Friday, August 12, 2011

डायरी/इस खिड़की से/रमेशचन्द्र शाह



Thursday, August 4, 2011


 

इस खिड़की से/रमेशचन्द्र शाह

इस खिड़की से रमेशचन्द्र शाह प्रकाशक किताबघर रमेशचन्द्र शाह ने अपनी डायरी के इस दूसरे खंड में 1986-2004 तक के कालखंड की महत्वपूर्ण राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक सरोकारों के साथ अपने नजरिए को दर्ज किया है। इस डायरी में 70 और 80 के दशक की छूटी हुई सामग्री भी शामिल है। डायरी नितांत अपनी निजी अनुभूतियों को अंकित रकने के लिए ही लिखी जानी चाहिए का मूलमंत्र में विश्वास रखने वाले शाह ने अपनी पहली डायरी अकेला मेला में 1981-85 के दौर की राम कहानी दर्ज की ।

खुद लेखक के शब्दों में डायरी लेखन अपने आप को दूर से देख सकना मानो वह कोई दूसरा हो। षाह के इंद्रधनुषी संसार में कबीर, निराला, जयशंकर प्रसाद, अज्ञेय, त्रिलोचन, शमशेर बहादुर सिंह, निर्मल वर्मा से लेकर काफका, इलियट, रूडोल्फ, राबर्ट फ्रास्ट, हैरल्ड रोजेबर्ग की झलकी मिलती है। गागर में सागर की तरह कविता, चित्रकला, यात्रा वृंत्तात से लेकर आलोचना तक एक स्थान पर उपलब्ध है।

लेखक ने दुनिया में सभ्यता के नाम पर हो रहे संघर्ष से लेकर भारतीय समाज से कटे देसी बौद्विक वर्ग और शैक्षिक दुनिया के सच से लेकर भाषाई गुलामी को अपनी कसौटी पर पूरी तरह कसा है । मुद्दे की बात यह है कि हाल में अपनी मौत के बाद भी लगातार मीडिया में सुर्खियां बना हुआ ओसामा बिन लादेन भी लेखक की दृष्टि से बचा नहीं है । जबकि आज भी हिंदी का बौद्विक समाज इसे असहज विषय मानकर कुछ बोलने लिखने से बचाव की भूमिका में ही है । जबकि शाह इस पर मौंजू टिप्पणी दर्ज करते हुए लिखते हैं कि तीन सौ करोड़ से अधिक डाॅलरों की संपत्ति का मालिक बिन लादेन टाइम्स पत्रिका को इंटरव्यूह देते हुए एक ऐसी बात कहता है जो रोंगटे खड़े कर देने वाली है । यह कि हमारे महजब में उन व्यक्तियों के लिए खास महत्व की जगह सुरक्षित है परलोक में, जो जिहाद में हिस्सा लेते है । मेरे लिए अफगानिस्तान की इस गुफा में बिताया गया एक दिन भी मस्जिद में इबादत के सौ दिनों के समतुल्य है। 23 सितंबर 2001 को हैरल्ड टिब्यून की खबर पर लेखक टिप्पणी दर्ज करता है कि सवाल उठता है सहज ही, तब फिर ओसामा को अपने इस धर्म की प्रेरणा कैसे और कहां से मिली और उसे लगातार इतनी बड़ी संख्या में आत्मघात के लिए तत्पर मुजाहिदीन भी कहां से और कैसे उपलब्ध हो जाते रहे सवाल निश्चय ही बहुत टेढ़ा और असुविधाजनक है।

लेखक की डायरी में ऐसे अनेक मुश्किल और ज्वलंत विषय दर्ज है, जिनसे सीधे जूझने की बजाय हिंदी का बुद्धिजीवी वर्ग बगल से गुजरने में ही वीरता समझता है । सरकारी सुख सुविधाओं और प्रतिष्ठा हासिल करने के लिए शतरमुर्गी रवैए को अपनाने वाले तथा भगवा, लाल और हरे रंग की रंतौधी के शिकार बुद्धिजीवी तबके की स्थिति पर रघुवीर सहाय की इन पंक्तियों से सटीक कुछ नहीं कि खंडन लोग चाहते है याकि मंडन या फिर अनुवाद का लिसलिसाता भक्ति से, स्वाधीन इस देश में चैंकते हैं लोग एक स्वाधीन व्यक्ति से । सन् 1941 में उपन्यासकार ई एम फाॅस्र्टर की भारतीय बुद्धिजीवी सिवा राजनीति के और कोई बात ही नहीं करते की टिप्पणी के जरिए आत्मकेंद्रित बौद्धिक समाज के दोगलेपन को उजागर करते हुए लेखक कहता है कि देश की, समाज की वास्तविक समस्याएं कभी भी इन बुद्धिजीवियों की नींद हराम नहीं करती । शिक्षा के अभाव में नब्बे प्रतिशत लोगों के रचनात्मक कार्यों में भागीदारी नहीं है-यह उनकी चिंता का विषय कभी नहीं रहा । न शिक्षा नीतियों का दिशाविहीन खोखलापन ही । मगर यूजीसी स्केल लागू करने के मुद्दे को लेकर कश्मीर से कन्याकुमारी तक सारे विश्वविद्यालय और काॅलेज महीने भर तक ठप्प करके सीपीआई और सीपीएम की अगुवाई में संघर्षरत शिक्षकों ने अपनी अभूतपूर्व और अभूतपश्चात एकता का रिकार्ड कायम कर दिया ।

