प्रस्तुति - अनामी शरण बबल /
ममता शरण /कृति शरण
**परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज-
रोजाना वाक्यात- 28, 29 जुलाई 1932-
बृहस्पतिवार और शुक्रवार:- दयालबाग में विद्युत शक्ति से चलने वाली 4 घडियाँ लग गई है। चारों घडियाँ चूँकि कि कल से चलती है इसलिए सबका वक्त एक सा रहता है। एक घड़ी टावर क्लॉक है जो कॉलेज बिल्डिंग के कंगरे पर लगाई गई है। बाकी तीन मामूली साइज की है और बैंक, मॉडल इंडस्ट्रीज, और टेक्निकल कॉलेज के दफ्तरों में लगाई गई है। सब पर ₹1000 के करीब खर्चा हुआ है।
पूना के एक कारीगर ने बनाई है। जिस शख्स को देखो हाथ पर घड़ी बांधे हैं लेकिन बहुत ही कम लोगों को घडी रखना व इस्तेमाल आता है। बाज औरतें तो दो दो घड़िया लगाती है। एक कलाई पर बाँधती हैं और दूसरी जेब में रखती है लेकिन न घडियाँ ठीक वक्त देती है और न घड़ी वालों को वक्त की पाबंदी का शौक है । यह महज रुपए की बर्बादी है ।
दयालबाग वालों को घड़ी ठीक रखने और वक्त की पाबंदी सिखलाने की गरज से यह नई घड़ियां लगाई गई है। मुझे पाबंदीएवक्त का अजहद शौक है जिसकी वजह से अक्सर तकलीफ उठानी पड़ती है मगर पाबंदीएवक्त सीखे बगैर कोई शख्स जिम्मेदाछछरी से काम पूर्णता नहीं कर सकता। इसलिए मेरी कोशिश है कि हर एक भाई व बहन वक्त की पाबंदी का उसूल सीखे और उस पर प्रतिबद्ध हो।।
गुरुकुल कांगड़ी से खत आया है कि 2 विद्यार्थी प्रोफेसर फकीरचंद साहब के साथ अगस्त के महीने के मध्य में दयालबाग देखने आना चाहते हैं। शौक से आए। और बेहतर हो कि वापसी पर प्रबंधकों गुरुकुल को प्रेरणा दें कि वहां भी कला व कौशल की तालीम की शाखा खोली जावे। जबकि महज अंग्रेजी की तालीम आजकल निरर्थक हो गई है तो महज संस्कृत की तालीम से कैसे गुजारा हो सकता है ?
दयालबाग नहर की स्कीम पर आज बहस व गौर किया गया। मेरी राय यथावत कायम है कि नहर बन सकती है और सब मुश्किलें दूर हो सकती हैं। अंततः यह प्रस्ताव हुआ कि जिन लोगों से मशीनें खरीदनी है उनसे मशवरा लिया जाए। चुनांचे एक खत कोलकाता तहरीर किया गया।।
सत्संगी भाई शिकायती पत्र भेज रहे हैं कि उनके लड़कों व रिश्तेदारों को टेक्निकल कॉलेज में जगह नहीं मिली। सबको जगह कैसे मिले जबकि नियमों की अनुसार से फर्स्ट ईयर क्लास में सिर्फ 15 लड़के भर्ती हो सकते हैं और उनमें से निस्फ गैरसत्संगी होने जरूरी है। बाज भाई मशवरा देते हैं कि ज्यादा तादाद में लड़के भर्ती किए जावे लेकिन वह भूल जाते हैं कि गवर्नमेंट ने अपनी ग्रांट की निस्बत यह खासतौर पर शर्त कायम की है कि किसी क्लास में 15 से ज्यादा विद्यार्थी ना लिए जावे ।
इसके अलावा हमारे कारखाने में अमली तालीम के लिए कलें भी सिर्फ इतने ही विद्यार्थीयों के लिए है। जब तक सभा ज्यादा तादाद में कलें उपलब्ध ना करें अधिक लड़कों को भर्ती करना उनका नुकसान करना है। हमें हर काम में सत्य निष्ठा से बरतना चाहिए। चाहे बुरा माने या भला।
राधास्वामी दयाल ऐसी दया फरमावें की हम बड़े से बड़े पैमाने पर नौजवानों की खिदमत कर सके। जब तक हमारी यह प्रार्थना मंजूर न हो, सतसंगी भाइयों को सब्र से काम लेना होगा।
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🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**
: **परम गुरु साहबजी महाराज -सत्संग के उपदेश -
भाग 2 -(33)-
【 असली व झूठे त्याग में फर्क।】:-
दुनिया में जाहिरी त्याग की बड़ी महिमा है जो शख्स अपने जिस्म का बहुत सा हिस्सा नंगा रखें या ओढने के लिए मोटा कपड़ा या कंबल इस्तेमाल करें और सिर व दाढ़ी मूंछ के बाल लंबे व बेतरतीब रखे वह बड़ा त्यागी समझा जाता है और जो शख्स समय समय पर अपने त्याग का जिक्र करता रहे और रुपया पैसा छूने से इनकार करें उसकी महिमा का तो कुछ बार-पार ही नहीं है ।क्या वे सब लोग , जो इस किस्म के स्वांग बनाए फिरते हैं और बार-बार गृहस्थों से मिलकर अपनी जरूरियात पूरी कराते हैं, दिल से संसार के भोग बिलास को नफरत या लापरवाही की निगाह से देखते हैं ? अगर सच पूछा जाए तो खास लोगों का जिक्र छोड़ कर आमतौर पर ऐसे लोग यह स्वांग बतौर रोजगार के रचतज हैं क्योंकि वे बखूबी समझते हैं कि त्याग कि चिन्ह देखकर गृहस्थों के दिलों में सेवा के लिए बड़ी उमंग पैदा हो जाती है और वे त्यागी जी की जरूरियात पूरी करने के लिए रुपया पैसा खर्च करना अपनी बडभागता समझते हैं।
