से मिले. फिर विक्षिप्त लाशें मिलनी शुरू हुई. लाशों को जैसे किसी ने उधेड दिया हो, चिंदी-चिंदी हुए शरीर. लाशें पहचानना भी बहुत कठिन काम था. लंदन में सभी रिश्तेदारों के रहने, खाने-पीने की व्यवस्था एयनलाइन की ओर से मुफ्त की गई थी. विमल महाजन सभी कार्य बडी तत्परता से निभा रहे थे. स्वयं उन्हें अपने खाने-पीने और सोने का भी ध्यान नहीं था. वंचित लोगों की सेवा करके संभवतः वे स्वयं को संतुष्ट करना चाहते थे. उनका यही प्रयत्न था कि किसी भी यात्री को कोई शिकायत या असुविधा न हो. एक यात्री विमल महाजन तक पहुंचा, मिस्टर महाजन, खाना-पीना तो ठीक है, पर हमें आप कुछ अलाउंस वगैरह भी दिलवाने का प्रबंध करवा दें तो अच्छा होगा. हम सब इतनी जल्दी में आए हैं कि एफ़टीएस का प्रबंध नहीं हो पाया. कम-से-कम इतना रोजाना भत्ता तो हमें मिलना चाहिए, जिससे हमें कहीं बाहर आने-जाने में मुश्किल न हो. विमल महाजन हैरान! शीला देशमुख के पिता किसी सरकारी महकमे में उच्च अधिकारी थे, महाजन साहब, हमारी बेटी ने तो एअरलाइन के लिए जान दे दी. उसके बदले में आप हमें क्या देंगे? चंद रुपए. इस बुढापे में हम उन रुपयों का क्या करेंगे? हमारी दूसरी बेटी अमेरिका में रहती है. हम चाहते हैं कि जब तक हम जिएं, मुझे व मेरी पत्नी को हर वर्ष अमेरिका आने-जाने का मुफ्त टिकट मिले, मैं मिनिस्टर साहिब से भी इस विषय में बात करूंगा. विमल महाजन की इच्छा हुई कि सब काम-धाम छोडक़र वापस चले जाएं. इंसान इतना स्वार्थी भी हो सकता है! ये भावनाविहीन लोग इस हादसे से अपना-अपना स्वार्थ सिध्द करने की कोशिश में लगे हैं. ़ ़पर वे तो यह सारा काम अपने सहयोगियों को श्रध्दांजलि के रूप में कर रहे थे. उन्हें यह सब करना ही होगा. धैर्य के साथ ़ ़ लंदन के विक्टोरिया अस्पताल का एक हिस्सा. वहां लाशें इकठ्ठी की गई थीं. लाशें! लाशें!! गहरे नमकीन पानी में से निकाले गए विकृत शरीर. कौन कैसे पहचान कर पाएगा! भगवान ने कितनी दर्दनाक मौत लिखी थी कुछ इन्सानों के लिए! नवजात शिशु से लेकर सत्तर वर्ष तक की बूढी लाशें. कहीं हाथ गायब है तो कहीं टांग नदारद. कहीं केवल धड ही है-ऊपर और नीचे के दोनों ही हिस्से गायब. किसी की अंगूठी पहचानने की कोशिश की जा रही थी, तो किसी का लॉकेट. केवल एक लाश साबुत मिली थी. अपने मासूम चेहरे पर अपार दर्द लिए नैंसी, मां और तीन छोटी बहनों का पेट भरने वाली नैंसी. चेंबूर की झोंपडपट्टी से ऊंची उठी नैंसी. बिन बाप की बेटी नैंसी. कमजाेर नारी होते हुए भी बलवान पुरुषों से कहीं अधिक पौरुषपूर्ण नैंसी. अब कभी भी खडी न हो पाएगी. मां पछाड ख़ाकर गिर पडी अौर संभली. एक सच्चे ईसाई की भांति वीरता दिखाई. बेटी की लाश को चूमा. बूढी क़ोख में हलचल हुई. अपना पराया हो गया. किंतु अभी तीन बेटियां और घर में हैं. एक ने इसी साल बीए किया है, बाकी दोनों स्कूल में हैं. उनके लिए मां को मजबूत बनना है. बेटी को घर ले जाने की तैयारी करने लगीं. चेहरों पर निराशा साफ़ दिखाई देने लगी थी. किसी भी और लाश को पहचानना लगभग असंभव-सा लग रहा था. फ़ैसला किया गया कि सभी लाशों का सामूहिक क्रिया-कर्म किया जाए. यह भी तय किया गया कि क्रिया-कर्म सागर-तट पर ही होगा और वहीं मरने वालों की याद में एक स्मारक भी स्थापित किया जाएगा ताकि विश्व को चेतावनी मिले कि आतंकवाद क्या कर सकता है. विमल महाजन धम्म से कुर्सी पर बैठ गए. रिश्तेदारों की दिक्कतें दूर करते, ब्रिटिश सरकार व एअरलाइन अधिकारियों से संपर्क व बातचीत करते उनका शरीर व दिमाग दोनों की थक गए थे. उस पर इतनी सारी लाशों का सामूहिक क्रिया-कर्म, उन्होंने आंखें मूंद लीं. मिस्टर महाजन! जी. उन्होंने आंखें मूंदे ही पूछा. आपसे एक सलाह चाहिए. कहिए. नेत्र खुले. जिस काम के लिए आए थे, वो तो हो गया. जरा बताएंगे, यदि शापिंग वगैरह करनी हो तो कहां सस्ती रहेगी? नए हैं न ़ ़ उसके आगे बात सुनने की ताकत विमल महाजन में नहीं थी. हाउंसलो हाइ स्ट्रीट पर पचास-सौ की गिनती बढने से कोई विशेष अंतर नहीं पडता. हर काम यथावत जारी है. डिक्संज, बूट्स, मार्क्स, वुलवर्थ हर जगह कुछ अनजाने चेहरे दिखाई दे रहे थे. कल सुबह तो वापस बंबई चले जाना है. सभी यथासंभव सामान बटोरने में लगे थे. लंदन में गर्मियों में भी सूर्य-देवता आंख मिचौली खेलते रहते हैं. आज उन्होंने पूर्ण विश्राम करने का निर्णय ले लिया है. बादल आसमान में चहलकदमी कर रहे थे. एअरपोर्ट पर एअरलाइन के काउंटर पर भी जो नजारे थे, वे कुछ कम क्षोभ पैदा करने वाले नहीं थे. सभी यात्री अधिक-से-अधिक सामान के साथ चेक-इन करने की कोशिश कर रहे थे. काऊंटर क्लर्क शौकत अली जी को समझा रहा था. मिस्टर, पच्चीस किलो का तो आपका टीवी ही है. कुल मिलाकर साठ किलो वजन है आपके सामान का. और हैंडबैग अलग. आप केवल बीस किलो सामान ले जा सकते हैं. मगर मैं तो यहां अपने भाई की लाश पहचानने आया हूं. हमारा केस फ़र्क है ़ ़ यह भाई की मौत का वजन से क्या संबंध है? एक बार फिर विमल महाजन को ही जा कर अनुरोध करना पडा. क्षुब्ध विमल महाजन जैसे-तैसे सबको समझाकर यात्रियों को चेक-इन करवा पाए. विमान ने उडान भरी. सीट-बेल्ट बांधने के संकेत बंद हुए, तो केबिन में हलचल बढने लगी. विमल महाजन अपनी रिपोर्ट लिखने में व्यस्त थे. यात्रियों को खाना दिया गया. विमल महाजन केबिन का मुआयना कर रहे थे. मिसेज वाडेकर ने खाने को छुआ तक नहीं था. वह अपने बेटे की लाश को दूल्हा नहीं बना पाई थीं. लाश की शिनाख्त ही नहीं हो पाई. दीपिंदर दस दिन में दो-दो लाशों के क्रियाकर्म के गम से उबर नहीं पाया था. कुछ यात्री गम गलत करने के लिए पेग-पर-पेग चढा रहे थे. यार, पी ले आज, जी भरके. हमें कौन-से पैसे देने हैं. यह काम अच्छा किया है एअरलाइन ने. विमल महाजन थोडा और आगे बढे. क्यों ब्रदर, आपने कौन-सा वीसीआरलिया? मुझे तो एनवी450 मिल गया. बडी अच्छी किस्मत है आपकी. मैंने तो कई जगह ढूंढा. आखिर में जो भी मिला, ले लिया. हमें कौन-सा बेचना है! ... ़ ़ ़ आपने सोनी ढूंढ ही लिया. कितने इंच का लिया? 27 इंच का. और आपने? हमारे भाग्य में कहां जी! जेवीसी का लिया है. पर देखने में अच्छा लगता है. फिर च्वाइस कहां थी! मौसम में थोडी ख़राबी हुई, यात्रियों को एक झटका सा महसूस हुआ. विमान "ब्लैक सी" के नजदीक उडान भर रहा था. श्रेणी: कहानी इस पन्ने का पिछला बदलाव २१ जनवरी २००९ को १७:०० बजे हु

