Wednesday, June 15, 2011

कथादेश पर एक और सारांश



धुंधली छवि का विशेषांक

साहित्य, संस्कृति और कला का समग्र मासिक होने का दावा करनेवाली मासिक पत्रिका कथादेश ने अगस्त में मीडिया पर केंद्रित भारी-भरकम विशेषांक निकाला. इस अंक का संपादन पूर्व पत्रकार और अब शिक्षक अनिल चमड़िया ने किया है. अनिल चमड़िया पिछले कई सालों से कथादेश में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर स्तंभ लिखते रहे हैं और यदा-कदा उसके संपादकों के नाम खुला पत्र लिखकर इस माध्यम को लेकर अपनी चिंता प्रकट करते रहे हैं. कथादेश के मीडिया विशेषांक में भी अनिल ने मीडिया के पतन पर अपनी गहरी चिंता जताई है. मीडिया के अधोपतन पर अतिथि संपादक इतने विचलित हो गए कि आख़िरकार उनकी भी चिंता की सूई टीआरपी पर आकर टिक गई. टीवी पत्रकारों पर लिखते हुए चमड़िया ने लिखा- पूंजीवाद ने उनके  बीच कई हिस्से तैयार कर दिए. एक हिस्सा वह है जो चांदी काट रहा है. मीडिया मालिकों की तरह राजसभा (संभवत : वो राज्यसभा लिखना चाह रहे हों ) में रंगरलियां मना रहा है. इनकी रंगरलियों का अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि ये चंद वर्षों में सैकड़ों-करोड़ों डॉलर के  मालिक बन गए. वे चैनल चला रहे हैं और उसी तरह से चला रहे हैं जैसे रुपर्ट मर्डोक और दूसरे साम्राज्यवाद समर्थक चैनल चलाते हैं. जो चैनल मालिक नहीं बन पाया, वह जिस तरह से चैनल चला रहा है, उनके  उसी तरह चलने की बेशर्मी से वकालत करता है. टीआरपी को वह अपने कुकर्मों का सुरक्षा कवच बनाता है और ये नहीं बताता है कि टीआरपी क्या है? टीआरपी सांस्कृतिक वर्चस्व को बढ़ावा देने के  उद्देश्य से तैयार हुआ है. इसमें पूंजी किसी संस्थान की नहीं, बल्कि पूंजीवादी विचारधारा की लगी हुई है. इसके वर्चस्ववादी सांस्कृतिक हथियार होने का प्रमाण तब मिलेगा, जब टीआरपी के  ढांचे के  रहस्य को खोला जाए. यहां अनिल चमड़िया ने टीआरपी की बेहद मनोरंजक और मौलिक व्याख्या की है – टीआरपी ख़ास तरह के विचारों को थोपने और अपनी मौलिकता को भुला देने वाला सांगठिक हथियार है- लेकिन, अपने इस फतवा के समर्थन में उन्होंने कोई उदाहरण या तर्क प्रस्तुत नहीं किया है. अपनी इस प्रस्थापना को पूंजीवाद, बाज़ारवाद, संकट का समय, संगठन जैसे शब्दों की चाशनी में डुबोकर पाठकों पर अपनी विद्वता का परचम लहरा दिया है. टीआरपी को बग़ैर जाने समझे उसे गाली देने का फैशन बन गया है और अनिल उस फैशन के  शिकार हो गए हैं. ऐसा नहीं है कि अनिल चमड़िया ने स़िर्फ न्यूज़ चैनलों की आलोचना की है. इन्होंने समान भाव से अख़बारों के गिरते स्तर पर भी अपनी चिंता जताते हुए पत्रकारों को कोसा है. अनिल इस बात का ख़तरा भी उठाते हुए चलते हैं कि उनके आलोचक उनपर एक ऐसे संत का ठप्पा लगा सकते हैं कि जो गांधी आश्रम में बैठकर पत्रकारिता में व्याप्त भ्रष्टाचार और गंदगी को अपनी लेखनी से सा़फ करना चाहता है. लेकिन, मैं उनके  आलोचकों को ये कहना चाहता हूं कि संत तो संत होता है जो स़िर्फ प्रेरित कर सकता है, पहल नहीं. अनिल चूंकि इस अंक के संपादक हैं, इसलिए रचनाओं पर भी उनके विचारों की छाप सा़फ दिखाई देती है. कई लेखक टीआरपी को लेकर रोते दिखाई दे रहे हैं. स़िर्फ उमेश चतुर्वेदी ने अपने लेख में टीआरपी को समझने और समझाने की कोशिश की है. उमेश ने टीआरपी की तथाकथित गुत्थी को खोला है. श्रमपूर्वक लिखे गए इस लेख से टीआरपी की कई भ्रांतियां दूर होती हैं.
