प्रस्तुति - स्वामी शरण / संत शरण
सत्संग:
1 : अगर जीतना हो मन को, तो पहला नियम है कि लड़ना मत।(लडनेवाला खुद लडा जानेवाला है।हम अपने एक हाथ को दूसरे से लडायें तो हानि अपनी ही है।)
2 : ध्यान है तो सब है,
ध्यान नहीं तो कुछ भी नहीं।(बेध्यानी सिवाय उपद्रव के दूसरा कुछ भी नहीं कर सकता जबकि ध्यानी सब संभाल सकता है चाहे संसार हो चाहे परमार्थ।)
3 : प्रेम लक्ष्य है,
जीवन यात्रा है।(यात्रा के लक्ष्य अनेक हो सकते हैं।प्रेम अलावा बाकी सारे लक्ष्य लक्ष्यविहीनता के ही सूचक हैं।)
4 : उत्सव मेरा धर्म है,
प्रेम मेरा संदेश है,
और मौन मेरा सत्य है।(मौन सबका स्रोत है।मौन अहंकारविहीन है।उसीमें से सबकी उत्पत्ति है।जो बिना मौन हुए श्रेष्ठ का सृजन करना चाहता है उसकी कृति पर कर्ताभाव की छाया रहती है जो पौधे को बढने नहीं देती।)
5 :जहाँ भय समाप्त हो जाता है, वहाँ जीवन शुरू होता है।(भय को स्वाभाविक मानकर भय में जीने को ही जीवनशैली मान लिया है जो सही नहीं है।इससे पता नहीं चलता कि भयमुक्त होकर जीना संभव है।और वही सही ढंग से जीवन जी पाना है।)
6: स्वतंत्रता हमारा सबसे अनमोल खजाना है।
कुछ के लिए यह मत खोना।(उन्मुक्त जीवन स्वच्छंद विचरण आनंदपूर्ण है।वह निर्भार होना है।)
7 : सवाल यह नहीं है कि मृत्यु के बाद जीवन मौजूद है या नहीं। असली सवाल यह है कि आप मौत से पहले जीवित हैं या नहीं?(मृत्यु के तथ्य की समझ आदमी को समझदार बना सकती है।ऐसा व्यक्ति मृत्यु से भयभीत नहीं होता पर जीवन जरूर उसका सभीके लिए एक प्रेरक संस्मरण बन जाता है।)
8 : ठोकरें खा कर भी ना संभले तो मुसाफ़िर का नसीब, वरना पत्थरों ने तो अपना फर्ज़ निभा ही दिया था।(ठोकर खाकर कोई पत्थरों को कोस भी सकता है और कोई होशपूर्वक, सावधानी पूर्वक चलाने के लिये उन्हें धन्यवाद भी दे सकता है।सभी बाधाओं के प्रति रचनात्मक दृष्टि यही है।)
9 : कबीर ने कहा है कि तुम धोखा खा लो, लेकिन धोखा मत देना, क्योंकि धोखा खा लेने से कुछ भी नहीं खोता है। धोखा देने से सब कुछ खो जाता है।(धोखा देनेवाला परिधि पर जाकर अपने केंद्र को गंवा बैठता है जबकि आत्मकेंद्र मे स्थित व्यक्ति सब कुछ अपने में समा लेता है।स्थिर बना रह पाता है।)
10 : यहाँ कोई भी आपका सपना पूरा करने के लिए नहीं हैं। हर कोई अपनी तकदीर और अपनी हक़ीकत बनाने में लगा है।(जितना समय और शक्ति दूसरों से सहायता पाने में लगी है उतनी आत्मसहायता में लग जाय फिर दूसरों के सपने पूरे करने की सामर्थ्य पा लेना भी कोई आश्चर्य की बात नहीं।)
11 : तुमने पद, धन, यश, कीर्ति, प्रेम इन सबकी चेष्टाएँ की, बस एक ध्यान के दियें को जलाने की चेष्टा नहीं की, वही काम आएगा। मौत केवल उसी दिये को नहीं बुझा पाती।(आत्मा को कोई माने या न माने पर ध्यान कोई मानने या न मानने की चीज नहीं है बल्कि यह तो जीवंत प्रयोग है,सक्रिय प्रयास है स्व में स्थित होने का।चाहे कोई भी अजमा कर देख ले।इसे सभी चुनौतियां स्वीकार है।बस समर्पण चाहिए इसके प्रति।यह सदा प्रस्तुत है।)
12 : जीवन पर गुस्सा मत करो, यह जीवन नहीं जो आपको निराशा देता है, यह आप हैं जो जीवन की नहीं सुनते।(हमारा ध्यान हमारी अपेक्षाओं पर केंद्रित है बजाय तथ्यों को समझने के।दोनों विपरीत दिशाएं हैं।उनके परिणाम भी सर्वथा भिन्न हैं।)
