Saturday, March 7, 2020

आज 07/03 को दयालबाग में पढ़ा गया बचन




प्रस्तुति - कृति शरण / अमी शरण


राधास्वामी!! 07-03-2020 आज शाम के सत्संग में पढ़ा गया बचन कल से आगे-( 77 ) जो लोग मोक्ष के अभिलाषी हैं उन्हें भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि मोक्ष के विषय में केवल बातचीत या वाद-विवाद कर लेने से मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता । यह संसार कर्मक्षेत्र है यहां रहकर कर्म करना उचित है और उचित कर्म करने ही से मोक्ष मिल सकता है। कर्म दो प्रकार के हैं:- एक वे जो हम अपने मन की प्रेरणा से करते हैं और दूसरे वे जो हम मालिक की प्रेरणा से करते हैं। पहले किस्म के कर्म भी दो प्रकार के हैं:- एक वे जो हम नेकनियति से करते हैं और शुद्ध कर्म कहलाते हैं, दूसरे वे जो हम बदनियति से करते हैं और मंदकर्म  कहलाते हैं । शुभ कर्मों का परिणाम सुख होता है और मंद कर्मों का दु:ख । लेकिन शुभकर्म हो या मंद,दोनों का फल भुगतने के लिए जीव को संसारचक्र में भ्रमण करना पड़ता है अर्थात अपने मन की प्रेरणा से किए हुए कर्म हमें संसारचक्र से नहीं छुडा सकते हैं। इसके लिए मालिक की प्रेरणा की जरूरत है और प्रेरणा हासिल करने के लिए प्रेरणा लेने वाला हो औजार दुरुस्त करना लाजमी है , जो आसान काम नहीं है।  अलबत्ता अगर किसी को भाग्य से सच्चे सतगुरु मिल जाए और वह उनकी शरण लेकर उनकी आज्ञाओं का पालन करने लगे तो उसके लिए मामला आसान हो जाता है क्योंकि सच्चे सतगुरु वहीं पुरुष होते हैं जिनकी सुरतशक्ति जगी है, जिनका अंतर में सच्चे मालिक से मेल है, जिनके मन व इंद्री बस में हैं और जिनका हृदय शुद्ध है जो हमेशा राजी बरजा रहते हैं।उनका प्रेरणा लेने वाला औजार दुरुस्त रहता है और उनको बार बार मालिक की जानिब से प्रेरणा आती है। वह इसी उद्देश्य से संसार  में भेजे व रक्खें जाते है। ऐसे पुरुष की आज्ञाओ का पालन मालिक ही की आज्ञाओं का पालन है। कबीर सासब फरमाते है:- साद मिले साहब मिले, अन्तर रही न रेख। मनसा बाचा करमना, साधू साहब एक।।🙏🏻राधास्वामी 🙏🏻 (सत्संग के उपदेश भाग तीसरा)





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