Thursday, July 21, 2011

युवा पीढ़ी-क्षण में जीवन जीती क्षणभंगुर बनी पीढ़ी


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यंग, डायनेमिक, एनर्जेटिक और ओपन माइंडेड पीढ़ी का जीने का अंदाज बिल्कुल बदल चुका है। ब्रान्डेड और डिजाइनर कपडे़, तेज रफ्तार बाइक-कार का दीवाना यूथ अब रूकने को तैयार नहीं। रोटी, कपड़ा और मकान पिछली पीढियों की तरह इनके पारंपरिक खांचे में नहीं आते। बेहतरीन करियर की दीवानी यह पीढ़ी खूब कमाने और जी भर के खर्चने में विश्वास रखती है। अंतर्राष्ट्रीय बैंक, शापिंग माल्स, मल्टीप्लेक्स और क्लब इसी पीढ़ी के भरोसे चल रहे हैं। जूते, मोजे, अंडरगारमेंट, शर्ट, टी-शर्ट, टाप, जीन्स, घड़ी, टाई, चश्मा, परफ्यूम, बाडी लोशन, फेस पैक, बर्तन, फर्नीचर, सिगरेट, वाइन- सब कुछ मंहगा, ब्रांडेड और डिजाइनर।
तीन-तीन, चार-चार बैंकों के कर्जदार, मोटी सेलरी, लेकिन बैंक में ढेला तक नहीं। न एलआईसी, न मेडीक्लेम। चमचमाती बाइक या कार,  रहने को किराये का ही सही, बड़ा सा घर या फिर किसी पाश इलाके में पेइंग गेस्ट। पब, डिस्कोथेक, ड्रग पार्टियां। आमदनी तीस-चालीस-पचास हजार। खर्च अस्सी, नब्बे हजार। यह हिंदुस्तान की वह युवा पीढ़ी है जो सही मायने में अस्तित्ववादी दर्शन की संवाहक बनी सिर्फ क्षण में जीती है। अंतर्राष्ट्रीय बैंक, शापिंग माल्स, मल्टीप्लेक्स और क्लब इसी पीढ़ी के भरोसे चल रहे हैं। यह जमकर कमा रही है और धड़ल्ले से खर्च कर रही है। इसे अतीत से मतलब नहीं और यह भविष्य के बारे में सोचने को फिजूल मानती है। यह सिर्फ वर्तमान में जीती है। गरीबी की रेखा और दर्द से अनजान यह उन लाखों युवाओं का रहस्यमय और अभेद संसार है, जो जेब में पांच-सात बैंकों के क्रेडिट कार्ड लिए, कोक पीते, बर्गर चबाते, कंप्यूटर स्क्रीन पर आंख गड़ाए छह, आठ, दस या पंद्रह मंजिला इमारतों के वातानुकूलित कमरों में दिन रात खुद को सिद्ध करने में जुटा है। इनके जीवन का लक्ष्य है-पैसा। निरंतर हाहाकार है जो चौबीस घन्टे अनवरत उपस्थित है। राग-द्वेष, संवेदना, लगाव, रिश्ते, सरोकार से अछूता यह संसार मुंबई, दिल्ली, पुणे, कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद, बेंगलूर और अहमदाबाद जैसे हर शहर में है।
यह क्षणभंगुर पीढी है, जो चेहरे पर शिकन लाये बिना किसी राक शो का तीन हजार का टिकट भी खरीद लेती है और किसी फाइव स्टार होटल के सैलून में जाकर दो हजार रुपये में अपने बाल भी कलर करा लेती है। इस पीढी के लड़के कानों में और लड़कियां नाभि में रिंग पहनती हैं। उत्तर आधुनिक समय की कोख में पैदा हुआ युवाओं का यह मायावी संसार है। आईटी कंपनियों, बैंकों, काल सेंटरों, टीवी चैनलों, एफ.एम.रेडियो, शापिंग माल्स, विज्ञापन एजेन्सियों, फिल्म तथा सीरियल निर्माता कंपनियों, फैशन हाउसों तथा मल्टीप्लेक्स थियेटरों में अठारह से अट्ठाइस की उम्र वाले युवाओं की बडी फौज है, जो अठारह से बीस-बीस घंटे काम कर रही है। ऊपर से चकाचक यह पीढ़ी काम के भारी तनाव और दबाव से गुजर रही है। यहाँ बिना परिचय के कोई भी किसी से पूछ लेता है - डू यू वान्ट टू स्मोक अप.. अनिद्रा, तनाव, हाथों में कंपन, नजर की कमजोरी, हाई ब्लड प्रेशर, कमर दर्द, हड्डियों की कमजोरी, कैल्सियम और हीमोग्लोबिन की कमी, यूरिक एसिड की बढ़ती सीमा, हाईपर टेंशन, एसीडिटी, अल्सर, पाइल्स, एग्जिमा, बीसियों ऐसी बीमारी हैं, जिनसे एक जमाने में युवाओं का कोई लेना-देना नहीं था, अब यह सब युवा वर्ग के संग-साथ हैं।
