Friday, July 15, 2011

आउटसोर्सिंग क्या बला है?








हरिकृष्ण निगम

आज हमारे देश में जब से आर्थिक सुधारों एवं निजीकरण के दौर का प्रारंभ हुआ है, अंग्रेजी भाषा की जो शब्दावली सबसे अधिक सामान्य वार्तालाप में उपयोग से सभी के द्वारा लाई जा रही है उसमें ‘आउटसोर्सिंग’ एक ऐसा हीं शब्द है। इसी तरह भूमंडलीकरण के कारण भी जब से बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने इस देश में पैर पसारे हैं बी. पी. ओ. एक दूसरा आधुनिक आद्याक्षरों का वाक्यांश है जो हर पढ़े-लिखे की जूबान पर रहता है। हमारे मीडिया में तो इस शब्द को उस संदर्भ में तब से अधिक उपयोग में लगातार लाया गया जब से अमेरिका और पश्चिमी देशों में अपनी बढ़ रही बेरोजगारी के लिए इसी ‘आउटसोर्सिंग’ को दोषी माना गया है। आर्थिक मंदी और लगभग 10 प्रतिशत बेरोजगारी की समस्या के लिए दूसरे एशियाई देशों के बसे लोगों को दोषी के रूप में देखा जा रहा है। दूसरी ओर अमेरिकी उद्यमियों द्वारा उनके नियमित श्रमिकों का रोजगार उन देशों में ‘आउटसोर्सिंग’ के हवाले किया जा रहा है जहां उनके स्तर से यह काम काफी सस्ते में किया जा सकता है। स्वयं राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इसके लिए चुनावी घोषणा पत्र में भी इसी ‘आउटसोर्सिंग’ पर प्रतिबंध लगाने का आश्वासन दिया था। उस समय हड़कंप मच गई थी जब अपने वायदे को मूर्त रूप देने के तथा अपनी लोकप्रियता को गिरने से बचाने के लिए उन्होंने कुछ दिनों पूर्व अमेरिका में काम करने के इच्छुक लोगों को दिया जाने वाला वीजा ‘ एच-वन-बी’ और ‘एल-वन’ का शुल्क बढ़ाकर दो हजार डॉलर कर दिया था। साथ ही साथ अमेरिकी उद्योगपतियों को भी चेतावनी दी थी कि अगर वे देश का काम विदेशों में करवायेंगे तो करों में छूट या अन्य सुविधाओं से वंचित कर दिया जाएगा। फिर भी भारत का ‘आउटसोर्सिंग’ का 60 प्रतिशत से अधिक का बाजार अमेरिका से आता है व उत्तरोत्तर प्रगति कर रहा है। इसका एक कारण भारतीयों के संगणकों के कार्य की गुणवत्ता और तुलनात्मक रूप से न्यूनतम कीमत पर उपलब्धता है।
 शायद इसलिए चाहे हमारे देश के नगरों के कॉल सेंटर हों या बी. पी. यो. उनमें दिन रात करने वालें को कुछ लेखक ‘साइबर कुली’तक कह चुके हैं। अमेरिका के उपर्युक्त उदाहरण से स्पष्ट है कि चाहे ठेके पर हो, या अनुबंध के माध्यम से अथवा ‘सब कांट्रैक्ट’ के जरिए हो। ‘आउटसोर्सिंग’ का साफ अर्थ किसी तीसरी पार्टी द्वारा निष्पादित कार्य को कहा जा सकता है। यह हमारे देश में क्यों फल-फूल रहा है? इसका एक कारण संचार क्रांति के साथ विशेषकर अमेरिका का टाईम जोन भी कहा जाता है जहां हमारे यहां दिन होता है वहां रात होती है। उनके द्वारा वहां दिन के अंत तक भेजे हुए काम को अगले दिन