राधास्वामी!! 11-07-2020
-आज शाम के सतसंग में पढे गये पाठ-
(1) होली खेलत सतगुरू संग। पिरेमन रंग भरी।।-(राधास्वामी महिमा नित हिय जिय से। गावत उमँग उमँग।।) (प्रेमबानी-3-शब्द-17,पृ.सं.306)
(2) राह रपटीली साईं घर दूर।।टेक।। कोउ न सुने मेरी किसे सुनाऊँ। कैसे होय मेरी आशा पूर।।-(दीन दास अस निश्चय धारी। तुमते होय सब आशा पूर।।) (प्रेमबिलास-शब्द-8,पृ.सं.11) (3) यथार्थ प्रकाश-भाग पहला-कल से आगे- 🙏🏻राधास्वामी🙏🏻
राधास्वामी!!
11-07- 2020 -
आज शाम के सत्संग में पढ़ा गया बचन-
कल से आगे -
(46)
आदि चैतन्य धार के इस स्वभाव का प्रभाव उसके दोरुखी अंगों पर भी पड़ा जिसके कारण प्रत्येक बड़े विभाग के अंतर्गत छः छोटे उपभाग या लोक प्रकट हुए, अर्थात तीन लोक शब्द- अंग के तौर और तीन लोक सुरत अंग के, और जोकि आदिधार चैतन्य धार थी अर्थात उसमें रचना करने का ज्ञान तथा संकल्प भी था इसलिए इन सब विभागों को या लोको के केंद्र भी चैतन्य थे और उनमें रचना करने का ज्ञान तथा संकल्प विद्यमान था।
इसलिए इन केंद्रों को पुरुष कहते हैं। तात्पर्य यह है कि रचना की क्रिया आरंभ होने पर प्रथम कुलमालिक में आदिक्षोभ उत्पन्न हुआ और फिर आदि चैतन्य धार प्रकट होकर वह सब सामग्री, जो कुल मालिक में गुप्त रूप से विद्यमान थी, 3 बड़े भागों में फैल गई और प्रत्येक बड़े भाग में 6 उपभाग स्थापित पर हुए और प्रत्येक भाग तथा उपभाग में एक चैतन्य केंद्र अर्थात पुरुष प्रकट हुआ ।
और जोकि आदिक्षोभ और आदिधार की क्रिया (केंद्र में क्षोभ उत्पन्न होकर धार का प्रवाहित होना) ही से सब भाग प्रकट हुए इसलिए प्रत्येक भाग के केंद्र के अंतर के अंतर इस क्रिया का प्रभाव विद्यमान है। और जोकि इस क्रिया का प्रभाव राधास्वामी शब्द है इसलिए प्रत्येक पुरुष के अंतर के अंतर में राधास्वामी शब्द विद्यमान है।
पर विदित हो कि राधास्वामी धाम के अतिरिक्त हर एक लोक में प्रत्येक केंद्रीक शक्ति अर्थात पुरुष से निकलकर जो शक्ति की धारें फैलती है उनसे भी शब्द प्रकट होते हैं किंतु वे शब्द भिन्न है ।
अनेक मतों में जिन ध्वन्यात्मक नामों का उपदेश किया जाता है उनका संबंध इन्ही शब्दों से है और सुरत शब्द अभ्यासी का मार्ग में आने वाले स्थानों में जिन शब्दों के काम पड़ता है वे भी ये ही शब्द है ।
और जोकि मनुष्य की आत्मा भी कुलमालिक से निकलकर रचना की क्रिया से प्रभावित होकर अनेक भागों से गुजरती हुई पृथ्वीलोक तक पहुंचती है इसलिए उसमें राधास्वामी धाम से लेकर पृथ्वीलोक तक की समस्त रचना का प्रतिरूप अर्थात सब लोको और पुरुषों तथा शब्दों का नमूना विद्यमान है
और सुरत शब्द अभ्यास करने का प्रत्येक अभ्यासी को अपने अंतर में इनका अनुभव होता है। वेदांत दर्शन में 'दहराकाश' के उल्लेख में इस विषय पर पूर्ण प्रकाश डाला गया है जो देखने के योग्य है।
🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻
यथार्थ प्रकाश-
भाग पहला -
परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज!!
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