Monday, October 16, 2023

संत मत की परम्परा और राधास्वामी संत मत / उदय वर्मा


 भारत मेंअनादि काल से संत मत की परंपरा की अविच्छिन्न धारा प्रवाहित होती रही है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि अपने अध्यात्मिक साधना के सफर में सद्गुरुओं और संतों ने हर स्तर पर  भारतीय चेतना की  प्रगति को शिखरचुम्बी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। राधास्वामी भी एक ऐसा ही पंथ है, जिसके गुरु महाराजों ने अपने अनुनायियों को आत्म कल्याण और परमार्थ के मार्ग पर चलने  के लिए प्रेरित किया ।

     राधास्वामी पंथ में भक्ति का मूल स्वर प्रेम भक्ति ही है , जिसका स्थायी संदेश मानव कल्याण की सर्वोच्च संभावनाओं की तलाश है। इस मत के पथिकों में गुरु महाराज के प्रति जो प्रेम की पराकाष्ठा मिलती है, वह दास्य भाव की भक्ति से गुम्फित हो कर अपने चरम पर पहुंचती है और भक्त खुद को गुरु चरणों में अर्पित कर धन्य हो जाते हैं। नदियां समुद्र में मिल कर पूर्ण होती हैं और अपना अस्तित्व मिटा कर समुद्र बन जाती हैं, यानी मुक्ति  पाती है, वैसे ही गुरु चरणों में समर्पित भक्त अपना कर्म पूरा करने के उपरांत अंततः गुरु में विलीन हो कर मुक्ति प्राप्त करते हैं राधास्वामी लोक में स्थान पाते हैं।


   वास्तव में राधास्वामी मत के गुरुओं  का पूरा अभियान मानव मुक्ति की साधना की प्रेम-कथा है। राधास्वामी आध्यात्मिक आन्दोलन जीवधारियों को उसकी सहज रागदीप्त चेतना से जोड़ कर एक ऐसे समाज की रचना का पक्षधर है, जिसमें आध्यात्मिक,नैतिक और आत्मिक उत्थान के सारे साधन सहज सुलभ हो। इस अर्थ में राधास्वामी आन्दोलन एक ऐसा पंथ है जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला मार्ग खोलता है। 

  राधास्वामी पंथ की स्थापना १८६१ में श्री सेठ शिव दयाल सिंह महाराज ने की थी। चूंकि सेठ शिव दयाल सिंह महाराज जी की पत्नी का नाम राधा था, इसलिए उन्हें राधास्वामी भी कहा जाता था, यही कारण है कि उनके द्वारा स्थापित पंथ का नाम राधास्वामी पड़ा। जिस दिन राधास्वामी मत आमजनों के बीच अवतरित हुआ था, वह दिन विद्या और ज्ञान की देवी की आराधना का दिन था। महाराज जी ने अपने पंथ की स्थापना के लिए वसंत पंचमी के पावन दिन को ही क्यों चुना, इस विषय में उन्होंने कभी कुछ नहीं कहा।  लेकिन हमें यह कहना पड़ेगा कि राधास्वामी मत गुह्य धार्मिक मत है और इस मत का अनुयायी कोई भी हो सकता है। इस पंथ के अनुसार जीवधारी अपनी उच्चतम क्षमताओं को सिर्फ शब्द नाम जप द्वारा प्रकट कर सकते हैं। राधास्वामी मत के अनुसार पहले सतपुरूष निराकार था, फिर उसने आकार ग्रहण किया। इससे पहले कोई रचना नहीं हुई थी, कुछ था तो शून्य था, बाद में शब्द प्रकट हुआ , फिर रचना शुरू हुई। पहले सतलोक,  फिर सत् पुरूष की कला से तीनों लोकों का विस्तार हुआ। राधास्वामी पंथ के अनुसार  इन तीनों लोकों से ऊपर राधास्वामी लोक है। हालांकि इस स्थापना से सनातन की मान्यता अलग है। 

  राधास्वामी पंथ में नाम और सत्संग यानी सच्चे लोगों की सभा का विशेष महत्व है। इस पंथ में भक्त नाम भक्ति और सत्संग के माध्यम से एक ऐसी दुनिया रचते हैं, जिसमें न कोई बड़ा होता है न छोटा, न कोई अमीर होता है न गरीब, न कोई ऊंच होता है न नीच। सब बराबर होते है। हुजूर के दरवार में आ कर सभी नाकारात्मक भावनाएं नष्ट हो जाती हैं और सब हजूर के हो जाते हैं और हजूर सब के। इस मरहले पर यह कहा जा सकता है कि राधास्वामी मत सामाजिक समरसता का पंथ है, जिसका उद्देश्य  कर्मकांडी उलझनों में उलझे बिना सत्संग के माध्यम से पंथियों को सत् का साक्षात्कार कराना है और समरस समाजिक चेतना का विकास करना है।

   राधास्वामीपंथी सत्संग के माध्यम से आत्म शुद्धि के साथ हजूर के शरणागत होते हैं और अपना भूत, भविष्य, यहां तक कि अपना सब कुछ मालिक पर छोड़ देते हैं। राधास्वामी पंथियों की मालिक के प्रति यह समर्पण-भक्ति की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या है।

