Thursday, September 22, 2011

अल्‍लाह के इश्‍क में दीवानी संत राबिया


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वह संत तो महान दार्शनिक और प्रचारक थे। लेकिन एक महिला के सामने अपने होने को साबित करना अचानक उनके जेहन में उतर आया। महिला के सामने खुद का बड़प्‍पन साबित करने के लिए वे बोले :- चलो, ऐसा करते हैं कि नदी पर अपनी चटाई बिछाकर ईश्‍वर की आराधना की जाए। महिला ने इस संत की बात को ताड़ लिया। तपाक से जवाब दिया :- नहीं, हम लोग अपनी चादर को हवा में बिछाकर ईश्‍वर की उपासना करें तो बेहतर होगा। संत स्‍तब्‍ध। यह कैसे हो सकता है :- सवाल उछला। महिला ने जवाब दिया :- पानी में तो यह काम मछली का है, जबकि हवा में करामात तो मक्‍खी दिखाती है। ऐसी बाजीगरी वाले काम में क्‍या दम। असली काम तो ईश्‍वर की उपासना है और यही असली काम इन जादुई करामातों के करने के अहंकार से लाखों दर्जा ऊपर है। कहने की जरूरत नहीं कि संत का सिर शर्म से झुक गया।
ईश्‍वर से प्रेम और उस पर अगाध श्रद्धा केवल हिन्‍दुस्‍तान की मीरा बाई और बाई परमेश्‍वरी सिद्धा तक ही सीमित नहीं है। इस्‍लाम में भी मीरा और परमेश्‍वरी जैसी सिद्ध महिलाएं हुईं हैं, जिन्‍होंने अपने अकेले दम पर पूरी इंसानियत और उसकी रूहानियत को एक नया अंदाज और आयाम दिया। इस म‍हिला का नाम था राबिया। प्रेम और विश्‍वास की जीती-जागती और हमेशा के लिए अमर हो चुकी राबिया। इतने गरीब परिवार में जन्‍मी थीं राबिया कि उनकी नाभि पर तेल लगाने तक के लिए जुगाड़ नहीं था। कुछ बड़ी हुईं तो माता-पिता का साया उठ गया। कुछ ही दिन बाद गुलाम बना ली गयीं। क्‍या-क्‍या जहर नहीं पीना पड़ा लेकिन अल्‍लाह के प्रति मोहब्‍बत लगातार बढ़ती ही रही। अपने मालिक के घर का सारा काम निपटाने के बाद अपने कमरे में वे अल्‍लाह की याद में रोती रहती थीं।
मालिक ने एक दिन सुना कि राबिया नमाज में रो-रोकर कह रही थीं :- मैं तो तुम्‍हारी गुलाम हूं, मगर या अल्‍लाह, तूने तो मुझे किसी और की मिल्कियत बना डाला। मालिक पर घड़ों पानी पड़ गया और इस तरह राबिया रिहा हो गयीं। लेकिन केवल मालिक की कैद से, अल्‍लाह के लिए तो वे पहले की ही तरह गुलाम बनी रहीं।  बियावान जंगल मे रह कर तपस्‍या करती रहीं। आसपास खूंखार जंगली जानवर और परिंदे उनकी हिफाजत करते थे। कहा तो यहां तक जाता है कि एक दिन बुजुर्ग संत इब्राहीम बिन अदहम चौदह साल की यात्रा कर रक्अत करते हुए काबा पहुंचे तो काबा दिखायी ही न पड़ा। कहते हैं कि अल्‍लाह ने खुद ही काबा को राबिया के इस्‍तकबाल के लिए रवाना कर दिया था। हालांकि बाद में अल्‍लाह के इस अहसान का बदला चुकाने के लिए राबिया ने केवल लेटते हुए काबा की यात्रा सात साल में पूरी की।
हां, इस बीच शायद उन्‍हें कुछ घमंड हो गया, सो अल्‍लाह से सिजदे में बोल पड़ी :- मैं तो मुट्ठी भर खाक हूं और काबा सिर्फ पत्‍थर का मकान ही है। यह सब करने की क्‍या जरूरत है अल्‍लाह। मुझे खुद में समा ले। लेकिन अचानक ही उन्‍हें इस बात का अहसास हो गया कि अगर इस तरह अल्‍लाह ने उनकी बात मान ली तो गजब हो जाएगा। अल्‍लाह का जलाल जाहिर हुआ, तो कहर हो जाएगा और उसका सारा पाप उनके कर्मों पर हावी हो जाएगा। सो अपने स्‍वार्थ को त्‍याग कर वे फौरन चैतन्‍य हुईं और वापस बसरा लौट आयीं। खुदा की इबादत के लिए।