13 : अधिक से अधिक भोले, कम ज्ञानी और बच्चों की तरह बनिए। जीवन को मज़े के रूप में लीजिये क्योंकि वास्तविकता में यही जीवन है।(अहम्मन्यता से मिलने वाला सुख आभास मात्र है।सचमुच निर्दोषता से जीया जा सके तो सुख आधार रुप में अनुभव होता है।)
14 : भागना मत। भागना भय है। और भय तो कायरता है। और कायर तो संसार भी नहीं पा सकता, सत्य को क्या खाक पाएगा।(भय का स्रोत बाहर हो तो भागना ठीक भी है।भय का स्रोत भीतर है तो उससे भागने का कोई अर्थ नहीं।अत:जब भी भय प्रतीत हो उसे ध्यान से सुनें।वह आपको रुकने के लिए कह रहा है।पलायन के साथ भय बढता है।अपने में ठहराव के साथ भय समाप्त हो जाता है।स्वयं से दूर जाने में ही भय है अन्यथा कोई भय नहीं।प्रस्तुत रहने से कष्ट सहना होगा यह अहम्मन्यता का कल्पित भय है।)
15 : दुखी कोई भी नहीं यहाँ, दुःख से घिरे रहना हमारा स्वभाव बन गया है। इस लिए दुःख है।(चारों ओर दुखी लोग हैं उनके साथ रहने से दुख की भ्रांति दृढ हो जाती है।सत्य की समझ रखनेवाले का संग भ्रांति मुक्त होने में सहायता कर सकता है।)
16 : प्रेम देना बहुत सुंदर अनुभव है क्योंकि देने में तुम सम्राट हो जाते हो।(और कुछ देने में अभिमान हो सकता है,प्रेम देने में नहीं क्योंकि प्रेम अपने आपको देता है।वस्तु देना कोई बडी बात नहीं।)
17 : दुःख भी तभी दुःख मालूम पड़ता है जब हम अस्वीकार करते हैं। दुःख में पीड़ा नहीं है, पीड़ा हमारे अस्वीकार में है कि ऐसा नहीं होना चाहिए था, और हुआ, इसलिए पीड़ा है।(अहंकार और अस्वीकार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।जहाँ अहंकार है वहां अस्वीकार होगा ही।जहाँ अस्वीकार है,अहंकार होगा ही।अतः पीडा भी अवश्य होगी ही।इसे समझना है तो अहंकार और अस्वीकार से अलग रहना होगा।'The moment I am aware that I am aware,I am not aware.Awareness means the observer is not.'अतः "जाननेवाले" की तरह नहीं रहना है,विशुद्ध "जानने" की तरह रहना है।)
18 : दुःख पर ध्यान दोगे तो हमेशा दुखी रहोगे, सुख पर ध्यान देना शुरू करो। क्योंकि तुम जिस पर ध्यान देते हो वह चीज सक्रिय हो जाती है। ध्यान सबसे बड़ी कुंजी है।(मन में नकारात्मक विचार आते हैं तो उनकी शिकायत करने से काम नहीं चलेगा बल्कि उनके बावजूद डटे रहकर अपनी आत्मगत विशेषताओं को प्रकट होने के लिए रास्ता देना होगा।ये विशेषताएं खुद संभाल लेंगी सारी परिस्थितियां।)
19 : सर्वाधिक आनंद उन्हें प्राप्त होता है, जो अकेले रहने की कला सीख जाते है।(न रहे विचारकर्ता,न रहे विचार।ये मन ही है जो विचारकर्ता और विचार बनकर व्यस्त रहकर हमें भी व्यस्त रखता है अतः हमें ही शून्य होना होगा।"शून्य" कोई शब्दमात्र नहीं है।यह मैं मेरारहित, शांत,मौन,निशब्द, निर्विचार अनुभवदशा है।)
20 : जिसको तुम अपने से छोटा मानते हो या अपने जैसा मानते हो उसके पैर छूने से अहंकार गिरेगा।(ऐसे में हमारी स्वाभाविक स्थिति हृदय में होती है।हम सचमुच स्वस्थता का अनुभव करने में सफल हो जाते हैं।अहंकार तथा उसकी पीडा से मुक्त होने के और प्रयास इतने कारगर नहीं।)
21 : मेरा संदेश छोटा–सा है : प्रेम करो। सबको प्रेम करो। और ध्यान रहे कि इससे बड़ा कोई भी संदेश न है, न हो सकता है।(प्रेम का न होना समस्या नहीं है।प्रेम के महत्व को हृदयंगम न करना समस्या है।महत्व हृदयंगम हो जाये तो बाकी के रास्ते अपने आप खुलने लगते हैं।)
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