Saturday, March 7, 2020

सत्संग के मिश्रित प्रसंग और बचन



प्रस्तुति - अनामी शरण बबल
 / ममता शरण /कृति शरण

**परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज -

रोजाना वाक्यात- 30 जुलाई 1932-

शनिवार:- आज सुबह के वक्त प्रेम विद्यालय स्कूल व इंटरमीडिएट कॉलेज का सालाना मुआयना किया। कुल इंतजामात संतोषप्रद पाये। अलबत्ता यह नामुनासिब मालूम हुआ कि मिडिल स्कूल के विद्यार्थी साइंस के प्रयोगों के लिए कॉलेज की इमारत में आते हैं। मशवरा दिया गया कि प्रिंसिपल साहब मिडिल स्कूल के विद्यार्थियों के लिए अलग इंतजाम करें और सभा की तरफ से लगभग एक ₹100 बतौर ग्रांट पेश किया गया। गीता का अनुवाद नवे अध्याय तक तैयार होकर हस्तांतरित लेखकर्ता हो गया है। सातवें अध्याय में आखिर और आठवे अध्याय के शुरू हिस्सा में लफ्ज अधियज्ञ के अर्थ पर खूब छानबीन करनी पड़ी बहुत खोज के बाद एक अनुवाद में यह मानी निकले जो मैंने दर्ज कियें है ।उम्मीद है कि गीता के प्रेमियों को यह अनुवाद पसंद आवेगा।।                   लाहौर के सत्संगी इस वर्ष फिर लाहौर जाने के लिए जोर दे रहे हैं। उनका प्रेम तो काबिले तारीफ है लेकिन यह कैसे मुमकिन है कि किसी शहर का हर साल चक्कर लगाया जाए। इस साल नवंबर महीने में पटना के लिए नियत हो चुका है। इसके अलावा गालिबध जल्दी बंगलुरु व कलकत्ता जाना पड़ेगा ।।                       शाम के वक्त लाँन पर संसार के सामान में मोह रखने की जरूरत पर विस्तार से बातचीत हुई। वाकई लोग खुशकिस्मत हैं जो दुनिया के सामानों से काम लेते हैं और नफा उठाते हैं लेकिन उन्हें बंधन पैदा नहीं करते।  बातचीत का सिलसिला हुजूरी बाग नंबर 2 के मुतालिक शुरू हुआ। एक शख्स खूनेजिगर से सींच कर बाग लगाता है। दूसरा सख्त कानूनी जोर से उसे बेदखल कर देता है। दुनिया के हिसाब से लाजमी था कि इस पर पहला शख्स सिटपिटाता  लेकिन प्रमार्थी हिसाब से यही मुनासिब है कि वह राजी ब राजा रहे और ऐसे बरतकर अपने निर्मोह होने का सबूत दे ।🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**





**परम गुरू हुजूर साहबजी महाराज-

सतसंग के उपदेश-भाग-2-

कल का शेष:-

अगर इस किस्म का इंतजाम न होता तो अवाम के लिये बडे पैमाने पर तिजारत करना नामुमकिन रहता और छोटे पैमाने पर तिजारत करने में भी सख्त तकलीफ होती। मसलन अगर आप कपडा खरीदना चाहते तो पुराने जमाने के दस्तूर व इन्तिजाम के मुताबिक आप को दो चार मन अनाज सिर पर लादकर ले जाना पड़ता और बजाज की दुकान के कोने में कपड़ों के ढेर होते और बकिया हिस्से में किस्म किस्म के अनाज के ढेर दिखलाई देते। ख्याल किया जा सकता है कि अगर कोई शख्स मोटरकार खरीदना चाहता तो उसको गेहूं वगैरह के कितने छकडे लादकर साथ ले जाने पड़ते और मोटरफरोश की दुकान अनाज मंडी से कम ना होती । गरजेकि यह जाहिर है कि सिक्का का रिवाज इस मतलब से जारी किया गया कि लोगों को चीजों की खरीद-फरोख्त में सहूलियत रहे। दूसरे लफ्जों में जो काम पिछले वक्तों में अनाज के ढेर या जानवरों से लिया जाता था वह अब धातु के टुकड़ों से लिया जाता है और अगर यह बात सच है तो दर्याफ्ततलब हो जाता है कि आया पिछले जमाने में त्यागी लोग जानवरों के रखने व छूने से परहेज करते थे ? इसका जवाब साफ है-- सभी ब्राह्मणव ऋषि गायें पालते थे और राजाओं से इनाम व दक्षिणा अनाज व डायें प्राप्त करते थे । इन बातों पर गौर करने से साफ हो जाना चाहिए कि रुपया पैसा छूने में कोई हर्ज नहीं है। अलबत्ता क्योंकि रुपए पैसे से हर किस्म के जायज व  नाजायज सामान बआसानी खरीद किए जा सकते हैं इसलिए हर शख्स के लिए दिल में रुपए पैसे के लिए सहेज में मोहब्बत पैदा हो जाती है । परमार्थी पुरुषों को चाहिए कि वे मोहब्बत या राग का जहर दिल में दाखिल ना होने दें और अपनी मेहनत व हक्क व हलाल की कमाई से जो रुपया कमाया जाए उसका मुनासिब व जायज इस्तेमाल करें और रुफये पैसे के ढेर जमा करने की लालसा न उठावे।🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**


