प्रस्तुति - दिनेश इस सिन्हा
होइ न बिषय बिराग *भवन बसत भा चौंथपन*।
हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु।।
स्वयं मनु जी ने भी मनु स्मृति में मनुष्य के पूरी आयु को चार भागों में बांटा गया है -।
बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था।
बाल्यावस्था खेल कूद से लेकर शिक्षा ग्रहण के अवस्था है,
किशोरावस्था शिक्षा कौशल विकास के लिए है,
युवावस्था गृहस्थी में लगे,
और वृद्धावस्था गृहस्थी के झंझटों से दूर रहकर भगवान के भजन में लगाने के लिए उचित माना गया है।
मंदोदरी ने संतों की वाणी को उद्धृत करते हुए रावण से यही बात कहती हैं कि संतों का यही मत है कि राजा को चौंथेपन अर्थात् वृद्धावस्था में प्रवेश करने पर भगवान का भजन करने के लिए वन में चले जाना चाहिए...
संत कहहिं असि नीति दसानन। **चौंथेपन जाइअ नृप कानन*।।
तो फिर आज के परिप्रेक्ष्य में इस पर कई प्रश्न उठता है कि वृद्धावस्था में वन में जाना आवश्यक है क्या?
और यदि हां तो अब वन बचे कितने हैं??
यदि वन हैं भी तो आज के युग में वहां जीवन यापन युक्त कंदमूल फल मिलेंगे क्या???
अब तो वन में पहले वाली शांति नहीं है बल्कि आतंकियों के अड्डे बन गए हैं कि नहीं????
वन में गोलियों की गूंज सुनाई पड़ती है तो भजन कैसे होगा?????
शरीर में कई प्रकार की बिमारियां हो गई हैं,
औषधि पर जीवन चल रहा है,
आदि आदि कई प्रश्न हैं।
अतः अभी तत्काल युग में चौंथेपन में वन में जाने का इस शास्त्र वचन को किस भाव से लिया जाए?
आज के युग में चौंथेपन में गृह त्याग का अभिप्राय क्या है??
देखिए हम मानते हैं कि आज के युग में चौंथेपन में वन में पहले की भांति अनुकूलता नहीं है।
और हम भी पूर्व युग के चौंथेपन जैसा निरोग काया वाले नहीं हैं।
किन्तु ये भी तो सच है कि हम चौंथेपन में गृहस्थी को चलाने में युवावस्था की भांति सक्षम नहीं हैं।
संतान वृद्धाश्रम में ले जाकर जबरदस्ती डाल दे उसके पहले क्यों न स्वयं कदम उठाएं???
माना कि हमने करोड़ों रुपए खर्च कर मकान बनाया है,
उसके पर्श संगमरमर से बनावाया है,
लेकिन जब वृद्धावस्था आई और शरीर में कफ अधिक हो गया,
घर से बाहर निकल कर थूकने में भी सक्षम नहीं हैं और यदि हमने उस संगमरमर को गंदा कर दिया तो अपने ही पुत्र या पुत्रवधू के मुंह देखते बनता है।
हम युवावस्था की भांति कार्य करना चाहते हैं लेकिन शरीर साथ नहीं देता,
हम अगली पीढ़ी से अपने भांति चलाना चाहते हैं और वे उसमें अपने को सामंजस्य स्थापित नहीं कर पा रहे,
जिसे अपने हाथों से संवारा है, उसके क्षति देख नहीं सकता।
हमें ब्रह्म बेला में नींद नहीं आती और अगली पीढ़ी सूर्योदय होने पर उठना नहीं चाहता, आदि आदि।
तो सामंजस्य स्थापित होगा???
आँख से दिखाई नहीं देता फिर भी पोते के विवाह देखने की इच्छा है,
पोते को छोड़िए परपोते खेलाने की लालसा शेष रह गई है तो भगवद्भक्ति कैसे संभव है???
अर्थात् इन सारी इच्छाओं का शमन दमन ही गृह त्याग है।
हमारे अंदर ही काम वासनाओं का भवन बना हुआ है, उसका त्याग आवश्यक है।
लाखपति बन गए हैं किन्तु इस चौंथेंपन भी जबकि कुछ दिनों में खाकपति बनना निश्चित है, फिर भी करोड़पति बनने के लिए व्यग्र हैं। अतः ऐसी इच्छाओं के महल का त्याग करना ही होगा।
जब हम जाड़ा आने से पहले गर्म कपड़े की व्यवस्था करने लगते हैं ताकि भविष्य में कष्ट न हो तो क्या इस भवन को छूटने से पहले उहलोक के लिए (परलोक संवारने के लिए) कुछ नहीं करना चाहिए???
वस्तुतः चौंथेपन अभिशाप नहीं बल्कि परमात्मा प्राप्ति के अवसर प्रदान करने वाली अवस्था है,
अंतर्मुखी होने के अवसर प्रदान करता है और इसका लाभ अवश्य लेना चाहिए।
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