Wednesday, March 11, 2020

रोजाना वाक्यात / परम गुरू हुजूर साहबजी महाराज




प्रस्तुति - संत शरण /
रीना शरण / अमी शरण


**परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज- रोजाना वाक्यात- 2, 3 अगस्त 1932- मंगलवार, बुधवार:- 2 अगस्त को दिनभर दयालबाग में उत्सव रहा। तीसरे पहर कुश्तियां और गटके का खेल हुआ। जब बाजीगर अपनी बाजी दिखलाने लगे एकदम जोर की बारिश आ गई और सब आटा गीला हो गया।।            3 अगस्त को कर्नल डन तशरीफ लाए और डेरी की अनेक आंशिक फिल्म ले गए। कर्नल डन की इस मेहरबानी से हमारी डेरी पब्लिक की निगाह में आ जाएगी । डेरी की कलें और डेरी के इंतजामात देखकर सामान्य जन को लाभप्रद सबक हासिल होगा और डेरी का कारखाना आवाम की निगाह में चढ जाने से कारखाने की तरक्की होगी। आज दिन भर बारिश होती रही। सावन का महीना पूरे जोरों पर हैं चारों तरफ घटाएं छा रही है और टप टप बूंदे बरस रही है। जिधर देखों हरियाली ही हरियाली नजर आती है।किसों और कहानियों में वृन्दावन की जो तारीफ पढ़ने में आती है इन दिनों दयालबाग में प्रकट दिखलाई देती है।।              सुबह कॉरेस्पॉन्डेंस के वक्त सन्यासी साहब से बातचीत हुई ।ताज्जुब कि लोग यह कहने की हिम्मत रखते है कि  कारण व कारज यानी कारण व कारज एक हो सकते हैं। एक अर्से के बाद यह करार पाया कि कारण व कारज दो चीजें हैं। कारण पहले होता है कारज पीछे।और यह कि संस्कार व वासना में फर्क है। संस्कार से बासनायें पैदा होती है संस्कार कारण है और बासनायें कारज। मेरी राय में यह सब कमियां इल्म की जाती है। कमी की वजह से पैदा होती है और अक्ल की कमी की वजह से पैदा होती है। अक्ल की कमी रहते हुए इल्म का वही हाल होता है जो नादान बच्चे के हाथ में हीरे व लाल का ।।                      सन्यासी साहब कहने लगे कि सूक्ष्म दृष्टि के कारण व कारज  एक ही होते हैं क्योंकि सांखयमत यह है कि कारज कारण के  अंदर गुप्त तरीके से मौजूद रहता है । जवाब में कहा गया कि कारण के अंदर मौजूद नहीं रहता बल्कि कारज के प्रकट होने और कारज के रूप के मुतालिक इंतजाम उसके अंदर रहता है। मसलन बीज के अंदर दरख्त मौजूद नहीं रहता अलबत्ता दरख्त का रूप प्रकट किये जाने  का इंतजाम रहता है। और अगर सूक्ष्म दृष्टि इस्तेमाल की जावे तो न कारण रहे न कारज,.न बीज रहे न दरख्त। सांख्य मतानुसार सिर्फ पुरूष व प्रकृति रह जाते है उस हालत में सब बातचीत बंद हो जाती है। बातचीत अभी जारी रह सकती है जब सूक्ष्म दृष्टि छोड़कर और पव्यवहारिक  सत्यता पर निगाह रखी जावे आखिर में सन्यासी साहब ने यह बात मंजूर कर ली और बहस खत्म हुई।🙏🏻 राधास्वामी*🙏🏻

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