तेजेन्द्र शर्मा/ देह की कीमत

रचनाकार=तेजेन्द्र शर्मा
}}

परमजीत कौर अपने कमरे में गुमसुम बैठी थी। उसकी आंखें सामने पड़े कलश पर टिकी हुई थीं। उसका दो वर्षीय पुत्र गहरी नींद सो रहा था। कमरे की निस्तब्धता को उसके पुत्र की ज़ुकाम से बंद नाक की सांस की आवाज ही भंग कर रही थी। कमरे का टेलिविज़न भी चुप था, टेलिफ़ोन भी गला बंद किये कोने में पड़ा था। किन्तु यह चुप्पी किसी शांति का प्रतीक नहीं थी। परमजीत के मन में तूफान की लहरें भयंकर शोर मचा रही थीं।

और फ़रीदाबाद के सेक्टर पंद्रह के बाहर एक कुत्ता ज़ोर से रो रहा था।

रोना तो अब शायद पम्मी के जीवन का अभिन्न अंग बनने वाला था।......पम्मी।......हां, हरदीप उसे इसी नाम से तो पुकारा करता था। पम्मी और हरदीप एक-दूसरे के जीवन का अटूट हिस्सा बन चुके थे। पम्मी का उजला खिला रंग रूप, बेदाग मुलायम चेहरा और अंग्रेजी (आनर्स) तक की पढ़ाई; ......यही सब गुण तो उसे फ़रीदाबाद के सेक्टर अट्ठारह से सेक्टर पंद्रह तक ले आये थे। हरदीप ने पम्मी को अपने किसी रिश्तेदार के विवाह में देख लिया था।......बस! ......तभी से बीजी के पीछे पड़ गया था, 'बीजी, जे ब्याह करना है, तो बस उस लाल सूट वाली से।'

'लाल सूट वाली दा नाम तां पुछ लैंदा!' बीजी को अपने पुत्र की व्यग्रता कहीं अच्छी भी लगी थी ......उनका लाडला बेटा जापान जाने की तैयारी में है। यदि, वहां से कोई चपटी नाक वाली जापानी पत्नी उठा लाया तो बीजी का क्या होगा! बीजी लग गईं लाल सूट वाली की तलाश में।

तलाश जाकर पूरी हुई सेक्टर अट्ठारह में। बीजी के मन में थोड़ा झटका लगा।......पुत्तर की पसंद टिकी भी तो जाकर सेक्टर अट्ठारह में। भला पन्द्रह सेक्टर वाले अट्ठारह वालों के घर रिश्ता लेकर जायें तो कैसे! ......बात बड़ी सीधी सी है - सेक्टर पन्द्रह है कोठियों और बंगलों वाला सेक्टर......हर बंगले में कम से कम एक कार तो है ही......और सेक्टर अट्ठारह में हैं हाउसिंग बोर्ड के दो कमरों वाले मकान।......बीजी सोच में पड़ गईं।

