Wednesday, October 15, 2014

देव के राजा का कला प्रेम



 

 

 

माया महल में हुआ था 'पुनर्जन्म'

प्रस्तुति-- स्वामी शरण

 रांची : हिंदी सिनेमा अपना सौवां साल मना रहा है। अपने सौ साल के सफर को याद करना वाकई रोमांचित करता है। पूरा देश सिनेमा के इस उत्सव में शरीक हो रहा है। नोएडा में इस महीने के अंत में दो दिनी अंतरराष्ट्रीय महोत्सव हो रहा है। लेकिन इस सौ साला सफर में रांची का भी किंचित योगदान है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मेन रोड में एक टाकीज थी, रतन टाकीज। पहले इसका नाम माया महल था। 1937 में जब इसके मालिक बदले तो नाम भी बदल गया। झारखंड तब बिहार का हिस्सा था। देव (औरंगाबाद, बिहार) के तत्कालीन महाराजा जगन्नाथ प्रसाद सिंह किंकर ने 1931 में ही छठ पर्व पर एक वृत्तचित्र का निर्माण किया था। जब सवाक (आवाज के साथ) फिल्मों का दौर शुरू हुआ तो राजा साहब पीछे नहीं रहे। उन्होंने उस समय के प्रतिष्ठित फिल्मकार धीरेननाथ गांगुली के निर्देशन में एक फीचर फिल्म 'पुनर्जन्म' का निर्माण करवाया। धीरेन दा को दादा साहब फाल्के सम्मान मिल चुका है। इन्होंने कई फिल्मों में अभिनय भी किया और दर्जन से ऊपर फिल्मों का निर्देशन। फिल्म बनने के बाद इसका प्रीमियर रांची में ही 'माया महल' में किया गया। माया महल का नाम ही आगे चलकर रतन टाकीज हो गया। अब यह सिनेमा हॉल भी इतिहास के एक अध्याय में सिमट गया।
रतन टाकीज में 'अछूत कन्या' का प्रवेश :
1937 में जब माया महल रतन टाकीज हो गया और सवाक फिल्में आने लगीं तो इस टाकीज में पहली फिल्म अछूत कन्या दिखाई गई। डा. श्रवणकुमार गोस्वामी कहते हैं कि इस फिल्म को देखने के लिए काफी संख्या में दर्शक आए थे। इसमें अशोक कुमार व देविका रानी ने अभिनय किया था।
रांची का हिंदी सिनेमा के साथ संबंध उतना ही पुराना है, जितना मुंबई का। आगे चलकर, महाराजा की तरह कोई उत्साही नहीं आया। लेकिन, जब भोजपुरी सिनेमा की नींव पड़ी तो गिरिडीह के विश्वनाथ शाहाबादी ने फिल्म के निर्माण में अपना पैसा लगाया। वह 1962 का समय था। परिवार की तीसरी पीढ़ी भी आज फिल्मों में सक्रिय है।

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