**राधास्वामी!! 09-07-2020
- आज शाम के सतसंग में पढे गये पाठ-
(1) फागुन की ऋतु आई सखी। आज गुरु सँग फाग रचो री।।-(होय निहाल जाय जग पारा। चरनन सुरत धरो री) (प्रेमबानी-3-शब्द-15,पृ.सं.305)
(2) सतगुरु मेरे पियारे। धुर घर से चल के आये। सुपने में दर्श देकर। चरनन लिया लगाये।-( अद्भुत बनी यह आरत। कल मल गई सब आफत। निज धाम की तैयारी। सूरत रही कराय।। )
(प्रेमबिलास-शब्द-6,पृ.सं.7)
(3) यथार्थ प्रकाश-भाग पहला-कल से आगे।।
🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**
**राधास्वामी!! -09-07- 2020
- आज शाम के सत्संग में पढ़ा गया बचन-
कल से आगे -(44)
जो कि आदिधार चैतन्य शक्ति की धार थी इसलिए उसमें शक्तियों के गुण अवश्य विद्यमान रहे होंगे। जगत् में विद्युत- शक्ति तथा चुंबकशक्ति सबसे बड़ी शक्तियाँ है । इन दोनों के अंतर्गत 2 गुण देखने में आते हैं -
प्रथम यह कि इनकी धारें द्विमुखी अर्थात दोरुखी रहती हैं ,जैसे चुंबक- शक्ति की धारें ध्रुवों से चलकर वृत्त अथवा अपने क्षेत्र में फैलती भी है और क्षेत्र के अंतर्गत लोहे के कणों को ध्रुवों की ओर खींचती भी है, अर्थात इनका एक रूख केंद्र से परिधि की ओर, दूसरा रूख परिधि से केंद्र की ओर रहता है । इस स्वभाव के अनुसार आदि चैतन्य धार में भी दो रुख विद्यमान होंगे और इन रुखों से भिन्न भिन्न शब्द प्रकट होने चाहिएँ।
अतएव राधास्वामी- मत बतलाता है कि बहिर्मुख रूख से ' रा' और अंतर्मुख रूख से 'धा' शब्द प्रकट हुए, और इनके मिलाने से जो 'राधा ' शब्द बनता है वह आदिधार की पूर्ण-अर्थात उसके दोनों रूखों की क्रिया का परिणाम है । और जोकि (जैसा ऊपर कहा गया ) इस धार के प्रवृत्त होने से पहले चैतन्य शक्ति के भंडार में क्षोभ उत्पन्न हुआ और यह दोरुखी क्रिया इस क्षोभ में भी विद्यमान थी इसलिए क्षोभ के रूखों से भी भिन्न भिन्न शब्द प्रकट हुए।
अतएव क्षोभ के बहिर्मुख रुख से ' स्वा' और अंतर्मुख रुख से 'मी' शब्द का प्रादुर्भाव हुआ, और 'स्वामी' शब्द आदिक्षोभ की पूर्ण - अर्थात उसके दोनों रुखो की क्रिया का परिणाम है। संतमत में आदिक्षोभ को 'आदिशब्द' और आधीधार को 'आदिसुरत' भी कहते हैं।
जैसा कि बचन है:- राधा आदि सुरत का नाम । स्वामी आदि शब्द निज धाम
🙏🏻राधास्वामी🙏🏻
यथार्थ प्रकाश- भाग पहला
-परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज!**
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