  राधास्वामी मत के संस्थापक शिवदयाल साहब के राधास्वामी लोक गमन के बात राधास्वामी सम्प्रदाय वस्तुत:  दो शाखाओं में विभाजित हो गया। मुख्य शाखा तो आगरा में ही रही ,जबकि दूसरी शाखा अमृतसर में व्यास नदी के तट पर स्थापित की गयी, जिसे व्यास की राधास्वामी शाखा के रूप में जाना जाता है। इन दोनों शाखाओं के अनुयायी भारत में बड़ी संख्या में तो हैं ही, विश्व के अनेकानेक देशों में भी इनका विस्तार मिलता है। यह राधास्वामी पंथ के बढ़ते महत्व को दर्शाता है।


 - उदय वर्मा

Sunday, October 15, 2023

*🌻ईश्वर सब देख रहा है !!🌻*

 प्रस्तुति : उषा रानी / राजेंद्र प्रसाद सिन्हा


*एक राजा था. वह राजा समय-समय पर वेश बदलकर अपने नगर का सर्वेक्षण करता रहता था. ताकि देख सके सभी कर्मचारी अपना कार्य नियमानुसार कर रहे हैं या नहीं ? क्या प्रजा उसके कार्य से संतुष्ट है या नहीं।एक बार राजा वेश बदल कर अपने प्रधानमंत्री के साथ निरिक्षण पर निकले. बाजार में उन्होंने ने देखा कि एक व्यक्ति का शव पड़ा था .राजा ने आसपास के दुकानदारों कहा कि इस मृत व्यक्ति को उसके घर पहुँचा दो.*


*सब लोग कहने लगे कि बुरा आदमी था इसका शव यही पड़ा रहने दो. इसके घर वाले आकर स्वयं ले जाएगे.कोई भी दुकानदार उसके बारे में बात तक नहीं करना चाहता था. राजा बहुत हैरान कि इस व्यक्ति ने ऐसे क्या कर्म किए हैं जो मृत्यु के बाद इसको कोई कंधा देने तक को भी सहमत नहीं है.*


*राजा  को किसी दुकानदार ने बताया कि यह व्यक्ति पाप कर्म करता था . बहुत शराब पीता था और वेश्या के पास भी जाता था. इसलिए कोई भी इसके शव को हाथ लगाने को तैयार नहीं है.*


*राजा को लगा कि चाहे वो जैसे भी कर्म करता हो लेकिन उसके राज्य में किसी के भी शव का ऐसा तिरस्कार नहीं होना चाहिए. राजा ने दुकानदार से उसके घर का पता पूछा. अब राजा और प्रधानमंत्री स्वयं शव अपने कंधों पर उठा कर उसके घर पहुँचे.*


*राजा ने उसकी पत्नी को पूछा -  कि कोई भी आपके पति के शव को उठाने को तैयार क्यों नहीं था ? *उस व्यक्ति की पत्नी ने कहा-कि मेरे पति बहुत ही नेक कर्म करते थे। अब राजा हैरान कि वहाँ बाजार में तो हर कोई कह रहा था कि यह पाप कर्म करता था शराब पीता वेश्या के पास जाता था. फिर इसकी पत्नी इसके कर्मों को नेक कर्म क्यों कह रही है ?* 


*उसकी पत्नी ने बताया कि जब भी उसके पति के पास पैसे इकट्ठे होते वह शराब की दुकान पर जाता और शराब खरीद कर घर आकर नाली में बहा देता ताकि किसी और का घर बर्बाद होने से बच जाए. इसी तरह वेश्या के पास जाते और उसे पैसे देकर कहते कि तुम्हें आज के पैसे मिल गए. अब तुम अपने घर का दरवाजा बंद कर लो. ताकि किसी और के पैसे बच जाए और वह पैसे अपने बीबी बच्चों पर लगाए या फिर क्या पता वह यह पैसे किसी शुभ काम में लगा दे ?*


*उस व्यक्ति की पत्नी ने कहा कि मेरे पति के शराब के ठेके और वेश्या के पास जाने के कारण लोगों ने उनसे दूरी बना ली थी. क्योंकि कोई भी उनके नेक इरादे के बारे में नहीं जानते था? मैं उनको कहती थी कि आप की इतनी बदनामी हो चुकी है कोई भी आप को कंधा देने नहीं आएगा. लेकिन मेरे पति का मानना था - *कि शुभ कर्म लोगों को दिखाने के लिए नहीं करने चाहिए.ईश्वर हमारे अच्छे बुरे कर्म फल का हिसाब रखता है.इसलिए अच्छे कर्म करने चाहिए और उसका फल ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए क्योंकि ईश्वर सब देख रहा है, मुझे ईश्वर पर विश्वास है. मेरे पति मजाक में कहते थे कि तुम देखना मेरी शव स्वयं राजा और उनके मंत्री लाएंगे. राजा यह सब सुनकर अवाक रह गया.*


*राजा ने उस व्यक्ति की पत्नी से कहा कि चाहे आप के पति मजाक में ही कहते थे कि देखना मेरा शव राजा और मंत्री उठाएंगे. लेकिन वो बात शत् प्रतिशत सच है. क्योंकि मैं यहाँ का राजा हूँ और यह मेरा मंत्री हैं. राजा ने बड़े सम्मान के साथ उस व्यक्ति का दाह संस्कार करवाया और उसके अच्छे कर्मों की सच्चाई से सबको रूबरू करवाया.*


*यह सत्य कथन है कि हमें शुभ कर्म दिखावे के लिए नही करने चाहिए . क्योंकि हमारे कर्मों का लेखा जोखा ईश्वर रखता है हमे देखने सुनने वाले नहीं. किसी को डर होता है कि ईश्वर देख रहा है, किसी को विश्वास है ईश्वर तो देख ही रहा है. इसलिए अच्छे कर्म करते रहे*