जब सामान्तः वे प्रातः कार्यालय जाते हैं उसका भारतीय हल उनकी टेबिल पर पहुंच जाता है। वैसे भी त्वरित संप्रेषण क्षमता की उपलब्धि से और भारत में अंग्रेजी भाषा के अधिकाधिक उपयोग से वह अन्य देशों जैसे- चीन, जापान, फ्रांस, जर्मनी या दूसरे एशियाई देशों से एक कदम आगे रहता है। शायद इसलिए ‘लुफ्तहांसा’ जैसी प्रसिध्द जर्मन वायुसेवा हो, या कुछ अंतर्राष्ट्रीय कर निर्माता या बड़े बहुराष्ट्रीय कंपनियाें की वैश्विक ग्राहक दूर-सुदूर के देशों के किसी अनामी क्षेत्र में भी बैठा हो, उसके प्रश्नों व मांगी जानकारी का हल उसी के लहजे में ऐसी अंग्रेजी में दिया जाता है जैसे वह उनके क्षेत्र का हो। उसे पता ही नहीं चलता कि वह एक भारतीय इस देश के पूणे, मुंबई, बंगलौर या गुड़गांव के किसी कार्यालय से वार्तालाप कर रहा है। आज ‘न्यूट्रल अंग्रेजी’ के साथ-साथ ‘बी. बी. सी.’ की ‘क्वींस इंग्लिस’ कहलाए जाने वाले लहजे के साथ-साथ अमेरिकी अश्वेत अथव पूर्वी समुद्र तट के न्यूयार्क या न्यूजर्सी इलाकों अथवा लूसियाना या टेक्सास या डेनवेर जैसे क्षेत्रों में अंग्रेजी किसी स्थानीय पुट के साथ बोली जा सकती है इसका भी प्रशिक्षण भारतीय कर्मचारियों को आवश्यकतानुसार दिया जा सकता हैं इस कारण भी ‘आउटसोर्सिंग’ के उद्यम को सन 2000 के बाद उल्टी ही जैसे भारत में पंख लग गए हो।
 यदि हम ‘आउटसोर्सिंग’ के आधुनिक घटनाक्रमों की ओर मुड़ कर देखें तो इटली की ‘फेरारी’ कार के निर्माताओं को इसका जनक माना जाना चाहिए। 80 के दशक में इस कार की कंपनी ने अपने कार के सॉफ्टवेयर बनाने के लिए टी. सी. एस. के साथ अनुबंध किया। इसके बाद अमेरिका के सिटी बैंक ने अपनी ॠण एवं अन्य सेवाओं को बढ़ावा देने के लिए भारत के साथ अन्य देशों की संगणक कंपनियों के साथ अनुबंध किया।
 वैसे भारत में इस व्यवस्था का पदार्पण सन् 2000 में हुआ। ‘स्पेक्ट्रामाइंड’ की पहली ‘बिजनेस प्रोसेस’ आउटसोर्सिंग’ या ‘बी. पी. ओ.’ कंपनी कहा जाता है। उसी साल ‘ई-फंड’ नामक कंपनी मुंबई में और ‘ई. एक्स. एल.’ नाम का एक बी. पी. ओ. नोएडा में खुला। सन 2002 में ‘विप्रो’ ने ‘स्पेक्ट्रामाइंड’ का अधिग्रहण किया और बाद में ‘विप्रो’ की तरह ‘इंफोसिस’, ‘पटनी’ और ‘सत्यम’ ने भी बड़े स्तर पर इस उद्योग में प्रवेश कर संगणक व्यवसाय की कायापालट कर दी। वैसे ‘बी. पी. ओ.’ का चलन इस देश में कोका कोला कंपनी की देन कहा जाता है जिसने पहली बार उत्पाद-वितरण के काम को ‘आउटसोर्सिंग’ में ग्राहक सेवा कैसे प्रदान की जाती है उसका एक सशक्त मॉडल दूसरी कंपनियों के साथ उदाहरण की तरह रखा है। आज तो चाहे बैंक हो, या बीमा या वित्तीय कंपनियां सभी अपने खर्चों पर नियंत्रण रखने के लिए तीसरी पार्टी से अनुबंध कर कार्य के ठेके जैसे देते हैं।