बीजी सोचते-सोचते ही सेक्टर अट्ठारह में पहुंच गईं। भला सा घर! ......सीधे सादे लोग! ......छोटा सा परिवार! सरदार वरयाम सिंह, पत्नी सुरजीत कौर, परमजीत और छोटा भाई सुखविंदर! ......बस इतना ही परिवार। दीवार पर गुरु नानक देव और गुरु गोबिंद सिंह के चित्र......और लाल कपड़े में लिपटा गुरु ग्रंथ साहिब परिवार के आस्तिक होने का ऐलान कर रहे थे। बाहर गुरुद्वारे के लाउडस्पीकर पर आवाज आ रही थी......'श्लोक महल्ला पंजवां......अपने सेवक की आपे राखे......आपे नाम जपावे......जहां-जहां काज किरत सेवक की......।' बीजी को लगा ऐसे समय में यह श्लोक उनकी सफलता का ऐलान है।......परमजीत उस दिन कालेज नहीं गई थी।......उसे हल्का सा बुखार था।

बुखार में जो लड़की इतनी सुंदर लग सकती है, वो सजने-संवरने के बाद क्या लगेगी! वरयाम सिंह और सुरजीत कौर प्रसन्न कि उनकी बेटी विवाह के बाद नज़दीक भी रहेगी और रहेगी भी सेक्टर पंद्रह में।......होने वाला जमाई जापान में काम करता है। माता-पिता के लिए इतना ही काफ़ी था।......उन्हें हां करने में देर ही कितनी लगनी थी।......वे दोनों भी कन्यादान कर स्वर्ग में अपना स्थान पक्का करने की योजना बनााने लगे।

परमजीत को तो कन्यादान शब्द से ही वितृष्ष्णा हो उठती थी।......दान वाली वस्तु बनना उसे गवारा नहीं था।......इसीलिये विवाह कचहरी में करना चाहती थी।......परन्तु शादी विवाह के मामले में बेटियों को नहीं बोलना चाहिए।...सम्भवत: इसीलिये परमजीत बोलना चाह कर भी कुछ नहीं बोल पाई। और 'लाल सूट वाली कुड़ी' लांवा फेरे लेकर,        ज्ञानियों के श्लोकों पर सवार होकर सेक्टर अट्ठारह से पन्द्रह के बीच की सड़क लांघ गई। रास्ते में भीम बाग और जैन मंदिर उसके विवाह के मूक साक्षी बने खड़े थे।

साक्षी बनने के लिए बिजली तैयार नहीं थी। इसीलिये तो जब घर पहुंचे तो बत्ती नदारद थी......फरीदाबाद में बिजली तो हर रोज गुल हो जाती है......दिन में लगभग चार से छह घंटे तो बत्ती के बिना बिताने ही पड़ते हैं। 'साढ्ढे घर बिजली दी की जरूरत है जी, साढ्ढी तां बहू ही ऐनी चमकीली है कि सारा घर उजला होया पाया है।'......बीजी अपनी ख़ुशी छिपा नहीं पा रही थीं।

उजली बहू तो आज भी घर में है। पर आज घर में गहरा काला अंधेरा छाया हुआ है।......बीजी अपने कमरे में रो-रोकर आंखें सुजा रही हैं। तो हरदीप के दोनों भाई अपनी भाभी को पत्थर दिल करार दे रहे हैं।......चुप हैं तो केवल दारजी!

दारजी ने सदा ही पम्मी को पिता का सा प्यार दिया है। वास्तव में उनका व्यवहार सरदार वरयाम सिंह के साथ समधियों जैसा रहा ही नहीं......दोनों ऐसे दोस्त बन गये, जैसे वर्षों से एक-दूसरे को जानते हों।......निकले भी तो पड़ोसी ही। सरदार वरयाम सिंह मौड़ मण्डी के रहने वाले थे और दारजी का बचपन मानसा में बीता था। भला मानसा और मौड़ में दूरी ही कितनी थी! ......बस इतनी ही दूरी फ़रीदाबाद में भी थी।......किन्तु हरदीप तो बहुत दूर चला गया था। हरदीप को दूर जाने का शौक भी बचपन से ही था। उसके ताऊजी जब से आस्ट्रेलिया जाकर बस गये थे......तब से हरदीप के मन में बस एक ही साध थी कि कहीं विदेश में जाकर ही बसना है।......पर पढ़ाई-लिखाई में तो उसका मन लगता ही नहीं था।......बस, किसी तरह दारजी के रसूख से हर वर्ष पास हो जाता था।......परन्तु हायर सेकण्डरी में तो बोर्ड की परीक्षा होती है।......वहां तो रसूख नहीं चलता है ना ! बस, उसी साल थोड़ी मेहनत की थी।......बी.ए. की डिग्री तो कुकुरमुत्तों की तरह उगे किसी 'पब्लिक कालेज' से ख़रीद ली गई थी।

ख़रीदने को तो दारजी नौकरी भी खरीद देते। परन्तु हरदीप को तो न नौकरी करनी थी और न ही दारजी के व्यापार में हाथ बंटाना था......उसे तो किसी भी तरह विदेश जाना था......बस......वहां जाना था......पैसा कमाना था और ऐश की जिन्दगी जीनी थी।......उन्हीं दिनों एअरलाइन में उड़ान परिचारकों की नौकरी निकली थी। विदेश की सैर का खुला न्यौता! ......हरदीप को कहीं से भनक लग गई कि पगड़ी-धारक सिखों को यह नौकरी नहीं मिल सकती......बस! कर आया केशों का अंतिम संस्कार! कर दिया दारजी की भावनाओं का खून! ......हो गई नौकरी की तैयारी!