और सेक्स.. बताते हैं सेक्सोलाजिस्ट डा.प्रकाश कोठारी। आफिस का तनाव सेक्सुअल लाइफ पर खतरनाक ढंग से असर डाल रहा है। नव दंपतियों में अनबन हो रही है। अपने ऐशो आराम के लिए मोटी तनख्वाह के लालच में नयी पीढ़ी लगातार काम में व्यस्त है। नतीजा यह कि पति-पत्नी एक-एक महीने तक यौन सुख से वंचित रहते हैं। सेक्स नैसर्गिक प्रक्रिया है। इसे रोकने से यौन विकृतियां पैदा होती हैं। तनाव अगर शयनकक्ष तक पहुंचता है तो पारिवारिक जीवन पर असर लाजिमी है। यही कारण है कि इन दिनों तलाक के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। मुबई के मालाड वेस्ट के काल सेंटर में काम करने वाला रितेश कालसेकर बताता है- सेक्स के लिए समय ही कहां है..पत्नी आईटी कंपनी में काम करती है। रात को दस-ग्यारह बजे लौटती है। मेरी ड्यूटी रात आठ से सुबह आठ की है। नौ-साढे़ नौ बजे सुबह मैं घर पहुंचता हूं, तब तक पत्नी जा चुकी होती है या जा रही होती है। सन डे को हम दोनों या तो सोते रहते हैं या झगड़ा करते रहते हैं। रितेश को इस सच के पीछे जो दर्द छिपा है, उससे पूरी युवा पीढ़ी रूबरू है। इस यथार्थ का दूसरा पहलू है- वन नाइट स्टैंड-एक रात के लिए सेक्स। यह नयी पीढी का नया फंडा है। इजी मनी इजी सेक्स। नो नैतिकता, नो शर्म। पूनम ने निःसंकोच कहा, कुंआरापन पिछडे़पन की निशानी है। कंट्रासेप्टिब्स किस मर्ज की दवा है..यह जीवन क्या बार-बार मिलने वाला है। जो भी है वह अभी है तो सेक्स से परहेज क्यों ..जो पसंद है, उसके साथ सोने में क्या परेशानी है।
यह वर्जनामुक्त, बंधनमुक्त समाज है जो अपने शौक और जरूरतों की गिरफ्त में है। मुंबई की प्रसिद्ध योग शिक्षिका डा. सुनीता पटेल बताती हैं, शहर की युवा पीढ़ी आचार, विचार, विहार और आहार चार समस्याओं से जूझ रही है। उनको नहीं पता कि वे जिंदगी से क्या चाहते हैं। यह उनके जीवन में विचार का लोप है। उनके शरीर को क्वालिटी रेस्ट नहीं मिल पा रहा है। यह उनके जीवन में विहार का लोप है। जिंदगी के प्रति उनका नजरिया क्या हो इसका अज्ञान उनके जीवन आचार का लोप है। उन्हें नहीं पता कि वह क्या खा रहे हैं। वह सही आहार की उपेक्षा कर रहे हैं। यह उनके जीवन में आहार का लोप है। महीने में अगर बीस नये रोगी मेरे पास आते हैं तो उनमे से पन्द्रह युवा हैं। वे डिप्रेशन के शिकार हैं। वे अनिद्रा के रोगी हैं। उन्हें नयी उम्र में डायबिटीज़ और ब्लड प्रेशर है। वे मानसिक और शारीरिक रूप से थके हुए हैं। उनके जीवन में रिश्तों की गर्मी नहीं है। उनकी सोशल लाइफ डैड है। मल्टीनेशनल कंपनियों के वे सबसे आकर्षक शिकार हैं।
मुंबई के गोरेगांव के एक घर में पेइंग गेस्ट के बतौर रह रहे आनंद ठक्कर ने बताया, मैंने अपने मम्मी डैडी को तीन साल से नहीं देखा। वे कानपुर उत्तर प्रदेश में रहते हैं। मैं जब बहुत थक जाता हूं तो तब मैं चला जाता हूं। काम इतना ज्यादा है कि मैं उनसे फोन पर भी बात नहीं कर पाता। सुविधाओं की भारी कीमत चुका रही इस पीढ़ी के पास न पर्याप्त नींद है, न समय पर पौष्टिक भोजन करने की मोहलत। व्यायाम तो ख्वाब है। भारी तनख्वाह..लेकिन एट द कास्ट आफ व्हाट.. डा.यश पूछते हैं,- उनके बैंकों में पैसा है लेकिन वह डैड मनी है, उसका प्रयोग नहीं हो रहा है। उनकी नौकरियों की उम्र भी उनकी अपनी उम्र की तरह कम है। इस पीढ़ी की औसत उम्र चालीस बरस है। यह डाक्टर का गुस्सा है या हकीकत।
