Wednesday, October 29, 2014

सूर्यषष्ठी व्रत ( छ्ठ पूजा ) का इतिहास






प्रस्तुति-- धीरज पांडेय  / ज्ञानेश पांडेय


सूर्य और षष्ठी तिथि के पूजन की परम्परा जो आज मात्र भोजपुरी , मैथिली क्षेत्र मे सिमट गयी है । यह सूर्य पूजा कभी अफ़्रीका , अमेरिका महाद्वीप तक फ़ैली थी । सूर्य पूजा की परम्परा आदित्य कुल के भार्गवो ने शुरु करायी । हिस्टोरियन हिस्ट्री आफ़ दी वल्ड एवं मिश्र के पिरामिडो से मिले प्रमाणो के अनुसार महर्षि भृगु के वंशज भार्गवो ने जिन्हे इस महाद्वीप पर हिस्त्री , खूफ़ू ..., मनस नामो से जाना गया । इन लोगो ने यहां सूर्य पूजा की परम्परा हजारो साल चलायी । इस तथ्य की जानकारी मिश्र के अलमरना मे हुई खुदाई से मिले पुरातात्विक साक्ष्यो और अमेरिकी विद्वानो कर्नल अल्काट , ए0डी0मार , प्रो0 ब्रुग्सवे के शोध ग्रन्थो से की जा सकती है ।



इसी प्रकार अमेरिका महाद्वीप पर 12अक्टूबर 1492 तक यह परम्परा कायम रही है । 12अक्टूबर 1492 को जब क्रिस्टोफ़र कोलम्बस नाम के पुर्तगाली नाविक यहां पहुंचे । उस समय इस महाद्वीप पर 10लाख सूर्य पूजक इण्डियन _ रेड इण्डियन भारतीय मूल के भार्गव वशी मय _ माया के वंशज मौजूद थे । जिनका कत्लेआम , इस जमीन पर कब्जा करने के लिए यूरोपवासियों ने बड़ी बेरहमी से किया । इस तथ्य को अमेरिकी विद्वानो चेसली बैटी की पुस्तक अमेरिका बिफ़ोर कोलम्बस , प्रो0हेम्बेरटो की पुस्तक - थाउजेण्ड इयर ओल्ड सिविलेजेशन इन अमेरिका , हेरिसन की पुस्तक _ इण्डिया इन द यूनाइटेड स्टेट और कम्पाजेट की पुस्तक _ दी हेरिटेज आफ़ अमेरिका मे देखा जा सकता है । इसके अतिरिक्त अमेरिका के ग्वालेटा यूक्जाक्टन और मैक्सिको मे हुई , पुरातात्विक खुदाईयो मे भी इसके प्रमाण मिले है ।



इंसान ने जब अपनी जिज्ञासा की आंखे खोली तो उसे सबसे पहले एक वह तारा दिखा जो रोज उसके लिए उजाला और अपनी गर्मी से शरीर को ताजगी देने आ जाता था । जिससे शिकार करने मे , अपने रहने के लिए नया बसेरा खोजने मे काफ़ी सुविधा हो जाती थी । प्राचीन इतिहासकार रांगेय राघव अपनी पुस्तक महागाथा मे लिखते है कि उस समय लोग मानते थे कि ये देवता महासागर मे रहते है । रोज हमे जगाने और खिलाने के लिए आते है ।



.महाप्रलय के बाद जिस कालखण्ड मे जिसमे हमलोग आज है । माता अदिति के सबसे छोटे पुत्र आदित्य के नाम पर रोज उजाला लेकर आने वाले इस चमकीले तारे का नाम आदित्य रख दिया । कालान्तर मे जब इस आदित्य ने इस नक्षात्र की चाल गति उष्मा , प्रकाश , ऊर्जा का अध्ययन किया , तब उसे परिभाषित करके इस ग्रह का नाम सूर्य रखा । इस ग्रह की प्रथम विवेचना करने वाले सूर्य _ विवस्वान _ आदित्य के नाम मे इस ग्रह के बारे मे शोध करने वाले मनीषियो के नाम आगे जुड़ते रहे । जैसे _ मित्रावरुण के नाम से सूर्य का नाम मित्राय _ अरुण पड़ा । भास्कराचार्य के नाम पर भास्कर _ भानु , खगाय , पूष्णे आदि नाम ऐसे ही पड़े है ।

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