पर क्या नौकरी ऐसे मिलती है? ......लिखित परीक्षा देनी होती है......पास करनी पड़ती है......साक्षात्कार! ......या फिर तगड़ी सिफारिश।......हरदीप के पास तो कोई भी अस्त्र-शस्त्र नहीं था इसलिए कोई भी बाधा लांघ नहीं पाया।......पहली ही सीढ़ी से फिसल कर गिर पड़ा।

आज पम्मी न जाने कितनी सीढ़ियों से नीचे गिर पड़ी है। उसमें उठकर बैठने की ना तो ताकत ही है और ना ही हिम्मत! ऐसा कैसे हो जाता है? ......एक ही घटना आप के समूचे जीवन को कैसे तहस-नहस कर देती है।......जिजीविषा बहुत निदर्यी वस्तु होती है। इंसान को जीवित रहने के लिए मजबूर करती रहती है। वरना क्या आज पम्मी के पास जीने का कोई बहाना है। उसके जीवन पर छाया अंधेरा तो और भी विकराल होता जा रहा है।

अंधेरे में जीने का अभ्यास है पम्मी को! ......तभी तो बीजी की कटु बातें और देवरों का निर्दयी व्यवहार भी उस अंधेरे को चीर कर उसे क्षत-विक्षत नहीं कर पा रहे हैं।......'मैं तां पहले ही कहन्दी सी, कुड़ी मंगली है।......ऐथे ब्याह नहीं करणा! ......मेरी तां कदी कोई सुणदा ही नहीं!' ......बीजी का विलाप जारी था।

'ना, उसके मां पयो ने कुछ छुपाया था क्या? ......साफ़-साफ़ बोल दिता था कि हमारी कुड़ी तां मंगली है।......ओस वक्त तो तेरे काके ने ही कह दिया था कि वोह इन बातों को माणता ही नहीं।......फिर आज किस बात की शिकैत है?'
'मेरा तां पुत्तर चला गया! ......तुसी मैंनूं ही लेक्चर दे रहे हो?'

'ओये जे तेरा पुत्तर गया है तो, ओस अभागन का भी तो खसम चला गया! ......ओय सोच भागवाने, विधवा का जीवन किसी को चंगा लगदा है?'

'हाय ओये, कुड़ी न निकली, डायण निकली, लोको! मां पयो ने अपनी डायण हमारे हवाले कर दिती......हुण मैं की करां जी?'

'करणा क्या है; बस अपणी बहु नू संभालो! ......हरदीप की निशाणी है उसदे पास......निक्के बच्चे नूं उसने संभालणा है।......मैं तो कहता हूं......!' और दारजी चुप्प हो गये।

'की कहंदे हो......। कुछ बोलो तां सही!'

'मैं तो कहता हूं......असी आप ही थोड़े वकत के बाद कुड़ी दा दूसरा ब्याह कर दें।......कुड़ी दा जीवन संवर जायेगा......ते साडी इज्जत रह जायेगी।'

'हाय ओये रब्बा! ......कैसा बाप है एह बन्दा! ......अभी पुत्तर नूं मेरे हफ्ता नहीं होया, ते बहू दे दूजे ब्याह दी गल करदा पया है! ......हाय ओये!'

'अपणे बैण बस कर! ......पम्मी की तरफ ध्यान दे।' दारजी का धैर्य चुकता जा रहा था।

पम्मी अब भी उस कलश को ताके जा रही है......जो मरा है, उसकी राख इसी कलश में पड़ी है। मरने वाला मरा भी तो जापान जाकर। 'काका, जा पान लै आ !' ......बीजी की बात सुनकर पम्मी की हंसी छूट गई थी।......भला उनका काका पूरा जापान कैसे ला सकता है! ......किन्तु आज तो उसी जापान ने उनके काके को और पम्मी के हरदीप को पूरे का पूरा निगल लिया था।

जापान जाने की हठ भी तो हरदीप की ही थी।......कोई पक्की नौकरी तो वहां थी नहीं।......फिर भला क्या आवश्यकता थी वहां जाने की। विवाह से पहले पम्मी को यह कहां बताया गया था कि काका अवैध तरीके से जापान जाता है और दो-तीन वर्ष वहां बिताकर, जेबें भरकर, वापिस आ जाता है।

'क्यों जी, आप ऐसा 'इल-लीगल' काम क्यों करते हैं।......अगर कभी पकड़े गये तो?'

'ओय झलिल्ये, जब तक रिस्क नहीं लेंगे, तो यह ऐशो आराम के सामान कैसे जुटायेंगे।......यह सारी इम्पोर्टड चीजें कहां से आयेंगी?'

'मुझे इन चीजों में कोई दिलचस्पी नहीं जी! ......आप बस यहीं रहिये जी! ......हम बस अपनी दाल-रोटी में ही खुश हैं।'

'तो, आदरणीय पम्मी जी, तुसी दाल-रोटी विच खुश रहो। ते बस आह ही खांदे रहो! ......सरदार हरदीप सिंह दाल-रोटी में खुश रहने के लिये नहीं पैदा हुआ!'

'नहीं जी, मैं अब आपको वहां नहीं जाने दूंगी।......आप एक बार तो वहां हो ही आये हैं।......शौक तो पूरा हो ही चुका है......फिर दोबारा जाने की क्या जरूरत है? ......यहां दारजी का अच्छा-भला बिजनेस है......वही संभालिये।'

'ओये तुम जनानियों को मर्दों की बातों में दखल नहीं देना चाहिए।......तुम अपना घर संभालो......बस पैसे कमाना हम मर्दों का काम है। वोह हमारे ऊपर ही छोड़ दो।'

बुरी तरह से आहत हो गई थी पम्मी! ......उसने अंग्रेज़ी साहित्य में पढ़ाई इसलिये नहीं की थी, कि घर के आंगन में गाय की तरह बंधी खड़ी रहे और पति अपनी मनमानी करता रहे......पम्मी अपने पति के हर काम में बराबर की भागीदार होना चाहती थी......उसे अपने काम में भागीदार बनाना चाहती थी।......उसकी ताकत बनना चाहती थी पर काका तो दारजी और बीजी की कमज़ोरी था......वोह भला एक कमज़ोरी की ताकत कैसे बन पाती?
ताकत की तो पम्मी में कोई कमी नहीं......उसका चरित्र इतना शक्तिशाली है कि वह किसी भी मुसीबत का सामना करने में सक्षम है। परन्तु जब से हरदीप ने उसे बताया है कि वह किस तरह अवैध तरीके से टोकियो पहुंचता है, तो उसकी शक्ति भी जवाब देने लगी थी।

'बड़ी सीधी सी जुगत है पम्मी! तीन वर्ष पहले भी चल गई थी; अब की बार भी चल जायेगी।......अपना एजेंट हमें दिल्ली से बैंकाक तो अपनी देसी एअरलाइन से भेजेगा। वहां से सिडनी का टिकट बनवायेगा, वाया टोकियो।......टोकियो में आठ घंटे का ट्रांज़िट हॉल्ट होगा......बस, उसी आठ घंटे में अपना एजेंट हमें एअरपोर्ट से बाहर निकाल कर ले जायेगा......मैं पहुंच जाऊंगा टोकियो में अपने अड्डे पर!'