आज के नौजवान... उत्साह और ऊर्जा से मस्त ये जुझारू बेहतरीन करियर के साथ-साथ खुलकर जीने में भी विश्वास रखते हैं। सरकारी नौकरी करने वाला कोई भी 55..56॰ साल का पिता अपने 22 साल के बेटे की आदतों से परेशान देखा जा सकता है। यह बेटा न तो बेरोजगार है, ना ही ऐसा कोई अनैतिक काम कर रहा है जो परिवार का नाम डुबा दे,  पर उसके जीने का अंदाज पारंपरिक खांचे में फिट नहीं होता। वह अपने बाबू पिता की सीखों को दरकिनार करते हुए खूब खर्चने और जुट कर कमाने को जीवन का ध्येय मानता है। उसके लिए जीवन के चालीस साल एक ही कुर्सी से चिपके रहना घुटन भरा है। वह साल में पांच नौकरियां बदलता है, साथ में तीन मोबाइल सेट और एक बाइक भी। सुबह दस बजे तक सोना, 12 बजे दफ्तर और रात दो बजे वापसी घर वालों को चिड़चिड़ा ज्यादा बनाती है। घंटों फोन पर बातें, खाने की थाली की जगह पिज्जा, पानी की बजाए कोक और ब्रांडेड शर्ट।
65 साल के आरके सक्सेना चश्मे के मोटे ग्लास के पीछे से आंखें तरेरते हुए कहते हैं, मैं रेलवे से जब 36 साल की नौकरी के बाद रिटायर हुआ तो मेरी तनख्वाह 20 हजार थी। उसी में मैंने यह मकान बनाया और बेटी की शादी की। आज मेरा 28 साल का बेटा 30 हजार रुपए कमा रहा है पर ये भी उसके लिए कम हैं। उनकी पत्नी परेशान हैं कि वह शादी के लिए तैयार नहीं है। उनको समझ नहीं आता कि वह क्यूँ वो कहता है इतने पैसों से परिवार नहीं चला सकता। इस दंपति की शिकायत है कि वह तीन हजार रुपए की जींस खरीदता है और पांच हजार के जूते जबकि ये चाहते हैं कि दस हजार में गुजारा कर के वह 20 हजार रुपए बचाए। यहीं से शुरू होता है आज के युवाओं और बुजुर्गों के बीच वैचारिक मतभेद, जो तेजी से इतना फैल जाता है कि दोनों अपनी-अपनी दुनिया में ही रम जाते हैं। किसी भी माल में चले जाइए, वहां से निकलने वाले युवाओं के हाथ में परिवार वालों से ज्यादा थैले होंगे।
दिल्ली में अकेला रहने वाला 26 साल का शांतनु बीपीओ में काम करता है। शाम के 6 बजे से सुबह के 6 बजे तक काम करने के बाद उसको केवल बिस्तर ही नजर आता है। मगर वीकेंड्स में मैं राजा होता हूं, बेहद उल्लास से वह कहता है, दिन भर बीयर पीकर हम फिल्म देखते हैं और शाम को पार्टी करते हैं। उसके रूम मेट मयंक की प्रेमिका सुबह आ जाती है, दोनों मिलकर खाना पकाते हैं और खूब सारी मस्ती करते हैं। मयंक कहता है, आप घर में रहकर क्या ये सब कर सकते हैं। 25 साल का मयंक जानता है कि उसकी उम्र में उसके पापा के दो बच्चे हो चुके थे और उनको अपनी बहन की शादी के लिए पैसा जुटाना था। उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है, क्योंकि वह अकेला है और मम्मी पापा दोनों सरकारी नौकरी में हैं, उनको पेंशन मिलेगी, घर वे बनवा ही चुके हैं। मयंक और उसकी प्रेमिका कनाडा जाकर बसना चाहते हैं।

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