Tuesday, March 22, 2011

कोई नहीं चाहता संकट से पार पाना


कोई नहीं चाहता संकट से पार पाना

अनामी शरण बबल


द संडे इंडियन का मीडिया पर केंद्रित अंक साख पर संकट को संग्रहणीय नहीं दुर्लभ अंक कहना ज्यादा सार्थक होगा।  व्यावसायिकता की इस अंधी लड़ाई में मीडिया विशेष यह अंक वाकई आपकी निष्ठा को अभिव्यक्त करता है। केंद्रीय विषय पर एक साथ तमाम महानुभावों (?) के विचारों को रखा गया है, इस मामले में उनकी टिप्पणियों से यह अंक खास हो जाता है, मगर, सवाल साख के साथ साथ विश्वसनीयता का भी है। जनता के लिए बहुत कम ऐसे मौके आते है, जब खबरिया चैनल जनता की कसौटी पर खरा साबित होता है। किसी बड़ी घटना,चुनाव, या सीधे प्रसारण के समय ही यह अपने आप को  सार्थक साबित करता है, अन्यथा क्राईम, क्लास, कामेडी, सिनेमा और सेलेब्रेटी यानी फाईव सी के चौखटे में कैद खबरिया चैनल तो कब का जनता से दूर या इनसे जनता दूर हो चुकी है। इन चैनलों में झूमता हुआ एक खुशहाल भारत दिखता है। देश की समस्याओं, जनसरोकारों और आम जनता से दूर इन चैनलो में ना देश दिखता है ना ही देश को दिखाने की ललक है। दुख तो यह है कि तमाम बड़े और प्रकांड टीवी पत्रकार भी इस संकट से पार पाना नहीं चाहते ?  तमाम चैनलों में पिछले एक दशक से वही लोग बैठे है, मगर न नया कार्यक्रम है ना ही कोई नयापन । कभी भूत प्रेत तो कभी बंदर, सांप हाथी। कभी परलोक धाम का सफर या त्रेता युग को दिखाकर ये महान पत्रकार साबित करना क्या चाहते है ?  मानसिक दीवालियापन के सिला और क्या? पब्लिक लाचार जरूर है मगर बेवकूफ नहीं, जैसा कि चैनल के स्वंयभू मानते है। यही कारण है कि साख या विश्वसनियता बहाल करने या जनता से दूरी को कम करने के लिए अपने गिरेबां में झांकने की बजाय  पैसे के लिए समझौता करने या प्रीपेड न्यूज का जमाना जैसा धिसा पीटा तर्क देकर अपनी गलतियों पर पर्दा डालने की लिए भी दूसरे के कंधे का बहाना तलाश रहे है। खबरों को सनसनीखेज बनाकर परोसने की बजाय इस ताकत को सार्थक बनाने पर जोर देना होगा। अपने दर्शको पर यकीन करना होगा और यह तभी संभव है, जब आपको अपने उपर यकीन होगा।
अनामी शरण बबल ए-3/154 एच, मयूर विहार फेज-3 दिल्ली-110096

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