'मुझे तो डर लगता है जी!'

'ओये, मैं वहां कोई अकेला थोड़े ही होऊंगा।......कितने लड़के पाकिस्तान से होते हैं, कितने बंगलादेशी, और कितने अपने पंजाबी भाई।......यही नहीं फिलीपीन और कोरिया वाले भी 'इल-लीगल' होते हैं।'

'पर होते तो 'इल-लीगल' ही हैं न जी!'

'ओ तू यहां कानूनी और ग़ैर-कानूनी के चक्कर में पड़ी है और मुझे अपनी ज़िन्दगी बनाने की फिक्र है।'

पम्मी को तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। उसके पल्ले तो यह बात ही नहीं पड़ रही थी कि इतने पचड़ों में पड़कर जापान जाने की ऐसी मजबूरी क्या है? ......क्या इसी को ज़िन्दगी बनाना कहते हैं? ......पर......काका तो बहुत अकलमंद है न......पिछली बार ही पांच लाख बचाकर लाया था......इम्पोर्टेड चीजें अलग......। भला सफल आदमी भी कभी गलत हुआ है !......किसकी मजाल जो सफलता को उसकी कमियां बता सके ?......फिर पम्मी ही भला कैसे अपने हरदीप को समझा सकती थी!

उल्टा हरदीप ने ही उसे समझा दिया था।......हरदीप के समझाने का नतीजा भी महीने भर में सामने आ गया था।......शर्म से लजाकर पम्मी ने बताया था कि उसका जी खट्टा खाने को करने लगा है।......दारजी तो बच्चों की तरह भंगड़ा पाने लगे थे।......बीजी ने बलैयां ली थीं......बहू को काला टीका लगाया......उसकी नजर उतारी......गुरुद्वारे ले जाकर माथा टिकवाया......घर में अखण्ड पाठ रखवाया।......अबकी बार बीजी ने भी पुत्तर को समझाने की कोशिश की थी, 'पुत्तरा, कुड़ी दा पैर भारी है। मेरी गल मन, ऐस वार नां जा......पहला बच्चा है, तूं साथ होएंगा, तां कुड़ी चंगा महसूस करेगी।'

'बीजी, कोई निक्की बच्ची थोड़े ही है पम्मी! ......फिर आप हो, दारजी हैं ने, दो छोटे वीर ने, कोई इकल्ली थोड़ी है।'

'पुत्तरा असी सारे बेगाने! ......उसका अपणा तो बस, तू ही है।'

कितना सच कहा था बीजी ने! ......आज हरदीप की मौत के बाद सब बेगानों का सा व्यवहार ही तो कर रहे हैं। हरदीप तो बेटे का मुंह देखे बिना ही चलाना कर गया।

'पम्मी, इंसान अपने भविष्य के लिये क्या कुछ नहीं करता! ......दिल छोटा नहीं करदे पगली!'

'पता नहीं क्योंजी, मेरा तो दिल ही नहीं मानता कि आप जापान जाओ।......मेरी तो बस यही तमन्ना है कि जब अपना बच्चा पैदा हो, तो सबसे पहले आप ही उसका चेहरा देखें।'

चेहरे कैसे दूर चले जाते हैं। गायब हो जाते हैं।......पम्मी की मां जचगी के लिये अपनी बेटी को अपने घर ले गई थी।......आजकल घर में कहां बच्चे पैदा किये जाते हैं? ......दाइयां तो केवल कहानियों में रह गई हैं......या फिर पिछड़े हुए गांवों में।......शहरों में तो बच्चे नर्सिंग होम में ही पैदा होते हैं। मायके वाले तो बस पैसे खरचते हैं......परेशानी उठाते हैं ताकि होने वाला बच्चा उनके जमाई के नाम को आगे बढ़ा सके। पम्मी का पुत्र अपने पिता की अनुपस्थिति में ही इस दुनिया में आ गया था।

और हरदीप अपने पुत्र को देखे बिना ही इस दुनिया से चला गया था......अपनी रणनीति के अनुसार हरदीप बैंकाक होते हुए टोकियो पहुंच गया था। अपने पुराने साथियों के साथ ही जाकर रहने का ठिकाना भी कर ही लिया था......एक ही कमरे में दस-बारह अवैध रूप से घुसे लड़के वहां रहते थे।......कुछ एक की पत्नियां पीछे हिन्दुस्तान में प्रतीक्षा कर रही थीं।......कुछ एक जापान में ही विवाह करने की जुगाड़ बना रहे थे।......जापानी कन्या से विवाह करने पर वो जापान में रहना वैध हो जाता।

फ़रीदाबाद का वैध नागरिक, खाते-पीते घर का 'काका', जापान में अवैध काम करके को अभिशप्त था।......वहां वो कुली भी बन जाता था तो कभी रेस्टॉरेंट में बर्तन भी मांज लेता था......हर वो काम जो हरदीप अपने देश में किसी भी कीमत पर नहीं करता, जापान में सहर्ष कर लेता था।......कारण? ......झूठी शान के अतिरिक्त, और क्या हो सकता है......कि लड़का जापान में काम करता है।

काम करता है! ......दारजी सब समझते हैं, कि काका क्या काम करता है। घर में एक वहीं तो हैं जो पम्मी की बात से सहमत हैं कि हरदीप को जापान नहीं जाना चाहिए।......पर काके को बीजी की पूरी शह है।......बीजी का मन तो इम्पोर्टेड सामान के साथ बंधा रहता है।......फिर न जाने उन्हें इम्पोर्टेड बहू के ख्याल से क्यों डर लगता था।

डर तो पम्मी को भी था कि कहीं कोई जापानी गुड़िया उसके हरदीप को अपने जाल में न फंसा ले। हरदीप को सख्त हिदायत थी कि हर सप्ताह वह पम्मी को फोन करेगा।......हरदीप भी अपना वादा हर सप्ताह निभाता था।
फिर एक सप्ताह हरदीप का फ़ोन नहीं आया।......पम्मी का माथा ठनका। बीजी ने झिड़क दिया, 'ना! जे एक हफ्ता फोन नहीं आया तां हो की गया......मुंडा कहीं बिजी हो गया होगा।......आजकल की लड़कियां तो अपने खसम को गुलाम बनाकर ही रखना चाहती हैं।'

