प्रस्तुति - दिनेश कुमार सिन्हा
*होइ न बिषय बिराग* भवन बसत भा चौंथपन।
हृदयँ बहुत दुख लाग,जनम गयउ हरिभगति बिनु।।
महाराज मनु जी कहते हैं कि इस राजमहल में रहते हुए,भोग विलास में डूबे हुए मेरा चौंथापन आ गया, यमराज के आने के संकेत रूप बाल सफेद होने लगे, और अभी तक मैं सचेत नहीं हुआ, विरक्ति नहीं हुई, गृह त्याग नहीं किया।
मनुष्य तो गुण और ज्ञान के भंडार है अतः यमराज के संदेश से पहले सावधान हो जाना चाहिए और वृद्धावस्था के आहट से ही(*कृतान्तस्य दूती जरा कर्णमूले*(- श्रवन समीप भए सित केसा)। समागत्य वक्तिति लोकाः शृणुध्वम्। )
कान के बगल के एक बाल भी यदि सफेद होने लगे तो चाहे मनु शरीर में हों या दशरथ शरीर में, उन्हें महल त्यागकर भगवद्भक्ति में लीन होने की इच्छा प्रबल हो गई।
इसका तात्पर्य क्या है?
शुरू से ही उनके मन में वैराज्ञ है जो अवस्था को देखते ही प्रबल हो गई।चाहे मनु शरीर में हों या दशरथ शरीर में, उन्हें किसी ने कहा नहीं है कि आपको अब गृह त्याग करना चाहिए बल्कि स्वयं तत्पर हैं अर्थात् अंतस्थवैराज्ञ पहले से है...
तेहि पुर बसत भरत बिनु रागा। चंचरीक जिमि चंपक बागा।।
जैसे भरत जी राज्य संचालन करते हुए भी चौदह वर्ष की अवधि को गिनते रह रहे थे कि कब वो समय आएगा कि मैं प्रभु राम जी के संपत्ति को राम जी को समर्पित कर दूंगा।
मनु जी भले ही कहें कि उनमें विषय वासनाओं से वैराज्ञ नहीं है किन्तु संत मुनि सज्जनों को ज्ञात है कि वे सता संचालन भी एक तपस्वी की भांति करते हैं...
*सब पर राम तपस्वी राजा*।
तिन्ह कर काज सकल तुम साजा।।
अधिपति के भाव से नहीं बल्कि परमात्मा के आदेश भाव से जीवन व्यतीत किया है, राज्य सुख भोग किया है। इसलिए जब वे वन गए तो ऋषि मुनियों ने उन्हें राजर्षि के रूप में स्वागत किया है...
आए मिलन सिद्ध मुनि ग्यानी।धरम धुरंधर *नृपरिषि जानी*।।
उनके अंदर वैराज्ञ पहले से है इसलिए उन्होंने मनुष्य के आचार संहिता का निर्माण किया है।
उनके अंदर यह भाव पहले से है इसलिए उन्होंने मनु संहिता में पहले ही लिखा है कि ..
*गृहस्थस्तु यदा पश्येद् वलीपलितमात्मनः । अपत्यसैव चापत्यं तदारऽरण्यं समाश्रयेत्*।।
विषयों से वैराज्ञ के लक्षण क्या है?
आखिर हम ये कैसे समझेंगे कि किसे विषय वैराज्ञ है??
अपने कर्तव्य से विमुख होना,
जिस पत्नी का पाणिग्रहण संस्कार किया है उसे अपने पर छोड़ देना,
या
स्त्री मर गई,
संपत्ति नष्ट हो गए,
तो सिर मुंडवा कर संन्यासी के वेष धारण करना संन्यास नहीं है।
(नारि मुइ गृह संपत्ति नासी।
तो
मुड़ मुड़ाई होइ संन्यासी??)
कदापि नहीं।
विषय वैराज्ञ ये है कि...
परस्त्री परद्रव्यं कांक्षा त्वजध्वम्।
भजध्वम् रमानाथ पदारविन्दम्।।
मन को पराई स्त्री पर,पराए धन पर , उसके प्रति भोग की आसक्ति न रखना तथा मन को श्री हरि के चरणारविन्द में लगाए रहना ही वैराज्ञ है।
महाराज मनु ने भगवद् आज्ञा अर्थात् वेद शास्त्रों में जो प्रभु की आज्ञा है,नियम है,उसका पालन किया है...
प्रभु आयसु सब बिधि प्रतिपाला।।
अतः कहीं भी उनमें राग की भावना नहीं थी बल्कि ये तो उनकी परम दैन्यता है जो भगवान को बहुत प्रिय है....
।।।।।
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