प्रस्तुति - आभा श्रीवास्तव /दीपा शरण
11 मार्च 2020
आज सुबह के सतसंग में पढे गये पाठ-
(1) राधास्वामी नाम सुनाया राधास्वामी। राधास्वामी रुप दिखाया राधास्वामी।। राधास्वामी मध्य बिराजें राधास्वामी। राधास्वामी जुक्त जतन राधास्वामी।। (सारबचन-शब्द-तीसरा,पृ.सं.51)
(2) सुरतिया मान रही। गुरु बचन सम्हार सम्हार।।(प्रेमबानी-2,शब्द-84,पृ.सं.202)
राधास्वामी
संसार से निरबंध होना मनुष्य के बस की बात नहीं है यह तो कुल मालिक ही कर सकता है। निस्संदेह भजन व अभ्यास भी निरबंध होने का एक साधन है। परन्तु और भी साधन हैं, सिर्फ़ यही एक साधन नहीं है। सेवा, सतसंग और अभ्यास में सेवा का स्थान पहला है। अभ्यास का नंबर तीसरा है। सेवा के लिए क़ुरबानी आवश्यक है और क़ुरबानी के लिए स्वस्थ शरीर, शुद्ध मन और कुछ धन आवश्यक है। यदि आप निबल हैं तो थोड़ी ही क़ुरबानी कीजिये या बिलकुल मत कीजिए और बाक़ी दूसरे साधनों में से किसी को कीजिए। निवेदन है कि क़ुरबानी करने वाला मनुष्य ही सेवा ठीक तौर पर कर सकता है और जब सेवा को मालिक के प्रसन्न करने का एक साधन ठहरा दिया गया तो फिर क़ुरबानी भी निरबंध होने का एक कारण बन जाती है। साहबजी महाराज ने हम लोगों की शक्ति और योग्यता देखकर, जो साधन हमारे लिये सबसे उत्तम समझा उसे ही पहले नम्बर पर रक्खा।
(परम गुरु हुज़ूर मेहताजी महाराज के बचन, भाग 2, ब. 17 का अंश)
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