पम्मी ने भी एक गुलाम की तरह चुप्पी साध ली थी। अपनी भावनाओं को दिल में ही दबा दिया था।

परन्तु विदेश में बैठे हरदीप का बुख़ार उसके शरीर में दबकर रहने को तैयार नहीं था।......भेद खुल जाने के डर से डॉक्टर से दवा लेने में भी नहीं जा सकते थे। दोस्त लोग मिलकर ही दवा करवा रहे थे। शरीर कमजोर पड़ गया था।......दो कदम चलते ही चक्कर आने लगते थे। अवैध कर्मचारी को तो रोज़ के पैसे रोज़ काम करने पर ही मिलते हैं। काम नहीं तो दाम नहीं।......मन ही मन हरदीप को यह चिंता भी खाये जा रही थी। बस इसीलिये कमज़ोरी की हालत में भी काम पर निकल पड़ा था।

पम्मी को हर दिन काटने को दौड़ रहा था।......वह अपनी मां से मिलने तक नहीं जा पा रही थी।......अगर पीछे से हरदीप का फोन आ गया तो? मां का फ़ोन तो कई बार आ चुका था और पिता जी भी दो बार लेने आ चुके हैं। आखिरकर, पम्मी ने सेक्टर पंद्रह से अटठारह के बीच की सड़क लांघने का मन बना ही लिया।

सड़क पार करते हुए हरदीप को ज़ोर का चक्कर आ गया। तेज़ रफ्तार से आती कार के ड्राइवर ने पूरे ज़ोर से ब्रेक लगाई थी।......परन्तु हरदीप के जीवन का दीप गिेंज़ा की व्यस्त सड़क के बीचों बीच बुझा पड़ा था।
हरदीप के साथियों में शोर मच गया। हड़कंप की सी स्थिति थी। अवैध लाश! ......लावारिस! ......उसे लेने कौन जाये? ......हरदीप के दसों दोस्त भी तो अवैध थे - लावारिस ज़िन्दा लाशें।......जो भी लाश लेने जायेगा, वही धर लिया जायेगा।......पर सतनाम के पास तो वैध वीज़ा था।......वो तो हरदीप की दोस्ती के कारण सबके साथ रहता था।......फिर गुज़ारा भी सस्ते में हो जाता था। सतनाम ने जाकर लाश को पहचाना।......पर अब लाश का करें क्या?
ज़िंदा इंसान का हवाई जहाज़ का किराया कम लगता है, परंतु लाश को जापान से भारत भेजना बहुत महंगा सौदा बन जाता है। किसी प्रोफेशनल से लाश पर लेप चढ़वाना, ताबूत का इंतज़ाम, सरकारी लाल फीताशाही, और हवाई जहाज़ का किराया! ......सतनाम ने सभी दोस्तों से बातचीत की......सभी बड़े दिल वाले थे। पंजाबी ख़ून ने ज़ोर मारा और दो दिन में ही तीन लाख भारतीय रुपये के बराबर पैसा इकट्ठा हो गया।......सभी दोस्तों ने अपने यार को श्रध्दांजलि के रूप में यह पैसा एकत्रित किया था।

सतनाम भारतीय दूतावास जाने की सोच रहा था। एक नया अफ़सर है, नवजोत सिंह। सुना है ख़ासा मददगार इंसान है। दोस्तों ने टोका, 'यार, यह एम्बेसी के चक्कर में न पड़ो। हिन्दुस्तानी एम्बेसी वाले तो बनता काम बिगाड़ने के लिए मशहूर हैं।'

'याद नहीं पिछली बार अवतार सिंह के साथ क्या किया था।' सतनाम परेशान हो उठा, 'भाई, एक बार चलकर तो देख लें।'

सभी सतनाम की बात मान गये। आखिर इन सभी 'इल-लीगलों' में एक वही तो 'लीगल' था। गैर कानूनी ढंग से दूसरे देश में जाकर सिंह भी कैसे चूहे हो जाते हैं।

नवजोत सिंह भारतीय दूतावास में पिछले साल भर से है। पिछली बार पंजाब के एक लड़के ने आत्महत्या की थी, तब भी उसी के सिर सारा काम आन पड़ा था। उस लड़के का मृत शरीर, अभी तक नवजोत को झुरझुरी दिला जाता है।
सतनाम सिंह की बात नवजोत पूरे ध्यान से सुनता रहा। उसने सतनाम की पीठ ठोंकी, 'तुम सबने तो अपनी दोस्ती निभा ली यारो।......दो दिन में तीन लाख रुपये इकट्ठे कर लिये! ......अब मुझे कुछ सोचना है।'
सतनाम मुंह नीचा किये खड़ा रहा।......नवजोत के माथे पर पड़ते बल इस बात की घोषणा कर रहे थे कि वह गहरी सोच में डूबा हुआ है।

'एक बात बताओ सतनाम सिंह तुम कह रहे थे कि हरदीप सिंह की बीवी और एक बच्चा भी है।' नवजोत ने ठंडी सांस लेकर पूछा।

'है जी!'

'तुमसे एक बात कहूं, तो बुरा तो नहीं मानोगे?'

'कहो न साबजी! ......इस परदेस में आप ही तो हमारे माई-बाप हैं।'

'सतनाम, अगर यह सारा पैसा इस लाश को हिन्दुस्तान भेजने में खर्च हो गया, तो हरदीप की बीवी को क्या मिलेगा......बस एक लाश! ......उस पर वो अभागन क्रिया-कर्म का खर्चा करेगी, सो अलग।'

'आप कहना क्या चाहते हैं बाऊजी?'