परम गुरु हुजूर महाराज-प्रेमपत्र-

कल का शेष:-(१४) और जब अभ्यास में बैठे तो जो उस वक्त बिरह या प्रेम अंग नही है, तो अपनी कसरों के ऊपर ख्याल करके चित्त में दीनता लाकर प्रार्धना करता हुआ भजन करे तो जरुर थोडा और बहुत मन स्थिर होकर रस पावेगा क्योंकि जब मन का अंग दीन हुआ उसी वक्त थोडा बहुत प्रेम अंग जागेगा।और जब प्रार्थना का असर दिल पर हुआ उसी वक्त प्यार थोड़ा बहुत पैदा हो जावेगा तो उस तरफ से भी दया आवेगी। (15) और मुनासिब है कि अपने मन की थोड़ी-बहुत चौकीदारी करता रहे कि फजूल की तरंगे ना उठावे  और जो उठें तो उनको जल्द हटाता रहे। और जहां तक बन सके दूसरों की कसरों पर नजर ना डालें और किसी पर तान न लगावे।  हमेशा अपनी कसरों को देखता रहे और उनके दूर करने का जतन करता रहे। लेकिन जो कोई इसके सुपुर्द है इसके साथ प्यार भाव रखते हैं या इसके बचन को मोहब्बत के साथ सुनते हैं, तो उनको प्यार के साथ या खौफ दिलाकर या जिस तौर से मुनासिब होवे समझावे और कसरो के दूर करने का जतन बतावे। या जो कोई कि इसके संग में है और उनकी कोई चाल ढाल इस किस्म की है कि जिससे बहुत हर्ज और नुकसान होता मालूम पडता है, तो उनको एकांत में या जिस तरह पर मुनासिब हो समझना वास्ते उस चाल के छोडने के और नसीहत करना दुरुस्त है। और जो वह न  माने तो उनके संग से जिस तौर से मुनासिब होवे अपने आप को हटा ले और अपना बचाव कर लेवे।                                           यह थोड़ा रहनी का बयान किया गया है। जो कोई पर मारती है वह अपनी हालत के मुआफिक हर जगह और हर वक्त और हर काम में राधास्वामी दयाल की दया की तरफ नजर रखकर जैसे कुछ संभाल जरूरी है अपने आप विचार करके कर सकता है ।इस वास्ते इस मामले में कोई कदम खास मुकर्रर नहीं हो सकता, हर एक आदमी अपने निर्मल मन और बुद्धि से थोड़े विचार के साथ हर एक काम में भलाई और बुराई आप समझ सकता है। और जो यह परमार्थी है तो परमार्थ के कायदे के मुआफिक जिस तरह इसको अपने औरक्षपराये के साथ बरताव करना चाहिये, यह आप समझ कर मुनासिब तौर पर कर सकता है।   थोड़ा सा दया भाव और कोमलता हृदय में होनी चाहिए, बाकी राधास्वामी दयाल की दया से सच्चे परमार्थी की सँभाल आप हर हालत में होती रहेगी।🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**





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