Sunday, September 11, 2011

नाकामियों और खींचातानी में बीता साल…….

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हिमकर श्याम
अर्जुन मुंडा सरकार के एक साल पूरे हो गये। मुंडा सरकार का यह कार्यकाल नाकामियों और आपसी खींचातानी की कहानी बयान करता है। तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद अर्जुन मुंडा का ज्यादातर समय सहयोगी दलों को एकजुट रखने में बीता। सरकार पर समर्थन वापसी का खतरा लगातार बना रहा। अर्जुन मुंडा इस खतरे से बाहर नहीं निकल पाये हैं। यह सरकार कितने दिनों तक चलेगी इस पर आज भी सवालिया निशान लगा हुआ है। कोई सरकार तभी अच्छी होती है जब उसे चलानेवाले लोग अच्छे हों। झारखंड की सरकार अवसरवादियों की जमात है। झारखंड के नेताओं का मूल्यों और मुद्दों से कोई वास्ता नहीं है। यहां राजनीति के नाम पर षडयंत्र, कुचक्र और तिकड़मबाजी होती रही है।
सरकार के मुख्य घटक दल झामुमो, आजसू और भाजपा में भरोसे की कमी साफ झलकती है। आजसू-झामुमो के कई विधायक सरकार से नाराज हैं। सरकार को अपना समर्थन देने की एवज में आजसू, झामुमो और निर्दलीय विधायक बोर्डों और निगमों में अपना हिस्सा चाहते हैं। बोर्ड निगम के बंटवारे को लेकर शिबू सोरेन की पुत्रवधू सीता सोरेन ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। मानसून सत्र में भी यह प्रेशर पॉलिटिक्स देखने को मिली। मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा झारखंड विधानसभा में जिस समय प्रश्न काल का सामना कर रहे थे उस समय सत्तारूढ़ गठबंधन के चार विधायक सदन से बाहर अपनी नाराजगी व्यक्त कर रहे थे। दरअसल सत्ता की इसी बेचैनी ने इन विधायकों को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर वैकल्पिक सरकार के गठन के लिए मजबूर किया था। झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन भी सरकार को परेशानी में डालने का कोई मौका नहीं चूकते। कई मौकों पर वह सरकार के खिलाफ आग उगलते रहे हैं। झामुमो ने 28-28 महीने की सरकार चलाने की बात कहकर मुंडा की नींद हराम कर दी है।
किसी भी सरकार के लिए एक साल का समय ज्यादा नहीं होता है लेकिन झारखंड की फिसलन भरी राजनीति के लिए एक साल एक लंबे अरसे की तरह है। अनिश्चितता और अस्थिरता के बीच कई योजनाओं को सरजमीं पर उतारने की कोशिश भी की गयी। कई मामलों में सरकार की किरकिरी भी हुई। सरकार पूरे साल मंत्री और अफसरों के विवादों में उलझी रही। कहीं भी सरकार का नियंत्रण नजर नहीं आया। विकास योजनाएं कागजों पर ही सिमटी रहीं। वित्तीय कुप्रबंधन पूर्वत कायम रहा। लूट का खेल पहले की तरह ही जारी रहा। नक्शा घोटाला और मेधा घोटाले में सरकार की खूब फजीहत हुई। राज्य का अधिकांश हिस्सा नक्सली हिंसा के चपेट में है। नक्सलवाद पर काबू पाने में सरकार पूरी तरफ विफल रही। अतिक्रमण हटाओ अभियान सरकार के लिए सिरदर्द साबित हुआ। सरकार ने ने ढेरो बड़ी-बड़ी घोषणाएं की थीं लेकिन नतीजा ठन-ठन गोपाल रहा। इस दौरान बेराजगारों का सपना साकार होता नहीं दिखा जबकि सूबे का बागडोर संभालने के बाद मुंडा ने तीन माह के भीतर खाली पदों को भरने का ऐलान किया था।
एक वर्ष के दौरान सरकार के हिस्से कुछ उपलब्धियां भी आयीं। पंचायत चुनाव और राष्ट्रीय खेल के बाद खरसावां का चुनाव मौजूदा सरकार की बड़ी उपलब्धि साबित हुई। गत एक साल में राज्य ने दो उप चुनाव का स्वाद चखा। खरसावां सीट पर मुंडा ने जीत दर्ज कर सीएम की कुर्सी को बरकरार रखा। वहीं उनके द्वारा खाली की गयी जमशेदपुर लोकसभा सीट भाजपा को गंवानी पड़ी। भाजपा को इस परिणाम से तगड़ा झटका लगा है। यह सीट सीएम और पार्टी दोनों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल था। हार के बाद अर्जुन मुंडा के खिलाफ आवाज उठे। पार्टी के कई नेताओं का मानना था कि अर्जुन मुंडा की कार्यशैली की वजह से पार्टी को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। पार्टी से नाराज संजय सेठ और डा. दिनेश षाड़ंगी ने भाजपा को छोड़ झाविमो का दामन थाम लिया।
यह विडम्बना है कि झारखण्ड में आम आदमी की बात, विकास की बात, रोजी-रोटी और सड़क की बात कोई नहीं करता। यहां राजनीति जनकल्याण का माध्यम न होकर अर्थ साधना एवं भोग का माध्यम है। राजनीति का इस कदर निष्क्रिय, निष्प्रभावी और निस्तेज हो जाना निराशाजनक है। मुंडा की यह तीसरी पारी है। अब तक एक बार भी वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाये हैं। इस बार उन्हें जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरना होगा। विकास के साथ-साथ राजनीतिक अस्थिरता पर भी ध्यान देना होगा। हालांकि कागजों पर वह बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नक्शे कदम पर चलते हुए राज्य में सुशासन लाने की मुहिम में जुटे दिखाई देते हैं। राज्य में राइट टू सर्विस एक्ट लाकर भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की कवायद भी की जा रही है लेकिन जब तक यह सब हकीकत में नहीं बदलता तब तक कोई उम्मीद बेमानी है।

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