*" सिर्फ़ नाम लेने‌‌ से‌ ही कोई सत्संगी नहीं बन जाता, सत्संगी को अपना सारा जीवन संतमत के अनुसार ढालना पड़ता है। उसका हर एक विचार,वचन और कर्म सन्तमत के उसूलों के अनुसार होने चाहिए। कथनी से करनी ज़्यादा ज़रूरी है। विचारों की शक्ति तो‌ और भी अधिक है। सत्संगी का रोज का जीवन और रहन सहन साफ़ सुथरा और ऊंचे दर्जे का होना चाहिए। उसकी रहनी-सहनी से यह ज़ाहिर होना चाहिए कि वह एक पूरे सत्गुरु का शिष्य है। "*


*सहज मार्ग -*


*जीवन में सब कुछ एक निवेश की तरह ही होता है।* *दान,प्रेम,समय,साथ,खुशी, सम्मान और अपमान,जितना - जितना हम दूसरों को देते जायेंगे,समय आने पर एक दिन वह ब्याज सहित हमें अवश्य वापस मिलने वाला है।कभी दुख के क्षणों में अपने को अलग-थलग पाओ तो एक बार आत्मनिरीक्षण अवश्य कर लेना कि क्या जब मेरे अपनों को अथवा समाज को मेरी जरूफलरत थी तो मैं उन्हें अपना समय दे पाया था..? क्या किसी के दुख में मैं कभी सहभागी बन पाया था..? आपको अपने प्रति दूसरों के उदासीन व्यवहार का कारण स्वयं स्पष्ट हो जायेगा।* 


*क्या आपकी उपस्थिति कभी किसी के अकेलेपन को दूर करने का कारण बन पाई थी अथवा नहीं...? आपको अपने एकाकी जी

वन का कारण स्वयं समझ आ जायेगा। देवी द्रौपदी ने वासुदेव श्रीकृष्ण को एक बार एक छोटे से चीर का दान किया था और आवश्यकता पड़ने पर विधि द्वारा वही चीर देवी द्रौपदी को साड़ियों के भंडार के रूप में लौटाया गया। देर से सही मगर दिया हुआ अवश्य लौटकर आता है।*


*साधु और असाधु दोनों अक्सर रहते साथ-साथ।*

*अलग-अलग हैं गुण दोनों में एक दिवस तो एक है रात।*


*सन्त रहेगा फूल की भांति महकेगा महकायेगा।*

*दुष्ट हमेशा शूल की भांति घाव पे घाव लगायेगा।*


*सज्जन है इक अमृत जैसा देता जीवन दान है।*

*नर्क बना देता जीवन को दुर्जन ज़हर समान है।*


*🙏अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है।🙏*

Friday, October 13, 2023

माता शैलपुत्री की पूजा से शारदीय नवरात्र का शुभारंभ / विजय केसरी


(15 सितंबर, शारदीय नवरात्र के शुभारंभ पर विशेष)




भारत सहित विश्व  के जिन देशों में भारतीय मूल के लोग रहते हैं, सबों के लिए शारदीय नवरात्र का पर्व ढेर सारी खुशियां और संकल्पों के लेकर उपस्थित होता है । यह पर्व 15 सितंबर से प्रारंभ होने जा रहा है। आज माता शैलपुत्री की विशेष पूजा-अर्चना से शारदीय नवरात्र का   शुभारंभ होगा। माता दुर्गा दुर्गति नाशिनी है । माता

 कालनाशिनी है ।दुर्गा माता की आराधना से भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। समस्त प्राणियों की सुख दात्री देवी दुर्गा माता  की कृपा से उनके भक्तगण सदा आनंद में रहते हैं। माता के भक्त  दूसरे को भी आनंद प्रदान करते हैं।  नवरात्र का यह पर्व दशहरा के नाम से जनमानस में प्रसिद्ध है। ऐसी मान्यता है कि  माता नौ दिनों तक अपने भक्तों की भक्ति प्राप्त कर, भक्तों के सभी प्रकार के कष्ट हर कर माता दसवें दिन विदा होती हैं। संसार में जितने भी प्रकार के सुख, शांति, समृद्धि और वैभव विद्यमान हैं। यह सब कुछ माता की ही कृपा है। माता की आराधना से भक्तों को जन्म जन्म के पाप मुक्ति मिलती हैं। 

श्री देवी पुराण में ऐसा वर्णन है कि मां की भक्ति से यश, बल, धर्म ,आयु की वृद्धि होती है।  मोक्ष की भी प्राप्ति होती है। शारदीय नवरात्र पर्व का हमारे धर्म ग्रंथों में बहुत ही ऊंचा स्थान प्रदान किया गया है।  मां पुत्री रूप में हम सभी भक्तों के बीच उपस्थित होती हैं। हम सबों की भक्ति स्वीकार कर सुख, समृद्धि और शांति का आशीर्वाद देकर जाती हैं। साथ ही माता यह भी वादा कर जाती  हैं कि अगले साल मैं पुनः आऊंगी। अपने भक्तों के प्रति मां का यह स्नेह अद्भुत और बेमिसाल है।

