प्रस्तुति - अनामी शरण बबल
आज 10.03.2020
सतसंग के उपदेश
भाग-2
(परम गुरु हुज़ूर साहबजी महाराज)
बचन (53)
वक़्तगुरू की ज़रूरत।
(गतांक से आगे)
ज़रा सा निष्पक्ष ग़ौर करने पर मालूम होगा कि गुरुभक्ति के मुतअल्लिक़ सन्तमत और कृष्ण महाराज की तालीम बिल्कुल एक है और इसलिये अगर सन्तमत में सब देवी देवताओं की पूजा, यज्ञ कर्मों और वेदादि शास्त्रों की परस्तिश से हटाकर ज़िन्दा और पूरे गुरु की तलाश के लिये ज़ोर दिया जाता है तो यह तालीम हिन्दू भाइयों को हिन्दू मज़हब से हटाने वाली नहीं है बल्कि उन्हें उनके बुज़ुर्गों के बतलाये हुए रास्ते पर,जिससे वे अब कोसों दूर पड़ गये हैं, दोबारा डालने वाली है।
यह बयान पढ़कर बाज़ भाई, जो सन्तमत की तालीम से पूरी वाक़फ़ियत नहीं रखते, कह सकते हैं कि हम तसलीम करते हैं कि ज़िन्दा व सच्चे गुरु की तलाश करनी चाहिये लेकिन ख़ुद राधास्वामी मत के लोग भी तो सच्चे गुरु की तलाश नहीं करते। राधास्वामी मत में जो महापुरुष गुरू माने जाते हैं हरचन्द उनकी रहनी गहनी बहुत अच्छी थी लेकिन जबकि उन्होंने वेदादि शास्त्र नहीं पढ़े और उनको संस्कृत विद्या पर अधिकार हासिल नहीं था तो वे कैसे गुरुपदवी के अधिकारी हो सकते हैं वग़ैरह वग़ैरह।
वाज़ह हो कि एतराज़ करने वालों का यह ख़्याल कि बिला वेदादि शास्त्र पढ़े और संस्कृत विद्या पर अधिकार हासिल किये कोई पुरुष गुरुपदवी का अधिकारी नहीं हो सकता, बिल्कुल व्यर्थ है। यह एतराज़ ज़्यादातर वे भाई करते हैं जिन्होंने ख़ुद वेदादि शास्त्रों को तो पढ़ा नहीं लेकिन अपने दिल में प्राचीन पवित्र पुस्तकों की निस्बत अजीब व ग़रीब ख़्यालात रखते हैं। अगर ये भाई ज़रा तकलीफ़ उठाकर ख़ुद वेदादि शास्त्रों का मुताला करें तो उनका यह एतराज़ आप से आप दूर हो जावे। उपनिषदों में जाबजा सच्चे गुरू की ज़रूरत व तलाश के लिये हिदायत फ़र्माई गई है। चुनाँचे कठोपनिषद् में एक जगह पर आता हैः-
”उठो, जागो और चुने हुए गुरुओं से उपदेश हासिल करो। विद्वान् यानी ऋषि लोग कहते हैं कि वह रास्ता छुरे की धार सा तेज़ है और चलने के लिये कठिन और दुर्गम है।“
अलावा इसके मनुस्मृति के दूसरे अध्याय में गुरु की महिमा व सेवा के मुतअल्लिक़ मुफ़स्सिल हिदायतें दर्ज हैं। लिखा है- ”जो शिष्य शरीर की समाप्ति यानी मरने तक गुरु की सेवा करता है वह ब्रह्म के अविनाशी स्थान में प्राप्त होता है यानी मरने के बाद ब्रह्म में लीन हो जाता है।“ (श्लोक244)
”देह में बटना मलना, स्नान कराना,जूठा भोजन करना और पैरों का धोना इतनी बातें गुरु के पुत्र की न करे, सिर्फ़ गुरु ही की करे।“ (श्लोक 209)
इसके अलावा भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में बयान फ़रमाया गया हैः-
”वेदों का विषय तीन गुण हैं यानी वेदों में तीन गुणों का अर्थात् सत्, रज, तम की जहाँ तक पहुँच है, उपदेश है। ऐ अर्जुन! तू तीन गुणों की हद से पार हो और द्वन्द्वों से परे हो और नित्य यानी सदा क़ायम रहने वाली वस्तु में स्थित हो, प्राप्त और अप्राप्त वस्तुओं से लापरवाह हो और आत्मवान् हो। (श्लोक45)
ज्ञानी ब्रह्मवित् पुरुष के लिये सारे वेद इतने ही कारआमद हैं जितना कि किसी जल से भरपूर जगह में पानी का एक गढ़ा मुफ़ीद हो सकता है यानी जैसे समुद्र के सामने पानी का एक गढ़ा कोई हैसियत नहीं रखता ऐसे ही ज्ञानी पुरुष के सामने वेदों में बयान किया हुआ ज्ञान कोई वक़अत नहीं रखता। (श्लोक 46)
इसके अलावा ग्यारहवें अध्याय में फ़रमाया हैः-
”ऐ कौरवों में श्रेष्ठ! (अर्जुन!) न वेदों से,न यज्ञों से, न पढ़ने पढ़ाने से, न दानों से, न कर्मों से और न उग्र तप से इस नरलोक में (जिसमें मनुष्य बसते हैं) तुम्हारे सिवा कोई मेरा इस प्रकार का स्वरूप देख सकता है। (श्लोक 48)
ऐ अर्जुन! मेरी कृपा से तुझे इस रूप का दर्शन हासिल हुआ है, वग़ैरह वग़ैरह। (श्लोक 47)
इस सब प्रमाणों पर ग़ौर करने से अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि एतराज़ करने वालों के इस बयान में किस क़दर जान है कि बिला वेदादि शास्त्र पढ़े कोई शख़्स गुरुपदवी का अधिकारी ही नहीं हो सकता और नीज़ समझ सकते हैं कि ब्रह्मज्ञानी यानी सच्चे गुरू के मुक़ाबिले वेदों की क्या हैसियत है और हमारे भूले भाई, जिनका दिल वेदादि शास्त्रों और संस्कृत विद्या की मोहब्बत से भरपूर है और जो बजाय सच्चे गुरू की तलाश के अपना वक़्त पुस्तकों के पढ़ने और प्राचीन ग्रन्थों की महिमा गाने में सर्फ़ करते हैं, कहाँ तक सच्चाई के पक्ष पर हैं।
राधास्वामी
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