*सन्त-महात्माओंकी शरीरमें ममता नहीं होती, इसलिये उनके दर्शनसे लाभ होता है । जिस वस्तुमें ममता नहीं होती, वह वस्तु शुद्ध हो जाती है ।*
*मनुष्यशरीर सबसे दुर्लभ है । इसमें ऐसी सामर्थ्य है, ऐसा अधिकार मिला हुआ है कि यह अपनी, संसारकी और भगवान्की‒सबकी पूर्ति कर सकता है । अपना तथा संसारका कल्याण कर सकता है और भगवान्को प्रसन्न कर सकता है ।*
*जैसे चौरासी लाख योनियोंमें मनुष्यशरीर दुर्लभ है, ऐसे ही मनुष्यशरीरमें सत्संग दुर्लभ है । भगवान्की विशेष कृपाकी पहचान है‒सत्संग प्राप्त होना । स्वयंज्योतिजी महाराजने कहा था कि जीवन्मुक्त महापुरुषोंके साथ निष्काम प्रेम ‘सत्संग’ है । वास्तवमें भगवान्में प्रियता होना सत्संग है । भगवान् हमारे हैं‒यह असली सत्संग है । दुर्गुण-दुराचारोके त्यागका नाम भी सत्संग है ।*
*सच्चर्चाको भी सत्संग कह देते हैं, पर वास्तवमें सत्संग भगवान्में प्रेमका नाम है । उनके बिना रहा न जाय । इसलिये सबसे प्रेम ही माँगना चाहिये‒‘सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ’ (मानस, अयोध्या॰ १२९) ।*
*सन्त, शास्त्र, सद्भाव भगवान्का हृदय हैं । विशेष कृपा करके ही भगवान् अपना हृदय देते हैं । सत्संगसे संसारसे वैराग्य और भगवान्में अनुराग अपने-आप होता है । सत्संग करनेसे प्रतिकूलता भी आनन्द देनेवाली हो जाती है ।*
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