नवरात्र पर्व का हमारे हिंदू धर्म ग्रंथों में बहुत ही महत्व है। आज दुनिया में जिस तरह की भी शक्तियां  विद्यमान है। सभी दुर्गा माता की ही तेज से उत्पन्न हुई । मां की कृपा के बिना कोई भी शक्ति गतिशील नहीं हो सकती है। नवरात्र में मां के नौ रूपों की पूजा की जाती है। प्रथम दिन शैलपुत्री माता। दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी माता। तीसरे दिन चंद्रघंटा माता। चौथे दिन कुष्मांडा माता। पांचवें दिन स्कंदमाता माता । छठे दिन कात्यानी माता। सातवें दिन कालरात्रि माता । आठवें दिन महागौरी माता और नवमी दिन सिद्धिदात्री माता की पूजा होती है। माता के हर रूपों का एक गौरवशाली इतिहास है, जो हमारी धार्मिक भावनाओं और श्रद्धा  को प्रतिष्ठित कर संदेश देती हैं। दुर्गा सप्तशती में यह बात दर्ज है कि पुत्र कुपुत्र हो सकता है। किंतु माता कभी भी कुमाता नहीं हो सकती है। इस छोटे से वाक्य में हिंदू दर्शन की बहुत बड़ी बात छुपी हुई है। इसलिए हमारी रीति - रिवाज और धर्म संस्कृति में प्रारंभ से ही माता का ख्याल रखने के लिए कहा गया है। यह पर्व हमें दूसरों की मदद करने, दूसरों की भलाई करने और विश्व बंधुत्व की सीख भी प्रदान करता है।

पाप और पुण्य दोनों मां के ही पुत्र हैं। दोनों को मां समान रूप से जन्म देती हैं। लेकिन एक अपने प्रारब्ध कर्म के कारण पाप में परिवर्तित होता और दूसरा पुण्य में। जब सृष्टि में पाप बढ़ जाते हैं। तब पुण्य जनों के उद्धार के लिए माता प्रकट होती है। नवरात्र का पर्व सत्य और असत्य पर आधारित है। असत्य कितना भी विशाल क्यों ना हो जाए ?  वह कालजयी नहीं हो सकता है। उसे एक न एक दिन सत्य के हाथों पराजित होना ही होता है। नवरात्र का पर्व हम सबों को सत्य के साथ खड़े  होने की सिख प्रदान करता है। यह पर्व असत्य पर सत्य की विजय के रूप में भी मनाया जाता है। यह पर्व सिर्फ भारत देश तक ही सीमित नहीं है। हिंदू धर्म को मानने वाले विश्व भर में जहां-जहां भी  हैं, सभी नवरात्र व दशहरा का पर्व बड़े ही धूमधाम के साथ मनाते हैं। देश में प्रचलित सभी पर्वों के बीच नवरात्र पर्व का एक विशेष स्थान और महत्व है। इसे सब लोग बड़े ही धूमधाम के साथ और मिलजुल कर मनाते हैं। यह पर्व हम सबों को एक साथ मिलकर रहने की भी सीख प्रदान करता है। देवी पुराण में वर्णन है कि जब पृथ्वी पर आसुरी शक्तियां बहुत ही प्रबल हो गई थीं। आसुरी शक्तियों के अत्याचार से देवगण भयाक्रांत हो गए थे। आसुरी शक्तियों के वर्चस्व इतने बढ़ गए थे कि देवगण के सिंहासन भी आसुरी शक्तियों के अधीन हो गए थे। आसुरी शक्तियों से बचने के लिए सभी देवताओं ने मिलकर माता दुर्गा की आराधना की थीं। एक कथा के अनुसार भगवान विष्णु, भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा जी के तेज से आदि शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा अवतरित हुई थीं। आसुरी शक्तियों के प्रतीक महिषासुर अपने अहंकार में इतना चूर हो गया था कि वह जिनसे शक्तियां प्राप्त किया था , उसी को ही चुनौती देने लगा  था । महिषासुर की आसुरी शक्तियों के अत्याचार से चंहुओर त्राहिमाम त्राहिमाम होने लगा था। माता के अवतरण के साथ ही सबसे पहले माता अपने भक्तों की भक्ति स्वीकार की थीं। तत्पश्चात देवगणों  को महिषासुर के अत्याचार से मुक्त करने के लिए सीधे रण भूमि में कूद पड़ी देवी  थी। देवी पुराण में जिस तरह रणभूमि की विभीषिका का वर्णन किया गया है। महिषासुर और माता दुर्गा के  युद्ध के समान ना कभी भूतकाल  में ऐसा हुआ था और ना भविष्य में होगा।  इस युद्ध  में संपूर्ण ब्रह्मांड  हिल गया था । आकाश से बादल टूटकर गिरने लगे थे। हवा की तरह पर्वत इधर से उधर बह रहे थे ।आकाश से सिर्फ और सिर्फ आग ही बरीस हो रही थी। युद्ध सत्य और असत्य के बीच चल रही थी। आसुरी शक्ति महिषासुर ने विभिन्न रूपों में भेष बदलकर माता को पराजित करने का संपूर्ण कोशिश किया था। लेकिन उस अहंकारी महिषासुर को यह पता ही नहीं  था कि उसके पास जो भी शक्तियां विराजमान थीं। सभी  मां की कृपा से ही प्राप्त हुई थी।  महिषासुर की शक्तियां, मां की तेज का एक अंश भी नहीं था। उसे इस अंश पर इतना गुमान था। मां उन्हें अपनी पूर्ण शक्ति को प्रदर्शित करने का अवसर दे रही थीं। माता ने उसे अपनी गलती स्वीकार करने का भी अवसर पर अवसर प्रदान करती चली जा रही थीं।  इसके बावजूद महिषासुर को अपने अहंकार का भान ही नहीं हो रहा था। अंततः मां अपने विराट रूप में उपस्थित हुई और पलक झपकते ही उसका सर्वनाश कर दी थीं। 