किंवदंतियों के मुताबिक एक बार बसरा के ही एक प्रश्‍यात संत हसन बसरी उनसे मिलने पहुंचे तो वे जंगली जानवरों और परिंदों के साथ घूम रही थीं। हसन को आता देखकर जानवर और परिंदे घबरा कर उधर-उधर भागने लगे। हसन चौंक उठे। पूछा तो राबिया ने सवाल उछाला :- आपने आज क्‍या खाया। गोश्‍त :- हसन का जवाब था। राबिया बोलीं :- जब आप उन्‍हें खा जाते हैं, तभी तो वे आपको देखकर घबराते हैं। सच्‍चे इंसान उन्‍हें कैसे खा सकते हैं जो उनके दोस्‍त हों। यह सब मेरे दोस्‍त ही तो हैं। जाहिर है कि राबिया गोश्‍त नहीं खाती थीं।
राबिया को लेकर खूब कहानियां हैं। मसलन, एक बार सपने में हजरत मोहम्‍मद ने राबिया से पूछा :- राबिया, तुम मुझसे दोस्‍ती रखती हो। ऐ रसूल अल्‍लाह। ऐसा कौन है जो आपसे दोस्‍ती न रखना चाहता हो। लेकिन खुदा का मुझ पर इस कदर प्रेम है कि उनके सिवा मुझे किसी से दोस्‍ती करने की फुरसत ही नहीं मिलती है। ईश्‍वर तो उनसे ही मोहब्‍बत और दोस्‍ती करता है जो उससे मोहब्‍बत और दोस्‍ती करते हैं। और मेरे दिल में ईश्‍वर के अलावा कभी कुछ आ ही नहीं सकता। शैतान से नफरत के सवाल पर भी राबिया एक बार बोली थीं :- पहले खुदा की इबादत से तो मैं निजात पा जाऊं, जो कि मुमकिन ही नहीं। फिर किसी से दोस्‍ती या दुश्‍मनी की बात का कोई सवाल ही नहीं।
बुरे कामों पर पश्‍चाताप यानी तौबा करने के सवाल पर राबिया का कहना था कि ईश्‍वर तब तक पश्‍चाताप की इजाजत नहीं देता, तब तक कोई भी अपराधी पश्‍चाताप कर ही नहीं सकता। और जब इसकी इजाजत मिलती है तो तौबा कुबूल होती ही है। यानी, गुनाहों से तौबा करने के लिए आंतरिक यानी दिल से ताकत जुटानी पड़ती है, जुबानी तौबा तो हराम है जो कैसे कुबूल किया जा सकता है। अल्‍लाह की राह पर पैदल नहीं, दिल और उपासना से ही चला जा सकता है।
राबिया ने तो मर्द शब्‍द की अनोखी ही व्‍याख्‍या कर दी। एक सवाल पर बोलीं :- अगर संतोष रखना मर्द होता तो बाकायदा करीम बन गया होता। संतोष से बढ़कर कुछ नहीं। जो संतोष रख सकता है, वही मर्द है। जिसे संतोष है, वही मर्द है और वह ही ज्ञानी भी। ऐसा इंसान ईश्‍वर से अपना ईमान और आत्‍मा साफ-सुधरी और पवित्र ही चाहता है और फिर उसे ईश्‍वर को ही सौंप देता है। इस तरह वह हर हाल में दुनिया के नशे से हमेशा के लिए दूर हो जाता है और अल्‍लाह में समाहित होता है। भारी सिरदर्द से तड़पते हुए माथे पर पट्टी बांधे एक शख्‍स जब उनके पास राहत के लिए आया, तो उन्‍होंने उसे जमकर डांटा। बोली कि तीस साल तक जब उसने तुमको स्‍वस्‍थ रखा, तब तो तुमने शुक्राने में एक बार भी सिर पर पट्टी नहीं बांधी, और आज जरा सा दर्द उठा तो लगे तमाशा करने। इसे भी अल्‍लाह की नेमत मान मूर्ख।
अपने अंतिम वक्‍त में आठ दिनों तक खाना ही न खाया, पानी भी नहीं। आखिरी दिन सबको हटा कर दरवाजा बंद कर लिया। भीतर से आती राबिया की आवाज सुनी गयी :- चल मेरी निर्दोष आत्‍मा, चल अल्‍लाह के पास चल। काफी देर बाद लोगों ने देखा कि राबिया ईश्‍वर यानी ब्रह्म में विलीन हो चुकी हैं। राबिया कहा करती थीं कि अल्‍लाह अपने दुश्‍मनों को दोजख में रखे और अपने उपासकों को बहिश्‍त में। मुझे इन दोंनों में से कुछ भी न चाहिए। मैं तो बस उसके ही करीब रहना चाहती हूं, जिसे जिन्‍दगी भर मोहब्‍बत करती रही। एक किंवदंती यह भी है कि उन्‍हें लेने आये मुन्‍कर और नकीर नाम फरिश्‍तों ने जब उनसे पूछा कि तेरा रब कौन है, तो राबिया ने उन्‍हें जमकर लताड़ा। साथ में अल्‍लाह को भी। बोलीं :- जब अल्‍लाह ने मुझे कभी नहीं भुलाया तो मैं, जिसे दुनिया से कोई वास्‍ता कभी न रहा, उसे कैसे भूल सकती थी। फिर वह अल्‍लाह यह सवाल फरिश्‍तों के जरिये मुझसे क्‍यों पुछवा रहा है।

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