1 अगस्त जन्मदिन पर विशेष:
शादाब जफर “शादाब’’

शायद ही कोई हिन्दी फिल्म प्रेमी ऐसा हो जिस ने अपने जीवन काल में फिल्म
पाकीज़ा एक बार न देखी हो। आज फिल्मे किस स्तर पर पहुच गई है कुछ कहने की
जरूरत नही। आज की फिल्मे और फिल्म हीरोईनो की ऐसी कहानी हो गई है कि ये कब
आती है कब चली जाती है पता ही चलता। टाकीज में फिल्म लगती है और उतर जाती
है पर इन फिल्मो की फिल्मी गलियारो में चर्चा भी नही होती। क्यो कि आज
फिल्म की हीरोईने अदाकारी की बजाये अपना तन दिखाने और अपने कपडे उतारने में
लगी है। हर महीने एक नई फिल्म में नई हीरोईन नजर आती है। पुराने जमाने की
कई अभिनेत्रिया और फिल्मे आज भी कई बरस बीत जाने के बाद भी दिलो दिमाग से
नही उतरती उन में एक नाम मीना कुमारी का भी है। मीना कुमारी का नाम आते ही
फिल्मो का वो इतिहास सामने आ जाता है जिसे फिल्मी पंडित आज भी फिल्मो के
गोल्डन दौर के रूप में याद करते है। 1 अगस्त 1932 को मुम्बई, बॉम्बे
प्रेजिडेंसी, ब्रिटिश भारत में जन्मी मीना कुमारी को कला और साहित्य जन्म
से ही घुट्टी में मिला। एक ओर इनके पिता अलीबख्श अपने जमाने के फिल्मो और
पारसी रंगमंच के बडे जबरदस्त मंजे हुए कलाकार थे। वो एक संगीतकार के रूप
में भी अपनी प्रतिभा का लोहा कई फिल्मो में हिट संगीत देकर मनवा चुके थे।
वही मीना कुमारी की मॉ का ताल्लुक एक ऐसे घराने से था जिसे उस समय पूरे
हिन्दुस्तान में साहित्य का सब से बडा घराना समझा जाता था। मीना कुमारी की
मॉ प्रभा देवी जो उनके पिता अलीबख्श से शादी करने के बाद इकबाल बानो के नाम
से प्रसिद्व हुई दरअसल टैगोर खानदान से ताल्लुक रखती थी। और वो भी अपने
जमाने की मशहूर नृत्यांगना और अभिनेत्री थी। मीना कुमारी का वास्तविक नाम
मेहजबी बानो था। मीना कुमारी ने केवल छह साल की छोटी उम्र में फिल्मो में
काम करना शुरू कर दिया था। 1952 में विजय भट्ट की फिल्म बैजू बावरा ने मीना
कुमारी को बतौर अभिनेत्री फिल्मी दुनिया में स्थापित किया और इस फिल्म की
लोकप्रियता के बाद मीना की अदाकारी की चारो ओर काफी प्रसंशा होने के साथ ही
मेहजबी से यह अदाकारा मीना कुमारी बन गई। अपने फिल्मी कैरियर के शुरूआती
दौर में मीना कुमारी ने भारतीय पौराणिक कथाओ की कहानियो पर बनी फिल्मो में
काम किया इन फिल्मो के द्वारा ही मीना कुमारी का टैलेन्ट निकल कर बाहर आया
और भारतीय सिनेमा में अभिनेत्रियो का वो दौर शुरू हुआ जिस में माला सिन्हा,
नूतन, मधुबाला, नरगिस, सुचित्रा, वैजंतीमाला, आदि की भारतीय हिन्दी
चित्रपट पर तूती बोलने लगी। सन 1953 तक मीना कुमारी की तीन सुपर हिट फिल्मे
आ चुकी थी। जिन में “दायरा’’, “दो बीघा जमीन’’, और “परिणीता’’। फिल्म
परिणीता मीना कुमारी के फिल्मी कैरियर में मील का पत्थर साबित हुई इस फिल्म
में मीना कुमारी ने जबरदस्त अदाकारी की और अपने ललीता के किरदार को फिल्मी
पर्द पर जीवित कर के खूब प्रसंशा बटोरी। इस फिल्म से मीना कुमारी के लिये
एक नया युग का आगाज हुआ। परिणीता में एक ओर जहॉ फिल्मी पंडितो ने उन की
अदाकारी की प्रसंशा की वही परिणीता में उनके निभाए ललीता के किरदार ने
भारतीय महिलाओ को काफी प्रभावित किया। दरअसल इस फिल्म की कहानी का फोकस
भारतीय नारी की आम तकलीफो को समाज के सामने सहज रूप में पेश करना था जिसे
मीना कुमारी ने पर्द पर अपनी कला के माध्यम से जीवित किय। इस फिल्म के