 महिषासुर का अंत अर्थात असत्य का अंत के समान है। इसका अभिप्राय है कि मनुष्य के अंदर पांच प्रकार के विकार होते हैं। काम, क्रोध, मद, लोभ और मोह । इन्हीं पंच विकारों के कारण मनुष्य रसातल तक पहुंच जाता है। जो मनुष्य इन पंच विकारों से मुक्त होकर निर्लिप्त और साक्षी भाव से जीवन जीते हैं। उन्हें मां की कृपा प्राप्त होती है। वे इस संसार में रहकर सभी प्रकार के सुखों को भोगते हैं। सदा कष्टों से मुक्त रहते हैं। दीर्घायु बनते हैं। और अंत में मां में समाहित हो जाते हैं। ऐसे भक्त सदा सदा के लिए आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाते हैं। देवी पुराण में ऐसा वर्णन है कि काम, क्रोध, मद, लोभ ,मोह जैसे विकारों से मुक्ति का ही नाम नवरात्र है।यह त्योहार पूरी तरह मानसिक है। मां को चढ़ने वाले फल - फूल आदि सभी बाह्य पूजा है। मां मन की पूजा स्वीकार करती हैं। मन में अगर कलमष है, बाहर खिले हुए फूल हैं, ऐसी पूजा का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। मन पंच विकारों से मुक्त हर्षित हो, बाहर भी खिले हुए फूल हो। इसे ही मां स्वीकार करती हैं। यह त्यौहार भक्तों के लिए एक संकल्प का त्यौहार है। इस त्यौहार का उद्देश्य है कि भक्तगण अपने पंच विकारों से मुक्त होने का संकल्प लें। भक्तगण स्वयं के अंदर छुपे काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह को त्यागने का संकल्प लें। मां के श्री चरणों में इन  पंच विकारों को अर्पित कर दें। सच्चे अर्थों में मां के प्रति यही पूजा सच्ची पूजा है। साथ ही यह पर्व हम सभी को यह भी सीख देता है कि हमसे ऐसी कोई भूल ना हो जिससे समाज की कोई भी नारी शक्ति आहत हो। यह पर्व हम सबों को नारी शक्ति के सम्मान का भी सिख प्रदान करता है। हम सब मिलकर नारी शक्ति का सम्मान करें। जाने अनजाने कोई काम ऐसा ना करें, जिससे नारी शक्ति अपमानित और परेशान हों। नारी शक्ति का सम्मान  सच्चे अर्थों में नवरात्र है।


 विजय केसरी,

( कथाकार / स्तंभकार),

पंच मंदिर चौक, हजारीबाग - 825 301 ,

मोबाइल नंबर : 92347 99550 ,

Thursday, October 5, 2023

कुछ तो लोग कहेँगे /कृष्ण मेहता


प्रस्तुति - उषा रानी -राजेंद्र प्रसाद सिन्हा


एक *साधू* किसी नदी के पनघट पर गया और पानी पीकर पत्थर पर सिर रखकर सो गया....!!!


पनघट पर पनिहारिन आती-जाती रहती हैं!!!

तो आईं तो एक ने कहा- *"आहा! साधु हो गया, फिर भी तकिए का मोह नहीं गया*...

*पत्थर का ही सही, लेकिन रखा तो है।"*


पनिहारिन की बात साधु ने सुन ली...

*उसने तुरंत पत्थर फेंक दिया*...

दूसरी बोली--

*"साधु हुआ, लेकिन खीज नहीं गई👆..* 

*अभी रोष नहीं गया,तकिया फेंक दिया।"* 

तब साधु सोचने लगा, अब वह क्या करें ?


तब तीसरी बोली-

*"बाबा! यह तो पनघट है,यहां तो हमारी जैसी पनिहारिनें आती ही रहेंगी, बोलती ही रहेंगी, उनके कहने पर तुम बार-बार परिवर्तन करोगे तो साधना कब करोगे?"*


लेकिन चौथी ने

बहुत ही सुन्दर और एक बड़ी अद्भुत बात कह दी-

*"क्षमा करना,लेकिन हमको लगता है,तूमने सब कुछ छोड़ा लेकिन अपना चित्त नहीं छोड़ा है,अभी तक वहीं का वहीं बने हुए है।*

*दुनिया पाखण्डी कहे तो कहे, तूम जैसे भी हो,हरिनाम लेते रहो।"* 

*सच तो यही है, दुनिया का तो काम ही है कहना...*


आप ऊपर देखकर चलोगे तो कहेंगे... 

*"अभिमानी हो गए।"*


नीचे दखोगे तो कहेंगे... 

*"बस किसी के सामने देखते ही नहीं।"*


आंखे बंद करोगे तो कहेंगे कि... 

*"ध्यान का नाटक कर रहा है।"*


चारो ओर देखोगे तो कहेंगे कि... 

*"निगाह का ठिकाना नहीं। निगाह घूमती ही रहती है।"*


और परेशान होकर आंख फोड़ लोगे तो यही दुनिया कहेगी कि...

*"किया हुआ भोगना ही पड़ता है।"*


*ईश्वर* को राजी करना आसान है,

लेकिन *संसार* को राजी करना असंभव है....


