सतसंग,सुमिरन और भजन ,यही परमार्थ के तीन मुख्य अंग हैं। सतसंग परमार्थ का भौतिक स्वरूप है, सुमिरन मानसिक और भजन आत्मिक अंग है। इसमें भजन यानी अभ्यास मुख्य है, क्योंकि सच्चा व पूरा उद्धार आत्मा के खोल उतारने पर सुरत अंग का ही होता है। तन तत्वों मे और मन चिदाकाश यानी ब्रहमाण्डीय मन में लीन हो जाता है और आत्मा; परमात्मा यानी ब्रह्म में लीन हो जाती है।
इस प्रकार रचना के हर स्तर, मण्डल या घाट पर उस स्तर के उद्धार या बंधनो से मुक्ति की कार्यवाही होते हुए सुरत अंग बरामद होता है, जो कि अपने मूल कुल मालिक राधास्वामी दयाल के चरणों में समा कर सच्ची मुक्ति व पूरे उद्धार को प्राप्त होता है और उसी का काज पूरा हुआ।
सतसंग से बुद्धी की मलीनता घटती जाती है और बुद्धि स्पषट होती जाती है तो वर्तमान कर्म कटते जाते हैं, इस प्रकार जीव जीवन में पहले निष्काम फिर निःकर्म हो जाता हैं।
सुमिरन से मन निर्मल होता है तो विचार, विकार रहित हो जाते हैं और अंतःकरण अपनी सहज अवस्था में आ जाता है।यही निष्काम अवस्था है।
भजन यानी अंतर घट भीतर आदि धुन चैतन्य धार को सुनने से 'प्रारब्ध' कर्म कटते जाते हैं। इस प्रकार जीव प्रारब्ध कर्मों से रहित हो कर, आत्मिक सामर्थ प्राप्त करता है तो एक जीवात्मा-सुरत बन जाती है। यही निःकर्म हो जाना है।
यदि *सत्संग में ध्यान न लगे तो बुद्धी विकारों से ग्रसित हो जाती है। *सुमिरन में ध्यान न लगे तो नाम (अंतर धुन) गुप्त हो जाता है और जब तक *भजन में ध्यान न लगे तो शब्द नहीं खुलता। इस प्रकार हम पाते हैं कि , परमार्थ की राह में ध्यान ही मुख्य है। ध्यान साधन है और इसका उपयोग साधना।
कुछ लोग कहते हैं कि ध्यान नहीं टिकता या मन में उठने वाले विचार नहीं रुकते या कि वर्षों हो गये पर शब्द नहीं खुलता। दरअसल ये वो लोग हैं जो सत्संग तो नियमित रूप से सुनते है पर सत्य संग कभी किया ही नहीं। तो समझ में भी कुछ ना आया, तब भला करनी कैसे बनती...? सुनने मात्र से कल्पनाओं का विकास होता है और सत संग करने से मार्ग पर बढने की सामर्थ व तकनीक प्राप्त होती है। तो ऎसे लोग कल्पपनाओं में ही सारा मार्ग तै कर लेते हैं और सब कुछ रट कर वाचक ज्ञानी बन जाते हैं।
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