वाजह हो कि त्याग व वैराग्य वही सच्चा व लाभदायक है जो दिल से हो ।अगर दिल में दुनियावी साज व सामान के लिए मोहब्बत व राग मौजूद है तो बाहरी त्याग व वैराग्य महज कपट की कार्रवाई है ।हाफिज ने खूब कहा है:- इस किस्म की मक्कारी से यह मुमकिन है कि कोई शख्स सौ पचास लोगों को अपना श्रद्धालु बना लें और उनसे सेवा व टहल कराके अपने दिन आराम से गुजारे लेकिन ऐसा शख्स सच्चे परमार के मार्ग पर कदम रखने के काबिल हरगिज ना होगा।
बाज लोग कहते हैं कि रुपया पैसा छूने से बड़ा पाप लगता है इसलिए अभ्यासी पुरुषों को कभी चांदी सोने को हाथ नहीं लगाना चाहिए ।हम पूछते हैं कि क्या पाप लगता है? सच्चे विरागी पुरुष के लिए सोना ,चांदी व मिट्टी एक समान है क्योंकि तीनों एक ही खानि से निकलती है और यकसाँ मुफीद है । क्या मिट्टी, लोहा, कांसा , पीतल किसी एक मालिक ने बनाए हैं और सोना ,चांदी दूसरे ने? यह सब के सब धातुएं उसी एक मालिक के इंतजाम से और एक ही पृथ्वी से प्राप्त होती है? अब जरा गौर करो कि रुपए पैसे क्या चीज है? ये महज चांदी ल ताबें के टुकड़े हैं जिन पर खास किस्म के नक्स वगैरा खुदे हैं और जिस हुकूमत ने उन्हें तैयार किया है उसके हुकुम से चीजों के खरीद-फरोख्त के सिलसिले में बतौर कीमत के लिए वह दिए जाते हैं क्रमश:
🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**
**परम गुरु हुजूर महाराज-
प्रेम पत्र -
कल से आगे -(९ )
और जब सामान खुशी का मयस्सर आवे तब उसमें बहुत खुश न होवे और ना फूले, क्योंकि इसमें सुरत फैलती है। उस वक्त ऐसा ख्याल करें कि जो अपने मन को संभाले रखेगा तो उसके अभ्यास में खलल ना पड़ेगा, और नहीं तो मौज उनके मन को किसी न किसी तरह से दुखी करके संभालेगी ।ऐसा डर और ख्याल मन में रखकर अपनी संभाल करता रहे।।
(१०) जब कभी तबीयत बीमार होवे और तरह की तकलीफ होवे जिससे भजन और ध्यान में बैठ ना सके, तो जैसे बने लेटे-लेटे या बैठे-बैठे मन या चित्त से चरणों का सेवन करता रहे। जो इसका मन या चित्त चरणों में लगा रहेगा, तो वह बीमारी या तकलीफ इसको कम व्यापेगी, और जो ज्यादा बीमारी या तकलीफ में यह भी बन पडे तो मन से राधास्वामी नाम का सुमिरध ही करता रहे और संग संग थोड़ा बहुत ख्याल रखें। इस तरह से भी तकलीफ जरुर थोड़ी बहुत कम हो जाएगी ।
(११) और जहां तक बन सके किसी आदमी या जानवर या चीज में अपने चित्त का बंधन हद से ज्यादा ना करें , क्योंकि ज्यादा बंधन में दुख सुख ज्यादा भोगना पड़ता है और अपना ख्याल भी बिखरा हुआ रहता है और भजन या ध्यान में कम सिमटता है।
(१२) और हर एक के साथ जिनसे इसको काम पड़े जहां तक मुमकिन होवे मुलायमियत या दीनता या प्यार के साथ बरताव करें । सो मुलायमियत तो उनके साथ जो अपने से छोटे हैं, जो बराबर है उनके साथ प्यार और जो बड़े हैं उनके साथ दीनता।
(१३) और अपने मतलब के वास्ते किसी को ना दुखावे बल्कि जहां तक बन सके सुख पहुंचाना चाहिए ।और जो कोई ऊँच नीच तो जहां तक उसकी बर्दाश्त करें और किसी के साथ झगड़ा पैदा करें और जो अपना थोडा सा नुकसान भी होवे तो भी उसका सोच और ख्याल ना करें और अपनी तबीयत को झगडे बखेडे से और तकलीफ से बचाता रहे। मंसा बाचा कर्मना, सबको सुख पहुँचाये। अपने मतलब कारने, दुख न दे तू काय।।
जो सुख नहीं तू दे सके, तो दुख काहू मत दे। ऐसी रहनी जो रहे, सोई शब्द रस ले।।क्रमशः
🙏🏻 राधास्वामी*🙏🏻*
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