*दुनिया* क्या कहेगी, उस पर ध्यान दोगे तो....????


*आप अपना ध्यान नहीं लगा पाओगे.*            

    🌹जय श्री कृष्ण🌹

      🌹

Wednesday, September 27, 2023

लगे रहो और हिम्मत ना हार

 *घास और बाँस*


प्रस्तुति - उषा रानी / राजेंद्र प्रसाद सिन्हा 


ये कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है जो एक व्यापारी था लेकिन उसका व्यापार डूब गया और वो पूरी तरह निराश हो गया। अपनी जिंदगी से बुरी तरह थक चुका था। अपनी जिंदगी से तंग आ चुका था।


एक दिन परेशान होकर वो जंगल में गया और जंगल में काफी देर अकेले बैठा रहा। कुछ सोचकर भगवान से बोला – *मैं हार चुका हूँ, मुझे कोई एक वजह बताइये कि मैं क्यों ना हताश होऊं, मेरा सब कुछ खत्म हो चुका है।*


*मैं क्यों ना व्यथित होऊं?"*


*भगवान मेरी सहायता किजिए"*


भगवान का जवाब


*तुम जंगल में इस घास और बांस के पेड़ को देखो- जब मैंने घास और इस बांस के बीज को लगाया। मैंने इन दोनों की ही बहुत अच्छे से देखभाल की। इनको बराबर पानी दिया, बराबर रोशनी दी।*


*घास बहुत जल्दी बड़ी होने लगी और इसने धरती को हरा भरा कर दिया लेकिन बांस का बीज बड़ा नहीं हुआ। लेकिन मैंने बांस के लिए अपनी हिम्मत नहीं हारी।*


*दूसरी साल, घास और घनी हो गयी उसपर झाड़ियाँ भी आने लगी लेकिन बांस के बीज में कोई वृद्धि नहीं हुई। लेकिन मैंने फिर भी बांस के बीज के लिए हिम्मत नहीं हारी।*


*तीसरी साल भी बांस के बीज में कोई वृद्धि नहीं हुई, लेकिन मित्र मैंने फिर भी हिम्मत नहीं हारी।*


*चौथे साल भी बांस के बीज में कोई वृद्धि नहीं हुई लेकिन मैं फिर भी लगा रहा।*


*पांच साल बाद, उस बांस के बीज से एक छोटा सा पौधा अंकुरित हुआ……….. घास की तुलना में ये बहुत छोटा था और कमजोर था लेकिन केवल 6 महीने बाद ये छोटा सा पौधा 100 फ़ीट लम्बा हो गया। मैंने इस बांस की जड़ को वृद्धि करने के लिए पांच साल का समय लगाया। इन पांच सालों में इसकी जड़ इतनी मजबूत हो गयी कि 100 फिट से ऊँचे बांस को संभाल सके।*


*जब भी तुम्हें जिंदगी में संघर्ष करना पड़े तो समझिए कि आपकी जड़ मजबूत हो रही है। आपका संघर्ष आपको मजबूत बना रहा है जिससे कि आप आने वाले  कल को सबसे बेहतरीन बना सको।*


*मैंने बांस पर हार नहीं मानी, मैं तुम पर भी हार नहीं मानूंगा, किसी दूसरे से अपनी तुलना(comparison) मत करो घास और बांस दोनों के बड़े होने का time अलग अलग है दोनों का उद्देश्य अलग अलग है।*


*तुम्हारा भी समय आएगा। तुम भी एक दिन बांस के पेड़ की तरह आसमान छुओगे। मैंने हिम्मत नहीं हारी, तुम भी मत हारो !अपनी जिंदगी में संघर्ष से मत घबराओ, यही संघर्ष हमारी सफलता की जड़ों को मजबूत करेगा।*


*लगे रहिये, आज नहीं तो कल आपका भी दिन आएगा।*


*शुभ प्रभात। आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलकारी हो।*



दयालबाग़ का सच / 2709 2023


1915 से तिनका तिनका जोड़ मालिक की दया व मेहर से सत्संगियों ने मेहनत से जोड़े ज़मीन के टुकड़े, जिन बंजर ज़मीनों पर दिन रात पाटा चलाके उसे उपजाऊ बनाया और मानव सेवा, शिक्षा और पर्यावरण के संतुलन की उद्ग़म दृष्टि सालों पहले ही सोच कर नित नवीन शोध के चलते दयालबाग़ की स्थापना हुई जिसमे आज शिक्षण संसथान, अस्पताल और इंडस्ट्रीज सब शामिल है।

 राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के "सेल्फ रेलिएन्ट" भारत के स्वप्न को जिस संस्था ने अपने बल पर बिना किसी बाहरी वित्त सहायता से साकार किया।

 इस पवित्र भूमि पर इंडिया के तत्कालीन वाइसराय, सरोजिनी नायडू, पूर्व भारतीय राष्ट्रपति श्री वी वी गिरी जी व राकेट मैन ऑफ़ इंडिया श्री डॉ एपीजे अब्दुल कलाम जी ने यहाँ आकर इस पवित्र भूमि व दयालबाग़ के सामजिक, वैज्ञानिक व आर्थिक अवधारणा को वंदन कर देश के लिए मिसाल बताया। यहाँ खेतों की हरियाली ने दयालबाग़ छेत्र को "ग्रीन बेल्ट ऑफ़ आगरा" की संज्ञा दिलाई जिसके चलते यहाँ का तापमान आगरा के मुक़ाबले तीन से चार डिग्री काम रहता है।

