Saturday, March 7, 2020

राधास्वामी सत्संग के प्रसंग




प्रस्तुति - उषा रानी /
राजेन्द्र प्रसाद सिन्हा
[08/03, 04:02] +91 97830 60206: **परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज-सतसंग के उपदेश भाग-2-(34)-【धर्मशास्त्र और शरीअत】:- जबकि दुनिया के हर हिस्से में तब्दीली व तरक्की का शोर मच रहा है। मुल्क हिंदुस्तान में धर्मशास्त्र व शरीअत के जमानों के लिए पुकार सुनाई देती है। हिंदूसंगठन के प्रेमी पिछले युगो व मर्यादापुरुषोत्तम रामचंद्र जी के जमाने के स्वपन देख रहे हैं और मुस्लिम संगठन के प्रेमी चौदह सौ  वर्ष पुराने अरब देश के किस्से व कहानियां याद कर रहे हैं । यह कोई नहीं कहता कि धर्म शास्त्रों में जो शिक्षाएं वर्णन की गई हैं या पिछले युग में जो रिवाज मुल्क हिंदुस्तान में काम थे या अरब देश में इस्लाम की छोटी उम्र में जो शरीअत का कानून मुकर्रर हुआ वह एकदम गलत या नुकसान देह है बल्कि यह कहा जाता है कि प्राचीन बुजुर्गों ने जरूरीयाते वक्त व हालात गिर्दोपेश को ख्याल में रखकर जो नियम मुकर्रर किए उनकी मौजूदा जमाने में, जबकि दुनिया की काया पलट गई है और हिंदू हो या मुसलमान बिल्कुल नये हालात में जिंदगी बसर कर रहे हैं, हर्फ बहर्फ तामील कराना नादुरुस्त है। चुनांचे हिंदू भाइयों का यह उम्मीद करना कि हिंदुस्तान में वैदिक समय दोबारा प्रकट हो, सरासर गलत है क्योंकि अगर यह ज्ञान भी अगर यह मान भी लिया जाए कि वह जमाना दोबारा लौट आए तो ज्यादातर हिंदुओं को हरगिज़ पसंद न आएगा। महात्मा बुध, कबीर, नानक व दीगर महापुरुषों की शिक्षा के प्रचार से हिंदू आवाम को बखूबी जेहननशीन हो गया है कि अपने पाप साफ कराने की तरफ से बेजुबान जानवरों का बलिदान करना सच्ची धार्मिक जिंदगी के नुक्ते निगाह से कतई नादुरुस्त व नामुनासिब है । इसी तरह राजाओं व अमीरों का सैकड़ों शादियां करना और उद्दालक ऋषि से पहले का या पांडवों का सा शादी का रिवाज दोबारा कायम करना सभ्यता के मौजूदि आदर्श के खिलाफ होने से हर्गिज़ सर्व साधारण को पंसद नही हो सकता। इसलिए हिंदुओं के लिए मुनासिब यही है कि ऋषियों व मुनियों की तालीम से जमाने के हाल की जरुरियात के लिए जो कुछ भी मुफिदे मतलब मिले ग्रहण कर लिया जाए और बाकी बातें छोड दी जावें।क्रमश: 🙏🏻राधास्वामी🙏🏻*
[08/03, 04:02] +91 97830 60206: **परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज- रोजाना वाक्यात- 31 जुलाई 1932- रविवार:- सेह पहर को हस्ब मामूल  विद्यार्थियों का सत्संग हुआ । लड़कों से दरयाफ्त किया गया आया वह कोई खास मजहबी किताब पढ़ना पसंद करेंगे या जबानी लेक्चरों पर संतोष करेंगे?  उन्होंने मजहबी किताब पढ़ना पसंद किया।  पेश किया गया कि अगर वह चाहे तो कुरान शरीफ, इंजीत मुकद्दस, श्रीमद्भागवत गीता, सांख्य व योग दर्शन या बारह  उपनिषदों में से कोई , या ड्रामा स्वराज्य या सत्संग की किताब में से कोई प्रारंभिक किताब पढ़ाई जा सकती है।  एक लड़के ने कुरान शरीफ तजवीज किया 10- 12 लड़कों ने श्रीमद्भागवत गीता, लेकिन अधिक तादाद में अमृत बचन पसंद किया । बहुत से  तर्क वितर्क के बाद यह तय हुआ कि कुरान शरीफ से कुछ है स्सा पढ़ा जावे।  चुनांचे ख्वाजा हसन निजामी साहब का प्रदान किया हुआ  अनुवाद मंगवाया गया। और कुल सूरत फातिहा व सूरत नूर का निस्फ हिस्सा पढ़ा गया । और बाकी अगले हफ्ते के लिए रख लिया गया। जहाँ तक मुमकिन हो सका मैने मजमीन पर रोशनी डाली। विद्यार्थियों ने लफ्ज लफ्ज कमाल शौक के साथ सुना। और जब उन्हें मालूम हुआ कि पैगंबर साहब कैसे स्पष्ट वादी ,समझौता वादी के हमदर्द और मालिक के आशिक थे और उन्हें जाहिलो के हाथ क्या क्या सितम उठाने पड़े तो अक्सरों के दिल भर आए। ख्वाजा साहब का प्रकाशित अनुवाद निहायत ही सुगम व प्रभावशाली है। आखिर में विद्यार्थीयों के दरख्वास्त  करने पर अनुवाद उनकी हवालगी में दे दिया गया ताकि वह हफ्ता में वक्त निकालकर उससे अतिरिक्त फायदा उठा सकें।                        