प्रस्तुति - कृति, सृष्टि, दृष्टि और अमी
[06 मार्च 2020
: राधास्वामी!
! 06-03-2020
आज सुबह के सतसंग में पढे गये पाठ-(1)
राधास्वामी नाम सुनाया राधास्वामी। राधास्वामी रुप दिखाया राधास्वामी।। राधास्वामी सुरत शब्द राधास्वामी। राधास्वामी धुनन बुलाई राधास्वामी।।(सारबचन-शब्द-तीसरा,पृ.सं.48) (2) सुरतिया छान रही। अब गुरू मत कर सतसंग।।(प्रेमबानी-2,शब्द-82,पृ.सं. 199)
🙏🏻राधास्वामी🙏🏻
राधास्वामी!!
06- 03- 2020
-आज शाम के सत्संग में पढ़ा गया बचन- कल से आगे
-( 76)-
रचना के शुरू में सिर्फ वही सुरते संसार में उतरी जिनका का रुझान या झुकाव माया की जानिब था । मायिक देश में आकर इन सुरतों को मायिक शरीर धारण करने पड़े और उनके द्वारा मायिक भोगों से संबंध कायम करके यही की हो रहीं। जब तक किसी सुरत का माया की जानिब झुकाव,जिसे आदिकर्म और काल का कर्जा भी कहते हैं, खत्म न हो जाए उसका माया के देश से छुटकारा नहीं हो सकता। सुरते आदि कर्म की वजह से संसार में आईं और यहां आकर उन्होंने अनेक स्थूल कर्म किये जिनका हिसाब इतना बढ़ गया कि कोई हद ना रही।इन स्थूल कर्मों की ही वजह से अनेक जीव नीच ऊँच योनियों में जन्म धारण करते हैं और संसार के दुख सुख सहते हैं ।
होते होते जब किसी जीव के स्थूल कर्म खात्मे पर आते हैं तो आदि कर्म का बेग फिर से अपना जोर दिखलाता है और वह जीव फिर अनेक स्थूल कर्म करता है जिनके खत्म होने पर फिर आदि कर्म के वेग की बारी आ जाती है । गर्जेकि जीव आदि कर्म व स्थूल कर्मों के चक्कर में फँसा है और उनका भुगतान होकर एक मरतबा शाखें कट जाती है तो जड़ से नया मसाला प्रकट होकर नई शाखें उत्पन्न हो जाती है इससे जाहिर है कि जीव का स्थूल कर्मों से छूटना इतना मुश्किल नहीं है ,असली मुश्किल काम आदि कर्म से छुटकारा हासिल करना है। आदि कर्म से सहज में छुटकारा हासिल करने के लिए किसी महापुरुष की खास दया व मेहर की जरूरत है । जब वे कृपा करके अपने चरणों की प्रीति बक्शीश फरमावे तो जीव का झुकाव माया के बजाय सच्चे मालिक की जानिब कायम हो। और अधिगम के वेग से हमेशा के लिए छुट्टी मिले,
जैसा कि फरमाया है :- शब्द- सतगुरु प्यारे ने चुकाया, काल का कर्जा हो।टेक।। मैहर से मोहि सत्संग में खींचा। भक्ति पौद लगा गुरु सींचा।। कांटे विघन और हरजा हो।। दया गुरु परख बढत परतीती। सेव करत जागत नई प्रीति।। बढत मेरा दिन दिन दर्जा हो।। शब्द का मारग दीन लखाई।स्रुत मेरी धुन सँग दुन मिलाई । आज घट गगना गरजा हो।। भरम गुरु ने मेट दिये मेरे सारे । करम भी काट दिए अति भारे।। काल भी डर से लरजा हो।।। राधास्वामी कीन जगत उपकारा। चरण शरण दे जीव सवारा।। तार दई सब परजा हो।।
🙏🏻राधास्वामी 🙏🏻
सत्संग के उपदेश भाग तीसरा*
*राधास्वामी!
! 06-03-2020
आज शाम के सतसंग में पढे गये पाठ-
(1) कैसे गहूँ री सरन गुरू बिन परतीत।।टेक।। (प्रेमबानी-3,शब्द-4,पृ.सं.-192)
(2)सुनकर बिनय नवीन मेहर स्वामी को आई। जीवन के हित अर्थ बचन यों बोल सुनाई।। गुरू संग के परताफ तपन जब मिटती देखे। सहज होय जिव काज आस जग घटती पेखे।।(प्रेमबिलास-
शब्द-76,पृ.सं.108,109)
(3) सतसंग के उपदेश-भाग तीसरा।।।
🙏🏻राधास्वामी🙏🏻*
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