 श्री सैम पित्रोदा जी, जो वर्तमान समय में किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं, उनका यह रिकार्डेड कथन है- "भारत में हर जगह हों दयालबाग़ जैसी यूनिवर्सिटीज", उन्होंने यहाँ की संपूर्ण  मानव विकास की शिक्षा नीति को सराहा और विद्यार्थियों का भविष्य सुरक्षित हाथों में है इस बात की अपने भाषण में पुष्टि की।

आज समाज में कहीं कहीं भेद भाव और जाति प्रथा के चलते समाज में विघटन देखने को मिलता है, किन्तु दयालबाग़ में खेतों और अन्य सेवाओं में निस्वार्थ भाव से सेवा होती है जहाँ मेहनती मज़दूर और एक काबिल अफसर साथ साथ हाथ बटाते हुए सेवा करते है। 

यहाँ 2 रुपए में अस्पताल में इलाज, 18000 में विवाह जो कि जाति मुक्त है, छह रूपए में भण्डार घर का भोजन उपलब्ध है। उन सभी गुणीजनों से यह प्रश्न है की जो संस्था सादा जीवन शैली, कम लागत में उच्च कोटि के कार्य करने में दिन रात अपनी लगन लगाती है , आज अचानक उसे ज़मीन हथियाने की क्या आवश्यकता आ पड़ी?

 जो उन्ही ग्रामीण वासियों को मुफ्त मेडिकल कैंप की सुविधा, ग्रामीण बच्चों को कंप्यूटर व जनरल शिक्षा और डी इ आई द्वारा सोलर एनर्जी की बिजली उन तक मुफ्त पहुँचता है।  क्या यह नीयत "भू माफियों" की होती होगी? जैसा कि दयालबाग़ को कहकर  समाचार पत्र, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया व विद्यार्थी प्रचार कर रहे है।

जिस तरह प्रशासन ने २३ व २४ को अपनी ज़मीन पर सेवा कर रहे बच्चों, महिलाओं और वृद्धों पर लाठी चार्ज और पथराव किया, बार बार सत्संग समुदाय के वाईस प्रेजिडेंट जो की स्वयं एक रिटायर्ड रेलवे पुलिस आई जी हैं, की मिन्नतों के बावजूद , प्रशासन लगातार न्याय जो शर्मसार करता रहा।

 अंत में संपूर्ण सत्संग सभा व सत्संग जगत को माननीय न्यायालय पे भरोसा है, सम्मान है की वह उचित समाधान के साथ अपना निर्णय देंगे। राधास्वामी सत्संग किसी विशेष  धर्म का नहीं अपितु "मानव धर्म" है। Please share the true information 🙏

Tuesday, September 26, 2023

पुत्री का विवाह🎈🙏*/ कृष्णा मेहता


  *🙏🎈



*बनारस की वो गलियाँ जहाँ हर मोड़ पे आपको एक छोटा-मोटा मंदिर मिल जाएगा। शायद यही बनारस की खूबसूरती का एक राज है।*


*हर पल उस छोटे बड़े मंदिर से आती घंटियों की आवाज़ें मन को कितना सुकून देती हैं।*


*बनारस के इन्हीं गलियों में एक राम जानकी मंदिर है, जिसकी देख रेख मंदिर के पुजारी पंडित रामनारायण मिश्र के हाथों थी। मिश्रजी भी अपनी पूरी जिंदगी इस राम जानकी मंदिर को समर्पित कर चुके थे।*


*संपत्ति के नाम पर उनके पास एक छोटा सा 2 कमरे का मकान और परिवार में उनकी पत्नी और विवाह योग्य बेटी कमला ।* 


*मन्दिर में जो भी दान आता वही पंडित जी और उनके परिवार के गुजारे का साधन था। बेटी विवाह योग्य हो गयी थी और पंडित जी ने हर मुकम्मल कोशिश की जो शायद हर बेटी का पिता करता। पर वही दान दहेज़ पे आकर बात रुक जाती।* 


*पंडित जी अब निराश हो चुके थे। सारे प्रयास कर के हार चुके थे।*

          

*एक दिन मंदिर में दोपहर के समय जब भीड़ न के बराबर होती है उसी समय चुपचाप राम सीता की प्रतिमा के सामने आँखें बंद किये अपनी बेटी के भविष्य के बारे में सोचते हुए उनकी आँखों से आँसू बहे जा रहे थे।*


 *तभी उनकी कानों में एक आवाज आई, "नमस्कार, पंडित जी!"*


*झटके में आँखें खोलीं तो देखा सामने एक बुजुर्ग दंपत्ति हाथ जोड़े खड़े थे। पंडित जी ने बैठने का आग्रह किया। पंडित जी ने गौर किया कि वो वृद्ध दंपत्ति देखने में किसी अच्छे घर के लगते थे। दोनों के चेहरे पर एक सुन्दर सी आभा झलक रही थी।*


*"पंडित जी आपसे एक जरूरी बात करनी है।" वृद्ध पुरूष की आवाज़ सुनकर पंडित जी की तंत्रा टूटी।*


*"हाँ हाँ कहिये श्रीमान।" पंडित जी ने कहा।*

 

*उस वृद्ध आदमी ने कहा, "पंडित जी, मेरा नाम विशम्भर नाथ है, हम गुजरात से काशी दर्शन को आये हैं, हम निःसंतान हैं, बहुत जगह मन्नतें माँगी पर हमारे भाग्य में पुत्र/पुत्री सुख तो जैसे लिखा ही नहीं था।"*