'अगर हम इस लाश का क्रिया-कर्म यहीं जापान में कर दें, तो इसकी अस्थियां तो मुफ्त में भारत भेजी जा कती हैं   डिप्लोमैटिक मेल में भेज देंगे।......ये पैसा .. उसके काम आ आयेगा।'

सतनाम किंकर्तव्यविमूढ़ होकर रह गया था। उसे समझ ही नहीं आ रहा था, कि उसकी प्रतिक्रया क्या हो। उसे नवजोत सिंह बहुत ही घटिया आदमी लगा, क्योंकि भावनाओं की कद्र उस इंसान में बिल्कुल भी नहीं थी।......उसे नवजोत सिंह बहुत अच्छा इंसान लगा।......क्योंकि वह जीवित व्यक्ति के बारे में सोच रहा है......सिर्फ लाश के बारे में नहीं। 'बाऊजी, आप जो ठीक समझें, वहीं करो जी।'

सतनाम ने वापिस आकर सारे मित्रों को नवजोत सिंह के मन की बात बताई। सभी की आंखों में नवजोत का चरित्र पेण्ड़ुलम की तरह नायक और खलनायक के बीच झूल रहा था। बुत बने बैठे थे सब। किसी भी निर्णय पर पहुंच पाना आसान था क्या? एक राय पर सभी मित्र एकमत थे कि फ़रीदाबाद में हरदीप की बेवा से बात की जाये। जो वह ठीक समझे वही किया जाये।

फोन की घंटी बजी। दोपहर का समय था। दारजी ने फ़ोन उठाया। जापान से फ़ोन था।......दारजी की आवाज़ स्वयमेव ही ऊंची हो गई, 'हां जी! ......मैं उसका फ़ादर बोल रहा हूं जी।......उसकी वाईफ़ घर में नहीं है। ......जी! ......व्हाट!....

'हलो, मिस्टर सिंह! ......आप हमारी आवाज़ सुन रहे हैं?'

दारजी की गीली भर्राई हुई आवाज़ निकली, 'क्यों जी? काके का फ़ोन था......क्या बोला?'

'अब वोह कभी नहीं बोलेगा, भागवाने!'

'शुभ-शुभ बोलोजी! वाहेगुरु मेहर करे!'

'हरदीप दी बीबी, काका सानूं छड के चला गया। ... जापान वाले काके दा क्रिया-कर्म वहीं करके उसके पैसे पम्मी के नाम भेज रहे हैं।'

तूफ़ान का झोंका एक भूचाल की तरह आया। बीजी फटी हुई आंखों से अपने पति को देख रही थीं, जिसने ऑल इंडिया रेडियो की तरह अपने पुत्र की मौत का समाचार सुना दिया था। बीजी का स्यापा घर की दीवारों की सीमा पर करके पड़ोसियों के घरों तक पहुंचने लगा था। वह बदहवास हुए जा रही थीं। हरदीप के दोनों भाई भौंचक्के खड़े थे।

'पुत्तर नूं तां खा गई, हुण ओसदे पैसे बी खा जायेगी।'

'अकल दी बात कर, कुलवंत! ......ओस बेचारी को तो अभी तक यह भी नहीं पता कि वो विधवा हो चुकी है।' दारजी को दु:ख और गुस्से दोनों पर काबू पाना भारी पड़ रहा था।

'दारजी, भरजाई को बुलाने से पहले एक बात हम आपस में तय कर लें।'

'हमें क्या तय करना है पुत्तर जी?'

'दारजी या तो वीरजी की लाश लेने हम दोनों भाइयों में से कोई जायेगा......या फिर......!'

'बोलो पुत्तर, चुप क्यों हो गये?'

'या फिर जापान वालों से कहिये कि पैसे बीजी के नाम से भेजें।'

'पुत्तर जी, अगर तुम लाश लेने जाओगे तो क्या खास बात हो जायेगी?' दारजी का गुस्सा बाहर आने को बेताब हो रहा था।

'दारजी, हम वहां वीरजी की जगह टोकियो में रहने का चक्कर चला सकते हैं।' कुलदीप ढिठाई से बोला।

'ओये, हरदीप की मौत से भी तुमने कोई सबक नहीं लिया?'

'चलो जी हम एक मिनट के लिये मान भी जायें कि काके दा क्रिया-कर्म जापान में हो जाये, तो सारे पैसे कल दी आई कुड़ी को क्यों मिलें। पुत्तर तो हमारा गया है!' बीजी ने कुलदीप के सुर में आवाज़ मिलाई।

दारजी सिर पकड़कर बैठ गये। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि इस औरत के साथ उन्होंने इतना लंबा जीवन बिता डाला, 'ओ, जिसका खसम गया है, पहले उसे तो बताओ कि वोह बेवा हो चुकी है।'

'पर दारजी, पम्मी भाभी के आने से पहले हम घरवालों को कोई फैसला तो कर लेना चाहिए।......दोबारा जापान से फोन आ गया तो क्या जवाब देंगे?' यह गुरप्रीत था, सबसे छोटा।

दारजी अपने परिवार को देखकर हैरान थे, क्षुब्ध थे......अपने ही पुत्र या भाई के कफ़न के पैसों की चाह इस परिवार को कहां तक गिरायेगी, उन्हें समझ नहीं आ रहा था। मन किया सब कुछ छोड़-छाड़कर संन्यास ले लें। पर अगर वे नहीं होंगे तो पम्मी का क्या होगा? ......यह गिध्द तो सामूहिक भोज करने में जरा भी नहीं, हिचकिचाएंगे। 'पुत्तर जी आप अपणे भाई और मां के साथ फ़ैसले करो, मैं ज़रा जाकर अपनी बहू को उसकी बरबादी की खबर दे आऊं।'

पंद्रह सेक्टर पर गिरी बिजली को दारजी अट्ठारह सेक्टर अपने साथ ले गये। सरदार वरयाम सिंह और सुरजीत कौर के तो पैरों के नीचे से मानों जमीन ही निकल कई। पम्मी तो चीख मारकर बेहोश ही हो गई।......बस चार-पांच महीने ही तो बिताये थे अपने पति के साथ।

'वरयाम सिंह जी, आप जी दी क्या राय है? ......जापान वालों को क्या जवाब दिया जाये?'

