Friday, July 15, 2011

हम जानते पर मानते नहीं




श्‍याम नारायण रंगा
हमारे समाज में और आस पास के माहौल में काफी दोहरे मुँह वाले लोग रहते हैं। लोग कहते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं। व्यक्ति के कहने और करने में बिल्कुल भिन्नता रहती है। यही प्रवृति आज समाज में सारी और दिखाई दे रही है। हालात ऐसे हो गए हैं कि ये समझ पाना मुश्किल हो गया है कि कौन कैसा है और पता नहीं कब किस रूप में सामने आ जाए। चारों तरफ ऐसे झूठ का माहौल है कि सारे वातावरण में झूठ ही झूठ घुलामिला नजर आता है। व्यक्ति की उपस्थिति उसके झूठी उपस्थित नजर आती है। आज कोई भी व्यक्ति किसी का असली चेहरा नहीं जान पाता है।
उदाहरण के लिए हम बात करें तो व्यक्ति आदर्श व समझ की बड़ी बड़ी बातें करता है परन्तु जब उसके सामने उन आदर्शों और उपदेशों को अपनाने की बात आती है तो यह कहकर पल्ला झाड़ लेता है कि ये तो सिर्फ कहने की बातें है अपनाई थोड़ी जाती है। मतलब जो बात उसने खुद ने कही उसे ही वह अगले ही पल मानने या उसके अनुसार चलने से मना कर देता है।
इस संदर्भ में एक कहानी मेरे जेहन में आती है कि एक सेठजी रोज एक महात्मा जी का प्रवचन सुनने जाते थे और महात्मा जी का बड़ा सम्मान भी करते थे। महात्मा के गुणगान सबके सामने ऐसे गाते थे जैसे उनके समान कोई और महात्मा है ही नहीं। ये महात्मा जी अपने प्रवचनों में रोज प्रत्येक जीव के प्रति प्रेम करने की बात कहते और प्रत्येक जीव को न मारने का प्रवचन देते थे। एक दिन सेठ जी इस सत्संग में अपने बेटे को भी लेकर गये। बेटे ने बड़े श्रद्धा से प्रवचन सुना। सेठ जी अगले ही दिन बेटे को अपनी दुकान पर ले गए और दुकान बेटे के भरोसे छोड़ खुद प्रवचन सुनने चले गए। पीछे से दुकान में एक गाय ने मुँह मार लिया और वहाँ पड़ा सामान खाने लगी। यह देखकर बेटा गाय के पास बैठ गया और उसे सहलाने लगा। थोड़ी देर में सेठजी आए और यह दृष्य देखकर आग बबूला हो गए और बेटे को भला बुरा कहने लगे तो बेटे ने महात्मा जी का उल्लेख करते हुए कहा कि गाय को कैसे हटाता, वह तो अपना पेट भर रही थी और उसे मारने पर जीवों पर हिंसा होती। सेठजी समझ गए और तुरंत बोले कि बेटा प्रवचन सिर्फ सुनने के लिए होते हैं और उस पाण्डाल तक के ही होते हैं, वहाँ के प्रवचन दुकान पर नहीं लाए जाते सो आगे से ध्यान रखना।
कहने का मतलब यह है कि सब लोग जानते हैं कि सच क्या है और झूठ क्या तथा सही क्या है और गलत क्या और मजे की बात यह है कि सारे लोग आपस में चर्चा सही सही बातों की करते हैं और हर वक्त अपने आप को सही साबित करने की कोशिश में ही लगे रहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति का अपने दोस्तों के सामने और समाज के सामने ऐसा ही व्यवहार होता है जेसे सारा संसार तो गलत है पर मैं एकदम सही हूँ और सत्य के मार्ग पर चलता हूँ। प्रत्येक व्यक्ति हर वक्त यही साबित करने में लगा रहता है कि मैं एकदम सही हँ ओर कभी गलत नहीं करता हूँ। मतलब यह है कि ऐसा प्रत्येक व्यक्ति सही और गलत की अच्छी समझ रखता है और पहचान सकता है कि कौनसी बात सही है और कौनसी गलत है। परन्तु जब व्यवहार में उस बात को अपनाने की बात आती है तो सब के सब पीछे हट जाते हैं और व्यवस्था और सिस्टम की दुहाई देकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश करते हैं।