*"बहुत सालों से हमनें एक मन्नत माँगी हुई है, एक गरीब कन्या का विवाह कराना है, कन्यादान करना है हम दोनों को, तभी इस जीवन को कोई सार्थक पड़ाव मिलेगा।"*


*वृद्ध दंपत्ति की बातों को सुनकर पंडित जी मन ही मन इतना खुश हुए जा रहे थे जैसे स्वयं भगवान ने उनकी इच्छा पूरी करने किसी को भेज दिया हो।*


*"आप किसी कन्या को जानते हैं पंडित जी जो विवाह योग्य हो पर उसका विवाह न हो पा रहा हो। हम हर तरह से दान दहेज देंगे उसके लिए और एक सुयोग्य वर भी है।" वृद्ध महिला ने कहा।*


*पंडित जी ने बिना एक पल गंवाए अपनी बेटी के बारे में सब विस्तार से बता दिया। वृद्ध दम्पत्ति बहुत खुश हुए, बोले, "आज से आपकी बेटी हमारी हुई, बस अब आपको उसकी चिंता करने की कोई जरूरत नहीं, उसका विवाह हम करेंगे।"*


*पंडित जी की खुशी का कोई ठिकाना न रहा। उनकी मनचाही इच्छा जैसे पूरी हो गयी हो।*


*विशम्भर नाथ ने उन्हें एक विजिटिंग कार्ड दिया और बोला, "बनारस में ही ये लड़का है, ये उसके पिता के आफिस का पता है, आप जाइये। ये मेरे रिश्ते में मेरे साढ़ू लगते हैं।*


*बस आप जाइये और मेरे बारे में कुछ न बताइयेगा। मैं बीच में नहीं आना चाहता। आप जाइये, खुद से बात करिये।*


*पंडित जी घबराए और बोले, "मैं कैसे बात करूँ, न जान न पहचान, कहीं उन्होंने मना कर दिया इस रिश्ते के लिए तो..??"*


*वृद्ध दंपत्ति ने मुस्कुराते हुए आश्वासन दिया कि, "आप जाइये तो सही। लड़के के पिता का स्वभाव बहुत अच्छा है, वो आपको मना नहीं करेंगे।"* 


*इतना कह कर वृद्ध दंपत्ति ने उनको अपना मोबाइल नंबर दिया और चले गए। पंडित जी ने बिना समय गंवाए लड़के के पिता के आफिस का रुख किया।*


*मानो जैसे कोई चमत्कार सा हो गया। 'ऑफिस में लड़के के पिता से मिलने के बाद लड़के के पिता की हाँ कर दी', 'तुरंत शादी की डेट फाइनल हो गयी', पंडित जी जब जब उस दंपत्ति को फोन करते तब तब शादी विवाह की जरूरत का दान दहेज उनके घर पहुँच जाता।*


*सारी बुकिंग, हर तरह का सहयोग बस पंडित जी के फोन कॉल करते ही उन तक पहुँचने लगते।* 


*अंततः धूमधाम से विवाह संपन्न हुआ। पंडित जी की लड़की कमला विदा होकर अपने ससुराल चली गयी।*


*पंडित जी ने राहत की साँस ली। पंडित जी अगले दिन मंदिर में बैठे उस वृद्ध दम्पत्ति के बारे में सोच रहे थे कि कौन थे वो दम्पत्ति जिन्होंने मेरी बेटी को अपना समझा, बस एक ही बार मुझसे मिले और मेरी सारी परेशानी हर लिए।*


*यही सोचते-सोचते पंडित जी ने उनको फोन मिलाया। उनका फोन स्विच ऑफ बता रहा था। पंडित जी का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।* 


*उन्होंने मन ही मन तय किया कि एक दो दिन और फोन करूँगा नहीं बात होने पर अपने समधी जी से पूछूँगा जरूर विशम्भर नाथ जी के बारे में।*


*अंततः लगातार 3 दिन फ़ोन करने के बाद भी विशम्भर नाथ जी का फ़ोन नहीं लगा तो उन्होंने तुरंत अपने समधी जी को फ़ोन मिलाया।*


*ये क्या….*


*फ़ोन पे बात करने के बाद पंडित जी की आँखों से झर झर आँसू बहने लगे। पंडित जी के समधी जी का दूर दूर तक विशम्भर नाथ नाम का न कोई सगा संबंधी, न ही कोई मित्र था।*


*पंडित जी आँखों में आँसू लिए मंदिर में प्रभु श्रीराम के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए। और रोते हुए बोले,*


*"मुझे अब पता चला प्रभु, वो विशम्भर नाथ और कोई नहीं आप ही थे,*

 

*वो वृद्धा जानकी माता थीं, आपसे मेरा और मेरी बेटी का कष्ट देखा नहीं गया न?*


*दुनिया इस बात को माने या न माने पर आप ही आकर मुझसे बातें कर के मेरे दुःख को हरे प्रभु।"*


*राम जानकी की प्रतिमा जैसे मुस्कुराते हुए अपने भक्त पंडित जी को देखे जा रही थी।*



     *🕉️ 🔱 जय महादेव 🔱🕉️*

पूज्य हुज़ूर का निर्देश

  कल 8-1-22 की शाम को खेतों के बाद जब Gracious Huzur, गाड़ी में बैठ कर performance statistics देख रहे थे, तो फरमाया कि maximum attendance सा...