इस अंक में लेखों की भरमार है. यहां-वहां, जहां-तहां से लेखों को इकट्ठा कर, अनुवाद कर, प्रकाशित कर दिया गया है. वरिष्ठ टीवी पत्रकार अजीत अंजुम के पिछले साल पत्रकारिता संस्थान में दिए गए एक भाषण को छाप दिया गया है. भाषण देने की शैली और लिखने की शैली बिल्कुल अलग होती है. अजीत अंजुम के  भाषण को लगता है, जस का तस छाप दिया गया है.
यहीं पर संपादक का दायित्व बनता है कि वो भाषण को लेख के  रूप में संपादित कर दे. लेकिन, ये नहीं हुआ और साल भर पुराना भाषण छपा. जब अजीत अंजुम की बात चली तो बरबस जनवरी 2007 में उनके  संपादन में हंस के  मीडिया विशेषांक की याद आ गई. हंस का वह अंक भी लगभग ढाई सौ पृष्ठों का था. हंस का वह अंक, संपादन कौशल का बेहतरीन नमूना था. चिंताएं वहां भी थीं, लेकिन उन चिंताओं का जवाब भी था. राजदीप सरदेसाई, क़मर वहीद नक़वी, उदय शंकर के  विचार इन चिंताओं से टकरा रहे थे. न्यूज़ चैनलों को लेकर जो कहानियां छपी थीं वो वहां काम करने वाले पत्रकारों के  दर्द और प्रेम की प्रतिनिधि कहानियां थीं. मेरे जानते मीडिया पर हंस का वो अंक अब तक का सबसे अच्छा अंक है, जिसका एप्रोच एकदम फोकस्ड है.
कथादेश के इस अंक में एक गुमनाम लेख छपा है, जिसमें स्टार न्यूज़ के  संपादक शाजी जमां पर बेहद संगीन इल्ज़ाम लगाए गए हैं. इस लेख के बारे में संपादक ने कहा है कि इंटरनेट के ज़रिए स्टार न्यूज़ के  न्यूज़रूम में घूमता एक पत्र हमारे हाथ लगा है और विद्वान और पत्रकारिता में शुचिता की बात करने वाले संपादक अनिल चमड़िया ने इंटरनेट पर घूमते एक गुमनाम ख़त को मीडिया विशेषांक में छापकर मान्यता प्रदान कर दी. लेख के  पहले अवश्य एक टिप्पणी संपादक की ओर से है, लेकिन यह लेख बेहद घटिया और स्तरहीन है, जिसकी जितनी भी निंदा की जाए कम है. स्टार न्यूज़ के  संपादक शाजी जमां पत्रकार के  साथ-साथ एक संवेदनशील लेखक भी हैं. इनके  लिखे को पढ़ने के  बाद कथादेश में छपे इस लेख को पढ़कर ये लगता है कि कोई व्यक्ति शाजी को बदनाम करने की मंशा से ऐसा कर रहा है और कथादेश जाने-अनजाने बदनाम करने की उस मुहिम में उसका साथ देता नज़र आ रहा है.
कुल मिलाकर, अगर कथादेश के  मीडिया विशेषांक पर समग्रता से विचार करें तो ये बेहद हल्का और उथला है. ढाई सौ पृष्ठों का ये भारी-भरकम विशेषांक डीफोकस्ड लगता है, जिसमें से कोई सा़फ तस्वीर सामने नहीं आती है. इस अंक की पहली रचना पंकज श्रीवास्तव की है, मी लॉर्ड ! आप समझ रहे हैं ना. इसमें पंकज ने मुन्नाभाई और गांधी की शैली में अपने अनुभवों को बेहद रोचक शैली में पेश किया है. इसे इस अंक की उपलब्धि के  तौर पर रेखांकित किया जा सकता है.

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