फिर डायरी में एक मौंजू सवाल दर्ज होता है कि अंग्रेजी के बिना दस मिनट तक भी अपनी बौद्धिक बहस चला पाने में अक्षम इन बुद्धिजीवियों से भला अब कौन पूछने वाला है कि हिंदुस्तान की महान् भाषाओं की बेकद्री करने वाला कौन है । इसी के मारे लेखक देश के सामूहिक औसत चरित्र की निंदा और कामचोरी की मुखर आलोचना करने वाले नायपाॅल को सरकारी पट्टे पर अपनी राजनीति चलाने वाले और समाज को उसकी असली आत्मा होने का विश्वास दिलाने की चाहत रखने वाले सहमत छाप बुद्धिजीवियों से कहीं ज्यादा भरोसेमंद और प्रामाणिक मानता है । मैं कह चुका हंू कि मुझे अपनी परंपरा और पूर्वजों पर गर्व है कि जिन्होंने बौद्धिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में भारत को विश्व में अग्रणी बनाया । मैं आपसे पूछता हंू-भारत के इस अतीत के बारे में आप कैसा महसूस करते हैं, क्या आप खुद को उसका सहभागी-उत्तराधिकारी महसूस करते हैं और इसलिए, क्या आप उस सपंदा पर सचमुच गर्व करते हैं जो आपकी भी उतनी ही है, जितनी मेरी या कि आप उसे पराई वस्तु मानते हैं-और अपने को उसके सामने परदेसी-अजनबी महसूस करते हैं । सन् 1948 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पंडित जवाहरलाल नेहरू के दीक्षांत भाषण के उपरोक्त अंश की टीप के साथ लेखक आज की राजनीति और शिक्षा जगत में पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसी दूरदर्शिता और साफगोई की कमी को रेखांकित किया है ।
उसे लगता है पोलिटिकल करेक्टनेस के मारे इस देश में आज सच बोलना ही मुहाल हो गया है ।

( कादम्बिनी, अंक जुलाई 2011 में प्रकाशित )

Saturday, July 30, 2011


media ki kahani

सत्ता के नंगेपन ने सचिन को दोराहे पर ला दिया था।यूज करने और यूज होने का विकल्प था तो दूसरी ओर अकेले जूझने का। काला,सफेद रंग चौसर में होता है राजनीति के ग्रे रंग ने उसकी जिंदगी बदरंग कर दि थी। सत्ता के गुबंद में कई राज ममी बन चुके थे,कुछ पैसे की धार और सलवार की कतार में थे।सत्ता की रखवाली कोई ठकुरेती नहीं समय की मार थी।शेर,सियारों का कैदी था तो गीदड़ भगवानमहान से माहौल गुंजाएं हुए थे।समय,सीखने से ज्यादा भुलाने का था।
राहुल दिल्ली के आइआइएमसी में पढ़ाई के बीच में ही मुंबई एक चैनल में ब्रेक मिलने की वजह से यमुना की बजाया समुंदर किनारे पहुंच गया । करीब साल भर चैनल में रात की शिफ्ट में काम करने के बाद उसका खुद के बारे में मानना था कि वह पहले से ज्यादा काला हो गया था । पर यह चमड़ी से ज्यादा मन का मैल था जो कि चैनल में रात की शिफ्ट की देन चैनल था।
उसकी यूनिट से लेकर कैन्टीन का किशोर तक दोनों के दिल में उठ रही प्यार की लहरों के शोर से वाकिफ थे । उनके कदमों की आहट से संगी साथी उनके मिलने का अंदाजा लगा लेते थे तो लंबे समय तक न दिखने पर अक्सर कैन्टीन में मिलने वाली लखनऊ की सपना उसे नजमा के रात की शिफ्ट में न होने की बात बता देती थी ।
मजेदार बात यह थी कि यह ब्रेकिंग स्टोरी लाने वाली नजमा दीन के नाम हरदम दान करती थी । सिनेमा की बेपर्दा हकीकत को पूरे से बयान करने वाली पटना के नामचीन डॉक्टर की यह खुद्दार लड़की अपने निकाह के इकरारनामे को ठुकराते हुए ठाकरे की मुबंई में आबाद थी । इस ब्रेकिंग स्टोरी पर काम करते हुए दोनों की मुलाकात की बात चैनल में आम हो गई थी ।
उसने गोरे, सुदंर स्क्रीन पर चमकने वाले चेहरों को एडिट रूम में चैनल हैड के साथ अंधेरे में जाते देखा, टीआरपी की दौड़ में अंधे आउटपुट इंचार्ज को मुंबादेवी के बाबाजी और कामतीपुरा की बाईजी के आगे झुकते देखा तो सेकुलरवाद की वजह से मुंबई के गली चौराहों पर फल बेचने के धंधे पर बांग्लादेशियों के कब्जे की स्टोरी को ड्रॉप होते हुए देखा था ।