प्रत्येक व्यक्ति को मालूम है कि झूठ नहीं बोलना चाहिए, भ्रश्टाचार नहीं करना चाहिए, सत्य का सहारा लेना चाहिए, चापलूसी नहीं करनी चाहिए, धर्म पर चलना चाहिए, कपट और धोखा नहीं करना चाहिए आदि आदि लेकिन ये सब कुछ जानने के बाद भी व्यक्ति इन बातों को मानता नहीं है। वह झूठ बोलता है, जमकर भ्रश्टाचार करता है, परनिंदा करता है, अधर्म और भ्रष्‍ट व्यक्तियों का साथ देता है, अपने राश्ट्र ये गद्दारी करता है। इसका यह मतलब हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति जानबूझकर यह सब करता है और वह जानता है कि उसे ऐसा नहीं करना चाहिए फिर भी वह करता है और मानता नहीं है।
हमारे धर्मगुरू, कवि, नेता, वकिल, डॉक्टर, पत्रकार आदि आदि सभी वर्गों के लोग एक दूसरे के सामने बड़ी सैद्धान्तिक और समझ की बातें करते हैं लेकिन जैसे ही अपनी गद्दी से उतरते हैं या माहौल से हटते हैं सब भूल जाते हैं। धर्मगुरू एक गद्दी पर बैठ कर सन्यास, बैराग, धर्म, परोपकार, सच, आस्था, भक्ति, त्याग, बलिदान की बातें करते हैं परन्तु जैसे ही भाशण पूरा होता है वे ही महँगी गाड़ियों में सवारी करते हैं और एयरकन्डीसन्ड कमरों में जीवन बीतातें हैं और ऐसे भी मामले आए हैं कि ये धर्मगुरू भोग, लिप्सा व वासना के चक्रव्यूह में फॅंसे रहते हैं। इसी तरह वकील कानून की बात करता है उसकी रक्षा करने की बात करता है परन्तु यह जानते हुए कि अमुक व्यक्ति ने हत्या की है उसे बचाने का प्रयास किया जाता है। ऐसे कितने वकील है कि जिन्होंने यह जानकर अपना क्लाईंट छोड़ दिया कि क्लाइन्ट गलत है। डॉक्टर बातें बहुत करते हैं लेकिन भारी भरकम फीस के बिना देखने वाले डॉक्टरों की संख्या बहुत कम है। मेरे कहने का यही सार है कि किसी को भी यह समझाने की जरूरत नहीं है कि उसे क्या करना चाहिए क्योंकि प्रत्येक वर्ग का व्यक्ति यह जानता है कि वह कर क्या रहा है और करना क्या चाहिए। उसे सही गलत में भेद करना आता है पर वह करता नहीं है।
यही कारण है कि आज हमारे देष में इतनी समस्याएँ हैं। हमारी कथनी करनी में भेद है। प्रत्येक व्यक्ति अगर अपनी कथनी और करनी में फर्क करना बंद कर दे तो सारी समस्याएं ही समाप्त हो जाएंगी। व्यक्ति जैसा अपने आप को समाज और दोस्तों के सामने प्रकट करता है वेसा ही व्यवहार अपने जीवन में करना शुरू कर दे तो हमें किसी अन्ना हजारे या किसी समाज सुधारक ही जरूरत ही नहीं पड़ेगी। हमें जरूरत है कि हम सब अपने आप को सुधार लें और जो जो अच्छी और सही बातें हम जानते हैं उसे मानना भी शुरू कर दे और खुद अपनी समझ से काम लेना शुरू कर दें। बोलने व करने के इस भेद ने आज हमें ऐसे चौराहे पर ला खड़ा कर दिया है कि हम किसी पर भी भरोसा नहीं कर पा रहे हैं। पता नहीं कब कौन धोखा दे जाए आज मनुष्‍य का मनुष्‍य पर से और अपनों का अपनों पर भरोसा उठ गया है। आज सच्चे और ईमानदार रिश्‍तों का जो अभाव समाज में देखा जा रहा है वह इसी कारण है कि हम अपनी कथनी करनी में भेद कर कर हैं। संशय भरे इस माहौल में कोई भी किसी पर भी विष्वास नहीं कर पा रहा है। सब को यह डर लगा रहता है कि क्या पता कब कौन पलट जाए। आज आम आदमी की यह सोच बन गई है कि यार हम किसी से अपने संबंध क्यों खराब करें बस थोड़ा भला बोलना ही तो है भले ही वह झूठ हो और इसी प्रवृति ने इस समस्या को जन्म दिया है। हम सत्य बोले प्रिय बोले और असत्य प्रिय न बोले तभी समाज का भला होगा और तभी राष्‍ट्र का भला होगा। हम अपनी कथनी और करनी में एकता लाएँ और जो जानते हैं उसे मानना भी षुरू करे तो निश्‍चय ही समाज में समझ का माहौल बनेगा और हम निरंतर विष्वास के रिश्‍तों में बंधकर एक सुदृढ़ समाज और ईमानदार राष्‍ट्र का निर्माण कर सकेंगे।

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