Saturday, December 10, 2011

तेजेन्देर शर्मा-साहिर लुधियानवी एक रोमांटिक कारवां

 
        कथा यूके के कार्यक्रम में गूंजे उनके गीत
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साहिर लुधियानवी एक रोमांटिक कारवां

लंदन। 'साहिर लुधियानवी मूलतः एक रोमांटिक कवि थे। प्रेम में बार-बार मिली असफलता ने उनके व्यक्तित्व पर कुछ ऐसे निशान छोड़े जिसके नीचे उनके जीवन के अन्य दुःख दब कर रह गये। अपनी प्रेमिका की झुकी आखों के सामने बैठ साहिर उससे मासूम सवाल कर बैठते हैं- 'प्यार पर बस तो नहीं है मेरा लेकिन फिर भी, तू बता दे कि तुझे प्यार करूं या न करूं।' यह कहना था कथाकार एवं कथा यूके के अध्यक्ष तेजेन्द्र शर्मा का। अवसर था लंदन के नेहरू सेन्टर में एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स एवं कथा यूके के कार्यक्रम–साहिर लुधियानवी एक रोमांटिक क्रांतिकारी।
इससे पहले बीबीसी उर्दू सेवा के रज़ा अली आबिदी ने साहिर लुधियानवी (मूल नाम अब्दुल हैय) के बचपन, जवानी, साहित्यिक शायरी और फ़िल्मी नग़मों की चर्चा की। साहिर के मुंबई में बसने पर आबिदी ने कहा कि किसी शहर के रंग में रंग जाना बहुत सहज होता है मगर साहिर ने बम्बई को अपने रंग में रंग दिया। उन्होंने साहिर के गीत 'हम आप की ज़ुल्फ़ों में इस दिल को बसा दें तो?' (फ़िल्म–प्यासा) में 'तो' शब्द की अलग से व्याख्या करते हुए कहा कि उर्दू शायरी में इस शब्द का ऐसा प्रयोग कभी इससे पहले या बाद में नहीं किया गया।
तेजेन्द्र शर्मा ने चित्रकार मक़बूल फ़िदा हुसैन, फ़िल्मकार मुज्ज़फ़र अली, एवं संसद सदस्य वीरेंद्र शर्मा की उपस्थिति में अपने पॉवर पाइन्ट प्रेज़ेन्टेशन की शुरूआत फ़िल्म हम दोनों के भजन अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम से की। एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स की अध्यक्ष काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी ईद के त्योहार में व्यस्तता कारण कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सकीं मगर उन्होंने श्रोताओं के लिये ईद और गणेश चतुर्थी की बधाई का संदेश भेजा। साहिर की एक संपूर्ण रोमांटिक कवि की छवि स्थापित करने के लिये तेजेन्द्र शर्मा ने उनके जिन फ़िल्मी गीतों और ग़ज़लों को पर्दे पर दिखाया उनमें शामिल हैं फिर न कीजे मेरी गुस्ताख़ निगाही का गिला (फिर सुबह होगी-1958) तुम अगर मुझको न चाहो (दिल ही तो है-1963) जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा (ताजमहल-1961) चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों (गुमराह–1963) और तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक़ है तुमको (दीदी–1959) साहिर ने अपने एक ही गीत में गुस्ताख़ निगाही और यूं ही सी नज़र जैसे विशेषणों का इस्तेमाल कर फ़िल्मी गीतों को साहित्यिक स्तर प्रदान किया है।
यहां से शुरू हुआ साहिर का क्रांतिकारी रूप और इस रूप के लिये जिन गीतों का इस्तेमाल किया गया उनमें शामिल थे चीनो अरब हमारा (फिर सुबह होगी–1958) ये दुनियां अगर मिल भी जाए तो क्या है और जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहां है (प्यासा–1957) साहिर की विशेषता है कि वे सत्ता से सवाल भी करते हैं, हालात पर टिप्पणी भी करते हैं, और दुनियां को जला कर बदलने की बात भी करते हैं, तेजेन्द्र शर्मा ने आगे कहा कि साहिर ने फ़िल्मों में जो भी लिखा वो अन्य फ़िल्मी गीतकारों के लिये एक चुनौती बन कर खड़ा हो गया। उनका लिखा हर गीत जैसे मानक बन गए। उन्होंने फ़िल्मों में सर्वश्रेष्ठ कव्वाली न तो कारवां की तलाश है (बरसात की रात) सर्वश्रेष्ठ हास्य गीत सर जो तेरा चकराए (प्यासा) सर्वश्रेष्ठ देशप्रेम गीत ये देश है वीर जवानों का (नया दौर) सूफ़ी गीत लागा चुनरी में दाग़ छिपाऊं कैसे (दिल ही तो है) यहां तक कि शम्मी कपूर को नई छवि देने में भी साहिर का ही हाथ था जब उन्होंने तुमसा नहीं देखा के लिये गीत लिखा 'यूं तो हमने लाख हसीं देखे हैं' लिखा। कार्यक्रम में यह गीत भी दिखाया गया।
