**परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज
प्रस्तुति - संत शरण / रीना शरण
-सतसंग के उपदेश भाग-2-(34)-
【धर्मशास्त्र और शरीअत】:
- जबकि दुनिया के हर हिस्से में तब्दीली व तरक्की का शोर मच रहा है। मुल्क हिंदुस्तान में धर्मशास्त्र व शरीअत के जमानों के लिए पुकार सुनाई देती है। हिंदूसंगठन के प्रेमी पिछले युगो व मर्यादापुरुषोत्तम रामचंद्र जी के जमाने के स्वपन देख रहे हैं और मुस्लिम संगठन के प्रेमी चौदह सौ वर्ष पुराने अरब देश के किस्से व कहानियां याद कर रहे हैं । यह कोई नहीं कहता कि धर्म शास्त्रों में जो शिक्षाएं वर्णन की गई हैं या पिछले युग में जो रिवाज मुल्क हिंदुस्तान में काम थे या अरब देश में इस्लाम की छोटी उम्र में जो शरीअत का कानून मुकर्रर हुआ वह एकदम गलत या नुकसान देह है बल्कि यह कहा जाता है कि प्राचीन बुजुर्गों ने जरूरीयाते वक्त व हालात गिर्दोपेश को ख्याल में रखकर जो नियम मुकर्रर किए उनकी मौजूदा जमाने में, जबकि दुनिया की काया पलट गई है और हिंदू हो या मुसलमान बिल्कुल नये हालात में जिंदगी बसर कर रहे हैं, हर्फ बहर्फ तामील कराना नादुरुस्त है। चुनांचे हिंदू भाइयों का यह उम्मीद करना कि हिंदुस्तान में वैदिक समय दोबारा प्रकट हो, सरासर गलत है क्योंकि अगर यह ज्ञान भी अगर यह मान भी लिया जाए कि वह जमाना दोबारा लौट आए तो ज्यादातर हिंदुओं को हरगिज़ पसंद न आएगा। महात्मा बुध, कबीर, नानक व दीगर महापुरुषों की शिक्षा के प्रचार से हिंदू आवाम को बखूबी जेहननशीन हो गया है कि अपने पाप साफ कराने की तरफ से बेजुबान जानवरों का बलिदान करना सच्ची धार्मिक जिंदगी के नुक्ते निगाह से कतई नादुरुस्त व नामुनासिब है । इसी तरह राजाओं व अमीरों का सैकड़ों शादियां करना और उद्दालक ऋषि से पहले का या पांडवों का सा शादी का रिवाज दोबारा कायम करना सभ्यता के मौजूदि आदर्श के खिलाफ होने से हर्गिज़ सर्व साधारण को पंसद नही हो सकता। इसलिए हिंदुओं के लिए मुनासिब यही है कि ऋषियों व मुनियों की तालीम से जमाने के हाल की जरुरियात के लिए जो कुछ भी मुफिदे मतलब मिले ग्रहण कर लिया जाए और बाकी बातें छोड दी जावें।
क्रमश:
🙏🏻राधास्वामी🙏🏻*
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