रात के सत्संग में बयान हुआ कि वैसे तो सत्संग की खूब तरक्की हो रही है सैकड़ों नए आदमी हर माह भर्ती होते हैं लेकिन सत्संग की तरक्की का आदर्श लोगों की भीड़ भाड़ नहीं हो सकता । हमें यह देखना होगा आया काफी तादाद ऐसे भाई राधास्वामी दयाल और उनकी तालीम में सच्ची आस्था रखते हैं और उसे अमल में लाकर लाभान्वित हो रहे हैं । अगर सत्संग में ज्यादा तादाद ऐसे भाइयों की है जिन्हें बिना किसी खास वजह के यानी बिना किसी दुख या सुख  का मौका होने के मालिक के दर्शन के लिए तड़प पैदा होती है और काफी तादाद ऐसे भाइयों की है जिनका चलते-फिरते और कामकाज करते ध्यान बनता रहता है और कुछ तादाद ऐसे भाइयों की है जो ऊंचे मकामात पर  दर्शन हासिल करते हैं और कम से कम एक ऐसा भी सत्संगी है जिसका सीधा ताल्लुक कुल मालिक राधास्वामी दयाल हैं तो हमारा मजहब जिंदा है और हमारा सब मामला ठीक है । वरना जैसी और मजहबी संगठन ऐसी हमारी जमाअत । उसके बाद सच्चे सत्संग के मानी बयान हुए। लोग समझते हैं कि सत्संग के असली मानी सिर्फ कथा वार्ता या उफदेश देश है ।सत्संग के असली मानी सत्तपुरुष का संग है और यह तब तब मुमकिन है जब हमारी संगत में कोई सत्तपुरुष हो और वह   हमें अपने से ताल्लुक कायम करने का मौका दें और अपनी खास तवज्जह हमारी जानिब प्रवृत्त करें । बिना ऐसे पुरुष की मौजूदगी के सब कार्यवाही शुभ कर्म का फल देने वाली है । उससे कोई रूहानी लाभ हासिल नहीं हो सकता।🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**
[08/03, 04:02] +91 97830 60206: **परम गुरु हुजूर महाराज- प्रेम पत्र -भाग 1 -(11)-【 संत सतगुरु की महिमा और सुरत शब्द अभ्यास की बड़ाई】:- सब लोग मालिक की तलाश में खोज करते हुए चले हैं, जिसको जहां तक का भेद मालूम हुआ उसी को उसने सिद्धांत समझा।  और सच्चे  मालिक का पता सिवाय संतों के किसी को नहीं मिला। अक्सर लोग समझते हैं की प्राण की साधना से सच्ची मुक्ति हासिल हो सकती है और तीन लोक के मालिक का दर्शन मिल सकता है, लेकिन प्राण की साधना गृहस्थ जीवों से तो बिल्कुल नहीं हो सकती, क्योंकि उसके संजम यानी परहेज ऐसे हैं कि जब तक ग्रस्त घर बार और रोजगार को छोड़कर अलग ना हो जावे तब तक कुछ अभ्यास नहीं बन सकताऋ और फिर अभ्यास में जरा सी भी बदपरहेजी से खतरे बहुत है ँ या तो कोई बीमारी ऐसी लग जावे की जन्म भर ना जावे या फौरन मृत्यु हो जाए।  जब गृहस्थियों से अभ्यास न बन सका तो गोया बड़ा हिस्सा जीवो का तो उद्धार के काबिल नहीं हुआ। अब बिरक्त जो जवान है उनसे तो कुछ बन भी सकता है, पर वे भी उसके साथ और पैरों से लाचार होकर रह गए। और जो बूढ़े हैं उनसे बिल्कुल बन नहीं सकता। जब परमार्थ का ऐसा हाल देखा तब जीव कर्म, धर्म, और मूरत पूजा और तीर्थ, व्रत वगैरह में लग गए और कोई कोई थोड़ी विद्या हासिल करके उसी में मगन हो गए । पर सच्चे मालिक का पता और सच्चे पद की प्राप्ति की जुगत किसी के हाथ नहीं लगी। कुल मालिक राधास्वामी दयाल ने जीवो के उद्धार का दरवाजा बंद देखकर आप संत सतगुरु रूप धारण कर संसार में आकर अपना निज भेद आप प्रगट किया। क्रमश:🙏🏻 राधास्वामी**🙏🏻

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