यादों के झरोखों में झांकते हुए तेजेन्द्र शर्मा ने साहिर के प्रेम प्रसंगों का ज़िक्र किया। ज़ाहिर तौर पर उसमें सुधा मल्होत्रा और अमृता प्रीतम के नाम शामिल थे। अमृता प्रीतम की एक स्मृति को तेजेन्द्र ने बहुत भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया। अमृता और साहिर दोनों मॉस्को गये थे जहां साहिर को सोवियत लैण्ड पुरस्कार मिलना था। वहां एक अफ़सर की ग़लतफ़हमी से दोनों के नाम के बिल्ले बदल गये। साहिर ने अमृता से बिल्ले वापिस बदलने के लिये कहा। मगर अमृता ने कहा कि वह बिल्ला वापिस नहीं करेगी, इस तरह साहिर अमृता के दिल के क़रीब रहेगा। भारत वापिस आने पर साहिर की चन्द दिनों में ही मृत्यु हो गई। अमृता ये सोच कर रोती रही कि दरअसल मौत उसकी अपनी आई थी, मगर उसके नाम का बिल्ला साहिर के सीने पर था। इसलिये मौत ग़लती से साहिर को ले गई।
तेजेन्द्र शर्मा का साहिर की भाषा पर टिप्पणी करते हुए कहना था कि किसी भी बड़े कवि या शायर की लिखी वही शायरी ज़िन्दा रही है जो आम आदमी तक प्रेषित हो पाई है। ग़ालिब की भी वही शायरी प्रसिद्ध हुई जो की सरल भाषा में लिखी गई। संप्रेषण किसी भी साहित्य की मुख्य विशिष्टता है। साहिर ने भी अपनी साहित्यिक रचनाओं की भाषा को फ़िल्मों के लिये सरल और संप्रेषणीय बनाया। इसीलिये उसकी वो रचनाएं अमर हो पाईं। इसका सबसे ख़ूबसूरत उदाहरण है जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहां हैं (प्यासा) जो कि साहित्यक रूप में कलिष्ट उर्दू भाषा में लिखी गई है। जबकि फ़िल्म के लिये उसे सरल भाषा में दोबारा लिखा गया। कबीर, तुलसी, मीरा, सूरदास, ग़ालिब, मीर और फ़ैज़ की तरह साहिर की शायरी भी आम आदमी को नये-नये मुहावरे दे जाती है। साहिर, शैलेन्द्र और शकील अपने समय के फ़िल्मी गीतों की ऐसी त्रिमूर्ति थे जिन्होंने फ़िल्मी मुहावरे में उत्कृष्ठ साहित्य की रचना की।
अपने प्रेज़ेन्टेशन में उन्होंने साहिर की शराब की रोज़ाना होने वाली पार्टियों का ज़िक्र किया और संगीतकार से एक रूपया अधिक पारिश्रमिक लेने की उनकी ज़िद के बारे में बताया। साहिर ने ही ऑल इण्डिया रेडियो में गीतकार का नाम शामिल करने की परम्परा शुरू करवाई। मुंबई के जुहू इलाक़े के जिस क़ब्रिस्तान में साहिर को दफ़न किया गया था वहीं मुहम्मद रफ़ी, मधुबाला, नौशाद, तलत महमूद, नसीम बानो, ख़्वाज़ा अहमद अब्बास, जॉ निसार अख़्तर और सरदार जाफ़री जैसी हस्तियां भी दफ़नाई गई थीं, मगर हाल ही में क़ब्रिस्तान को चलाने वाले बोर्ड ने बिना किसी को बताए इन क़ब्रों पर लगे क़ुतबे और छोटे-छोटे मक़बरे तोड़ दिये और ज़मीन को समतल कर दिया। वहां मिट्टी डाल कर नई क़ब्रों के लिये जगह बनाई गई है। उनका कहना है कि इस्लाम में मक़बरे बनाने की इजाज़त नहीं है। यह उस देश में हुआ जिस देश की एक पहचान एक मक़बरा भी है। पूरी दुनियां के लोग उसे ताजमहल कहते हैं और उसको देखने भारत आते हैं। शायद इसीलिये साहिर ने अपने जीवन में ताजमहल के बारे में कहा था, 'इक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर, हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक, मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझ को।'
कार्यक्रम की शुरूआत में नेहरू केन्द्र की निदेशक मोनिका मोहता ने अतिथियों का स्वागत किया। तेजेन्द्र शर्मा ने कथाकार महेन्द्र दवेसर, ग़ज़लकार प्राण शर्मा एवं जमशेदपुर की विजय शर्मा को धन्यवाद दिया जिन्होंने इस कार्यक्रम की तैयारी में कुछ सामग्री भेजी। अन्य लोगों के अतिरिक्त नसरीन मुन्नी कबीर, प्रोफेसर अमीन मुग़ल, ग़ज़ल गायक सुरेन्द्र कुमार, शिक्षाविद अरुणा अजितसरी, दिव्या माथुर एवं उच्चायोग के जितेन्द्र कुमार भी शामिल थे।


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