द्वारा मीना कुमारी की तारीफ तो बहुत हुई पर उन पर इस किरदार का ऐसा ठप्पा
लगा कि उन की छवि सिर्फ दुखांत भूमिकाओ में सिमट कर रह गई। दिल अपना और
प्रीत पराई, यहूदी, बंदिश, दिल एक मंदिर, प्यार का सागर, मैं चुप रहॅूगी,
आरती, भाभी की चूडिया, काजल, कोहेनूर, सहारा, शारदा, फूल और पत्थर, गजल,
नूर जहॉ ,मझली दीदी, चन्दन का पालना, भीगी रात, मिस मैरी, बेनजीर, साहिब
बीवी और गुलाम, ये सारी ऐसी फिल्मी है जिन्होने मीना कुमारी को बुलंदी के
उस आसमान पर पहुॅचा दिया जहॉ से आसमान को छूना बहुत आसान हो जाता है।
सफलता मीना कुमारी के कदम चुमने लगी थी। सफलता न कदम चमूे तो मीना
कुमारी के कदम डगमगाने लगे और और उनके नाम के साथ कई फिल्म कलाकारो का नाम
जुडने लगा। जिन में उस वक्त के हीरो धर्मन्द्र के साथ मीना कुमारी के
रोमांस की चर्च सब से ज्यादा हुई पर फिल्मी पर्द पर दुख झेलती इस अदाकारा
के असली जीवन में भी दुख ही दुख भर गये। या यू कहा जाये कि इस अदाकारा ने
खुद को जमाने से दूर बहुत दूर कर दुखो से दोस्ती कर ली। पर इतनी बडी दुनिया
में तन्हा जीना बडा मुश्क्लि होता है। मीना को तन्हाई खाए जा रही थी इसी
दौरान न जाने कब उन्होने शराब और शायरी को अपना दोस्त बना लिया खुद उन्हे
भी नही पता। मीना कुमारी शायरी के माध्यम से शोर कह कर अपने दिल का दर्द
हल्खा करने लगी वो नाज नाम से उर्द् शायरी करती थी। यू तो मशहूर फिल्मकार
कमाल अमरोही से मीना कुमारी ने शादी की पर ये शादी पाकिजा की तरह कामयाब
नही हो सकी। शायद असल जिन्दगी और फिल्मी जिन्दगी की ये ही हकीकत है। फिल्म
पाकिजा से कमाल अमरोही को अमर करने वाले ये अदाकारा सन 1964 में कमाल
अमरोही से अलग होने के बावजूद इस महान अदाकारा ने पाकिजा में अपनी सारी
जिन्दगी का तर्जुबा और कला के रूप में फिल्म के हर सीन में अपना खून भर कर
मीना कुमारी ने भारतीय हिन्दी चित्रपट को वो यादगार फिल्म दी जिसे बार बार
देखने के बाद हर बार मीना कुमारी और कमाल अमरोही की याद आती है।
पाकिजा के साथ साथ काजल, आजाद, प्यार का सागर, बहू बेगम और साहिब बीवी
और गुलाम, जैसी फिल्मो का शुमार मीना कुमारी की कुछ बेहतरीन फिल्मो में
किया जाता है। फिल्म साहिब बीवी और गुलाम में उनके शराबी किरदार को भला कौन
भूल सकता है। फिल्म साहिब बीवी और गुलाम को सर्वश्रेष्ट फिल्म के लिये
“फिल्म फेयर’’ अवार्ड हासिल हुआ इस फिल्म को “पे्रसीडेन्टस’’ सिल्वर मेडल
द्वारा भी सम्मानित किया गया। 1954 में बैजू बावरा, 1955 में परिणीता, 1963
में साहिब बीवी और गुलाम व 1966 में फिल्म काजल, के लिये मीना कुमारी को
फिल्मफेयर के रूप में सर्वश्रेष्ट अभिनेत्री का पुरस्कार प्राप्त हुआ। पर
फिल्मो में दुखांत यादगार भूमिकाए निभाने वाली इस अभिनेत्री का अंत भी दुख
भरा रहा। बेहद शराब की आदी हो चुकी इस अदाकारा ने अपने शराब के शौक के कारण
जब अपने गुर्द गवां दिया और मुम्बई के हास्पीटल में जिन्दगी और मौत की
लडाई जारी थी तब इस महान अदाकारा के पास हास्पीटल का बिल चुकाने के लिये एक
फुटी कौडी भी नही थी। आज मीना कुमारी इस बेदर्द और लालची दुनिया से बहुॅत
दूर भले ही चली गई हो पर उनके चाहने वाले हमेशा उन को याद करते रहेगे और
कहते रहेगे मीना कुमारी हम तुम्हे कभी नही भूला सकते।
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