kahani 2

उसने कितनी बार बस स्टॉप पर इंतजार में बसों को छोड़ा था, ऑफिस से उसके साथ निकलने के फेर में रहा था। पर साथ चलने के बावजूद वह जिंदगी में नहीं आई। हिस्से आया तो सिर्फ इंतजार। आज उसी स्टॉप पर बीते पल ताजा हो गए क्योंकि दर्द तो दिल के कोने में सीता की तरह समा गया था। मिलने, ‌बिछड़ने की कश्मकश से जिंदगी कहां रूकती है । झूठ के पांव नहीं होते और सच का गांव नहीं होता । सो, बस आई तो वह उसमें चढ़ गया और मन स्टॉप पर ही रह गया ।


pasandida line

कभी किसी का साथ

ऐसा मत छोड़ना दोस्त

जिंदगी बहुत लंबी है

फिर आमने सामने ला खड़ा करती है


पहला

पहला जन्म,

पहला स्पर्श

पहला नाद,

पहला पग,

पहला डग,

पहला पाठ,

पहला गुरू

पहला भाव,

पहला अभाव

पहला कुभाव,

पहला प्रभाव

पहला पराभव

पहला स्वीकार,

पहला अस्वीकार

Saturday, July 16, 2011


bombay bomb blast

अब तो जटा खोल, गंगा को बहने दो
हो चुका बहुत, अब शिव का तांडव होने दो
कितना संभलोगे, इन मर चुके पुतलों को
खुली आंखों से, सोने वालो को सोने दो
पार से आए, बन बैठे पहरूओं का ज्यादा भरोसा ठीक नहीं
डालर के लारे, कहां गिरेंगे पता नहीं
दिल्ली से वाशिंगटन क्या लाहौर भी दूर नहीं
रण है, रणभेरी है, रणछोड़दास है
ऐसे मन के कालों से धरती भारी, आकाश उदास है
चारों ओर पसरा शल्य भाव, जता रहा अभाव है
ऐसी क्या मजबूरी है, मरना जनता का जरूरी है
मेरी जुबानी हो या तेरे जुबानी, अब बहस बेमानी है
देश के शरीर पर उग आई है फुन्सियां, उनका ईलाज अब जरूरी है
चीरा लगाएं या गरम चिमटा चिपकाएं, कुछ होना अब अपने लिए जरूरी है
याद करो उन मासूमों की कुर्बानी, न आसमान फटा न धरती हिली
न किसी ने दी, तिरंगे में लिपटाकर तोपों की सलामी
क्या फर्क रह जाता मांग के लाल सिंदूर और चिता का लाल चंदन में
उजड़ से उजाड़ तक दोनों की एक ही नियति है
राजा विदेह के लिए देह का क्या है मोल, जब बड़े हो रहे हो खेल
सभा में विमर्श जारी है संयम का छूटना भारी है,अब जनता के अष्टाबक्र की बारी है

Tuesday, June 28, 2011


अंतिम संवाद/नलिन चैाहान

रात की आखिरी मेट्रो थी लिहाजा खचाखच थी। लेडिज कम्पार्टमेंट में वे एक दूसरे से ऐसे घुलेमिले थे मानो गर्म पानी में रम । दूसरे मुसाफिरों पर जोड़े के रमने का सुरूर तारी था । लेडिज डिब्बा मुकम्मल प्यार की रील था । सबकी निगाहों का फोकस इन पर था तो जोड़ा एक दूसरे में डूबा था । आखिरी स्टेशन के साथ रील खत्म हुई तो पात्र भी उबरे और दर्शक भी । जिंदगी फिर अपनी रफ्तार पर चल पड़ी।

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