वैसे हमारे देश में बहुत अर्से तक आदमी ‘आउटसोर्सिंग’ का क्षेत्र या अर्थ मात्र कॉल सेंटर तक सीमित मानता रहा है। पर वस्तुतः यह काम का मात्र एक ही पक्ष है। अब तो उससे एक कदम आगे के. पी. ओ. या नॉलेज प्रोसेसिंग ‘आउटसोर्सिंग’ के जरिए ज्ञान व सुचना संबंधी हर सेवा चाहे व डॉक्टरों, अस्पतालों, अर्थशास्त्रियों, सांख्यिकी विशेषज्ञों की जरूरतें हों या तकनीकी पत्रकारों, लेखकों, या व्यवसाय विश्लेषकों की दिनचर्या से जुड़े हों, सभी क्षेत्रों में यह सेवा उपलब्ध हैं।
 आज देश भर में फैले बी. पी. ओ. में 22.3 लाख कर्मचारी काम कर रहे हैं जिनमें से आधे स्वाभाविक रूप से रात्रि की पाली में काम करते हैं। एक अनुमान के अनुसार इंटरनेट का उपयोग करने वालों के एक सर्वेक्षण में लगभग 3.50 करोड़ नियमित रूप से नेट का उपयोग करने वालों में 32 प्रतिशत इसे 9 बजे रात्रि से 12 बजे रात्रि तक प्रयोग में लाते हैं और लगभग 3 प्रतिशत या 10,50,000 इसे अर्धरात्रि के बाद ऑन लाईन कार्य में लाते हैं। चाहे गुड़गांव स्थित हरियाणा का संगणक केंद्र हो या बंगलुरू अथवा मुंबई हो यह शहरीकरण का एक नाया पक्ष या रात्रि की अर्थव्यवस्था भी है जिसने कर्मचारियों की खानपान की अनियमितता और जीवनशैली द्वारा उनकी शरीर की घड़ी में व्यतिक्रम ला दिया है। पारंपरिक आठ घंटे के दिन के कार्य के स्थान पर रात्री कालीन काम के दो घंटों के काम के कारण नई स्वास्थ्य और सामाजिक समस्याएं भी पैदा कर दी है। जिसमें पारिवारिक संबंधों के अलावा संबंधियों या मित्रों के लिए समय देना भी दुर्लभ होता जा रहा है। बहुधा अनेक निजी कंपनियों के अधिकारियों को रात्रि के 3 बजे या ऐसे ही किसी समय में चाहे सिडनी हो या कोई अमेरिकी शहर जिससे बात करने के लिए कांफ्रेंस कॉल व्यवस्थित करनी हो घंटों बात करते देखा जा सकता है। सच तो यह है कि अब सिमट कर यह 24 घंटे सचेत रहने और बातें करने की दुनियां बन चुकी हैं। लगता है इस देश में भी अब नियमित पारंपरिक काम घंटों के बाद ही विपणन और वाणिज्य के अनेक रूपों के काम की शुरूआत होती है।
 उद्योगपतियों की दृष्टि में आज इस व्यवसाय के नए-नए लाभप्रद पक्ष खुलते जा रहे हैं जिससे उनके कार्यक्षेत्र की परिधि भी लगातार विस्तृत हो रही है। अब तो अनेक उद्योगपति अपने उत्पाद के विपणन, प्रचार-प्रसार व उसकी छवि निर्माण के लिए विज्ञापन या जन संपर्क विभाग भी न रखकर वह किसी अनुभवी व निगुण मीडिया संस्थान से अनुबंध क र कम खर्चवाली सलाह को ‘आउटसोर्स’ करता है और डिजिटल संप्रेषण के युग में यह अधिक कारगर सिध्द होता है। इसी तरह अलग-अलग हर शहर में ग्राहक सेवा केंद्र खोलने के स्थान पर कम लागत में किसी दक्ष एवं सक्षम संस्था के माध्यम से काम कराता है।
 पर यह भी सच है कि इस तरह के ‘आउटसोर्सिंग’ का चलन एक दुधारू तलवार है। व्यवसायी जहां अपने मुनाफे को सरलता से बढ़ा चुके हैं। यह कर्मचारियों व सफेदपोश श्रमिकों का घोर शोषण भी कर रहा है। नियमित स्थायी रोजगार कम होता जा रहा है। क्योंकि ठेके पर हुए कर्मचारियों के भविष्य की कोई सुरक्षा नहीं है। वेतनवृध्दि, पदोन्नति व सेवानिवृत्ति होने पर मिलने वाले लाभों पर निरंतर सीमाएं खिंचती जा रही हैं।

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