'सरदार साहब, आप बड़े हैं, अक्लमंद हैं, दुनिया देखी है आपने। आप जो फैसला करेंगे......वोह तो ठीक ही होगा।' सरदार वरयाम सिंह के हाथ जुड़े हुए थे।

'देख भाई वरयाम सिंह, यह फैसला मैं अकेला नहीं कर सकता......मेरी हालत से तो तू अच्छी तरह वाकिफ है......अभी तक न जाने कैसे सब कुछ सहे जा रहा हूं'

'सरदार साहिब, आप जो भी फैसला करें......जरा पम्मी के भविष्य का जरूर ख्याल करें।'

'भविष्य की बात तो बाद में सोचेंगे......अभी तो पम्मी को मेरे साथ रवाना करें। घर मे सौ अफ़सोस करने वाले आयेंगे।' दारजी उठ खड़े हुए।

वरयाम सिंह और सुरजीत कौर पम्मी और उसके पुत्र को लिये पंद्रह सेक्टर की ओर चल दिय।......भीम बाग और जैन मंदिर पम्मी की सूजी आंखें देखकर भी चुप थे।......निरपेक्ष खड़े थे।

बीजी ने सबको देखा तो उनका स्यापा और ऊंचा हो गया। दारजी ने पम्मी को अलग से बुलाया और उससे एक बार फिर वही सवाल किया।......पम्मी के पास सिवाय रोने के और कोई जवाब नहीं था। दारजी के दिमाग में वरयाम सिंह की आवाज़ गूंज रही थी, 'जरा पम्मी के भविष्य का ख्याल जरूर करें।'

जापान से फ़ोन आया। दारजी ने फ़ोन उठाया। पम्मी की ओर देखा। पम्मी की रोती हुई आंखों में लाचारी साफ़ दिखाई दे रही थी। बीजी, कुलदीप और गुरप्रीत की आंखें और कान दारजी की ओर ही लगे हुए थे।

'हांजी, नवजोत सिंह जी, आप......ड्राफ़्ट परमजीत कौर के नाम से ही बनवाइयेगा।......और......और अस्थियां थोड़ी इज्ज़त से किसी कलश में भिजवा दीजियेगा।' दारजी के आंसुओं ने उनकी आंखों से विद्रोह कर दिया। और वे निढाल होकर जमीन पर ही बैठ गये।

पूरा घर तनाव से भर गया। बीजी ने पूरा घर सिर पर उठा लिया, 'ऐस कमीनी नूं तां पैसा मेरे पुत्तर तो ज्यादा प्यारा हो गया।......अपने पुत्तर दे आखरी दर्शन वी नहीं कर सकांगी।......खसमां नूं खाणिये तेरा कख ना रहे।'

दारजी ने पम्मी के सिर पर हाथ फेरकर उसे कमरे में जाने को कहा।......पम्मी एक लुटे-पिटे मुसाफिर की तरह किसी तरह अपने कमरे तक पहुंच गई।

रात को बीजी ने एक और चाल चली, 'सुणोजी, मैं एक बात कहूं, बुरा तो नहीं मानोगे।'

'बोलो', दारजी की दर्द भरी आवाज उभरी।

'अगर कुलदीप पम्मी पर चादर डाल दे, तो कैसा रहे? ......घर की इज्ज़त भी घर में रह जायेगी और......'

अस्थियां और बैंक ड्राफ्ट आ पहुंचे हैं। बाहर बीजी का प्रलाप जारी है, दारजी दु:खी हैं। और अंदर कमरे में पम्मी अपनी सूजी आंखों से कलश को देश रही है।......उसने तीन लाख रुपये का ड्राफ्ट उठाया।......उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह उसके पति की देह की कीमत है या उसके साथ बिताये पांच महीनों की कीमत।

उसका पुत्र अभी भी जुकाम से बंद नाक से साँस लिये जा रहा है।

Monday, December 5, 2011

- बीबी


कान्ति प्रकाश त्यागी की मजाहिया कविता - बीबी

.

बीबी -डॉ. कान्ति प्रकाश त्यागी

एक आदमी ने रात में पड़ोसी का दरवाजा खटखटाया ,
पड़ोसी गहरी नींद से उठा, दरवाजा खोलते ही बड़बड़ाया
क्यों भई ?, क्या मुसीबत है जो इतनी रात में उठाया ,
भाई साहब संकट बहुत गहरा है, इसलिए आपको उठाया
क्षमा कीजिए आपको इस समय तकलीफ़ दी ,
आपको उठाकर, आपकी नींद हराम की


आप ही मेरे पड़ोसी हैं ,
सब से अच्छे हितैषी हैं ,
मेरी बीबी खिड़की में बैठी है ,
वह अपनी जिद की पक्की है
खिड़की में बैठी है, तो बैठी रहने दो ,
काम से थका हूं, मुझे तो सोने दो

.

.
भाई साहब, आप मेरी बात नहीं समझ रहे हैं ,
आप भी तो ठीक से, नहीं समझा रहे हैं
वह खिड़की से कूद कर आत्महत्या करना चाहती है ,
इस घटना के लिए, मुझे दोषी बनाना चाहती है


यह तो आपका व्यक्तिगत मामला है ,
आप ही को सब कुछ संभालना है
बीबी मेरी है अथवा तुम्हारी ,
यही है सब से बड़ी लाचारी


मैं पत्नीव्रता पति हूं, पति धर्म निभाना चाहता हूं ,
अग्नि समक्ष फेरों की याद निभाना चाहता हूं
फिर भी कहिये, मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूं ,
कैसे आपको, इस भारी संकट से बचा सकता हूं
साफ साफ बोलिए, आपको क्या चाहिए ,


बस आपकी जरा थोड़ी सी मदद चाहिए
वह बहुत देर से प्रयत्न कर रही है ,
उस से खिड़की नहीं खुल रही है
कृपया आप, खिड़की खोल दीजिये ,
इस पुण्य कार्य में उसकी मदद कीजिये

(चित्र - यशोदा एरन की तैलरंगों से बनी कलाकृति)


आगे पढ़ें: रचनाकार: कान्ति प्रकाश त्यागी की मजाहिया कविता - बीबी http://www.rachanakar.org/2006/11/blog-post.html#ixzz1fjYMayVf

पूज्य हुज़ूर का निर्देश

  कल 8-1-22 की शाम को खेतों के बाद जब Gracious Huzur, गाड़ी में बैठ कर performance statistics देख रहे थे, तो फरमाया कि maximum attendance सा...